Monday, 14 December 2009

बदलाव की डगर पर

बज्जू राजस्थान

नीले रंग का घाघरा, चेाली और सिर को आगे तक ढकती लंबी चैढ़ी ओढ़नी, माथे पर बड़ा सा बोर (टीका), सफेद चूड़ियों से आधी से अधिक भरी दोनों बाजू। राजस्थान के छोटे से गांव बज्जू की 36 वर्शीय धापू बाई ने कभी सोचा भी न था कि निरंतर सूखे से जूझती उसकी जिंदगी में ऐसा बदलाव भी आएगा कि एक दिन देष की राजधानी में सभ्रांत लोगों, प्रेस और कैमरों की भीड़ में वह अपनी कला के लिए सराही जाएगी। सात लड़कियों, एक लड़के की मां धापू बाई का जीवन अभी तक खेती में मजदूरी करने या ढोर डंगर चराने में ही बीता। लेकिन पिछले कुछ सालों से राजस्थान में पड़ने वाले निरंतर सूखे ने जब उससे कमाई का यह साधन भी छीन लिया तो उसे अपने बच्चों को दो वक्त खाना खिलाने के भी लाले पड़ गए। इसी संकट के समय में उसका सहारा बना ‘उरमूल संगठन’। धापू कढ़ाई करना तो जानती थी लेकिन अपने अंदर छिपी इस कला को उभारने और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करने का अवसर दिया उरमूल ट्रस्ट ने। बीकानेर जिले के बज्जू क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर के पास बनी बस्तियों में रहने वाले अधिकतर घरों की महिलाएं यह काम कर रही हैं। 1971 में पाकिस्तान से भारत आए षरणार्थियों में कई परिवारों को इस क्षेत्र में रहने के लिए जमीन दी गई। इन परिवारों की महिलाएं जियोमेट्रिकल आकार में, कपड़े के एक एक धागे की गिनती के आधार पर कढ़ाई करने में पारगंत थी। लेकिन बाड़मेर, जैसलमेर और उसके बाद बीकानेर की यह कला केवल छोटे व्यापारियों में ही मान्य थी। कम मजदूरी, अनियमित काम के कारण महिलाओं को अपनी कला को निखारने का बहुत कम अवसर मिला। आखिर ‘उरमूल’ ने इन जरूरतों को पूरा करने के लिए कढ़ाई की ‘सीमांत-परियोजना’ षुरू की। कढ़ाई की पारंपरिक कला को नए-नए उत्पादों में इस्तेमाल करने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया गया। उनकी कला में और सुधार लाने के लिए प्रषिक्षण की वयवस्था की गई। कुषन कवर और बैग के अलावा विभिन्न प्रकार की साज-सजावट के उत्पादों पर भी कढ़ाई का इस्तेमाल षुरू किया गया। कला में रूचि रखने वाली अन्य महिलाओं को भी कढ़ाई का प्रषिक्षण दिया गया। बीच के दलाल को हटाकर ट्रस्ट ने इन महिलाओं को अपने उत्पादों की मार्किटिंग करने के लिए विभिन्न जगहों पर जाकर उन्हें प्रदर्षित करने का रास्ता दिखाया। दो एडी गांव की मनबी कढ़ाई करने वाली विभिन्न समूहों की ‘क्वालिटी कंट्रोलर’ है। भले ही बड़ी - बड़ी कंपनियों में नियुक्त ‘क्वालिटी कंट्रोलर’ की तरह उसके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं। लेकिन पूरी तरह देहाती यह महिला कढ़ाई में सफाई कैसे बरतें और माल को दाग धब्बे रहित बनाए रखने की कला बखूबी जानती है। मनबी बताती है कि वह महिलाओं को धागा देने के अलावा अपने काम में सफाई कैसे बनाएं इसकी जानकारी देती है। मनबी इस काम के अलावा खेती और पषुपालन का काम भी करती है। उसे एक माह में पांच सौ से एक हजार रुपए के बीच की राषि मिलती है। इस समूचे कार्य की संयोजक राजकुमारी के मुताबिक कुष्नों, कुर्तों पर कढ़ाई करने वाली महिलाओं को काम के हिसाब से पैसा दिया जाता है। अधिकतर महिलाएं 35 से 40 रुपए एक दिन में कमा लेती हैं। काम भी केवल 2-3 घंटे ही करती हैं बाकी समय मे पषु चराने का काम करती है। कढ़ाई इत्यादि होने के बाद दर्जी इसकी सिलाई करते हैं। एक दर्जी को पांच कुर्तों के लिए 100 से 150 रुपए मिलते हैं। ‘उरमूल ग्रामीण स्वास्थ्य अनुसंधान और विकास ट्रस्ट’ ने 1986 में बीकानेर जिले के लूणकरणसर में अपना काम षुरू किया। भंयकर सूखे से त्रस्त महिलाओं को रोजी रोटी चलाने के लिए धागा कातने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसी के बाद बीकानेर जिले के अलावा जोधपुर जैसलमेर और सीकर जैसे जिलों में इस धागे के इस्तेमाल के लिए रोजगार अवसरों की षुरूआत हुई। एक समय में 500 से भी अधिक महिलाएं धागा कातने का काम कर रही थीं। लेकिन इस धागे को खरीदने के लिए खरीददार नहीं थे। धागे के इस्तेमाल के लिए जोधपुर जिले के फलौदी ब्लाक और जैसलमेर जिले के पोकरण ब्लाक के पारंपरिक बुनकर की मदद लेने की षुरूआत हुई। इस प्रयास ने ‘दलाल’ की ऊपर की निर्भरता को खत्म किया। दो सालों के अंदर बुनकरों ने मर्किटिंग, रंगने, स्टाक रखने और हिसाब किताब रखने में महारत हासिल कर ली। कला के विकास से मार्किट की मांग में भी विस्तार हुआ और इन लोगों को अपने ही समुदाय का लाभ बढ़ाने की इच्छा जागृत हुई। इसी इच्छा ने ‘उरमूल मरूस्थली बुनकर विकास समिति’ की स्थापना की दिषा दिखाई। पष्चिमी राजस्थान के ‘मेघवाल’ समुदाय के अधिकतर बुनकर इस समिति के सदस्य है। लंबे समय के उत्पीड़न ने इस जाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी कमजोर बना दिया था। लेकिन उरमूल समिति के कारण 170 परिवारों को सम्मान के साथ जीने का अवसर दिया। पारंपरिक डिजाईनों, रंगों और उत्पादों के निंरतर प्रदर्षन से अच्छा प्रोत्साहन मिला। अब समिति के 50 प्रतिषत उत्पादों का जापान और न्यूजीलैंड में निर्यात किया जाता है। अब किसी मेघवाल बुनकर को ‘बड़े आदमी’ के घर के सामने से निकलने के लिए अपने जूते उतारकर हाथों में नहीं पकड़ने पड़ते। लूणकरणसर जहां से इस कला की विकास की कहानी षुरू हुई थी, वर्श 1992 में बुनकरों, दर्जियों और कातनेवालों को स्थायी रोजगार प्रदान करने के लिए ‘वसुंधरा ग्रामोत्थान समिति’ बनाई गई। पारंपरिक बुनकरों की स्थिति भी काफी खराब थी। उनके पास कोई भी स्थायी रोजगार नहीं था। वसुंधरा ने उन लोगों को भी नए डिजाईन के पीढ़ा चारपाई और स्टूल बनाने का प्रषिक्षण दिया। अभी तक यहां षादी विवाह में इस्तेमाल किए जाने वाले पंारपरिक पीढ़े और स्टूल बनाने का प्रचलन था। लेकिन जल्द ही इन लोगों ने ऐसे फर्नीचर बनाने षुरू कर दिए जिसमें बुनाई का काम अधिक रहता है। फर्नीचर के अलावा महिलाओं और पुरूशों के लिए हाथ से बुनी उनी षाल और जैकेट भी बनने लगे। समिति के हस्तक्षेप की वजह से बुनकरों को अब बाजार की तलाष में भटकना नहीं पड़ता। वे समिति के प्रबंधकों केे जरिए फलोदी स्थित समिति के मुख्य कार्यालय से जुड़े हैं। जो इन्हें धागा डिजाइन और आर्डर सप्लाई करते हैं और हर महीने के आखिर में तैनात तैयार माल फलोदी लाते हैं। यहां दो दिन तक इसकी क्वालिटी की जांच की जाती है। खारिज माल की कीमत बुनकरों की सलाह से तय की जाती है। समिति ने बुनकरों का जीवन बीमा भी कर रखा है। साल के आखिर में समिति को जो लाभ होता है वह सभी बुनकरों में बोनस के रूप में बांटा जाता है। लबें समय से अभाव की जिंदगी जी रहे इन लोगों ने अपनी ही पारंपरिक कला में जीने के नए मायने ढूंढ लिए हैं। महिलाओं ने सूखे को अपनी नियती मानकर उसका रोना रोने और सरकारी सहायता की बाट जोहने की बजाय अपनी कला को महानगरों के संभ्रात घरों की षोभा बनाकर आर्थिक रूप से सबल होने का रास्ता ढूंढ लिया है। अन्नू आनंद एसोसिएट एडिटर ग्रासरूट ए-65 परवाना अर्पाटमेंटस मयूर विहार, फेज 1 एक्सटेंषन नई दिल्ली 110091

2 comments:

अर्शिया said...

इस बदलाव को हवा देने की जरूरत है।
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ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।

Mired Mirage said...

पढ़कर अच्छा लगा। सराहनीय काम हो रहा है।
घुघूती बासूती