Friday, 26 December 2008

एक अरब लोगों का मीडिया?

अन्नू आनंद
मई माह में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने प्रेस इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया द्वारा आयोजित ‘ग्रासरूटसमिट’ में एक अरब लोगों के लिए मीडिया का विकास करने का आह्नान किया। उनका कहना थाकि मीडिया को देश की समूची जनता की ‘पीड़ाओं और दुखों तथा खुशियों और सफलताओं’ कोप्रतिबिंबित करना चाहिए। यानी मीडिया को उनकी स्पष्ट हिदायत थी कि वे किसी विशिष्ट वर्गतक सीमित न रह समूची जनसंख्या की भावनाओं का प्रतिबिंब बने। राष्ट्रपति का यह सुझाव बेहदही सामयिक और सटीक है क्योंकि मौजूदा समय में मीडिया केवल दस प्रतिशत लोगों का खैरख्वाहबना हुआ है।
नब्बे करोड़ से अधिक लोगों की उपेक्षा कर केवल दस प्रतिशत लोगों की जरूरतों, ख्वाहिशों,खुशियों और गमों को प्रस्तुत करने वाले मीडिया का यह संकुचित दृष्टिकोण अब निरंतर चिंता औरबहस का विषय बनता जा रहा है। पिछले एक दशक से मीडिया का जिस तेजी से विस्तार हो रहाहै उसी तेजी से उसकी प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं। पिछले तीन माह में मीडिया में प्रमुखता सेछाए रहे मुद्दों को देखने से यह स्थिति स्पष्ट होती है।
अप्रैल माह की शुरूआत में सबसे अधिक मीडिया पर छाने वाला मुद्दा ‘लक्मे फैशन वीक’ और‘सेंसेक्स में अभूतपूर्व उछाल’ था। लक्मे फैशन वीक में रैम्प पर एक माॅडल की चोली के खिसकनेपर चैनलों के स्टूडियो में बहसों के दरबार सज गए। अधिकतर अखबारों ने इस पर बड़ी-बड़ीफोटो के साथ विभिन्न कोणों से अपने नजरियों को छापा। लेकिन इसी दौरान विदर्भ में किसानोंकी मौतों का आंकड़ा एक सप्ताह में चार सौ तक पहुंच गया। कुछेक पत्रों को छोड़कर शेष सभीमीडिया (चैनल/अखबार) ने इनकी कवरेज को एक दो कालमों तक ही सीमित रखा। सेंसेक्स में1100 तक के उछाल को अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने लीड और कवर स्टोरीज़ बनाया। प्राइमचैनलों ने भी सबसे अधिक समय दिया। जबकि हकीकत यह है कि स्टाॅक एक्सचेंज में निवेश करनेवाले लोगों की संख्या दो प्रतिशत से अधिक नहीं है।
जब समाचारपत्रों के फीचर पन्नों पर और चैनलों के स्टूडियों में सेंसेक्स के बढ़ते ग्राफ और ‘लक्मेफैशन वीक’ पर लंबी चर्चाएं हो रही थीं उसी दौरान वोट के अधिकार से महरूम, खुले आकाश केनीचे रहने को मजबूर करीब छह करोड़ की जनसंख्या वाला एक समुदाय मात्र वोट का अधिकारहासिल करने और सिर पर एक छत पाने के लिए राष्ट्रीय अधिवेशन कर रहा था लेकिन उनके इसबुनियादी अधिकारों के समाचार न तो अखबारों में खबर बने और न ही 24 घंटे के समाचार चैनलोंने इसकी कवरेज करना उचित समझा।
मई माह देश के चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों की स्विंग में हुए जोड़-घटाव मेंबीत गया और फिर शुरू हुआ म्ंाडल 2 का विवाद। सभी खबरिया चैनलों ने आरक्षण के मुद्दे परबहस चलाने से अधिक आरक्षण के विरोध में हो रहे आंदोलन को कवर करने में दिलचस्पी दिखाई।चैनलों में आंदोलन को ‘रंग दे बसंती’ की तर्ज पर कवर करने की होड़ मच गई। जून माह में‘राहुल महाजन की अय्याशी’ के कारण उपजे माहौल पर चैनलों ने एक-एक पल की फुर्तीलीरिपोर्टें दीं। लेकिन इसी दौरान राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत होनेवाली पदयात्रा और उड़ीसा के कलिंगनगर तथा छत्तीसगढ़ के नक्सली क्षेत्रों में आदिवासियों परहमलों की खबरें मीडिया की हेडलाइन बनने से तरसती रहीं।
यह सर्वविदित है कि देश में तीन वर्ष से कम आयु के 47 प्रतिशत बच्चे कम वजन के पैदा होतेहैं। केवल 42 प्रतिशत बच्चों का जन्म ही प्रशिक्षित हाथों से हो पाता है। प्रसव कारणों से मरनेवाली महिलाओं की औसत दर अभी भी 540 है। इस सब के बावजूद यदि मीडिया आइटम गर्लराखी सावंत और मीका के प्रकरण पर सबसे अधिक समय और स्पेस खर्च करे, राहुल महाजन कोअभियुक्त या निर्दोष साबित करने के लिए ‘चार या पांच ग्राम’ जैसे विशेष कार्यक्रम प्रसारित करे,समाचारपत्रों में विशेषज्ञों की विवेकशीलता का सबसे अधिक इस्तेमाल इन घटनाओं के विश्लेषणोंपर खर्च हो तो यह आभास होना स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं कुछ गलत अवश्य है।
पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया की सामाजिक पृष्ठभूमि पर कराए गए एक सर्वेक्षण के बाद मीडिया मेंयह बहस छिड़ गई कि मीडिया के उच्च पदों पर आसीन उच्च जाति के लोगों के कारण मीडियाका नजरिया पिछड़े दलितों और हाशिए के लोगों के प्रति उपेक्षित है। जल्दबाजी में यह निष्कर्षनिकालना शायद उचित नहीं। भले ही निर्णयकत्र्ताओं के पदों पर बैठने वाले लोगों की जात इनमुद्दों को उजागर करने में आड़े न आती हो लेकिन केवल चुनिंदा लोगों (दो से दस प्रतिशत) केमुद्दों की कवरेज़ के प्रति उनका विशेष मोह उनका एक विशेष ‘क्लास’ से संबंधित होने को दर्शाताहै।अगर केवल बाजारी दबावों के कारण मुख्यधारा के पत्र टेबलाॅयड में और न्यूज चैनल मनोहरकहानियों में बदलने के लिए विवश हो रहे हैं तो उन्हें अपनी सीमा रेखा निर्धारित करनी होगी। एकअरब से अधिक लोगों की अपेक्षाओं का मीडिया केवल दस करोड़ लोगों तक सीमित न रहे इसकेलिए मीडिया समूहों के संपादकीय और प्रबंधकीय विभाग को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने केसाथ इस सोच को भी बदलना होगा कि पाठक/दर्शक अपराध, सनसनी और मनोरंजन ही चाहताहै। फिलहाल किसी भी राष्ट्रीय स्तर के किसी सर्वे में ऐसे निष्कर्ष नहीं निकले हैं। 􀂄
(यह लेख अप्रैल-जून 2006 में प्रेस इंस्टीट्यूट की पत्रिका विदुर में प्रकाशित हुआ )है

2 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

आपकी पोस्ट में लिखी गई बातों से सहमत हूँ. मीडिया ने अभी तक अपना कर्तव्य बखूबी नहीं निभाया है. कल ही एक समाचार पत्र में पढ़ रहा था कि संसद में एक ही दिन में सत्रह विधेयक पास हुए लेकिन उनपर कोई बहस नहीं हुई. ये सारे विधेयक बिना बहस के ही पास नहीं हुए बल्कि सभी विधेयकों को पास करने में केवल बीस मिनट का समय मिला.

मैंने इस बात की चर्चा किसी टीवी चैनल पर नहीं देखी. एक दिन एक डॉक्टर साहब के चेंबर के बाहर बैठा था. करीब तीन साल पुरानी पत्रिका पढने को मिली. साल २००४ के दिसम्बर महीने के आउटलुक पत्रिका का संस्करण था. ट्वेंटी हीरोज ऑफ़ इंडिया नाम से एक विशेष कवरेज था. ऐसे लोगों की कहानी जिन्होंने अपने कामों से एक बहुत बड़े क्षेत्र और बहुत बड़ी जनसँख्या को प्रभावित किया.

पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई. कई बार सोचता हूँ कि इस तरह की कोई सीरीज कोई टीवी चैनल शुरू क्यों नहीं कर सकता. इतने सारे लोग हैं जो अपने स्तर पर काम करके समाज और देश का भला कर रहे हैं. जिनके काम देखकर लोगों को प्रेरणा मिले. लेकिन हमारी मीडिया फ़िल्म स्टार्स के नखरे कवर करने में बिजी है.

और ये सारा कुछ बहुत दुखद है.

Annu Anand अन्नू आनंद said...

aap ne bilkul sahi kha. lekin channel walon ka kehna hai ki in logon ke kaam ko dikhane mein hamein vigyapan kaun dega... hamara kya fayda...... aajkal media social responsibility se pehle laabh ki baat sochta kai. annu anand