Thursday, 18 December 2008

भाषा से खिलवाड़


अन्नू आनंद

किसी भी पत्र-पत्रिका की विषय-वस्तु अगर उसका शरीर है तो भाषा उसकी आत्मा कही जासकती है। किसी भी पत्र-पत्रिका की पहचान उसकी विषय सामग्री, भाषा, उसकी साज-सज्जाऔर उसके प्रस्तुतिकरण के तरीके से बनती है।पिछले कुछ समय से तकनीकी क्रांति और उदारीकरण के चलते पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप में भारीबदलाव की प्रक्रिया देखने को मिल रही है। नए प्रकार की पिं्रट तकनीकों और बाजारवाद के प्रभावके चलते अखबारों की साज-सज्जा पूरी तरह बदल गई है। विषय-सामग्री का स्थान सिकुड़ करछोटा हो गया है जबकि चित्रों का आकार बड़ा हो गया है। पृष्ठों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुईहै। काले-सफेद चित्र रंगमय हो गए हैं। बदलाव की आंधी ने विषय-सामग्री की गंभीरता को भीकम कर दिया है। गंभीर विषयों को भी इस ढंग से प्रस्तुत करने की होड़ छिड़ी है कि पाठकउसको भी मनोरंजन समझ कर पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएं। विचार गायब होते जा रहे हैं औरबाॅक्स आइटम जैसी रिपोर्टें भी बडे़ समाचारों के रूप में प्रकाशित हो रही हैं।बात यहीं खत्म नहीं होती, बदलाव की चक्की में सबसे अधिक भाषा पिस रही है। हिंदीसमाचारपत्रों में भाषा को लेकर मन-माने प्रयोग किए जा रहे हैं। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की मौजूदाभाषा में अंग्रेजी शब्दों की घुसपैठ इस कदर बढ़ गई है कि हिंदी की अपनी सुगंध, उसकीअभिव्यक्ति की मिठास अंग्रेजी की मिलावट से पूरी तरह खत्म हो गई है।हिंदी भाषा के समर्थक और उसके संरक्षण के हिमायती भी अब बाजारवाद की भाषा लिखने-बोलनेलगे हैं। कुछ समय पहले तक पत्र-पत्रिकाओं में भाषा के साथ छेड़छाड़ करना उतना संभव नहींथा, लेकिन अब सबसे अधिक प्रयोग भाषा के साथ ही हो रहे हंै। हैरत की बात तो यह है किबदलाव की इस चूहा-दौड़ में हिंदी के उन शब्दों का इस्तेमाल भी बंद हो गया है जिनके बेहदसरल और स्पष्ट मायने हंै। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षकों को देखें तो यह पता ही नहीं चलेगाकि वे किस भाषा में हैं। भाषा में इस बदलाव के समर्थकों का तर्क है कि आम पाठक तक पहुंचनेके लिए हिंदी में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।हिंग्रेजी समर्थकों का यह तर्क समझ से बाहर है क्योंकि आम पाठकों में हर वर्ग शामिल है औरहिंदी समाचारपत्र-पत्रिका पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति उतनी सरलता से एचीवमेंट, फेवरेट,सिचुएशन, जर्नी या पेशेंट्स को नहीं समझ सकता है जितनी सहजता से उपलब्धि, पसंदीदा,स्थिति, यात्रा या मरीज जैसे शब्दों को समझता है।कुछ समय पहले तक अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल तकनीकी शब्दों तक ही सीमित था। उसमें भीप्रयास यही रहता था कि उसका हिंदी विकल्प ढूंढा जाए। जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी के तकनीकीशब्दों के हिंदी शब्द गढ़े जाते थे। ऐसे ही एक प्रयास में विज्ञान लेखक रमेश दत्त शर्मा नेजेनेटिकल इंजीनियरिंग के लिए ‘जिनियागरी’ शब्द खोज निकाला था। मुझे याद है कि स्वास्थ्यऔर पर्यावरण के विषयों पर हिंदी में लिखते हुए अक्सर ऐसे शब्दों पर कठिनाई आती थी। फिर भी‘ट्यूबकटोमी’ के लिए बंध्याकरण या ‘वेस्कटोमी’ के लिए नसबंदी और बायोटेक्नोलाॅजी के लिएजैविक तकनीक तथा बायोडेवर्सिटी के लिए जैव विविधता का ही इस्तेमाल किया जाता था।उस समय हिंदी के किसी भी कठिन या तकनीकी शब्द को सरल बनाकर प्रस्तुत किया जाता थाताकि हर वर्ग का पाठक इन शब्दों को समझ सके। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने जनसत्ता कासंपादन करने के दौरान एक वर्तनी भी बनाई और सभी को हिदायत दी कि वे सरल शब्दों काप्रयोग करें। उन्होंने ‘अर्थात्’ के लिए ‘यानी’, ‘उद्देश्य’ के लिए मकसद, ‘किंतु-परंत’ु के लिए‘लेकिन’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दिया ताकि बोलचाल की हिंदी जानने वाला पाठक भीउसे समझ सके।ऐसे ही प्रयास अन्य संपादकों ने भी किए ताकि हिंदी अखबारों में एक बेहतर और सरल भाषा काविकास हो सके।लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अब तो सभी अखबारों में हिंदी के सरल शब्दों कोभी अंग्रेजी में लिखने का प्रचलन है। इसके लिए यह तर्क दिया जा रहा है कि इस से पाठकों कीसंख्या बढ़ रही है। क्या कोई भी सर्वे या अध्ययन यह बताता है कि हिंग्रेजी का इस्तेमाल पाठकोंको अधिक सुखद लगता है। पाठकों की संख्या बढ़ने का कारण अंग्रेजी शब्दों की खिचड़ी है यापोस्टरनुमा चित्र और सनसनीखेज ग्लैमरयुक्त विषय सामग्री। इस पर विचार करने की जरूरत है।क्या पत्र-पत्रिकाओं को किसी भी उत्पाद की तरह केवल उनकी बिक्री बढ़ाने के लिए बदला जासकता है? वह भी भाषा में मिलावट कर। अखबारों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी है जिससे वेसभी दबावों के बावजूद मुक्त नहीं हो सकते। अगर हिंग्रेजी अखबारों के लिए मध्यम वर्ग, युवाओंया माॅल्स संस्कृति तक पहुचंने का रास्ता है तो यह उन्हें ऐसे करीब 60 प्रतिशत पाठकों से दूर भीकरती है, जो अंगे्रजी से अभी भी बेहद दूर हैं।􀂄
( यह लेख अक्टूबर- दिसम्बर 2006 के विदुर अंक में प्रकाशित हुआ है )

3 comments:

PN Subramanian said...

हिन्दी के सरल शब्दों के लिए भी अँग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग पर अंकुश आवश्यक है. आजकल के अख़बार आदि ऐसी ही हिन्दी को प्रोत्साहित कर रहे है.

विष्णु बैरागी said...

हिन्‍दी समाचार पत्रों के मालिकों की आंखे लालच के पर्दे से ढंक गई हैं । ये लोग हिन्‍दी की रोटी खा रहे हैं, हिन्‍दी के कारण प्रतिष्‍ठा पा रहे हैं किन्‍तु हिन्‍दी को ही नष्‍ट कर रहे हैं ।

संगीता पुरी said...

हिन्‍दी पाठको के कारण भी हिन्‍दी समाचार पत्र फल फूल नहीं पा रहे हैं.....शायद बिक्री की कमी के कारण उन्‍हे अंग्रजी समाचार पत्रों की तुलना में विज्ञापन कम मिलता है....घाटा सहकर मालिक अखबारों को कैसे चला सकते हैं ?