Sunday, 6 April 2014

चुनाव और विकास

इस बार का चुनाव विकास के नाम पर लड़ा जा रहा है. देश की मुख्य पार्टियां अपने अपने विकास के कामों की दुहाई देकर लोगों के साथ छल कर रही है.  इस बार के चुनाव ने विकास की परिभाषा ही बदल दी है. नयी परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं. आखिर विकास का पैमाना क्या है. पुलों का निर्माण. हाइवे, बड़े शहरों की चमचमाती सड़कें, या गाड़ियों की बढ़ती गिनती. अगर किसी भी राज्य के विकास का मापदंड शहरों में सड़कों का निर्माण, फ्लाई ओवर की गिनती में बढोतरी, उद्योगों का विस्तार और कुछ खास बढ़े उद्योगों को वितीय लाभ तो इस में कोई शक नहीं कि  अहमदाबाद, वडोदरा, भोपाल और दिल्ली जैसे बहुत से महानगरी शहरों में रहने वाले लोगों की सुख सुविधाओं में बढ़ोतरी हुई है. अगर यह विकास का आदर्श मॉडल है तो गुजरात को विकास का बेहतर मॉडल कहा जा सकता है. लेकिन अगर आर्थिक असमानता में कमी, कुपोषण में गिरावट, गरीबी रेखा में कमी या औसत खर्च और औसत मजदूरी सहित स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर पर देश के दूर दराज इलाकों में सुधार और देश के अति गरीब और आदिवासी लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता में सुधार को आप विकास मानते हैं तो जान लें की आप को बेफकूफ बनाया जा रहा है. चुनाव में गुजरात को विकास के आदर्श मॉडल के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन अगर पोषण विकास का पैमाना है तो जान लें कि गुजरात में कैग(CAG) की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक हर तीसरा बच्चा कुपोषित है. यहाँ कुल शिशु मृत्य दर अभी भी 41 प्रति हज़ार है. देश की गरीबी रेखा करीब 32 रूपए है लेकिन गुजरात में शहरों में 10रूपए 80पैसे और शहरों में प्रति दिन 16 रूपए 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला गरीब नहीं है. यहाँ पर ग्रामीण इलाकों की मजदूरी अन्य कई राज्यों से कम है. सामाजिक स्तर के मापदंड भी कोई बेहतर तस्वीर नहीं प्रस्तुत करते. 2011 की जनगणना के मुताबिक लड़कों की अपेक्षा लड़कों की गिनती 890 है. जब कि देश में यह संख्या 919 है यानी गुजरात से अधिक है. यह आंकड़ा जानना भी अधिक जरूरी है क्योंकि राज्य में महिला सुरुक्षा का खास दावा किया जा रहा है.

अगर सवाल विकास का है तो महज प्रचार का विकास नहीं विकास के आंकड़ों और तथ्यों सहित जानकारी लेना भी ज़रूरी है. बार बार के प्रचार से ज़मीनी हकीकत कैसे बदलेगी         

Friday, 10 January 2014

बंधुआ मजदूरों के लिए ग्यारसी की जंग







अन्नू आनंद
जब मैंने हाल में कदम रखा तो मेरी नजर सभी पुरुषों के बीच अकेली बैठी साधारण और देहाती दिखने वाली महिला पर पड़ी. माथे पर बड़ी सी बिंदी और सिर साड़ी से ढका. लेकिन उसकी साधारण सी वेशभूषा के बावजूद उसके चेहरे की सौम्यता और अदभुत तेज उसके व्यक्तित्व को आकर्षित बना रहे थे. हाल में मौजूद दो चार शहरी महिलाओं को छोड़ कर (जिन से मैं पहले से ही परिचित थी) शेष सभी पुरुषों के बीच में उसे देख कर मैंने सोचा  कि गांव की कोई पीड़िता होगी जिसे आयोजकों ने अपनी व्यथा मीडिया को बताने के लिए बुलाया है. सेमिनार के शुरूआती दौर में जब भी मेरी निगाह उस पर पड़ी मैंने उसे बेहद दिलचस्पी और तल्लीनता से वक्ताओं को सुनते पाया.

तभी मॉडरेटर ने घोषणा की कि अब ग्यारसी बाई उर्फ ‘ग्यारसी सहरिया’ मीडिया को पिछले दिनों बंधुआ मजदूरों के छुड़ाने की घटनाओं की ताजा स्थिति और सहरिया महिलायों के साथ हुए शोषण की घटनाओं के खिलाफ हुई कार्रवाई की जानकारी देगी. नाम सुनते ही साधारण और देहाती देखने वाली वह महिला उठी और पॉवर प्वाइंट प्रसेंटेशन की मदद से मीडिया के लोगों को समझाने लगी, “अब बारां जिले में १६३ में से ५३ मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से छुड़ाया जा चुका है. इन्हें प्रमाण पत्र भी मिल गए हैं. जिन दो लड़कियों के साथ नाहरगढ़ में रेप हुआ था. हमने उनकी रिपोर्ट पुलिस में कर दी है. पुलिस ने बात दबाने की कोशिश की लेकिन मैं और मेरी साथी महिलाओं ने मीडिया में मुद्दा उठाया. पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया और आज पीड़ित लड़कियों के परिवारों को एक-एक लाख रूपए की राहत मिल गई है और आरोपी जेल में है”.
ग्यारसी बता रही थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री को सहरिया आदिवासियों को राहत पैकेज देने की घोषणा के लिए भी तैयार कर लिया है. वह बोल रही थी और मैं मन ही मन पश्चाताप कर रही थी कि जिसे मैं बेचारी, पीड़िता और वंचित समझ रही थी वह तो मेरे जैसी शहरों की हजारों महिलाओं को ‘इम्पावरमेंट’ का वास्तविक पाठ पढ़ा रही है.

उसका वक्तव्य खत्म हो चुका था. लेकिन मेरी उसे सुनने की उत्सुकता बढ़ गई थी. सत्र के खत्म होने के बाद जैसे ही मैं उसे जानने समझने के लिए उसके पास पहुंची तो देखा कि जानी-मानी समाज सेविका और राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य रह चुकी अरुणा रॉय ने सामने से आते हुए ग्यारसी बाई को देखते ही गले लगा लिया. एक बार नहीं तीन बार उन्होंने ग्यारसी को इस प्रकार से गले लगाया जैसे वह उसकी उर्जा और शक्ति को अपने में समेट लेना चाहती हो. उस से गले मिलने के बाद अरुणा जी के चेहरे पर आई संतोष की मुस्कुराहट और भाव से स्पष्ट था कि वह ग्यारसी से मिल कर और अधिक उर्जावान महसूस कर रही हैं. 
राजस्थान के बारां जिले की ५१ वर्षीय ग्यारसी सहरिया, महानगरों की बहुत सी जांबाज और इम्पावरड महिलाओं के लिए भी एक ऐसी मिसाल है जो हर प्रकार की विपरीत परिस्थितियों में भी नदियों की धाराओं का रुख बदलने का साहस रखती है. उसके संघर्ष, जमीनी ज्ञान और अनुभव के समक्ष महिला सबलता का हमारा किताबी और ‘सेमिनारी’ ज्ञान बौना प्रतीत हो रहा था.
वर्ष २०११ में अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन और सिविल सोसायटी पत्रिका ने ग्यारसी बाई को सहरिया आदिवासियों के जीवन में बदलाव लाने के लिए ‘हाल ऑफ फेम’ पुरस्कार से सम्मानित किया. पुरस्कार के बारे में पूछने पर ग्यारसी बताती है कि “मैं पुरस्कार के बारे में अधिक नहीं जानती लेकिन अगर हम छोटे लोगों के कार्यों को पहचान मिलती है तो खुशी महसूस होती है”. पिछले २२ सालों में ग्यारसी ने सहरिया आदिवासी बाहुल्य इलाके किशनगंज और शाहाबाद के गांवों में छोटे छोटे कार्य करते हुए कई बड़े बदलाव लाने में सफल रही है. बंधुआ मजदूरों की मुक्ति ग्यारसी की सब से बड़ी उपलब्धि है.

दरअसल बारां जिले के बहुत से गांव में बंधुआ मजदूरी का अभी भी प्रचलन है. इस क्षेत्र में पंजाब और हरियाणा से आकर बसे ज़मींदार मजबूर और जरूरतमंद आदिवासियों की ज़मीन को सस्ते मोल पर खरीद लेते हैं. फिर वे उन्हें कुछ रूपए उधार देकर उसी ज़मीन पर उनसे ‘हलिया’ यानी बेगारी करते हैं. इस मजदूरी के बदले वे उन्हें गेहूं या आटा प्रति माह देते हैं. मनमाने ब्याज के कारण हर साल कर्ज की राशि बढ़ती जाती है और मजदूर आदिवासियों को पीढ़ी दर पीढ़ी बेगारी करने के लिए मजबूर रहना पड़ता है. हालाँकि कानून में बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध है लेकिन इस इलाके में फ़ैली गरीबी, भुखमरी और बच्चों के लालन-पालन का मोह बहुत से परिवारों को इस बेगारी के लिए मजबूर कर देता है. ग्यारसी बाई इन मजदूरों के हकों के लिए खड़ी हुई तो उसे जिले के कई बड़े ज़मींदारों का विरोध झेलना पड़ा. उसे कई बार धमकियाँ भी मिली. लेकिन ग्यारसी डटी रही. ग्यारसी कहती है जब सरकार ने १३५ परिवारों की ६५० बीघा ज़मीन ज़मींदारों के कब्जे से छुडा कर उन्हें लौटाई तो मुझे लगा कि मुझे मेरे काम का फल मिल गया.   
कईं गांव के बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के बाद उनके पुनर्वास और छुडाइ गयी ज़मीन पर खेती के सवाल को लेकर ग्यारसी कईं बार मुख्यमंत्री और श्रम विभाग के प्रमुख सचिव से मिली. आखिर उसकी लड़ाई और निरंतर प्रयासों ने प्रशासन को कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर दिया. बारां जिले के सुंडा गांव के बंधुआ मजदूरी से मुक्त हुए बाबूलाल ने बताया, “ग्यारसी बेन और उसके साथियों ने लंबे समय तक प्रशासन, ज़मींदारों पर दबाव बनाने के बाद उसे और उसके ३५ साथियों को बेगारी से मुक्त कराया है”.  

ग्यारसी का जन्म ग्यारस यानी एकादशी को हुआ था. इसलिए उसका नाम ग्यारसी रखा गया. वह पढ़ना चाहती थी लेकिन वह स्कूल नहीं जा पाई. छोटी उमर में ही उस  पर भाई के बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी डाल दी गई. आठ साल की उमर में उसका बाल विवाह भंवरगढ़ के बक्सू सहरिया से कर दिया गया. १२ साल की उमर में जब वह ससुराल पहुंची तो पाया कि उसके समक्ष कई चुनौतियाँ थी. घर में खाने को नहीं था. ससुर किसानों के यहाँ रखवाली का काम करते थे. पति ज़मींदारों के पास ‘हाली’ थे. घर में एक समय रोटी बनती. शाम को पानी में ग्लाए गेहूं खाकर भूख मिटती थी. ग्यारसी ने पति को ज़मींदारों के पास मजदूरी करने से रोका. उसने पति को मनाया कि वे दोनो मिलकर चूने भट्ठे पर मजदूरी करेंगे. आखिर पति ने बात मानी और दोनों ने चूने की भट्ठी पर मजदूरी करने लगे. उसी दौरान इलाके की जानी- मानी सामजिक कार्यकर्ता चारु मित्रा ने महिला अधिकार और बालिका शिक्षा के सन्दर्भ में महिलाओं को संगठित करने के लिए इलाके में बैठक का आयोजन किया. इसमें भट्ठे पर काम करने वाली महिलाओं को भी बुलाया गया. उस बैठक में बैठक में जाने के लिए ग्यारसी ने घर की चारदीवारी से बाहर जो कदम रखा वह कदम उसके लिए नए जीवन की शुरुआत बन गया. बैठक में जब उसने महिला अत्याचार, समानता का अधिकार और शिक्षा के महत्व के बारे में सुना तो ग्यारसी को अहसास हुआ कि अगर उसकी जैसी सभी महिलाएं यह सीख हासिल कर लें तो समूचे परिवार और गांव को सशक्त बनाया जा सकता है.
उसने मन में ठान लिया कि वह भी महिलाओं को उनका हक दिलाने का काम करेगी.
लेकिन ग्यारसी को इसके लिए खुद को तैयार करना था. केवल इच्छा शक्ति, उत्साह और चाहत ही काफी नहीं था. मुद्दों की समझ बनना अभी बाकी था. अक्षर ज्ञान से महरूम ग्यारसी ने सब से पहले स्थानीय संस्था संकल्प द्वारा आयोजित शाहबाद तहसील के मामोनी गाँव में शिक्षा की पांच दिवसीय कार्यशाला में भाग लिया. यहाँ पर ग्यारसी ने महिला मुद्दों, अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित कानूनों की जानकारी और बालिकाओं के लिए शिक्षा के महत्व के सबक को सीखा.

यह प्रशिक्षण ग्यारसी के लिए वरदान साबित हुआ. सबसे पहले उसने समुदाय की महिलाओं को शिक्षा से जोड़ा. ग्यारसी बताती है, “इस क्षेत्र के अधिकतर लोग अशिक्षित होने के कारण  ही सब से पिछड़े हैं.” अपने काम और स्वभाव से शीघ्र उसने लोगों का दिल जीत लिया. उसकी सोच, समझ और बेझिझक अपनी बात कहने के साहस ने लोगों को उसकी बात सुनने के लिए मजबूर कर दिया.
जब उसके इलाके में शिक्षा की लोक जुम्बिश परियोजना की शुरुआत हुई तो उसके लिए भवन की जरूरत महसूस की गई. एक विचार आया कि महिलाओं से ही ऐसे भवन का  निर्माण कराया जाए. ग्यारसी ने इस विचार का समर्थन किया. उसने मिस्त्री का प्रशिक्षण लेकर भवन के निर्माण में सहयोग दिया. इसके बाद वह ब्यावर से शुरू हुए सूचना के अधिकार आंदोलन से जुड़ी. झालावाड़ के अकेलरा में कुछ भ्रष्ट लोगों ने ग्यारसी को अपनी राह का रोड़ा मानते हुए उस पर हमले भी किये. वह घायल भी हुई लेकिन उसने अपने हौंसले को टूटने नहीं दिया. फिर उसने महिला जागरण संगठन नाम का एक समूह बनाकर उड़ीसा की नीलगिरी पहाड़ियों पर बसे लोगों के हकों के लिए वहां जाकर आवाज़ उठायी.

सहरिया बाहुल्य क्षेत्र में बसे खैरुआ जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने में ग्यारसी की अहम भूमिका रही. जब मनरेगा का काम गांव में शुरू हुआ तो वह सहरिया समुदाय के लोगों को १०० दिन की बजाय २०० दिन का रोजगार मुहैया कराने के लिए पंचायत से लेकर राज्य स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों से मिलती रही.  .
शाहबाद और किशनगंज क्षेत्र को आदिवासी क्षेत्र घोषित कराने, वन भूमि पर काबिज लोगों को वन अधिकार अधिनियम २००५ के तहत पट्टे दिलाने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उसने अपनी आवाज़ उठाई. इसके लिए वह सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और राजस्थान के मुख्यमंत्री से भी मिली. ग्यारसी अब तक इतने मुद्दे उठा चुकी है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री, पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्री ग्यारसी की आवाज़ को ही नहीं बल्कि उसके संकल्प की दृढ़ता को भी पहचानते हैं. हार्वड विश्वविधालय में ग्यारसी के काम को विशेष केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जा रहा है.
लेकिन मुझे अफ़सोस इस बात का है कि छोटी छोटी जगहों पर बड़े बड़े बदलाव लाने वाले ग्यारसी जैसी सेलेब्रिटी जो अपने इलाके के बहुत से युवाओं के रोल मॉडल बन चुके हैं, मेनस्ट्रीम मीडिया के हीरो नहीं बन पाते भले ही उनकी राह किसी भी बॉलीवुड हीरो से कहीं अधिक कठिन होती है.   








Sunday, 21 July 2013


विकास से हुए अनाथ

अन्नू आनंद


 भिताड़ा (अलिराजपुर)चूना के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी. अब उसे कम से कम कुछ महीनों के लिए बच्चों के पेट भरने की चिंता नही सताएगी. 35 वर्षीय सरला भी अपना सारा काम काज छोड़ कर गांव के छोर की ओर भाग रही थी. वह यह अवसर चूकना नहीं चाहती थी. चूना और सरला की तरह गांव के सभी मर्द और युवा लड़के, लड़कियां तीन-चार किलोमीटर पैदल भागते हुए गांव के किनारे पहुँच रहे थे. आज उनके गांव भिताड़ा में छह माह के बाद पीडीएस राशन का गेहूं आया था. गांव के अंतिम छोर पर नदी के किनारे पीडीएस की दुकान के नाम पर जमीन पर ही राशन का गेहूं, चीनी और नमक रखे गए थे. यह सामान नाव के जरिये यहाँ लाया गया था. इस अजीबोगरीब राशन की दुकान की ओर भागते गांववासियों को यह डर भी सता रहा था कि कहीं उनके पहुँचने से पहले ही सरकारी कर्मचारी वापस न लौट जाएँ और उनके बच्चे फिर अपना पेट भरने को तरसते रहें.

यह नजारा था सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित मध्यप्रदेश के अलिराजपुर जिले के गांव भिताड़ा का. अलिराजपुर से 44 किलोमीटर सड़क के रास्ते और आठ किलोमीटर नाव और करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद इस गांव में पहुंचा जा सकता है. पूरा गांव पांच फलियों में बंटा है जिस में 350 परिवार रहते हैं. एक फलिया से दूसरे फलिया के बीच की दूरी एक या दो किलोमीटर की है और अधिकतर परिवार भिलाला और नायक आदिवासियों के हैं.

खाद्य सुरक्षा कानून के तहत हर गरीब परिवार के लिए हर माह में कम से कम सात दिन तक सस्ती दरों पर पीडीएस के जरिय राशन पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है. लेकिन सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित नर्मदा के किनारे बसे हजारों गांववासी जो पुनर्वास के अभाव में पहले ही नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं उन्हें अपने दो वक्त के भोजन के लिए भी सरकारी कर्मचारियों के रहमोकरमपर निर्भर रहना पड़ रहा है. इन गांव में राशन आता भी है तो महीनों  के बाद वह भी महज कुछ घंटों के लिए. छितरे हुए इन गांवों के हर घर में जब तक राशन आने की खबर पहुँचती है तब तक नदी के किनारे अस्थाई रूप से लगी यह दुकान खत्म हो जाती है. भिताड़ा में राशन का सामान लेकर आने वाले सरकारी कर्मचारी नांडला भाई के मुताबिक,” उन्हें केवल एक दिन के लिए ही इस गांव में जाने को कहा गया है. कल तो वह दूसरे गांव नाव लेकर जायेंगे.” नांडला भाई एक रुपये के नमक का पैकेट पांच रुपये में गांववालों को बेच रहे थे. जब इसका कारण पूछा गया तो उनका जवाब था,” दूर से लाने में सामान का किराया-भाड़ा भी तो लगता है.” लेकिन किराये का पैसा तो सरकार देती है? नांडला के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था.
 भिताड़ा की तरह अलिराजपुर जिले के 15 ऐसे गांव हैं जो सरदार सरोवर परियोजना के कारण पानी से घिरे हैं. बाँध की ऊँचाई बढ़ने से नर्मदा के पानी में इनके घर और ज़मीन डूब गए हैं. अपर्याप्त पुनर्वास के चलते इन सभी गांव में लोग भोजन, स्वास्थ्य और आजीविका की समस्या से दिन रात जूझ रहे हैं. पीडीएस, स्कूल, मिड-डे मील, मनरेगा और आंगनवाडी जैसी कल्याणकारी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में इन गांव में लागू हैं लेकिन सड़क से कटे होने, पहाड़ों पर छितरे घर, सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार के चलते अधिकतर ये योजनाएं कागजों तक सीमित होकर रह गई हैं.
करीब 13 साल पहले इन गांव में लहलहाते खेत हुआ करते थे. गांव तक पहुँचने के लिए सड़क का रास्ता था. ग्रामीणों की जीविका का आधार उनके खेत थे जिसमें गेहूं, मक्की, और बाजरा उगाया जाता था. बहुत से गांव वाले पशुओं और जंगल पर भी निर्भर थे. लेकिन 1996 से ये सभी गांव डूब में आना शुरू हो गए. वर्ष 2000 तक योजना के कारण इनके गांव के नीचे की खेती और घर पानी में समाते चले गए. ज्यों ज्यों बाँध की ऊँचाई बढ़ती गयी नर्मदा नदी के किनारे बसे गांव डूबते गए. ऐसी स्थिति में बहुत से ग्रामीणों को नदी किनारे बने पहाड़ों पर पनाह लेनी पड़ी. पहाड़ भी ऐसे कि कहीं भी दो से तीन झोंपड़े बनाने के लिए भी समतल भूमि उपलब्ध नहीं है. करीबन ऐसे 15 गांव में आजीविका और भोजन के संसाधन हमेशा के लिए खत्म हो गए.
ऐसे ही पहाड़ पर बने एक गांव अंजनवाडा में रहने पर पता चला कि इन गांवों में बसने वाले ग्रामीण अपनी पानी की ज़रूरतें नदी के पानी से पूरा करते हैं   लेकिन पेट भरने के लिए गेहूं, बच्चों के लिए पोषक आहार, स्वास्थ्य, स्कूल और आजीविका जैसी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के साधन नहीं. सड़क के रास्ते से आखरी गांव ककराना से दो घंटे नाव की दूरी पर बसे इस अंजनवाडा गांव के वासी भी आज भी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए सरकार पर निर्भर हैं. गांव की जनसँख्या 360 के करीब है. यहाँ रहने वाले बच्चों के लिए सरकार ने पांचवी कक्षा तक का एक स्कूल तो खोला है. लेकिन स्कूल तक पहुँचने के लिए गांव के आधे बच्चों को नाव के जरिये नदी को पार करना पड़ता है या फिर एक घंटे का पहाड़ी रास्ता.  स्कूल और आंगनवाड़ी एक ही जगह पर चलते हैं. आंगनवाडी में आने वाला पोषण आहार भी बच्चों को नहीं मिल पाता क्योंकि ज़रूरतमंद बच्चों के लिए रोज नाव से या पैदल चलकर यहाँ पहुंचना संभव नहीं. आंगनवाड़ी की देख रेख करने वाली गांव की युवती राखी बताती है कि अधिकतर समय तो छोटे बच्चे यहाँ पहुँच ही नहीं पाते. जब कभी वे आते हैं तभी उन्हें खिचड़ी या दूसरा पोषक आहार देती हूँ. गांव में बीमार का इलाज़ करने के लिए कोई स्वास्थ्य केन्द्र नहीं. स्वास्थ्य के नाम पर या तो पोलियो का टीका लगता है या फिर तीन या चार महीनों में एक बार स्वास्थ्यकर्मी पहुँच पाता है. इसलिए बीमारी और मौत इनके लिए आम बात है.

यहाँ रहने वाले खज़ान सिंह तीन साल पहले अपनी १२ साल की बच्ची और १८ साल के लड़के को समय पर इलाज़ न मिलने के कारण खो चुके हैं. सब से नजदीकी उप स्वास्थ्य केन्द्र १२ किलोमीटर दूर ककराना में है जहाँ तक नाव से पहुँचने में दो घंटे लगते हैं. अस्पताल उस से भी दूर तीन घंटे की दूरी पर सोंडवा या बडवानी में है. खज़ान सिंह बताते हैं, ”उनकी बेटी ने बुखार में नाव में ही दम तोड़ दिया था जबकी लड़के को बड़वानी अस्पताल पहुंचा तो दिया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.” यहाँ ९९ फीसदी प्रसव घरों में होते हैं क्योंकि नाव और गाड़ी से अस्पताल तक पहुँचने का खर्चा ३००० रुपये तक पड़ता है.
फिलहाल सड़क और बिजली तो इन लोगों के लिए बहुत दूर की बात है.
मध्यप्रदेश सरकार का मानना है कि उसने सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित ४५ हज़ार विस्थापितों को मुवाज़ा दे दिया है. लेकिन हकीकत में मध्य प्रदेश में डूब प्रभावित केवल कुछ लोगों को ही केवल झोंपड़े बनाने के लिए १५ से २५ हज़ार रूपए का भुगतान हुआ है. नर्मदा बचाओ आंदोलन की मीरा कुमारी बताती हैं कि करीब 3300 परिवारों को एक किश्त का भुगतान हुआ है. लेकिन फर्जी ज़मीन रजिस्ट्री घोटाले के कारण वे लोग भी ज़मीन नहीं खरीद पाए. फिलहाल मामला हाईकोर्ट में चल रहा है.
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पिछले माह सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मंत्री को पत्र लिखा है कि वह राज्य सरकार को परियोजना में विस्थापित सभी प्रभावी परिवारों को विकसित पुनर्वास कालोनियों में घर और गैर अधिगृहित और  सिंचाई युक्त ज़मीन प्रदान करने का निर्देश दें. 
वर्ष २०११ के मई माह में मध्य प्रदेश के खाद्य सुरुक्षा राज्य सलाहकार सचिन जैन ने कुछ जिला अधिकारियों के साथ इन गांव का दौरा किया और पाया कि इन गांव तक पहुँचने की कोई भी जल परिवहन व्यवस्था न होने के कारण कल्याण की योजनायों को लागू करना आसान नहीं. श्री जैन के मुताबिक सरकारी अधिकारी इन गांव में जाने से कतराते हैं. किसी भी विभाग की ओर से किसी भी योजना की कोई निगरानी नहीं हो रही. जिन 15 गांव की ज़मीन डूबी है उनमें अधिकतर को वैकल्पिक ज़मीन हासिल नहीं हो सकी. यहाँ एक विशेष  परिस्थिति है उस पर काबू पाने के लिए इन गांवों के खाद्य ओर रोजगार के संचालन के लिए एक विशेष कार्य योजना बननी चाहिए. 
पानी से घिरे इन लोगों का सवाल है कि आम आदमी के विकास के नाम पर उनका शोषण क्यों. अधिकतर की मांग है कि ज़मीन के बदले उन्हें ऐसी ज़मीन मिले जो सिंचाई योग्य हो. जब कि बहुत से लोगों को पुनर्वास में ज़मीन एक जिले में तो प्लाट दूसरे जिले में दिया गया. जैसे कि अंजनवाडा का आदिवासी जहाँगा का कहना था सरकार ने बहुत से प्रभावितों को ज़मीन तो धार जिले के संकरिया और ढोलना में दी और रहने की जगह अलिराजपुर जिले में. ऐसे में कौन यह पुनर्वास चाहेगा? एक का विनाश दूसरे का विकास कैसे हो सकता है? क्या सरकार इस सवाल का जवाब देगी?
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Thursday, 4 July 2013

‘न्यू कन्वर्जेंस’ मीडिया के लिए नया खतरा: पी साईनाथ



   
मीडिया को सब से बड़ा खतरा न्यू कन्वर्जेंस से है. जिस के तहत बड़े व्यापारिक घराने मीडिया समूह को खरीद रहे हैं और मीडिया समूह बिजनेस हाउसिस में बदल रहे हैं. बड़े राजनैतिक दल नए-नए अखबार और चैनल की शुरुआत कर रहे हैं. यानी अब मीडिया, कॉरर्पोरेट और राजनैतिक दलों के हित एक हो रहे हैं. यह ‘न्यू कनवर्जेन्स’ सब से खतरनाक है. क्योंकि कॉरर्पोरेट जगत को सृजनात्मकता अथार्त क्रेटीविटी से कोई मतलब नहीं. उनका मुख्य उद्देश्य केवल प्राफिट है. पेड न्यूज, प्राइवेट ट्रीटी (निजी समझौते) जैसी प्रवृतियों पहले ही मीडिया की साख को कम कर चुकी हैं.
ये बातें वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने भोपाल की संस्था विकास संवाद द्वारा होशंगाबाद जिले के केसला ब्लाक  में आयोजित सातवें मीडिया संवाद में कही.  कॉर्पोरेटाईजेशन ऑफ मीडिया विषय पर उन्होंने कहा कि  भारतीय मीडिया राजनीति हस्तक्षेप से भले ही आज़ाद हो गया है लेकिन वह प्राफिट का कैदी बन गया है. अब प्राफिट ही उसका सबसे बड़ा उद्देश्य है. इसी के चलते मीडिया पर बिल्डरों, व्यापारियों, और बड़ी कंपनियों का दबदबा बढता जा रहा है.
श्री साईनाथ के मुताबिक अधिकतर समाचारपत्रों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की सूची में रियल एस्टेट और बिल्डरों के नाम देखे जा सकते हैं. उन्होंने दैनिक जागरण की सूची में दक्षिण एशिया के मेकडोनाल्ड प्रमुख का नाम होने की बात भी कही.
उन्होंने कहा हर मीडिया हाउस अधिक से अधिक प्राइवेट ट्रीटी रखना चाहता है. एक अखबार ने २४० कंपनियों के साथ प्राइवेट ट्रीटी कर रखी है. लेकिन जब शेयर मार्केट गिरने के कारण ऐसी ट्रीटी के चलते मीडिया हाउसिस को नुकसान होता है तो भी वह शेयर समझौते से बंधे होने के कारण खामोश रहता है और यह नहीं कह पाता कि कंपनी के शेयर का मूल्य घट रहा है.  नाम लिए बिना उन्होंने बताया कि इस मीडिया हाउस ने अपने यहाँ फतवा ज़ारी कर रखा है कि ‘रिसेशन’ शब्द का इस्तेमाल न करें. केवल ‘स्लो डाउन’ ही लिखें. रिसेशन केवल अमेरिका के लिए लिखें.

श्री साईनाथ के मुताबिक मीडिया हाउस खासकर चैनल बिजनेस लीडर अवार्ड या सेव टाइगर्स जैसे विज्ञापन कैम्पेन चलाने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं क्योंकि इसमें उन्हें फायदा मिलता है. उन्होंने कहा हर दिन ४७ किसान आत्महत्या करते हैं लेकिन ऐसी स्टोरी कवर करने केवल कुछ पत्रकार पहुँचते हैं. लेकिन स्विट्जर्लैंड दावोस में इंडियन इकोनोमिक फोरम को कवर करने २०० पत्रकार पहुँचते हैं. क्योंकि सीआईआई या हीरो होंडा  जैसे ग्रुप इसे प्रायोजित करते हैं. मीडिया हितों के टकराव की बात करता है लेकिन समूचा मीडिया स्वयं हितों के टकराव से जकड़ा हुआ है. उन्होंने कहा यह दौर मीडिया के हायपर कमर्शियलाइजेशन का दौर है. जिस से बचने के लिए कुछ न कुछ नए तरीके ढूँढने होंगे.  अन्नू आनंद   





























































                 

Saturday, 1 September 2012

गांवों में लड़कियों के बदल रहे हैं बदल रहे हैं रोल मॉडल




अन्नू आनंद

शहरों में रहने वाली किशोर लड़कियों के रोल मॉडल भले ही फिल्म जगत, बिजनेस, खेल, या राजनीति में नाम कमाने वाली महिलाएं जैसे एश्वर्या राय, इन्द्रा नूई, सानिया मिर्ज़ा या हिलेरी क्लिंटन हो. लेकिन गांवों में रहने वाली वाली किशोरियों के रोल मॉडल बदल रहे हैं. पहले की तरह अब उनकी बड़े शहरों की शिक्षित और ऊँचे ओहदों पर विराजमान बड़ी हस्तियाँ या फ़िल्मी हीरोईन और मिस इंडिया बनने वाली महिलाएं प्रेरणास्त्रोत नहीं हैं. किरण बेदी, सोनिया गाँधी या सुषमा स्वराज की बजाय अब गांवों की लाखों युवा लड़कियां पढ़ने लिखने के बाद पंचायतों में सरपंच, पंच या वार्ड मेंबर के रूप में प्रभावी भूमिका निभाने वाली महिलाओं को अपना वास्तविक रोल मॉडल मानती हैं. देश के लाखों गांवों में महिला नेतृत्व के रूप में उभरने वाली कई दबंग, सबल और प्राशसनिक कार्यों में दखल रखने वाली ‘कुशल पंचायत लीडर’ में वे अपनी छवि तलाशती हैं. स्कूलों में पढ़ने वाली बहुत सी लड़कियां के लिए स्थानीय सत्ता के कार्यों में हाथ बांटने, स्थानीय मुद्दों पर अपनी राय देने, हक के लिए अपनी आवाज़ उठाने, और अशिक्षित तथा पिछड़ी महिलाओं को जागरूक बनाने वाली स्थानीय ‘महिला लीडर’ उनकी असली रोल मॉडल हैं.

पंचायतों में महिलाओं की बदती तादाद के कारण स्कूलों में लड़कियों की भर्ती  बढ़ने लगी है. ग्रामीण माँ बाप जो कभी केवल परिवार के लड़के को स्कूल भेजने को प्राथमिकता देते थे उनका नजरिया बदल गया है. अब वे छोटी उमर की लड़कियों को भी स्कूल में भर्ती करने को प्रोत्साहित हो रहे हैं. संविधान के 73वें संशोधन से वर्ष 1992-1993 में पंचायतों में महिलायों को मिले एक तिहाई आरक्षण (बाद में पचास प्रतिशत) से यह बदलाव संभव हुआ है.


लड़का स्कूल में पढ़ेगा और लड़की चूल्हा चौका संभालेगी की सोच रखने वाले ग्रामीण समाज के समक्ष अब ऐसी लाखों महिलाएं खड़ी हैं जो घर के कामों के कामों के साथ सत्ता के गलियारों में पहुँच रखती हैं और पुरुषों के समान या उनसे बेहतर राजनैतिक कामों को अंजाम देने में समर्थ हैं.
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख शोध पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर  में भारत के सन्दर्भ में इन तथ्यों की जानकारी दी गई है. नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी द्वारा की गई इस सर्वे में बताया गया है कि लोकतंत्र के सबसे निचले स्तर पर यानी पंचायतों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के कानून का सीधा असर गांवों के रोल मॉडल पर पड़ा है. इससे ग्रामीण लड़कियों और उनके माता पिता की महिला नेतृत्व की भूमिका के प्रति सोच बदल रही है. यही नहीं इसने किशोर लड़कियों की करियर और शिक्षा के प्रति उनकी आकांक्षाओं को बढ़ाने का काम किया है. जिस प्रकार से हिलेरी क्लिंटन ने ग्लास सीलिंग तोड़ कर 18 मिलियन महिलाओं को राजनीति में शामिल कर लोगों की सोच को बदलने का काम किया है, सर्वे का मानना है कि भारत में भी महिलाओं के प्रति कानून में हुए साकारात्मक बदलाव का ठीक वही नतीजा निकल रहा है. सर्वे के मुताबिक कानून द्वारा पंचायतों में महिलाओं की संख्या बढ़ने से लोगों में राजनीति में आने वाली महिलायों के प्रति नजरिया बदल गया है. सर्वे का दावा है कि राजनीति के सबसे निचले स्तर पर महिलाओं के स्थान आरक्षित करने के परिणाम दीर्घकालीन होंगे.

यह सर्वे देश के पश्चिम बंगाल राज्य के 495 गांवों के 8,453 किशोरों और किशोरियों और उनके माता पिता के बीच वर्ष 2006-2007 के दौरान की गई. इस क्षेत्र में 1998 में महिला आरक्षण का कानून लागू हुआ था. सर्वे टीम की एक लेखक लोरी बामन के मुताबिक भारत निश्चित रूप से एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिलाओं के लिए सीमित अवसर उपलब्ध हैं. इस कानून ने भारतीय महिलाओं को ग्रामीण स्तर पर स्वयं को सक्षम नेता साबित करने का अवसर प्रदान किया है.  
सर्वे के परिणाम इस विचार का समर्थन करते हैं कि राजनीति में महिलाओं के  कम प्रतिनिधित्व को खत्म करने के लिया आरक्षण साकारत्मक कार्रवाई है और शायद अन्य क्षेत्रों जैसे विज्ञान या कॉर्पोरेट, बोर्ड रूम में ऐसे निर्णय बेहतर साबित हो सकते हैं. क्योंकि ऐसे फैसले प्रभावी रोल मॉडल बनाते हैं और लंबे समय में ऐसे प्रयास अधिक फायदा पहुंचाते हैं. सर्वे में आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि जिन गांव में महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं था उन गांव की अपेक्षा जहाँ आरक्षण लागू था उन गांवों के माता -पिता के बीच में बच्चों की शिक्षा को लेकर जेंडर अंतर 25 प्रतिशत और किशोरों में 32 फीसदी जेंडर अंतर कम हुआ था. जिन गांवों में महिलायों के लिए सीटें आरक्षित थी वहाँ अधिक लड़कियां स्कूलों में मौजूद थी और कम समय घर के कामों में बिताती थी.   
·        राजनीति में महिलाओं के प्रति नजरिया बदला है .
·        स्कूलों में लड़कियों की भर्ती बड़ी है .
·        आरक्षित क्षेत्रों में जेंडर अंतर कम हुआ है
·        सकारत्मक कानूनों से प्रभावी रोल मॉडल बनाये जा सकते हैं. इसलिए ऐसे प्रयासों को बढ़ावा मिलना चाहिए. 



सर्वे के परिणाम इस बात की और इशारा करते हैं कि ग्रामीण स्तर पर लड़किया अपने बीच में से ही निकली महिला लीडर को अपने अधिक नजदीक पाती हैं और उनके जैसा बनने का सपना उन्हें अधिक पूरा होने के करीब दीखता है इसलिए वे उन्हें अपना रोल मॉडल मानना अधिक संभव मानती हैं.
भले ही यह सर्वे केवल पचिम बंगाल में की गई हों लेकिन देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसे ही अनुभव सुनने को मिल रहे हैं. रूरल गवर्नंस पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों कि महिलाओं को प्रशिक्षण देने वाली नयना चौधरी के मुताबिक, ‘’गांव की महिला लीडरों और किशोरियों के बीच एक प्रकार का स्वाभाविक संबंध है.  जब ये महिलाएं शोषण के खिलाफ बोलते हुए कहती हैं कि अब हमारी बहुओं या बेटियों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए तो उनमें महिला नेताओं के प्रति सम्मान बढ़ता है और वे भी बढ़ी होकर इन मुद्दों के खिलाफ खड़ी होने को प्रेरित होती हैं.” वह बताती है कि गाजीपुर जिले की नसीमा बानो ने जब दहेज के कारण एक महिला को मारकर गांव में लटका देने वाले परिवार के खिलाफ बेहद दबंग तरीके से लड़ाई लड़ते हुए दोषी परिवार को गिरफ्तार कराया तो वह गांव की बहुत सी किशोरियों के लिए एक रोल मॉडल के रूप में उभरी.   

उत्तर प्रदेश के अम्बेदकर नगर की २८ वर्षीय अनुपम सिंह ने बीए तक पढ़ाई की है. वह अपने इलाके की महिला लीडर कहलाती है. अनुपम हर रोज अलग अलग पंचायतों में जाकर बैठक करती है और महिलाओं को उनके क़ानूनी हकों के बारे जैसे राशन और काम हासिल करने की जानकारी देती है. अभी तक वह अपने जिला के कई लोगों को मनरेगा के तहत काम दिला चुकी है. अनुपम के इलाके की बहुत सी लड़किया पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके जैसा बनाना चाहती है. अनुपम बताती है, ”जब मैं गांवों की महिलाओं से बात करती हैं तो बहुत सी युवा लड़कियां भी आकर मुझे ध्यान से सुनती है और कहती हैं कि वे भी बड़ी होकर गांव से अज्ञानता को दूर करेंगी और लोगों को मेरी तरह जागरूक बनाने का काम करेंगी.’’
वर्ष 2009 से पचास प्रतिशत के आरक्षण का प्रस्ताव लागू होने के बाद से   करीब 14 लाख महिलायें पंचायतों के राज-काज में हिस्सेदारी कर रही हैं.  निस्संदेह इनमें बहुत सी महिला लीडर अपने अधिकारों के प्रति जानकारी रखने  में और सता की पेचीदगियों को समझने और समझाने में किसी भी महिला नेता को टक्कर दे सकती हैं. 1993 में पंचायतों में आने वाली महिलाओं के लिए ‘सरपंच पति’ और ‘रबड़ स्टेम्प’ जैसे आक्षेपों से शुरू हुआ सफर बेहद संघर्ष भरे पड़ावों से जूझता रहा है. लेकिन सभी प्रकार की चुनौतियों के बावजूद महिला ताकत के रूप में उभरी यह महिलाएं अगर आज गांवों की लड़कियों को प्रेरित करने में समर्थ हैं और उनकी रोल मॉडल बन रही है तो निश्चित ही यह ग्रामीण महिलाओं के संघर्ष की बहुत बड़ी जीत है.
 (  नवभारत टाइम्स में 24 सितम्बर  2012 को प्रकाशित आलेख) 

Tuesday, 10 July 2012

सरकार की दोहरी नीति ने बच्चों से छुड़वाया स्कूल


अन्नू आनंद
(देवास, मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश में मैला ढोने वालों के पुनर्वास को लेकर कर्इ प्रकार की अनियमितताएं देखने को मिल रही हैं। सरकार की पुनर्वास नीति में इतने सुराख हैं कि यहां पर कर्इ जिलाें में इस काम को छोड़ने वाले कर्इ लोग फिर से इस काम को अपनाने लगे हंै। फरवरी 2002 में देवास जिले में चलने वाले 'गरिमा अभियान के तहत किरन सहित बस्ती की 26 महिलाओं ने यह काम करना छोड़ दिया। मध्य प्रदेश में इस अभियान के तहत मैला ढोने वालों को अपनी मान मर्यादा और सम्मान की खातिर इस काम को छोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है। किरन बताती है कि यह काम छोड़ने के बाद उन सभी महिलाओं के पास बच्चों का पेट पालने के लिए कोर्इ विकल्प नहीं था। उन्होंने खेतों में मजदूरी करना शुरू किया लेकिन यह मजदूरी का काम भी कभी-कभार मिलता। मजदूरी के काम से अनजान किरन अक्सर नौ बीघा सोयाबीन काटती जबकि उसे मजदूरी केवल सात बीघा की ही मिलती। किरन सहित काम छोड़ने वाली बस्ती की अन्य महिलाओं के बच्चों को स्कूल में मिलने वाली छात्रवृत्ति भी बंद कर दी गर्इ। अब बस्ती के अधिकतर बच्चे स्कूल से बाहर हंै।
केंद्र सरकार ने जब वर्ष 1993 में मैला ढोने के अमानवीय कार्य को बंद करने का सफार्इ कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सनिनर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया था तो साथ में काम छोड़ने वाले लोगों के लिए पुनर्वास की राष्ट्रीय योजना भी लागू की थीं। इनमें से एक योजना अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के बच्चों को शिक्षित बनाने के संबंध में थी। अप्रैल 1993 से लागू इस योजना के तहत अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के दो बच्चों को दस माह तक पहली से दसवीं कक्षा तक छात्रवृत्ति प्रदान करने का प्रावधान है। योजना के मुताबिक एक से पांचवीं तक 40 रुपए प्रति माह और छठी से आठवीं तक 60 रुपए प्रति माह तक की छात्रवृत्ति निर्धारित की गर्इ थी। इस आर्थिक प्रोत्साहन ने देश भर में मैला ढोने के काम में लगे बहुत से परिवारों के बच्चों को स्कूलों में पहुंचाने का काम किया।
लेकिन जब वर्ष 2000 से कानून के तहत सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों के चलते मैला ढोने वाले लोगों द्वारा काम को त्यागने की प्रवृति ने जोर पकड़ा तो इसका सबसे बुरा प्रभाव स्कूली बच्चों पर पड़ा। स्कूलों में उनको मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद होने लगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि बच्चों को छात्रवृत्ति की इस कल्याणकारी योजना और कानून में ही विरोधाभास है। कानून अस्वच्छ धंधे पर रोक लगाता है जबकि योजना अस्वच्छ धंधे में लगे बच्चों को ही स्कूली शिक्षा के लिए सहायता देती है।


मैला ढोने का काम बंद करने वाली बस्ती की शोभा ने अपनी दो लड़कियों का स्कूल छुड़वा दिया। वह बताती है कि एक तो काम नहीं ऊपर से बच्चों की फीस, वर्दी और दूसरे खर्चे हम कहां से लाएं। किरन ने बताया कि जब स्थानीय सरकारी अधिकारियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि छात्रवृत्ति तो अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के बच्चों के लिए है जब काम छोड़ दिया तो छात्रवृत्ति क्यों मिलेगी। किरन तर्क देती है कि एक तरफ तो सरकार यह प्रथा बंद करना चाहती है और इसके लिए कानून भी बनाया है दूसरी ओर उसी कानून का सहारा लेकर हमारे बच्चों के पढ़ने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं हम बच्चों की जरूरतें कैसे पूरी करें। ऐसे में हमारे पास बच्चों को स्कूल से हटाने के अलावा क्या विकल्प है। पिछले वर्ष किरन ने गरिमा अभियान के तहत आयोजित जनसुनवार्इ में भी सरकार से ऐसे धंधों को छोड़ने वालों के बच्चों को दोगुनी छात्रवृत्ति देने की मांग की थी।
किरन की बातों में दम है लेकिन स्थानीय सरकारी अधिकारी सिर्फ कागजों की भाषा समझते हंै। इस छात्रवृत्ति को पाने के लिए साल में 100 दिन काम करने का हलफनामा देना पड़ता है। जिस पर सरकारी अधिकारी को हस्ताक्षर करने होते हैं। कोर्इ भी सरकारी अधिकारी यह मानना नहीं चाहता कि उनके जिले में मैला ढोने का काम चल रहा है। इसलिए बच्चों को छात्रवृत्ति नहीं मिल पाती।     
2500 की आबादी वाले सिआ गांव में वर्षों से मैला ढोने के काम को त्यागने वाली 54 वर्षीया मन्नू बार्इ कहती है, ''जब मैं और मेरी बहुएं यह काम करते थे तो मेरे पोते-पोतियों  के साथ स्कूल में भेदभाव होता था। अब काम छोड़ दिया तो हम बच्चों को स्कूल भेजने के काबिल ही नहीं रहे। सरकारी सहायता भी तो बंद कर दी गर्इ। संतोष बताती है कि पहले मैं मैला सिर पर ढोकर ले जाती थी बदले में मुझे बासी रोटी फेंक कर दी जाती थी। बच्चे स्कूल जाते तो उन्हें नल से पानी नहीं पीने दिया जाता। उनको टाटपल्ली पर बैठने भी नहीं देते थे। बच्चे घर आकर शिकायत करते। दोपहर के भोजन में भी उन्हें अलग बिठाकर भोजन खाने को मिलता। लेकिन बाद में जब गांव में इस काम को छोड़ने का अभियान शुरू हुआ और कानून के बारे में जानकारी दी गर्इ तो हमने काम छोड़ दिया, लेकिन हमें काम छोड़कर क्या मिला। आज न हमारे पास काम है उस पर बच्चों को शिक्षा में मिलने वाली मदद भी बंद हो गर्इ। आज जब हमारे काम की वजह से स्कूल में उन्हें शर्मसार नहीं होना पड़ता और वे सभी बच्चों के समान व्यावहार पाने के काबिल हुए हैं तो प्रशासन ने बच्चों को मिलने वाली राशि बंद कर दी। यह कहां का न्याय है।
वास्तव में मैला ढोने जैसे श्राप से मुकित दिलाने के लिए चालू की गर्इ सरकारी पुनर्वास योजनाओं में इतनी कमियां हैं कि निर्धारित समय सीमा तक इस काम को बंद करने का लक्ष्य अभी बेहद दूर जान पड़ता है। केंद्र की यूपीए सरकार ने सामाजिक न्याय मंत्रालय को यह आदेश दिया है कि दिसंबर 2007 तक सभी राज्यों में यह काम पूरी तरह बंद हो जाना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए योजना आयोग ने 'मैला ढोने से मुकित राष्ट्रीय कार्ययोजना 2007 भी बनार्इ है। जिस का मकसद 2007 के अंत तक इस काम को पूरी तरह बंद किया जाना है। लेकिन जमीनी हकीकत अलग ही कहानी बयां करती है।
मध्य प्रदेश सरकार ने हार्इकोर्ट में हलफनामा दिया है कि मध्य प्रदेश में अब कोर्इ भी  मैला ढोने का काम नहीं कर रहा। जबकि यहां के नौ जिलों में पिछले वर्ष गरिमा अभियान द्वारा करार्इ गर्इ सर्वे से पता चलता है कि अभी भी यहां 618 लोग इस काम में लगे हैं। इस के अलावा 52 ऐसे लोगों का भी पता चला जिन्होंने काम छोड़ने के बाद उचित पुनर्वास के अभाव में फिर से इस काम को अपना लिया है। जो लोग ये काम छोड़ चुके हैं उन से  आज भी अन्य हीन काम जैसे गांव में मरे पशुओं को फेंकना, श्मशान से मृतक के कपड़े लेना, लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना, जजमानी करना और किसी की मृत्यु होने पर ढोल बजाना इत्यादि कामों को कर रहें हैं और इन जातिगत कामों के बंटवारे को रोकने के लिए सरकार के पास कोर्इ ठोस नीति नहीं है।
सरकार का पूरा जोर आर्थिक पुनर्वास पर है। अधिकतर योजनाएं भी पुरुषों को ध्यान में रखकर बनार्इ जा रही हैं। जबकि इस धंधे में 93 प्रतिशत महिलाएं लगी हुर्इ हैं। जिन रोजगारों के लिए कर्जा दिए जाने की व्यवस्था है वे अधिकतर पुरुषों द्वारा किए जाते हैं। देवास जिला में इस मुíे पर काम करने वाली संस्था 'जनसाहस के प्रमुख आसिफ के मुताबिक अधिकतर ऐसे कामों के लिए कर्जा दिया जा रहा है जो पुरुष करते हैं। जैसे आटो, दुकानदारी आदि। ऐसा नहीं है कि ये काम महिलाएं नहीं कर सकतीं लेकिन उन्हें प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त बनाने की जरूरत है और ये लंबी प्रक्रिया है। आसिफ के मुताबिक स्कूलों से मिलने वाली आर्थिक मदद के बंद होने की नीति इन लोगों को यह काम न छोड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। उन्होंने बताया कि भावरासागर में मैला ढोने के काम मे लगी शोभा की छह लड़कियां स्कूल जाती थीं, लेकिन जब उसने वर्ष 2003 में काम छोड़ा तो कुछ समय बाद उसकी सभी बेटियों को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि स्कूल से मिलने वाली आर्थिक सहायता यानी कि छात्रवृत्ति बंद हो गर्इ और शोभा के लिए बिना सहायता के उन्हें पढ़ाना संभव नहीं था। 
किरन, शोभा, संतोष जैसी बाल्मीकी बस्ती की अधिकतर महिलाओं को यह काम छोड़े पांच वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी वे कभी खेतों में दाने तो कभी अनाज की फसल आने का इंतजार करती हैं तो कभी नगर पंचायत से नाली या गटर साफ करने की पर्ची कटने का इंतजार। यह काम केवल 15 दिनों के लिए बारी-बारी से हर परिवार को दिया जाता है।
सरकार नौ प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का भले ही जश्न मनाती रहे लेकिन हकीकत तो यह है कि आज भी छह लाख के करीब लोग इस अमानवीय काम को करने का खामियाजा भुगत रहे हैं। अब देखना यह है कि सरकार दिसंबर 2007 तक इन लोगों को इस प्रथा से निजात दिलाने के साथ ही उनके स्कूलों मे पढ़ने वाले बच्चों के साथ भी न्याय कर पाती है या फिर कोर्इ नर्इ तारीख, नया साल इनकी उम्मीद की परीक्षा लेगा।
(यह लेख २००७ में जनसत्ता, ग्रासरूट में कवर स्टोरी सहित क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है.)    

Tuesday, 28 February 2012

मॉडर्निटी क्या कोई थोपने की चीज है




भारत सरकार के विशेष दबाब के बावजूद भी नॉर्वे सरकार २३ मार्च तक ही बच्चों को उनके परिवार को सौपने के लिए तैयार हई है. आखिर आपने ही बच्चों कि कस्टडी पाने के लिए परिवार को धरने पर बैठना पड़ा है.  लेकिन नॉर्वे सरकार अभी भी बच्चों की उचित देखभाल के नाम पर उन्हें माँ बाप को सौंपने को तैयार नहीं, क्या  बच्चों को पारिवार से दूर,नए परिवेश, नयी भाषा और नए कल्चर में रखने से उनका  सही विकास संभव है ? क्या नॉर्वे की चाइल्ड वेल्फेयर एजेंसी इस का जवाब देगी. 

अन्नू  आनंद 
क्या भारतीयों का बच्चों को पालने का सामान्य तरीका बच्चों के विकास के लिए उचित नहीं है? बच्चों के पालन-पोषण की शैली क्या उन्हें विदेशों से सीखनी होगी? बच्चों की बेहतर परवरिश किसे कहेंगे? क्या देश बदलने के साथ जीवन शैली भी बदलना बच्चों के हित में है? क्या अपनी संस्कृति से जुड़े मूल्यों के मुताबिक बच्चों की देख-रेख करने में कोई बुराई है? इस तरह के कई सवाल इन दिनों चिंता का कारण बने हुए हैं। इसकी खास वजह है नॉर्वे में उन दो मासूम बच्चों को सरकारी स्तर पर उनके मां-बाप से अलग करने की घटना, जिसने देश और विदेशों में रहने वाले करोड़ों भारतीय परिवारों को असमंजस में डाल दिया है। इन सवालों पर बहस से पहले घटना को ठीक से जानना जरूरी है । 

साथ सुलाने का अपराध 
नार्वे के स्टावंगर शहर में रहने वाले अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य से उनके तीन साल के बेटे अभिज्ञान और एक साल से भी कम उमर की उनकी बेटी ऐश्वर्या को वहां की सरकारी एजेंसी ने कुछ समय पहले इस आधार पर अलग कर दिया कि वे बच्चों का पालन-पोषण सही ढंग से नहीं कर रहे। इस सिलसिले की शुरुआत तब हुई
 जब किंडरगार्टन में पढ़ने वाले अभिज्ञान के स्कूल को लगा कि वह कुछ चीजों को जल्दी नहीं समझ पा रहा है। उन्होंने इसकी जानकारी चाइल्ड प्रोटेक्टिव संस्था को दे दी। इसके बाद संस्था से जुड़े अधिकारी जांच के लिए उसके घर आने लगे। उनकी राय यह बनी कि बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं हो रही। अधिकारियों को शिकायत थी कि दंपति बच्चों को हाथ से खाना खिलाते हैं और खाने में दही-चावल देते हैं। इसके अलावा वे बच्चों को अपने साथ बिस्तर पर सुलाते हैं। जो बातें हमारी दिनचर्या का आम हिस्सा हैं, वही भट्टाचार्य दंपति के लिए अपराध बन गईं। 

कोर्ट-कचहरी के चक्कर 
सरकारी अधिकारियों ने बच्चों के अधिकारों से संबंधित नार्वे के कड़े कानूनों का हवाला देते हुए दोनों बच्चों को मां-बाप से जबरन अलग कर बारनेवर्ने नार्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विस सेंटर में भेज दिया। पिछले आठ माह से भट्टाचार्य दंपति अपने बच्चों की कस्टडी के लिए अदालत, सरकारी दफ्तरों और दूतावास के चक्कर काट रहे हैं। वहां की अदालत ने भी वेलफेयर सेंटर के पक्ष में फैसला देते हुए 18 साल तक बच्चों को अलग-अलग फोस्टर केयर में रखने और मां-बाप को साल में केवल दो बार बच्चों से मिलने की इजाजत दी। भारत सरकार के भारी दबाव के बाद नार्वे सरकार बच्चों को कोलकाता स्थित उनके चाचा के हवाले करने को तैयार हुई है। उम्मीद है कि बच्चे मार्च तक यहां पहुंच पाएंगे। 
 

नार्वे की इस घटना से उठा विवाद विदेशों में रहने वाले करीब तीन करोड़ भारतीयों के धार्मिक, सांस्कृतिक, और कानूनी अधिकारों पर सवालिया निशान लगाता है। विदेशी जमीन पर अपनी संस्कृति और जीवन शैली को भूलकर बाहरी कल्चर अपनाना और उसी के आधार पर बच्चों को ढालना आसान नहीं है। हर बच्चे को, चाहे वह कहीं भी रहे, अपने धार्मिक, सामाजिक, जातीय और भाषाई माहौल में पलने का हक है। कानून का डर दिखा कर उसका यह हक छीनना अन्याय है। नार्वे में बच्चों को हाथ से खिलाना अपराध है। वहां बच्चे को पैदा होते ही अलग सुलाने की रिवायत है। हमारी संस्कृति में बच्चों को हाथ से खिलाना आम बात है। 


दही-चावल हमारे रोजाना के भोजन का हिस्सा है। पांच साल तक बच्चों का मां-बाप के साथ सोना यहां सामान्य बात है। एक हद तक यह हमारी मजबूरी भी है। कम जगह के चलते अक्सर हमारे बच्चे मां-बाप के साथ या उनके कमरे में ही सोते हैं। बच्चों का मां-बाप की देख-रेख में रहना उनकी सुरक्षा तथा उनमें उचित मूल्यों के विकास के लिए भी बेहतर माना जाता है। भारत में लड़के शादी के बाद भी मां-बाप के साथ ही रहते हैं। हमारी इस रिवायत को पश्चिमी देशों में हैरत से देखा जाता है। इन देशों में बेटा अगर 21 साल की उमर के बाद माता-पिता के साथ रहे तो उन्हें इसे 'असामान्य प्रवृत्ति' समझा जाता है। 

यह संस्कृति का अंतर ही है कि हम आज भी बूढ़े मां-बाप को परिवार के साथ रखने में गर्व महसूस करते हैं, उन्हें ओल्ड एज होम या वेलफेयर सेंटर में नहीं रखते। ऐसा नहीं कि नार्वे या किसी और देश की संस्कृति खराब है, या उसे अपनाना गलत है। लेकिन इसे किसी पर थोपना ठीक नहीं है। सबसे ज्यादा हैरत की बात यह है कि नार्वे की अदालत ने भी फैसला दिया है कि दोनों बच्चे 18 साल की उम्र तक अलग-अलग फॉस्टर होम में रहेंगे और उनके मां-बाप साल में केवल एक बार उनसे मिल सकते हैं। अदालत के मुताबिक अगर पति-पत्नी अलग होते हैं तो बच्चे पिता को सौंपे जा सकते हैं। 

दूसरों को भी समझें 
इस फैसले से यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या भारत से बाहर रहने वाले भारतीयों को स्थानीय सिविल और क्रिमिनल लॉ के पालन के साथ अब अपने घरों में भी विदेशी कानूनों का पालन करना होगा? नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे यूरोपीय देशों में बच्चों के अधिकारों से जुड़े कानून इतने सख्त हैं कि बच्चों के हित के नाम पर उन्हें परिवारों से अलग रखने से भी गुरेज नहीं किया जाता। लेकिन इस मामले में भारतीय दंपति के पर्सनल लॉ को ताक पर रख कर नार्वे ने अपने देश के पालन-पोषण के नियमों को अधिक महत्वपूर्ण माना। 

यह मामला दूसरी संस्कृतियों के प्रति असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। जिस तरह वहां के कानून और कल्चर में बच्चे को हाथ से खिलाना 'फॉर्स्ड फीडिंग' है, उसी तरह मां का दूध पीने वाली आठ माह की बच्ची को मां से अलग करना भारतीय दृष्टि में बाल उत्पीड़न है। यूरोप को अपनी संस्कृति को उच्च मानने की प्रवृत्ति छोड़ कर दूसरे देशों की जीवन शैली को समझने का प्रयास भी करना चाहिए।