Monday, 26 January 2009

पंचायती राज में महिलाएं और मीडिया की भूमिका

अन्नू आनंद

वर्श 1993 में संविधान में किया गया 73वां और 74 वां संषोधन ग्रामीण महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मोड़ था। क्योंकि इन संषोधनों ने पहली बार स्थानीय स्वषासन में 33 प्रतिषत महिलाओं को चूल्हे से निकाल कर चैपाल में पहुंचाने का काम किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था जिसने भारत के दूरदराज गांवों की महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का सुअवसर प्रदान किया। ग्रामीण स्तर की महिलाओं के स्थानीय षासन में भागीदारी का एक बड़ा लाभ यह भी हुआ कि इसने देष भर में विधानसभा और संसद में भी महिलाओं के आरक्षण की बहस षुरू कर दी। वर्श 1995 में इस संषोधन के लागू होने से हर पांच वर्श में करीब 25 हजार गांवों में दस लाख महिलाएं स्थानीय सत्ता में काबिज हो रही हैं।
लेकिन पंचायतों या स्थानीय निकायों में चुनी जाने वाली महिलाओं के समक्ष अपना साम्र्थय और सक्षमता साबित करने के लिए चुनौतियों की पुलिया लंबी है। पहले कार्यकाल के लिए चुनी गई महिला प्रतिनिधियों के समक्ष सब से बड़ी चुनौती ‘पुरुशसत्तात्मक सोच’ थी। जिसके तहत पुरूश सत्ता पर अपना एकाधिकार मानते हैं। राजनीति में महिलाओं की यह भागीदारी वह भी निचले स्तर पर उन्हें गंवारा नहीं थी क्योंकि इससे उन्हें अपनी सत्ता में सुराख होता नजर आया। इसलिए पंचायतों की महिला प्रतिनिधियों को कार्यकाल के आरभिंक वर्शों में ‘रबड़ स्टैम्प’ और उनके पतियों को ‘प्रधानपतियों’ की संज्ञा दी गई। उन्हें पढ़ी लिखी नहीं या पंचायत के कामकाज को समझने में असक्षम बताकर पंचायत का सारा कामकाज पंचायतकर्मी या उनके पति अथवा गांव के किसी प्रभावषाली व्यक्ति के हाथों केंद्रित रहता। षुरूआती दौर में यह आरोप भी अधिक सुनने में आया कि घूंघट या पर्दे के भीतर रहने वाली महिलाएं विकास के कार्यों को कैसे निपटाएगीं? सही भी था जिस समाज में वे घरेलु दायित्वों में फेेैसला लेने की हकदार नहीं बन र्पाइं वहां वह पंचायत के विस्तृत दायित्व को निभाने में हिचक महसूस कैसे न करतीं? उन्हें पहली बार विकास कार्यक्रमों को बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी उन्हें यह जानकारी देने वाला कोई नहीं था कि अमुक कार्य करने के लिए क्या किया जाए। कुछ राज्यों ने प्रषिक्षण कार्यक्रम बनाए लेकिन उनको लागू करने मंे कई प्रकार की कमियां थीं। एक या दो कार्यक्रम महिलाओं को पंचायती राज की बुनियादी जानकारी, प्रस्तावित योजनाओं कोे लागू करने के तरीकों और पंचायती राज से जुड़े वित्तीय मामलों की जानकारी देने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
आखिर कुछ सरकारी और कुछ गैरसरकारी संस्थाओं ने महिलाओं को पंचायती कामकाज का प्रषिक्षण देकर उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया तो स्थिति बदलने लगी। उत्तर प्रदेष में तो बकायदा प्रस्ताव पारित कर महिला प्रधानों की जगह पर उनके पतियों के बैठक में जाने पर रोक लगाई गई। अपने पहले कार्यकाल के केवल तीन सालों के बाद बहुत सी महिलाओं सदस्यों ने अपनी सक्षमता और अधिकारों को पहचानना षुरू कर दिया। उत्तर और मध्यप्रदेष की बहुत सी पंचायत सदस्यों ने अपने स्थान पर अपने पतियांे को बैठकों में भेजने का ही नहीं ब्लकि बैठकों में उनकी मौजूदगी का भी विरोध किया। लोकतंत्र की इस बुनियादी संरचना से महिलाओं को बाहर करने के लिए बहुत सी घटनाओं में ‘अविष्वास मत’ का सहारा भी लिया गया। अगस्त 1998 में यानि पंचायतों में महिलाओं के प्रवेष के पहले कार्यकाल के मात्र तीन वर्शों बाद अगस्त 1998 में अजमेर जिले के रसूलपुर गांव की सरपंच छग्गीबाई को ‘अविष्वास मत’ के द्वारा हटा दिया गया। इस घटना ने पंचायती राज के लिए काम कर रही संस्थाओं को चेताने का काम किया। दिल्ली और राजस्थान की कुछ संस्थाओं ने इस संदर्भ में सर्वे कराई तो उन्हें पता चला कि बहुत सी महिला सरपंचों को ‘विष्वास मत’ से बाहर किया जा रहा है। 1999 के मई माह में राजस्थान की दो संस्थाओं ने एक जनसुनवाई का आयोजन किया ताकि महिला प्रतिनिधियों के अनुभवों को जाना जा सके। जनसुनवाई में हिस्सा लेने वाले राजस्थान के छह जिलों में से 74 महिला सरपंचों में से 24 महिलाओं को अविष्वास मत के द्वारा बाहर निकालने की धमकी दी गई थी। जनसुनवाई में यह भी स्पश्ट हुआ कि अधिकतर मामलों में उपसरपंच जो अधिकतर कोई पुरुश होता है महिला सरपंचों के कार्यभार को देखता है और यह उपसरपंच प्रायः अन्य सरकारी कर्मचारी जैसे बीडीओ की मिलीभगत से पैसों की हेराफेरी में षामिल रहता है। महिला सरपंच उनके खिलाफ अगर कार्रवाई करना चाहती है तो अविष्वास मत की मार्फत सरपंच को ही निश्कासित करने की मुहिम षुरू हो जाती है। छग्गीबाई के मामले में उपसरपंच मोहन सिंह ने अपने षराब के व्यापार को बचाने के लिए उसके खिलाफ विष्वास मत लाकर उसे निश्कासित कर दिया। महिला पंचायत सदस्यों के लिए अविष्वास मत के इस हथियार से जूझना दूसरी बड़ी चुनौती है। अन्य मुख्य चुनौती मानसिक और अन्य कई तरह की यातनाओं की थी। आरंभ के वर्शों में षोशण की स्थिति अधिक रही। पिछले वर्श जब महिलाओं के कार्यकाल के पहले पांच सालों का आकलन किया गया तो पता चला कि इन पांच वर्शों के दौरान पंचायतों में काम कर रही बहुत सी महिलाओं को जाति और लिंग के आधार पर पक्षपात का रवैया झेलना पड़ा। नीची जाति की महिला को ऊंची जाति के लोगों के हाथों बार-बार अपमानित होना पड़ा। उन्हें पंच सदस्य, सरपंच या उपसरपंच के पद पर स्वीकृत करने की मानसिकता बहुत कम थी।
गुजरात के गांधीनगर जिले के कलोल तालुक में धेड़िया गांव की सरपंच षंकरीबेन गांव के उच्च और प्रभावी लोगों को इसलिए गंवारा नहीं थी क्योंकि वह सेमा (दलित) जाति की होते हुए भी गांव के विकासात्मक कार्यों को बड़ी सफलता से निभा रही थी। उसे अपदस्थ करने के लिए उन्होंने उस पर भ्रश्टाचार के आरोप लगाने षुरू कर दिए। महिलाओं को पंचायतों की राजनीति से बाहर रखने के लिए षारीरिक हमले या पुरुश साथियों द्वारा बेइज्जत होने जैसे भी बहुत से मामले सामने आए। मध्यप्रदेष में बैतूल जिले की 65 वर्शीय महिला सरपंच के साथ बलात्कार। दुर्ग जिले में एक महिला सरपंच की भरी सभा में साड़ी खींचकर बेइज्जत करना तथा होषगांबाद जिले के सोनासांवरी की सरपंच केसर बाई के घर पर बम से हमला जैसी घटनाएं इनके मुख्य उदाहरण है। सबसे दिल दहला देने वाली घटना मध्यप्रदेष के पत्थल गांव में हुई। यहां की 70 वर्शीय मोती बाई को डायन करार देकर इतना प्रताड़ित किया गया कि उसे स्वंय को आग के हवाले करना पड़ा। लेकिन इन उत्पीड़नों और अत्याचारों का मुख्यता कारण इनका ‘महिला’ होना ही नहीं था बल्कि महिला होने के बावजूद सत्ता पर एकाधिकार मानने वाली पुरुशवादी सोच को निरस्त कर इन महिलाओं ने पंचायत की विकास योजनाओं के नाम पर आने वाले पैसों में होने वाले भ्रश्टाचार को खत्म करने के प्रयास भी किए थे। बहुत से ऐसे उदाहरण भी देखने को मिले जिन्होंने इस बात की पुश्टि की कि महिला सरपंचों के दमन का मूल कारण उनका भ्रश्टाचार का विरोध करना था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है औपचारिक षिक्षा से वंचित महिलाओं ने भी ग्राम पंचायतों में पुरुश के प्रभुत्व को सफलतापूर्वक चुनौती देनी षुरूकर दी है। दूसरे चुनाव के बाद इन महिलाओं से यह सुनने को मिल रहा है कि पहला चुनाव भले ही उन्होंने औरत होने की वजह से जीता हो लेकिन दूसरे चुनाव की जीत उनके कार्यों की जीत है। एक अच्छे सरपंच या पंच सदस्य की जीत है।
मीडिया की भूमिका पंचायती राज में मीडिया की भूमिका काफी सार्थक कही जा सकती है। खासकर महिलाओं के संदर्भ में । महिलाओं के पंचायतों में निर्वाचन केे बाद, पहले कार्यकाल में मीडिया ने महिलाओं के षुरूआती संघर्श को उजागर किया। उनकी समस्याओं, विफलताओं के बारे में कई रिपोतार्ज प्रकाषित हुईं। हांलाकि इससे पंचायतों में कार्य करने वाली महिलाओं की छवि ‘रबड़ स्टैम्प’ के रूप में भी उभरी। लेकिन दूसरे चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते बहुत से ऐसी महिला सरपंचों के नाम सुनने को मिले जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए पंचायत के कामकाज और गांव की विकास योजनाओं का बेहतर ढंग से संचालन किया। इनमें साक्षरता, स्वास्थ्य, भूमि सुधार और महिला समता जैसे मुद्दे भी षामिल हैं। मीडिया की सार्थक भूमिका का ही परिणाम था कि जब मध्यप्रदेष में टीकमगढ़ जिले की पीपरा बिलारी ग्राम पंचायत की अनुसूचित जाति की सरपंच गंुदिया बाई को वहीं के कुछ प्रभावषाली लोगों ने स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने से रोक कर अपमानित किया तो समाचारपत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस घटना को भरपूर प्रचारित किया गया। आखिर आगामी स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री ने स्वंय गुंदिया बाई के हाथों टीकमगढ़ जिला मुख्यालय पर झंडा फहराया।
इसके अलावा छग्गी बाई, जैसी महिलाओं के साथ होने वाले षोशण और अपमान की घटनाएं मीडिया के कारण ही प्रचारित हो रही हैं। इसका एक बड़ा कारण पिछले कुछ वर्शो में मीडिया मंे 30 से 40 प्रतिषत महिला पत्रकारों की बढ़ती संख्या है। इससे महिलाओं के मुद्दों को समाचारपत्रों मंे अधिक जगह मिलने लगी है। उनकी उपस्थिति ने समाचारपत्र के प्रबंधकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि महिला मुद्दे केवल फैषन, मेकअप, साजसजावट ही नहीं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि 80 प्रतिषत समाचारपत्र अभी भी राजनैतिक समाचारों और विज्ञापनों से भरे होते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि विज्ञापनदाताओं को पंचायती राज या ग्रामीण लोगों से कोई विषेश मतलब नहीं क्योंकि इससे उन्हें अपने ‘कोक’ ‘पेप्सी’ या साज-सज्जा की वस्तुएं बेचने में कोई मदद नहीं मिलेगी। इसके अलावा ग्रासरूट मुद्दों को कवर कराने के लिए रिर्पोटरों को दूरदराज के गावों में भेजना होगा, पंचायतों के कामकाज को देखने के लिए गावों मे अधिक समय बिताना होगा जिस का सीधा सीधा अर्थ समाचारपत्र प्रबंधको के लिए समाचार संकलन के खर्च को बढ़ाना है।
हांलाकि कुछ अखबारों ने इन सब दिक्कतों के बावजूद मानवीय सरोकारों को खास कर पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका को अहमियत देने का प्रयास किया है। कथित राश्ट्र समाचारपत्रों की अपेक्षा इस दिषा में अच्छा काम छोटे पत्र पत्रिकाओं का रहा। पंचायत के कार्यों को उजागर करने के लिए कई लघुपत्रिकाएं षुरू की गई है जैसे मध्यप्रदेष में देवास जिले से ‘एकलव्य’ नाम की संस्था ने ‘पंचतंत्र’ नाम की पत्रिका निकाली है। कई गैर सरकारी संगठन भी अपनी पत्र-पत्रिकाओं में इन मुद्दों को उजागर कर रहे हंै। आंचलिक समाचारपत्रों में इस संदर्भ की घटनाओं को बेहद बारीकी से देखा जा रहा है। ‘प्रेस इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया’ ने जमीन से जुड़े मुद्दों और मानवीय सरोकारों पर ‘ग्रासरूट’ की मासिक पत्रिका षुरू की है जिसमें एक पन्ना ‘पंचायत’ पर ही है। लेकिन ग्रामीण लोगों तक पंचायत में काम करने वाली महिलाओं की सफल मिसालें पहुंचाने के लिए लघु पत्रिकाओं की अधिक जरूरत है क्यों कि इनमें प्रकाषित पंचायतों से जुड़े महिलाओ के अनुभव बहुत से अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए दिषानिर्देष का काम करेगें।कुछ गैर सरकारी संगठन भी पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका को मीडिया मे उजागर करने में लगे हैं। उदाहरण के लिए ‘हंगर प्रोजेक्ट’ पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी के लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए पत्रकारों को दो लाख रुपए का अवार्ड दे रहा है। राश्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में इस अवार्ड ने विकास और ग्रासरूट मुद्दों के लिए थोड़ी जगह बनानी षुरू की है भले ही दो तीन कालम में ही सही।
विजुअल मीडिया में ‘सरोकार’ जैसे कायक्रमों में कई मिसाल बनी महिला संरपचों के कार्य को दिखाया जाता है। बाजारवाद के चलते हांलाकि अधिकतर अंग्रेजी और हिंदी के राश्ट्रीय स्तर के समाचारपत्रों में प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक ‘लाइफ-स्टाइल’, ‘फिल्म’ और ‘टीवी’ को जगह देने की होड़ लगी रहती है लेकिन इन स्थितियो में भी अगर पंचायत में महिलाओं की सफल कहानियों को अधिक प्रचारित किया जाए तो नीति निर्धारकों पर सार्थक प्रभाव डाला जा सकता है। जहां तक सरकार की भूमिका का सवाल है तो सबसे अहम यह है कि पंचायती राज के कामकाज में पारदर्षिता बनाने का काम सरकार को करना होगा। विकास के कार्य में जनता को हर कदम की जानकारी होना जरूरी है। विकास कार्य की योजना बनाने से लेकर उसको लागू करने के प्रत्येक चरण की उन्हें जानकारी होनी चाहिए। सूचना के अभाव में लोग योजना बनाने से लेकर योजना लागू करने तक की स्थिति में कोई फैसला नहीं दे सकते। इसलिए उन्हें सूचना मिले इसके लिए सूचना के अधिकार कानून को लागू कर सरकार अहम भूमिका निभा सकती है। विकास के कार्यों में पारदर्षिता से भ्रश्टाचार खत्म होगा। इसके अलावा पंचायत में भ्रश्ट सरकारी कर्मचारी जैसे ग्राम सेवक (बीडीओ) इत्यादि के खिलाफ सख्त कार्रवाई स्थानीय प्रषासन को स्वच्छ बनाने का काम कर सकती है। लोकतंत्र के पाये मजबूत बने इसके लिए लोगों का सहयोग जरूरी है। मानव विकास की रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी राश्ट्र की असली संपति उसके लोग होते हैं और विकास का उद्देष्य ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार करना है जिसमें लोग दीर्घ समय तक स्वस्थ और रचनात्मक जीवन जी सकें। लेकिन यह वातावरण लोगों की भागीदारी के बिना संभव नहीं। किसी भी गांव में सड़क बनाने या अन्य किसी विकासात्मक काम की मंजूरी ग्रामसभा के आयोजन के बिना संभव नहीं होती। प्रायः ग्रामसभाओं के आयोजन के अभाव में बहुत से विकासात्मक कार्य षुरू नहीं हो पाते। इन सभाओं का आयोजन आम लोगों की सक्रियता या सहमति के बिना संभव नहीं। ग्रामवासियों को चाहिए कि अपने क्षेत्र में होने वाले विकास कार्य के प्रति सचेत रहे और इनके अभाव में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं ।
( यह लेख अक्टूबर २००१ में विदुर में प्रकाशित हुआ है )

1 comment:

राजेश वसावा said...

स्त्रीशसक्तीकरणमे मीडियाकी भूमिका अहम है.महिलाओको जाग्रत करने के लीये अनके अधिकार उसे मीले और ये अधिकारका उपयोग कर सके एसा वातावरण तैयार करनेकी जिम्मेदारी मीडियाकी है.पहलेसे बहेतर वहीवट आज महिलाएं कर रही है. जरूरहै तो उसे प्रेरीत करनेकी.जो मीडियाही कर सकता है.काफी जगहो पर एक स्त्री पंचायतको सक्षमतासे चला रही है.धीरे धीरे शिक्षणका स्तर बढनेसे परिवर्तन आएगा.सपने अधिकारसे सुपरिचित होगी तो जरूर अपनी पुरी ताकत इनमे लगा देगी.मीडियाको इस तरहके समाचारको हाइलाट्स करना चाहीए.