Monday, 19 January 2009

मीडिया में आम आदमी

अन्नू आनंद
पिछला दशक मीडिया के के लिए बदलाव का दशक था। इस दौरान प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। खासकर भाषायी पत्रकारिता में ऐसे बदलाव अधिक देखने को मिले। समाचारपत्रों का स्वरूप बदला। पन्नों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। नए संस्करणों की शुरूआत हुई। कई क्षेत्रीय समाचारपत्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दो हजार के दशक तक पहुंचते-पहुंचते सैटेललाइट संस्करणों के साथ मीडिया के स्थानीयकरण की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। लेकिन मीडिया के विस्तार के साथ साथ मीडिया की सोच में भी परिवर्तन आने लगा। 90 दशक के अंत में अंग्रेजी समाचारपत्रों ने समाचारों को कमोडिटी (उत्पाद) की तरह बेचने का रवैया अपनाना शुरू कर दिया। समाचारों के उत्पादकरण की प्रक्रिया ने जन -सरोकारों को हाशिए पर धकेल दिया। मीडिया की प्राथमिकता आम आदमी को प्रभावित करने वाले मुद्दे नहीं रहे। यह महसूस किया जाने लगा कि गरीबी, बेरोजगारी और आवास की समस्याओं से फैशन, फिल्म, माडलिंग, खान-पान और जीवन शैली जैसे विषय अधिक अच्छी स्टोरी हैं क्योंकि वे अधिक बिकाऊ हैं। अंग्रेजी समाचारपत्रों के बाजारोन्मुखी होने के साथ भाषायी समाचारपत्रों ने भी मार्केट में जीवित रहने के लिए इस प्रवृत्ति को अपनाना शुरू कर दिया। अंततः मीडिया के विस्तृत स्वरूप में आम आदमी सिकुड़ता गया।
भारतीय मीडिया विश्व के सबसे जीवंत मीडिया में गिना जाता है। इसका मुख्य कारण प्रेस की स्वतंत्रता - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं इसका बढ़ता स्वरूप भी है। आरएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 में भारत में कुल पत्र-पत्रिकाओं की संख्या 51960 है जबकि 2000 में इनकी संख्या 49145 थी जो कि करीब 105 भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। सैटेलाइट और केबल चैनलों की संख्या यहां 100 से अधिक है यानी अमेरिका के बाद सबसे अधिक चैनल भारत में है। सरकारी टीवी की पहुंच 89 प्रतिशत है तो केबल टीवी की पहुंच भी निरंतर बढ़ रही है। 1999 के आंकड़ों के मुताबिक शहरों में 42 लाख घरों तक टीवी पहुंच रहे हैं तो गांवों में इनकी संख्या 37 लाख है। निजी रेडियो स्टेशन पहले ही अपने पैर पसार चुका है।
मीडिया के इस विस्तृत स्वरूप के मद्देनजर भारतीय मीडिया की बेहद परिपक्व, उतरदायी और संवेदनशील तस्वीर उभरती है। लेकिन हकीकत यह है कि देश के 74 प्रतिशत लोग अभी भी इस विशाल मीडिया की चिंता का विषय नहीं बन पाए हैं। जिस अनुपात में मीडिया का विकास हो रहा है, आम आदमी और उससे जुड़े मुद्दे उस का हिस्सा नहीं बन पा रहे। आम आदमी की बात करें तो जो तत्काल मुद्दे ध्यान में आते हैं वे हैं आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और भोजन। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अखबारों में इन मुद्दों की खबरों को ढूढंना पड़ता है। ये आम लोग मीडिया में तब दिखाई पड़ते हैं जब वे किसी बड़ी त्रासदी के शिकार होते हैं। उड़ीसा के कालाहांडी में लोगों की भूख से मौतें होती है या तूफान और चक्रवात उन पर कहर बरपाते हैं या फिर दक्षिण भारत के इलाकों मंे सुनामी की लहरें जब असंख्य लोगों को अपनी चपेट में लेती हैं तो टीवी और अखबारों में रोते, बेबस, बिलखते-तड़पते हुए इन आम लोगों तस्वीरें दिखाई पड़ने लगती हैं। ऐसी-ऐसी कहानियां खोजकर निकाली जाती हंै जिसमें मेलोड्रामा हो, रोमांच हो या फिर सहानुभूति और दर्द का ज़ज्बा ताकि पाठक या श्रोता भावनात्मक रूप से उससे जुड़ सके। विभिन्न चैनलों और अखबारों में भावनात्मक स्तर पर जनता को एक प्रकार से ब्लैकमेल करने की एक अदभुत होड़ चल पड़ती हंै। लेेकिन सामान्य परिस्थितियों में इसी आम व्यक्ति से जुड़ी बुनियादी समस्याएं जैसे शिक्षा, आवास या रोजी-रोटी के मुद्दों पर जीवन शैली, सेक्स, मनोरंजन और पेज थ्री की खबरें हावी हो जाती हंै।
उड़ीसा की एक प्रतिष्ठित संस्था सेंटर फाॅर यूथ एंड सोशल डेवलपमेंट ने वर्ष 2001 में मुख्यधारा और क्षेत्रीय समाचारपत्रों में उपेक्षित, गरीब और आम आदमी से जुड़े मुद्दों का कवरेज़ जानने के उद्देश्य से एक अध्ययन कराया। इसके लिए पांच क्षेत्रीय (उड़िया) समाचारपत्रों और चार राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचारपत्रों का चयन किया गया। उड़िया समाचारपत्रों में समाज, प्रजातंत्र, प्रगतिवादी, धारित्री, संवाद थे और अंग्रेजी समाचारपत्रों में द टाइम्स आॅफ इंडिया, द टेलीग्राफ, द एशियन एज और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस थे। अध्ययन में गरीब और उपेक्षित लोगों से जुड़े मुद्दों पर प्रकाशित रिपोर्टों की संख्या और रिपोर्ट प्रस्तुति की शैली पर विस्तृत अध्ययन कर आंकड़े एकत्रित किए गए।
छह माह की अवधि के दौरान किए गए इस अध्ययन के परिणाम मीडिया के आम आदमी के प्रति नजरिए की पोल खोलते हंै। इन परिणामों के मुताबिक मुख्यधारा के मीडिया में गरीब और सामाजिक विकास के जो मुद्दे प्रकाशित होते हैं, उनका अनुपात खेल, व्यापार या मनोरंजन जैसे विषयों की तुलना में न के बराबर हैं। उड़िया समाचारपत्रों में चार प्रतिशत स्थान इन मुद्दों को मिला था जबकि अंग्रेजी समाचारपत्रों में केवल एक प्रतिशत स्थान सामाजिक सरोकारों को दिया गया था। उड़ीसा में 47 प्रतिशत लोगों की संख्या गरीबी रेखा से नीचे है, यहां आदिवासी और दलित जनसंख्या का अनुपात भी काफी बड़ा है। लेकिन मीडिया में इनकी स्थिति उतनी ही शोचनीय है जितनी कि सामाजिक व्यवस्था में। उड़ीसा की तरह अन्य राज्यों के प़्ात्र-पत्रिकाओं की स्थिति अधिक सुखद नहीं। बंेगलोर की एक संस्था ‘सेंटर फाॅर डेवलपमेंट एण्ड लर्निंग’ ने वर्ष 2000 में समाचारपत्रों में विकास के मुद्दों का कवरेज को जानने के लिए एक अध्ययन कराया। विकास कवरेज़ पर एक साल तक के आंकड़े इकट्ठे किए गए। यदि विकास समाचारों को ऐसी सूचनाएं माना जाए जिनका कोई सामाजिक महत्व हो तो समाचारपत्रों की प्राथमिकताएं चैकानें वाली हैं। अध्ययन के परिणामों के अनुसार टाइम्स आॅफ इंडिया के 24 पन्नों में से केवल 4 प्रतिशत कवरेज़ विकास समाचारों को दिया गया था।
80 के दशक में समाचारपत्रों के रविवार संस्करणों में सामाजिक मुद्दे उनकी खास पहचान थे। इन्हीं पन्नों से मीडिया ने कई बड़े-बड़े सामाजिक अभियान खड़े किए। महिला आंदोलन, माया त्यागी, मथुरा ब्लात्कार काण्ड, नर्मदा बचाओ, भंवरीदेवी काण्ड जैसे मुद्दों पर मीडिया के कवरेज़ ने घटनाओं का रुख मोड़ दिया था। लेकिन तब समाचारपत्रों के सबसे ऊंचे पद पर आर्थिक जोड़ घटाव करने वाला मालिक नहीं संपादक होता तो जो किसी भी खबर की अहमियत का निर्धारक होता था। वह खबर का मूल्यांकन पत्रकारिता के मूल्यों के आधार पर करता था। लेकिन आज खबर या रिपोर्ट का महत्व प्रबंध संपादकों या विज्ञापन और प्रसार अधिकारियों की कृपादृष्टि पर निर्भर करता है।
इसलिए आज अगर अखबारों के रविवारी संस्करण उठाकर उसमें गरीबी, भुखमरी, रोजगार या कृषि से जुड़े मुद्दों पर कवरेज़ का जायजा लें तो अन्य विषयों पर लिखे फीचर के मुकाबले इनका अनुपात नगण्य होगा। 30 जून के दो राष्ट्रीय और चार क्षेत्रीय (हिन्दी) समाचारपत्रों के विश्लेषण से कुछ ऐसी ही तस्वीर उभरी। एक क्षेत्रीय समाचारपत्र में इंटरनेट पर होने वाली अश्लीलता पर कवर स्टोरी थी। दूसरे में ईशा कोप्पिकर पर और इन चारों क्षेत्रीय समाचारपत्रों के अंदर के पृष्ठों पर घर सजाने की कला, पति से पत्नी की अपेक्षाओं और खान-पान पर लेख मौजूद थे। अंग्रेजी सहित इन छह समाचारपत्रों में मानवीय सरोकारों पर कोई भी लेख नहीं था।
आमतौर पर कहा जाता है मीडिया हमारी संस्कृति और हमारे समाज पर गहरा प्रभाव डालता है और समाज में किसी भी बदलाव की कल्पना मीडिया के सहयोग के बिना पूरी नहीं होती। यह मान्यता भी है कि गरीबी को खत्म करने और सामाजिक असमानता दूर करने में मीडिया की भूमिका जागरूकता फैलाने और लोगों को सूचित करने में महत्वपूर्ण है। लेकिन मौजूदा मीडिया इन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। क्योंकि उसका मानना है कि मीडिया किसी भी प्रकार के सामाजिक दायित्व से नहीं बंधा। हाल में एक विचार गोष्ठी में मीडिया के कुछ प्रतिनिधियों ने ऐसे ही तर्क रखे। लेकिन बाजारवाद की आड़ में अखबारों के पहले पृष्ठ पर महिलाओं की अश्लील तस्वीरें छापना और अखबार के अधिकतर स्पेस को फिल्मी पोस्टरों में बदलना, मीडिया के किस दायित्व का बोध कराता है। यह बहस का मुद्दा हो सकता है। कुछ समाचारपत्र जैसे झारखंड का प्रभात खबर, छत्तीसगढ़ में देशबंधु, पंजाब का ट्रिब्यून, हिन्दू और जनसता जैसे पत्र भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के दबावों के बावजूद अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। इन समाचारपत्रों में अन्य किन्हीं भी समाचारपत्रों की तुलना में विकास और सामाजिक मुद्दों को अहमियत दी जाती है। वरना मुख्यधारा के समाचारपत्रों के लिए आम आदमी गौण होता जा रहा है। अधिकतर अखबार इस हकीकत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। सबसे अधिक प्रसार का दावा करने वाले हिंदी समाचारपत्र के कुछ प्रतिनिधियों का तर्क है कि उनके समाचारपत्र में स्वास्थ्य और मानव संसाधन ‘बीट’ हैं और रोजाना इस बीट के समाचारों को उनके अखबार में कवर किया जाता है लेकिन अगर इन अखबारों की रिर्पोटों का विश्लेषण किया जाए तो यह कवरेज़ कुछ सेंटीमीटरों की खबरों से अधिक नहीं होता और अधिकतर खबरेें या तो प्रेस ब्रींफिग पर आधरित होती हैं या सरकारी विज्ञप्ति और सरकारी घोषणाओं के आधार पर। लेकिन फिर भी इनका अनुपात राजनीति, अपराध और महानगरीय संस्कृति को दिए गए स्पेस की तुलना में न के बराबर होता है। अखबारों के इस चलन के प्रति एक दैनिक समाचारपत्र के प्रबंध संपादक कहते हैं कि समाचारपत्र समाज का आईना है और वे तो वही दिखाते हैं जो समाज में होता है और यही पत्रकारों का धर्म भी है। लेकिन मीडिया यह धर्म केवल एक विशिष्ट यानी ‘इलीट’ वर्ग के प्रति ही क्यों निभाता है। अगर मीडिया समाज का आइना होने का दावा करता है तो देश के 76 प्रतिशत लोगों के बात इसमें प्रतिबिंबित क्यों नहीं होती।
मीडिया पर बढ़ते बाजारवाद और उपभोक्तावाद के अलावा भी ऐसे बहुत से कारण हैं जो मीडिया में आम आदमी को हाशिये पर धकेलने के लिए जिम्मेदार है। संवाददाताओं में संवेदनशीलता की कमी और अखबारों के वरिष्ठ पदों पर बैठे व्यक्तियों की मानसिकता। आज हर संवाददाता ऐसी खबर की खोज में रहता है जिससे उसकी स्वयं या उसके प्रतिष्ठान की रेटिंग बढ़े। किसी विशेष हस्ती का इंटरव्यू या कोई सनसनीखेज खबर किसी भी चैनल या अखबार के लिए रामबाण माने जाते हैं। ऐसे में अधिकतर रिपोर्टर किसी गांव में पानी या शि़क्षा के अभाव से जूझते लोगों की व्यथाओं को कवर करने के बजाए ऐसी-वैसी खबरों की खोज में रहते हैं। यह भी सच है ंिक आम आदमी से जुड़े विकास के सवाल पर लिखने के लिए फील्ड रिपोर्ताज यानि ग्रामीण इलाकों मेेें जाने की जरूरत पड़ती है। हांलाकि छोटे समाचारपत्रों के लिए भले ही यह आर्थिक रूप से व्यावहारिक न हो लेकिन बड़े समाचारपत्रों के लिए यह संभव है। लेकिन इन पत्रों के शीर्ष पदों पर बैठने वालों को लगता है कि राजनीति, शहरी अपराध और सेलिब्रेटी सेे पन्ने भरना अधिक आसान है। हकीकत तो यह है ंिक मीडिया में पिछले एक दशक से संपादकों से मालिकों और प्रबंधकों को हुए सत्ता के स्थान्नांतरण ने मीडिया के एंजेडें को बदल कर रख दिया है। अब उसकी प्राथमिकता लाभ कमाना और सबसे आगे निकलना है। लेकिन जैसा कि टाइम्स लंदन के पूर्व संपादक हेनरी विकहम कहते हैं कि ‘‘आदर्श समाचारपत्र वही है जो कि पैसा बनाने के लिए पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता किए बिना अपनी रोजी-रोटी कमाए।’’लेखिका ग्रासरूट की संपादक है
यह लेख जनवरी २००५में प्रकशित हुआ है

2 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

शानदार!
जिन ७४ प्रतिशत लोगों की बातें नहीं छापी जातीं, शायद वे इस मीडिया के कंज्यूमर नहीं बने अबतक. जिस दिन समाचार पत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनके घरों तक पहुँच जायेगी, उस दिन देखेंगे कि कैसे मीडिया इनलोगों की उपेक्षा कर पाता है?

मीडिया के ऊपर आपके लेख बहुत प्रशंसनीय हैं.

Kishore Choudhary said...

aapne bahut achcha likha hai.