Tuesday, 23 December 2008

बाज़ार से नियंत्रित मीडिया

अन्नू आनंद

पिछले कुछ समय से मीडिया में आई बाजारवादी क्रांति के साथ कदमताल मिलाते हुए देश कीप्रमुख और गंभीर समझी जाने वाली पत्रिकाएं भी अपने मुखौटे बदल रही हैं। केवल रंग-रूप यासाज-सज्जा ही नहीं, इन पत्रिकाओं के कंटेंट (विषय-सामग्री) में भी आश्चर्यजनक परिवर्तन आरहा है। कुछ समय पहले तक ये पत्रिकाएं केवल राजनीति, व्यापार, खेल या कभी-कभार फिल्मों सेजुड़े मुद्दों को आवरण कथा के रूप में प्रकाशित करती थीं। लेकिन अब प्रायः महिला और पुरुषों केयौन संबंधों से जुड़े विभिन्न पहलुओं को इनके कवरों पर देखा जा सकता है।प्रायः इन आलेखों का आधार कोई न कोई ‘राष्ट्रीय’ या ‘एक्सक्लूसिव’ सर्वे बताया जाता है।यौन-संबंधों से जुड़े इन आलेखों को देखकर ऐसा आभास होता है जैसे कि समूचे देश में यौनव्यवहार की क्रांति आ गई हो। राष्ट्रीय सर्वे के हवाले से इन आलेखों में आंकड़ों का प्रस्तुतिकरणइस प्रकार किया जाता है जैसे कि यह तस्वीर पूरे देश की हो। जब तक पाठक पूरा लेख ध्यान सेनहीं पढ़ता यह बात समझ में नहीं आती कि जिस वर्ग और जिस समूह का यह सर्वे प्रतिनिधित्वकर रहे हैं उसका प्रतिशत एक से भी कम है। हकीकत में इस सर्वे का आधार महानगरों/शहरों केकुछ चुनिंदा महिलाएं या पुरुष होते हैं और ये चुनिंदा महिला/ पुरुष समूचे शहर या महानगर केयौन व्यवहार का प्रतिनिधित्व नहीं करते।एक पत्रिका द्वारा ऐसा कवर छपते ही प्रतिद्वंद्वी पत्रिका भी किसी ऐसे ही मुद्दे को कवर पर छापतीहै और फिर एक-दूसरे की होड़ में इस तथ्य को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाता है कि इसकापाठकों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इस प्रकार के चित्रण से समूचे देश की एकल महिला(अधिकतर जिन पर ये लेख केंद्रित होते हैं) या पुरुषों की गलत छवि प्रस्तुत होती है।दरअसल पिछले कुछ समय से मीडिया में आई परिवर्तन की आंधी ने सबसे अधिक प्रभावित कंटेंटकी गुणवत्ता को किया है। भारी पूंजी निवेश से शुरू हुईं इन पत्र-प़ित्रकाओं के विषय का निर्धारणबाजार के नजरिए से किया जाता है। पहले कंटेंट की कमान संपादक के हाथ में होती थी जोकिपत्रकारिता के मापदंडों के मुताबिक किसी खबर/लेख को प्रकाशित करने का निर्णय लेता था। येअधिकार अब प्रसार या विज्ञापन प्रबंधक के हाथ में चला गया है। प्रबंधकों/मालिकों के इस दबावका असर देश की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में स्पष्ट देखा जा सकता है। इन पत्रिकाओं केसंपादक हमेशा यह समझा और समझाया करते थे कि पाठकों की रूचि ‘होती’ नहीं ‘बनाई’ जातीहै और इसे ’बनाने’ का काम संपादकों के हाथ में होता है। आज बाजार से प्रभावित वही पत्रिकाएंयौन संबंधों से लेकर मुंबई में रात की पार्टियों पर कवर स्टोरी इस तर्क के साथ छाप रही हैं कि‘‘पाठक यही पढ़ना चाहते हैं।’’ क्योंकि सेक्स बिकता है इसलिए किसी न किसी बहाने उसे ‘कवर’पर छापकर मीडिया समूह अधिक मुनाफे की जुगत लगाते रहते हैं।कई छोटे-मझोले क्षेत्रीय अखबारों की बड़े मीडिया समूहों द्वारा खरीद की प्रवृति से पत्र/पत्रिकाओंकी विषय सामग्री में और भी गिरावट के आसार नजर आ रहे हैं। क्योंकि बड़े मीडिया समूह अधिकसे अधिक बोली देकर इन अखबारों को खरीद रहे हैं, संभवतः वे अपनी पूंजी निवेश को दोगुनाकरने के लिए हर हथकंडे भी अपनाना चाहेंगे। इस क्रम में सबसे बड़ा समझौता कंटेंट के साथ हीहोगा।कुछ समय से झारखंड के जन सरोकारी अखबार ‘प्रभात खबर’ के बिकने की खबरें आ रही हैं।इस अखबार की अपनी पहचान है। ग्रामीण मुद्दों को वरीयता देकर इसने दूर-दराज के इलाकों मेंअपनी जगह बनाई है, लेकिन अब कुछ बड़े समाचारपत्र समूह इस पर अपनी नजर लगाए बैठे हैं।उन्हें इस समाचारपत्र के जरिए अपने व्यापार को बढ़ाने की कई संभावनाएं नजर आ रही हैं।‘प्रभात खबर’ को खरीद कर वे इसके स्पेस को बेचकर करोड़ों का मुनाफा कमाना चाहते हैं।जाहिर है कि अपने व्यापार का विस्तार उन्हें हरिवंश जैसे संपादकों की तरह गरीबी, भुखमरी,बीमारी या हताशा की खबरें प्रकाशित कर नहीं मिलेगा। लेकिन यदि बड़े समाचारपत्र समूहों द्वाराव्यापार के नज़रिए से इसी तरह छोटे पत्रों को मुनाफे के लिए खरीदने की प्रवृत्ति जारी रही तोफिर मीडिया की पहचान किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से भिन्न नहीं रहेगी और यह देश औरसमाज के हित में नहीं होगा। 􀂄

(यह लेख जनवरी -मार्च के विदुर अंक में प्रकाशित हुआ है )

4 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

आपका कहना बिल्कुल सही है. पत्रिकाओं की बात तो जाने दीजिये हमारे शहर के दो प्रमुख समाचार पत्रों ने कई बार इस तरह के सर्वे प्रकाशित किए हैं. संस्कृति से लाकर राजनीति और अर्थ-व्यवस्था से लेकर शिक्षा जैसे विषयों में भिन्नता वाले इतने बड़े देश में दस हज़ार का सैम्पल सर्वे किस तरह का रिजल्ट दे सकता है, ये कोई नहीं सोचता. ये अखबार और पत्रिकाएँ अपने सैम्पल सर्वे में स्टैण्डर्ड एरर तक का अनुमान नहीं लगा सकते.

आपका कहना सही है कि विज्ञापन ही विषयों को तय कर रहे हैं. पाठकों को सतर्क रहकर अपने अखबारों और पत्रिकाओं का चयन करना चाहिए.

vinit utpal said...

badhiya laga lekh.

हेमंत said...

paristithi aam aadmi ke viprit hoti ja rahi hain. Media men bhi chhantni jari ho gai hai lekin khabre kahin nahi hai. Media aakjan ki aawaj uthane ke bajay industrialist ke mouthpiece ban gaye hain.....

ajai rai said...

baat adhuri hai.