Thursday, 9 October 2008

मध्यप्रदेश में युवाओं ने किया गावों का कायाकल्प


अन्नू आनंद


(सीहोर, मध्य प्रदेश)


अरुण के चेहरे की मासूमियत और आंखों से झलकती शरारतदेखकर यह कयास लगाना कठिन था कि गांव के विकास मेंउसका भी कोई योगदान हो सकता है। किसी भी अजनबी केआगमन से बेखबर वह बड़ी तन्मयता के साथ गांव के बीचोबीचबने छोटे से चबूतरे पर एकत्रित हुए गांव के सभी छोटे-बड़े बच्चोंके हाथों के नाखूनों की जांच कर रहा था। ‘‘क्या तुम्हारे हाथों केनाखून कटे हैं,’’ इस सवाल को सुनते ही उसने अपनी गर्दन ऊपरउठाई और अपने कटे हुए नाखून वाले हाथ झट आगे कर दिए।इतना करने के बाद वह फिर से अपने काम में मग्न हो गया।दस वर्षीय अरुण मेवाड़ा गांव की ‘आजाद बाल विकाससमिति’ का सदस्य है। गांव के सभी बच्चों की साफ-सफाईजांचने की जिम्मेदारी इस समिति पर है। गांव में पोलियो कीखुराक दी जा रही है। धीरज और हृदयेश गांव के पांच वर्ष तकके सभी बच्चों को पोलियो बूथ भेजने का काम संभाले हुए थे।दोपहर तक वे गांव के सभी बच्चों को दवाई पिलाने का काम पूराकर चुके थे। 12 वर्षीय प्रमोद सभी घरों की दीवार पर बने सफाईके ग्राफ को चाक से भरने का काम कर रहा था। यह ग्राफ बताताहै कि अमुक घर में आज नाली की सफाई, घर के बाहर की सड़ककी सफाई और शौचालय की सफाई की गई है या नहीं।यह दृश्य है राजूखड़ी गांव का। भोपाल से करीब 45 किलोमीटरकी दूरी पर सीहोर जिले के दस गांवों में पानी, शौचालय औरस्वच्छता के सामुदायिक प्रयासों ने गावों का पूरी तरह कायाकल्पकर दिया है।तीन वर्ष पहले तक इन गावों में पानी की बेहद कमी थी बहुतसे घरों में शौचालय न होने के कारण गंदगी और पेट कीबीमारियां अधिक थीं। अधिकतर लोग शौच के लिए खुले में जातेथे। बच्चों में भी स्वच्छता की जानकारी का अभाव था। इस सबकाअसर गांव के अन्य विकास कार्यों पर भी पड़ रहा था। गांव केज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाते थे क्योंकि गांव का इकलौताप्राइमरी स्कूल कभी-कभार ही खुलता था।वर्ष 2005 में भोपाल के गैर सरकारी संगठन ‘समर्थन’ नेसीहोर ब्लाॅक के 10 गावों में जल और शौचालय की एक परियोजनाकी शुरूआत की। इसके लिए यूके की एजेंसी ‘वाॅटर एड्’ सेवित्तीय मदद ली गई। संस्था ने प्रत्येक परिवार को घर मेंशौचालय बनाने के लिए 500 रुपए की मदद दी। शेष 2000 रुपएका खर्चा स्वयं परिवारों ने वहन किए। इसके अलावा उन्होंनेशौचालय बनाने में श्रम दान भी किया।सीहोर से करीब चार किलोमीटर कच्चा रास्ता पार करने केबाद राजूखड़ी गांव पहुंचा जा सकता है। गांव में कुल 88 घर हैंजिनमें से 80 परिवार पिछड़े वर्ग और आठ परिवार अनुसूचितजाति के हैं। यहां के अधिकतर लोग खेतों मंे मजदूरी का कामकरते हंै। गांव में करीब सभी घर कच्चे हैं, रास्ता भी कच्चा हैलेकिन फिर भी गांव का साफ-सुथरा और व्यवस्थित वातावरणकिसी काल्पनिक गांव का अहसास देता है। गांव के सभी घरों मेंशौचालय मौजूद है। घरों के गंदे पानी के निकास के लिए हर घरके बाहर एक पाइप की व्यवस्था है। इस पाइप को घर के बाहरबनाए गए सोक्ता (सोक-पिट) से जोड़ा गया है। सोक्ता के ऊपरबोरी का टुकड़ा लगा रहता है ताकि गंदी मिट्टी पानी के साथछनकर अंदर न जाए।इस व्यवस्था के बारे में गांव के सरपंच चंदन सिंह बताते हैं,‘‘गांव के पानी का स्तर कम न हो जाए इसलिए घरों से निकलनेवाले पानी को सोक-पिट के माध्यम से रिचार्ज किया जाता है।इसके अलावा पानी को संरक्षित करने के लिए मिली 36 हजाररुपए की सरकारी सहायता और गांववालों की मजदूरी की मददसे स्टाॅप डैम और चेक डेम भी बनाए गए हैं।’’गांव में लगे चार सार्वजनिक नल के अलावा कपड़े धोने केलिए अलग से प्लेटफाॅर्म बने हुए हैं। इन नलों और प्लेटफाॅर्म कीसफाई के लिए जिम्मेदार बाल समूह समिति के सदस्य प्रमोदबताते हैं कि किसी को भी नल के नीचे कपड़े धोने की इजाजतनहीं है क्योंकि इससे अन्य लोगों को पानी लेने में दिक्कत होतीहै और नल के नीचे गंदगी भी फैलती है।कुल 21 घरों में वर्षा का पानी संरक्षित करने की भी व्यवस्थाकी गई है। चंदन सिंह के मुताबिक, ‘‘तीन वर्ष पहले यहां पानीऔर शौचालय मुख्य समस्याएं थीं लेकिन स्थानीय संस्था ‘समर्थन’ने जब ‘पानी, स्वच्छता और शौचालय’ की परियोजना गांव में शुरूकी तो सभी परिवारों ने आर्थिक और श्रम का योगदान देकर इसेसफल बनाने में पूरा सहयोग किया।’’ इसके लिए बच्चे, युवा,महिला और पुरुष विभिन्न स्तरों पर अपना योगदान दे रहे हैं। हरग्रामीण को हिस्सेदार बनाने के लिए गांव में विभिन्न समितियांमप्र में ें युवुवुवा औरैरैर बच्चों ें ने किया गांवंवंवों ें का कायाकल्पअन्नू आनंदंदंदबनाई गई हैं। पांच से बारह वर्ष तक के बच्चों का ‘बाल समूह’ हैजिसकी जिम्मेदारी व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना है। इसकेअलावा वे गांव के हैंडपंप, वाशिंग प्लेटफाॅर्म और घर की साफ-सफाईका भी संचालन करते हंै। गांव के युवाओं का समूह ‘युवा विकासमंडल’ सामुदायिक संरचनाओं जैसे गांव के कुएं, टंकी, स्कूल औरस्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं की देखभाल करता है।‘युवा विकास मंडल’ के सदस्य धर्म प्रकाश ने बताया, ‘‘पिछलेकई वर्षों से हमारे गांव का प्राइमरी स्कूल केवल दो घंटे के लिएही खुलता था क्योंकि स्कूल की शिक्षिका भोपाल में रहने के कारण12 बजे के करीब स्कूल आती थी। हमारी समिति ने शिक्षिका सेकई बार इसकी शिकायत की। लेकिन कोई कार्रवाई न होने परहमने स्कूल में ताला लगा दिया और चेतावनी दी कि स्कूल पूरासमय नहीं खुला तो इसे बंद कर दिया जाएगा।’’युवा समिति की इस चेतावनी पर शिक्षिका ने अपने रहने कीव्यवस्था सीहोर में ही कर ली और अब स्कूल नियमित समय परखुलने लगा। इसी प्रकार इन युवाओं ने गांव में आने वालीअनियमित डाक के खिलाफ सूचना के अधिकार के तहत शिकायतदर्ज की तो पता चला कि गांव का डाकिया गांव की डाक नहीं लेजाता जिसकी वजह से काफी डाक पड़ी रहती है।धर्म प्रकाश के मुताबिक, ‘‘हमारी शिकायत के बाद अब रोजडाकिया आता है और गांव के बहुत से युवा जिन्हें अपने नौकरी केआवेदन के जवाब का इंतजार रहता था, वे अब अपने पत्रों केजवाब से खुश हैं।’’राजूखड़ी गांव में आज स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और साफ-सफाईसब कुछ नियमित ढंग से चल रहा है। इसका पूरा श्रेय गांव कीसामूहिक भागीदारी को जाता है। गांव की महिलाएं स्वयं सहायतासमूह की सदस्य हैं। बचत के पैसे का इस्तेमाल ये महिलाएंछोटे-मोटे धंधे की शुरूआत में लगाती हंै।गांव में एक छोटे लेकिन बेहद ही सलीकेदार ढंग से सजेकमरे को ‘सूचना कंेद्र’ बनाया गया है। इस केंद्र में गांव में लागूहर सरकारी योजना की जानकारी के अलावा गांव से संबंधितदूसरे हर प्रकार की सूचना उपलब्ध है।सीहोर से आठ किलोमीटर दूर मानपुरा गांव में भी पानी औरशौचालयों की व्यवस्था ने पूरे गांव का नक्शा बदल दिया है। इसगांव में भी पानी की बेहद किल्लत थी। गांव के बीचोबीच बनेपुराने कुएं का जलस्तर भी काफी नीचे चला गया था। वर्ष के कुछमहीने ही यहां पानी उपलब्ध होता था। इस कमी को पूरा करने केलिए ‘समर्थन’ संस्था की मदद से यहां भी पानी और शौचालययोजना के तहत पानी आपूर्ति, शौचालय और स्वच्छता की एकीकृतपरियोजना शुरू की गई। इसके लिए समुदाय ने स्वयं औरसरकारी माध्यमों से फंड एकत्रित किया।यहां घरों की छतों पर वर्षा के पानी को संरक्षित किया जा रहाहै। कुल 60 घरों वाले इस गांव के हर घर की छत पर पानी कोएकत्रित करने की व्यवस्था है। पाइपों के माध्यम से वर्षा के पानीको पुराने कुएं में पहुंचाया जाता है। जिससे पानी रिचार्ज होकरनल में आता है। गांव के स्कूल में मिड-डे मील के प्रभारी दशरथका मानना है कि प्रोजेक्ट की शुरूआत से पहले गांव में दिसंबरआने तक पानी खत्म हो जाता था, लेकिन इस बार जनवरी-फरवरीमाह में भी पानी नलों में आ रहा है।सरकारी और सामुदायिक सहायता से दो लाख 36 हजाररुपए की लागत वाली 20 हजार लीटर पानी की एक बड़ी टंकीबनाई गई है। इस टंकी को पाइप के माध्यम से गांव की कुछ दूरीपर बने एक बोरवेल से पानी मिलता है। इस से गांव के 8सामूदायिक नल चल रहे हंै। इन नलों से पानी का इस्तेमाल करनेवाले परिवारों को गांव की ‘पानी और शौचालय निगरानी समिति’को दस रुपए प्रति माह फीस देने पड़ते हैं। इसके अलावा समिति30 रुपए प्रति माह की दर से घरों में भी पानी का कनेक्शन देतीहै।‘एकता युवा मंडल’ के पिंटू गांव के घरों की छत पर बने वर्षाके पानी को संरक्षित करने वाले ढंाचे को दिखाते हुए कहते हैं,‘‘कुछ साल पहले तक हमें पानी लेने के लिए एक किलोमीटर दूरजाकर बैलगाड़ियों पर पानी लाना पड़ता था, लेकिन अब हमनेपानी को बचाना सीख लिया है। अब हमें पानी की कोई कमी नहींहै।’’ पानी और शौचालयों से आई खुशहाली के बाद ग्रामीण जलऔर शौचालय समिति ने गांव में मिडिल स्कूल खोलने के प्रयासकिए। आज गांव में मिडिल स्कूल भी है जिसमें अन्य दो गावों केबच्चे पढ़ने आते हैं।‘समर्थन’ संस्था के जिला समन्वयक शाफिक का कहना है किराजूखड़ी, मानपुरा और जहांगीरपुरा सहित जिले के दस गांवों मेंआने वाले इस सार्थक बदलाव का मुख्य कारण सामूहिक भागीदारीहै। इसमें बच्चों और युवाओं की भगीदारी सबसे अधिक है, जोविभिन्न समितियों के माध्यम से इसे अंजाम देते हैं। इसके अलावापानी और शौचालयों के स्थाई संचालन के लिए हम पंचायतों कीक्षमता का निर्माण करते हैं। इसलिए कोई भी निर्णय पंचायतों कीभागीदारी के बिना नहीं होता।‘समर्थन’ के सामुदायिक समन्वयक लाखन सिंह के मुताबिककिसी भी योजना को लागू करने से पहले पंचायत समिति में उसपर बहस की जाती है। पंचायत सदस्य किसी भी मसले कोनिपटाने के लिए ग्रामसभा बुलाते हैं और सबकी सहमति से निर्णयलिया जाता है। राजूखेड़ी गांव के सरपंच चंदन सिंह का कहना हैकि उनके गांव की चैपाल आज भी संसद का काम करती है।सारे फैसले आज भी चौपाल पर ही लिए जाते हैं।साामूहिक भागीदारी की इस परियोजना ने यहां के लोगों केजीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। शाफिक के मुताबिक पानीऔर शौचालय योजना की इस सफलता को देखते हुए जिले केअन्य गांव भी इसे अपनाना चाहते हैं। 􀂄

1 comment:

सुरेश कुमार शर्मा said...

दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही ।
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इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है -
* मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है ।
* कम्प्यूटर ने मनवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है ।
* जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है ।
* 100% रोजगार सम्भव नही है ।
* अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है ।
* संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है ।
* दुनिया के 85% से अधिक संसाधनों पर मात्र 15 % से कम जनसंख्या का अधिपत्य है ।
* 85 % आबादी मात्र 15 % संसाधनों के सहारे गुजर बसर कर रही है ।
धरती के प्रत्येक संसाधन पर पैसे की छाप लग चुकी है, प्राचीन काल में आदमी जंगल में किसी तरह जी सकता था पर अब फॉरेस्ट ऑफिसर बैठे हैं ।
* रोजगार की मांग करना राष्ट्र द्रोह है, जो मांगते हैं अथवा देने का वादा करते हैं उन्हें अफवाह फैलाने के आरोप में सजा दी जानी चाहिए ।
* रोजगार देने का अर्थ है मशीनें और कम्प्यूटर हटा कर मानवीय क्षमता से काम लेना, गुणवता और मात्रा के मोर्चे पर हम घरेलू बाजार में ही पिछड़ जाएंगे ।
* पैसा आज गुलामी का हथियार बन गया है । वेतन भोगी को उतना ही मिलता है जिससे वह अगले दिन फिर से काम पर लोट आए ।
* पुराने समय में गुलामों को बेड़ियाँ बान्ध कर अथवा बाड़ों में कैद रखा जाता था ।
अब गुलामों को आजाद कर दिया गया है संसाधनों को पैसे की दीवार के पीछे छिपा दिया गया है ।
* सरकारों और उद्योगपतियों की चिंता केवल अपने गुलामों के वेतन भत्तों तक सीमित है ।
* जो वेतन भत्तों के दायरों में नही है उनको सरकारें नारे सुनाती है, उद्योग पति जिम्मेदारी से पल्ला झाड़े बैठा है ।
* जो श्रम करके उत्पादन कर रही हैं उनकी खुराक तेल और बिजली है ।
* रोटी और कपड़ा जिनकी आवश्यकता है वे उत्पादन में भागीदारी नही कर सकते, जब पैदा ही नही किया तो भोगने का अधिकार कैसे ?
ऐसा कोई जाँच आयोग बैठाने का साहस कर नही सकता कि मशीनों के मालिकों की और मशीनों और कम्प्यूटर के संचालकों की गिनती हो जाये और शेषा जनसंख्या को ठंडा कर दिया जाये ।
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दैनिक भास्कर अखबार के तीन राज्यों का सर्वे कहता है कि रोजगार अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा है , इस दायरे में 40 वर्ष तक की आयु लोग मांग कर रहे हैं।
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देश की संसद में 137 से अधिक सांसदों के द्वारा प्रति हस्ताक्षरित एक याचिका विचाराधीन है जिसके अंतर्गत मांग की गई है कि
* भारत सरकार अब अपने मंत्रालयों के जरिये प्रति व्यक्ति प्रति माह जितनी राशि खर्च करने का दावा करती है वह राशि खर्च करने के बजाय मतदाताओं के खाते में सीधे ए टी एम कार्डों के जरिये जमा करा दे।
* यह राशि यू एन डी पी के अनुसार 10000 रूपये प्रति वोटर प्रति माह बनती है ।
* अगर इस आँकड़े को एक तिहाई भी कर दिया जाये तो 3500 रूपया प्रतिमाह प्रति वोटर बनता है ।
* इस का आधा भी सरकार टैक्स काट कर वोटरों में बाँटती है तो यह राशि 1750 रूपये प्रति माह प्रति वोटर बनती है ।
* इलेक्ट्रोनिक युग में यह कार्य अत्यंत आसान है ।
* श्री राजीव गान्धी ने अपने कार्यकाल में एक बार कहा था कि केन्द्र सरकार जब आपके लिए एक रूपया भेजती है तो आपकी जेब तक मात्र 15 पैसा पहूँचता है ।
* अभी हाल ही में राहुल गान्धी ने इस तथ्य पर पुष्टीकरण करते हुए कहा कि तब और अब के हालात में बहुत अंतर आया है आप तक यह राशि मात्र 3 से 5 पैसे आ रही है ।
राजनैतिक आजादी के कारण आज प्रत्येक नागरिक राष्ट्रपति बनने की समान हैसियत रखता है ।
जो व्यक्ति अपना वोट तो खुद को देता ही हो लाखों अन्य लोगों का वोट भी हासिल कर लेता है वह चुन लिया जाता है ।
* राजनैतिक समानता का केवल ऐसे वर्ग को लाभ हुआ है जिनकी राजनीति में रूचि हो ।
* जिन लोगों की राजनीति में कोई रूचि नही उन लोगों के लिए राज तंत्र और लोक तंत्र में कोई खास अंतर नही है ।
* काम के बदले अनाज देने की प्रथा उस जमाने में भी थी आज भी है ।
* अनाज देने का आश्वासन दे कर बेगार कराना उस समय भी प्रचलित था आज भी कूपन डकार जाना आम बात है ।
* उस समय भी गरीब और कमजोर की राज में कोई सुनवाई नही होती थी आज भी नही होती ।
* जो बदलाव की हवा दिखाई दे रही है थोड़ी बहुत उसका श्रेय राजनीति को नही समाज की अन्य व्यवस्थाओं को दिया जाना युक्ति संगत है ।
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राष्ट्रीय आय में वोटरों की नकद भागीदारी अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए ।
* अब तक इस विचार का विस्तार लगभग 10 लाख लोगों तक हो चुका है ।
* ये अकाट्य मांग अब अपने पीछे समर्थकों की भीड़ आन्धी की तरह इक्क्ट्ठा कर रही है ।
* संसद में अब राजनीतिज्ञों का नया ध्रूविकरण हो चुका है ।
* अधिकांश साधारण सांसद अब इस विचार के साथ हैं । चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो ।
* समस्त पार्टियों के पदाधिकारिगण इस मुद्दे पर मौन हैं ।
* मीडिया इस मुद्दे पर कितनी भी आँख मूँद ले, इस बार न सही अगले चुनाव का एक मात्र आधार 'राष्ट्रीय आय मं. वोटरों की नकद भागीदारी' होगा, और कुछ नही ।
* जो मिडिया खड्डे में पड़े प्रिंस को रातों रात अमिताभ के बराबर पब्लिसिटी दे सकता है उस मीडिया का इस मुद्दे पर आँख बन्द रखना अक्षम्य है भविष्य इसे कभी माफ नही करेगा|
knol में जिन संवेदनशील लोगों की इस विषय में रूचि हो वे इस विषय पर विस्तृत जान कारी के लिए fefm.org के डाउनलोड लिंक से और इसी के होम पेज से सम्पर्क कर सकते हैं ।
मैं नही जानता कि इस कम्युनिटी के मालिक और मोडरेटर इस विचार से कितना सहमत या असहमत हैं परंतु वे लोग इस पोस्टिंग को यहाँ बना रहने देते हों तो मेरे लिए व लाखों उन लोगों के लिए उपकार करेंगे जो इस आन्दोलन में दिन रात लगे हैं ।
सांसदों का पार्टीवार एवं क्षेत्र वार विवरण जिनने इस याचिका को हस्ताक्षरित किया, वेबसाइट पर उपलब्ध है ।