Friday, 23 October 2009

विश्वास नहीं होता इन आंकडों पर

अन्नू आनंद

दिल्ली सरकार का दावा है कि दिल्ली में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई है। सरकार के मुताबिक दिल्ली में लड़कियों के अनुपात का आंकड़ा 1004 यानी 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या 1004 हो गई है। जबकि वर्ष 2007 में यह संख्या 848 थी। महज एक साल के भीतर आंकडों में आए इस ‘चमत्कारी’ बदलाव को भुनाने की सरकार पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए दिल्ली सरकार के विभिन्न मंत्री अपनी पीठ थपथपाते हुए इसका श्रेय सरकार द्वारा शुरू की गई बहुप्रचारित ‘लाडली’ योजना को दे रहे हैं। लड़कियों के स्तर में सुधार लाने के लिए मार्च 2008 में सरकार ने लाडली योजना शुरू की थी। योजना के मुताबिक एक लाख रूपए तक की वार्षिक आमदन वाले परिवारों को जनवरी 2008 के बाद पैदा होने वाली लड़कियों की शिक्षा में मदद के लिए सरकार 18 वर्ष तक की आयु तक एक लाख रूपए की आर्थिक मदद देगी। लेकिन महज एक साल के अंतराल में योजना शहर के लैंगिक अनुपात में ऐसा सकारात्मक बदलाव लाएगी इसकी कल्पना योजना निर्माताओं ने भी नहीं की होगी। दिल्ली सरकार के रजिस्ट्रार (जन्म और मृत्यु) की वार्षिक रिपोर्ट 2008 को जारी करते हुए वित और शहरी विकास मंत्री ने इस बात को बढा़ -चढ़ा कर प्रचारित किया कि लाड़ली योजना के चलते इस साल लड़कियों के रजिस्ट्रेशन में बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2007 में लड़कियों की गिनती 1।48 लाख थी जबकि साल 2008 में यह बढ़कर 1.67 लाख पहुंच गई है। दिल्ली में कुल रजिस्टर्ड जन्मों में 49.89 फीसदी लड़कों और 50.11 फीसदी लड़कियों की संख्या है। इन आंकडों जरिए यह बात साबित करने की कोशिश की जा रही है कि राजधानी में लड़कियों के गिरते अनुपात पर काबू पाने मे सरकार सफल हो गई है और एक साल के भीतर ही सरकार ने औसत आंकड़े 848 को बढा़ कर 1004 पर पहुंचा दिया है। लेकिन इन आंकड़ो के हवाले से यह साबित करना कि लड़कियों के अनुपात में बढ़ोतरी का कारण लड़कियों के प्रति बदली सोच या शहर में कन्या भू्रण हत्याओं में कमी है, बेहद भ्रामक है। इसके लिए इन आंकडों के पीछे की हकीकत को समझने की जरूरत है। लेकिन सरकार जानबूझकर इन तथ्यों से आखें मूंदकर आंकडों का राजनैतिक लाभ उठाने की फिराक में है। दरअसल योजना में लड़कियों के जन्म के पंजीकरण पर प्रोत्साहन का प्रावधान है इसलिए लड़कियों के पंजीकृत जन्मों में बढ़ोतरी स्वाभविक थी लेकिन लड़के के जन्म को रजिस्टर्ड कराने में ऐसे किसी आर्थिक प्रोत्साहन के अभाव में उनके रजिस्ट्रेशन में कमी होना भी स्वाभाविक है। इसके अलावा आर्थिक योजना का लाभ पाने के लिए कुछ जाली नामों के पंजीकरण से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इनमें बहुत से ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जो दिल्ली के आसपास के इलाकों में रहते हुए भी योजना का लाभ लेना चाह रहें हैं। रिपोर्ट में 1000 लड़कों पर संस्थागत लड़कियों के जन्मों की संख्या 915 बताई गई है लेकिन घरों में पैदा हुई लड़कियों की गिनती 1303 जो कि आश्चर्यजनक है। यूं भी दिल्ली में लडकियों के कम अनुपात का दोषी केवल गरीब तबका नहीं हैं दक्षिण-पश्चिमी जैसे संपन्न इलाके में लड़कियों का अनुपात 2001 की जनगणना के मुताबिक 845 है। संपन्न इलाकों के अधिकतर लोग लाडली योजना से बाहर हैं। ऐसे में समूचे शहर के अनुपात का यह आकडा़ संशय पैदा करता है। शहर में इस साल पैदा हुए लडकों की गिनती 1.66 लाख बताई गई है जबकि 2007 में यह 1.74 लाख थी। लड़को की संख्या में अचानक आई यह कमी भी कई सवाल खड़े करती है। लड़की को बोझ समझने की प्रवृति किन्ही आर्थिक खंाचों में बंधी हुई नहीं है जिसे सरकार के आर्थिक सहायता के प्रलोभन से खत्म किया जा सके। महज आंकडों के छलावे से यह भ्रम पालना कि लड़कियों के प्रति शहर की सोच बदल गई है गलत होगा। फिलहाल जरूरत बहुस्तरीय प्रयासों की है जिसमें सबसे अहम प्रयास लड़की के प्रति जंग खाई मानसिकता को बदलना है।

(यह लेख ८ अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकशित हुआ है )

12 comments:

Pandit Kishore Ji said...

kash yahi stithi anya pradesho me bhi ho jaye ...ek anokhi baat par dhyan khincha hain aapne

http/jyotishkishore.blogspot.com

ललित शर्मा said...

आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत मेंपदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, हमने भी आज ही एक और नया चिटठा "चर्चा पान की दुकान पर" प्राम्भ किया है, चिट्ठे पर आपका स्वागत है.
http://chrchapankidukanpar.blogspot.com

Charul said...

आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये

http://dilli6in.blogspot.com/

मेरी शुभकामनाएं
चारुल शुक्ल
http://www.twitter.com/charulshukla

वन्दना अवस्थी दुबे said...

स्वागत है.शुभकामनायें

Mishra Pankaj said...

स्वागत है आपका ब्लागजगत में कल आप यहाँ पधारे ...आपकी चर्चा यहाँ होगी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"लड़की को बोझ समझने की प्रवृति किन्ही आर्थिक खचों में बंधी हुई नहीं है जिसे सरकार के आर्थिक सहायता के प्रलोभन से खत्म किया जा सके। महज आंकडों के छलावे से यह भ्रम पालना कि लड़कियों के प्रति शहर की सोच बदल गई है गलत होगा। फिलहाल जरूरत बहुस्तरीय प्रयासों की है जिसमें सबसे अहम प्रयास लड़की के प्रति जंग खाई मानसिकता को बदलना है।"

इस अच्छे लेख के लिए बधाई!

संजय भास्कर said...

मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है,
बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

radhasaxena said...

sachai aur aankado me fark to hota hi hai.

अनिल कान्त : said...

उधर सरकार अपनी पीठ थपथपाना चाहती है और इधर उनके कुछ लोग सरकारी पैसा भी खाएँगे इस बहाने

वो चाहती है कि दुनियाँ इसी भ्रम में आगे जिये

Amit K Sagar said...

चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. मेरी शुभकामनाएं.
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हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

RAJNISH PARIHAR said...

हिंदी ब्लॉग परिवार में आपका स्वागत है!लिखते रहिये और पढ़ते रहिये....

डॉ. राधेश्याम शुक्ल said...

sanshay vajib hai.jagrook drishti ka abhinandan.