अन्नू आनंद
राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न उत्तरीय राज्यों में लड़कियों को गर्भ में खत्म करने का सिलसिला जारी है। लड़कियों के भू्रणों को खत्म करने की यह प्रवृति संपन्न राज्यों के संपन्न परिवारों में अधिक बढ़ रही है। हाल ही में हुई एक सर्वे के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, के अधिकतर जिलों में लड़कियों का अनुपात वर्ष 2001 की जनगणना से भी कम हो रहा है। पंजाब में स्थिति और भी खराब है। यहां के कुछ इलाकों में धनी पंजाबी परिवारों 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 300 ही पाई गई है।
चाहे उच्च वर्ग का शिक्षित परिवार हो पिछड़े वर्ग का गरीब और अनपढ़ परिवार लड़कियों की चाहत के प्रति दोनों की सोच में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता इसलिए केवल गरीबी और अशिक्षा को लड़कियों की संख्या कम होने के लिए दोषी ठहराना उचित नहीं। वर्ष 2001 की जनगणना से यह पहले ही साफ साबित हो चुका है कि कन्या भ्रूणों को खत्म करने की रिवायत संपन्न इलाकों में अधिक है। इस जनगणना में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लड़कियों की संख्या 900 से भी कम पाई गई। इस में फतेहगढ़ साहिब में 1000 लडकों के पीछे 766 लड़कियों की संख्या थीं लेकिन अब यह कम होकर 734 तक पहुंच गई है। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में यह 836 से कम होकर 789 पहुंच गई है। ऐसी ही प्रवृति अन्य संपन्न इलाकों में भी पाई गई।
देखा जाए तो पिछले सात वर्षो में देश में शिक्षा का विस्तार हुआ है। स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं की साक्षरता के आंकड़ो का ग्राफ भी बड़ा है। देश की आर्थिक वृद्दि दर 9 तक पहुच गई है। देश सुपर पावर बनने का दावा कर रहा है। सूचना क्रांति से लोगों में जागरूकता बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन इस सब के बावजूद लड़की के प्रति सोच पर अभी भी जंग लगा हुआ है। लड़कियों को गर्भ में ही खत्म करने की प्रवृति का सबसे बड़ा कारण वह रिवायत हैं जो लड़के को वंश आगे बढ़ाने और विरासत के रूप में देखती है। दूसरा लड़की को दिया जाने वाला दहेज जो लड़के के लिए बेयरर चेक का काम करता है।
दिल्ली की सेंटर फाॅर सोशल रिसर्च संस्था ने स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के सहयोग से हाल ही में दिल्ली में लिंग अनूपात से जुड़े आर्थिक ,सामाजिक और नीति संबंधी कारणों की जांच करने के लिए एक सर्वे कराई। सर्वे की रिर्पोट के मुताबिक पुराने रीति रिवाज और पारिवारिक परंपराओं के कारण दिल्ली में अधिकतर परिवार लिंग निर्धारित गर्भपात कराते हंै। दिल्ली में लड़कियों के कम अनुपात वाले तीन क्षेत्र नरेला, पंजाबी बाग और नजफगढ़ में कराई गई सर्वे में सभी अनपढ़, कम पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले उतरदात्ताओं ने माना कि लडकी की बजाए लड़के के जन्म को परिवार में अधिक बेहतर माना जाता है क्योंकि वह मरने के बाद अतिंम रस्मों को पूरा कर मोक्ष दिलाता है। इसके अलावा परिवार का नाम भी आगे बढाता है। सर्वे के नतीजे साफ इस बात की ओर इशारा करते हैं कि गरीब और पिछड़ा वर्ग अगर लड़की को आर्थिक बोझ के रूप में देखता है तो मध्य और उच्च वर्ग के संपन्न लोग लड़के को अपनी संपति का वारिस और अतिंम रस्मों को पूरा करने का जरिया मानते हैं।
इसी प्रकार कुछ माह पहले एक्शन एड द्वारा देश के पांच खुशहाल माने जाने वाले राज्यों पंजाब राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा के विभिन्न जिलों में की गई एक अन्य सर्वे सेे भी स्पष्ट होता है कि सभी दावों और प्रयासों के बावजूद लड़की को ‘अनचाही’ मानने की प्रवृति बढ़ती जा रही है। सर्वे में पाया गया कि मौजूदा समय में इन राज्यों में लड़कियों का अनुपात लड़कांे की अपेक्षा कम ही नहीं है बल्कि 2001 की जनगणना के बाद से शहरी क्षेत्रों में और कम हो रहा है। केवल राजस्थान को छोड़कर शेष सभी चार राज्यों में पहले से ही लड़कियों की कम संख्या में और भी कमी आ रही है। हांलाकि राजस्थान में भी यह आंकड़ा अभी औसत राष्ट्रीय अनुपात 1000 पर 927 लड़कियों तक नहीं पहुंच पाया। सर्वे से पता चलता है कि जिन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं और अल्ट्रासांउड मशीनों की पहुंच नहीं है, उन इलाकोे में लड़कियां पैदा तो हो जाती हैं लेकिन जीवित कम बचती हैं। इसके लिए पैदा हुई लड़कियों को या तो बीमार होने पर मेडिकल सहायता नहीं दी जाती या फिर ऐसे तरीके अपनाए जातें हैं कि वे जीवित न बचें। जैसे मध्यप्रदेश के मुरैना इलाके में बच्चे की नाड़ को जानबूझ कर इन्फेक्शन के लिए छोड़ने जैसी घटनाओं का पता चला है ताकि ‘अनचाही’ बच्ची से छुटकारा मिल सके। सर्वे किए गए सभी इलाकों में पैदा हुए दूसरे बच्चे में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। इसी प्रकार तीन इलाकों में तो तीसरे नंबर पर पैदा हुए बच्चों में लड़कियों की संख्या 750 से भी कम थी।
जिस प्रकार से पिछले एक वर्ष में उड़ीसा और चण्डीगढ़ से अजन्मी बच्चियों के फेंके गए भू्रण पाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं उससे पता चलता है कि लड़की को लेकर समाज के किसी वर्ग की सोच में बदलाव नहीं आया। लांसेट की रिर्पोट के मुताबिक भारत में हर साल 5 लाख लड़कियों का गर्भपात किया जा रहा है। लिंग निर्धारण तकनीकों की अधिक उपलब्धता हांलाकि इसका एक बड़ा कारण है। इसके लिए 1994 मे बना भू्रण परीक्षण निर्वारण कानून भी अधिक सहायक साबित नहीं हो रहा क्योंकि अल्ट्रासाउंड मशीनों का इस्तेमाल, लिंग परीक्षण के लिए करने वाले डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई के अधिक मामले सामने नहीं आ रहे। दरअसल इस की एक वजह यह भी है कि भू्रण परीक्षण एक निहायत ही निजी मामला है। इस प्रक्रिया में पति पत्नी और डाक्टर के अलावा अन्य कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं रहता। ऐसे में न तो परीक्षण करने वाले और न ही कराने वाले का पता चल सकता है। कानून को प्रभावी बनाने के लिए अधिक जरूरत महिलाओं के स्तर को उठाने की है। जिस प्रकार से लड़की से लड़के को अधिक प्राथमिकता देने की प्र्रवृति हर वर्ग में बढ़ती जा रही है उससे यह साफ जाहिर होता है कि समाज में महिलाओं का निम्न स्तर इस बुराई की सबसे बड़ी जड़ हैै। इस से निपटने के लिए लड़की के सामाजिक, आर्थिक अधिकारों को समान स्तर पर लाना होगा। लड़कियों को पिता की संपति में समान हक का कानूनी अधिकार भले ही मिल गया हो लेकिन इसे अमल में लाने वाले प्रयासांे को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। लड़कियों द्वारा मां- बाप के अतिंम संस्कार करने के भी छिटपुट प्रयास शुरू हो चुके हैं लेकिन ऐसे प्रयासों को ओर बढ़ावा मिलने की जरूरत है। परिवार में लड़की की अहमियत किसी भी प्रकार से लड़कों से कम नहीं, इस सोच को हर प्रकार से विकसित करना होगा। जब तक हर मोर्चे पर लड़की के स्तर को उठाने की प्रक्रिया शुरू नहीं होगी लड़कियों के गायब होने की संख्या कम नहीं होगी।
लेखिका प्रेस इंस्टीट्यूट की पत्रिका ग्रासरूट और विदुर की संपादक रही हैं