Thursday, 18 December 2008

भाषा से खिलवाड़


अन्नू आनंद

किसी भी पत्र-पत्रिका की विषय-वस्तु अगर उसका शरीर है तो भाषा उसकी आत्मा कही जासकती है। किसी भी पत्र-पत्रिका की पहचान उसकी विषय सामग्री, भाषा, उसकी साज-सज्जाऔर उसके प्रस्तुतिकरण के तरीके से बनती है।पिछले कुछ समय से तकनीकी क्रांति और उदारीकरण के चलते पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप में भारीबदलाव की प्रक्रिया देखने को मिल रही है। नए प्रकार की पिं्रट तकनीकों और बाजारवाद के प्रभावके चलते अखबारों की साज-सज्जा पूरी तरह बदल गई है। विषय-सामग्री का स्थान सिकुड़ करछोटा हो गया है जबकि चित्रों का आकार बड़ा हो गया है। पृष्ठों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुईहै। काले-सफेद चित्र रंगमय हो गए हैं। बदलाव की आंधी ने विषय-सामग्री की गंभीरता को भीकम कर दिया है। गंभीर विषयों को भी इस ढंग से प्रस्तुत करने की होड़ छिड़ी है कि पाठकउसको भी मनोरंजन समझ कर पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएं। विचार गायब होते जा रहे हैं औरबाॅक्स आइटम जैसी रिपोर्टें भी बडे़ समाचारों के रूप में प्रकाशित हो रही हैं।बात यहीं खत्म नहीं होती, बदलाव की चक्की में सबसे अधिक भाषा पिस रही है। हिंदीसमाचारपत्रों में भाषा को लेकर मन-माने प्रयोग किए जा रहे हैं। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की मौजूदाभाषा में अंग्रेजी शब्दों की घुसपैठ इस कदर बढ़ गई है कि हिंदी की अपनी सुगंध, उसकीअभिव्यक्ति की मिठास अंग्रेजी की मिलावट से पूरी तरह खत्म हो गई है।हिंदी भाषा के समर्थक और उसके संरक्षण के हिमायती भी अब बाजारवाद की भाषा लिखने-बोलनेलगे हैं। कुछ समय पहले तक पत्र-पत्रिकाओं में भाषा के साथ छेड़छाड़ करना उतना संभव नहींथा, लेकिन अब सबसे अधिक प्रयोग भाषा के साथ ही हो रहे हंै। हैरत की बात तो यह है किबदलाव की इस चूहा-दौड़ में हिंदी के उन शब्दों का इस्तेमाल भी बंद हो गया है जिनके बेहदसरल और स्पष्ट मायने हंै। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षकों को देखें तो यह पता ही नहीं चलेगाकि वे किस भाषा में हैं। भाषा में इस बदलाव के समर्थकों का तर्क है कि आम पाठक तक पहुंचनेके लिए हिंदी में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।हिंग्रेजी समर्थकों का यह तर्क समझ से बाहर है क्योंकि आम पाठकों में हर वर्ग शामिल है औरहिंदी समाचारपत्र-पत्रिका पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति उतनी सरलता से एचीवमेंट, फेवरेट,सिचुएशन, जर्नी या पेशेंट्स को नहीं समझ सकता है जितनी सहजता से उपलब्धि, पसंदीदा,स्थिति, यात्रा या मरीज जैसे शब्दों को समझता है।कुछ समय पहले तक अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल तकनीकी शब्दों तक ही सीमित था। उसमें भीप्रयास यही रहता था कि उसका हिंदी विकल्प ढूंढा जाए। जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी के तकनीकीशब्दों के हिंदी शब्द गढ़े जाते थे। ऐसे ही एक प्रयास में विज्ञान लेखक रमेश दत्त शर्मा नेजेनेटिकल इंजीनियरिंग के लिए ‘जिनियागरी’ शब्द खोज निकाला था। मुझे याद है कि स्वास्थ्यऔर पर्यावरण के विषयों पर हिंदी में लिखते हुए अक्सर ऐसे शब्दों पर कठिनाई आती थी। फिर भी‘ट्यूबकटोमी’ के लिए बंध्याकरण या ‘वेस्कटोमी’ के लिए नसबंदी और बायोटेक्नोलाॅजी के लिएजैविक तकनीक तथा बायोडेवर्सिटी के लिए जैव विविधता का ही इस्तेमाल किया जाता था।उस समय हिंदी के किसी भी कठिन या तकनीकी शब्द को सरल बनाकर प्रस्तुत किया जाता थाताकि हर वर्ग का पाठक इन शब्दों को समझ सके। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने जनसत्ता कासंपादन करने के दौरान एक वर्तनी भी बनाई और सभी को हिदायत दी कि वे सरल शब्दों काप्रयोग करें। उन्होंने ‘अर्थात्’ के लिए ‘यानी’, ‘उद्देश्य’ के लिए मकसद, ‘किंतु-परंत’ु के लिए‘लेकिन’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दिया ताकि बोलचाल की हिंदी जानने वाला पाठक भीउसे समझ सके।ऐसे ही प्रयास अन्य संपादकों ने भी किए ताकि हिंदी अखबारों में एक बेहतर और सरल भाषा काविकास हो सके।लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अब तो सभी अखबारों में हिंदी के सरल शब्दों कोभी अंग्रेजी में लिखने का प्रचलन है। इसके लिए यह तर्क दिया जा रहा है कि इस से पाठकों कीसंख्या बढ़ रही है। क्या कोई भी सर्वे या अध्ययन यह बताता है कि हिंग्रेजी का इस्तेमाल पाठकोंको अधिक सुखद लगता है। पाठकों की संख्या बढ़ने का कारण अंग्रेजी शब्दों की खिचड़ी है यापोस्टरनुमा चित्र और सनसनीखेज ग्लैमरयुक्त विषय सामग्री। इस पर विचार करने की जरूरत है।क्या पत्र-पत्रिकाओं को किसी भी उत्पाद की तरह केवल उनकी बिक्री बढ़ाने के लिए बदला जासकता है? वह भी भाषा में मिलावट कर। अखबारों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी है जिससे वेसभी दबावों के बावजूद मुक्त नहीं हो सकते। अगर हिंग्रेजी अखबारों के लिए मध्यम वर्ग, युवाओंया माॅल्स संस्कृति तक पहुचंने का रास्ता है तो यह उन्हें ऐसे करीब 60 प्रतिशत पाठकों से दूर भीकरती है, जो अंगे्रजी से अभी भी बेहद दूर हैं।􀂄
( यह लेख अक्टूबर- दिसम्बर 2006 के विदुर अंक में प्रकाशित हुआ है )

Tuesday, 16 December 2008

निजी समझौते और मीडिया

अन्नू आनंद

बाजारी ताकतों का पत्रकारिता पर प्रभाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। प्रिंट माध्यम हो या इलेक्ट्राॅनिकअब विषय-वस्तु (कंटेंट) का निर्धारण भी प्रायः मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है। कभीसंपादकीय मसलों पर विज्ञापन या मार्केटिंग विभाग का हस्तक्षेप बेहद बड़ी बात मानी जाती थी।प्रबंधन विभाग संपादकीय विषयों पर अगर कभी राय-मशविरा देने की गुस्ताखी भी करते थे तो वहएक चर्चा या विवाद का विषय बन जाता था और यह बात पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफमानी जाती थी।लेकिन यह बातें अब अतीत बन चुकी हैं। अब अखबार या चैनल के पूरे कंटंेट में मार्केटिंग वालोंका दबदबा अधिक दिखाई पड़ता है। इसकी एक वजह यह भी है कि हर मीडिया समूह अधिक सेअधिक मुनाफा कमाना चाहता है और उसके लिए खबरों को प्रोडक्ट मानना एक मजबूरी बनती जारही है। ‘खबर’ नाम के इस प्रोडक्ट को भले ही वे चैनल पर हो या अखबार में, अधिक से अधिकबेचने के लिए बड़े-बड़े मीडिया समूह आए दिन नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हुए इन दिनों बड़े मीडिया समूहों ने बड़ी-बड़ी काॅरपोरेट कंपनियों केसाथ ‘निजी समझौतों की शुरूआत की है। इन समझौतों के तहत प्रायः कंपनियांे के विज्ञापन औरप्रचार की जिम्मेदारी मीडिया कंपनी की होती है और बदले में काॅरपोरेट कंपनियां मीडिया कंपनीको अपनी कंपनी में हिस्सेदारी देती हैं।सूचनाओं के मुताबिक हाल ही में बेनेट एण्ड कोलमेन कंपनी के वर्ष 2007 में ऐसे निजी समझौतोंकी मार्केट कीमत पांच हजार करोड़ रुपए हुई है जो कि उसकी सालाना तीन हजार पांच सौकरोड़ की आमदन से भी अधिक है। अब यह प्रवृत्ति अन्य हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में भी पांवपसार रही है। हालांकि कहा यह जा रहा है कि काॅरपोरेट कंपनियों के अधिक विज्ञापनों को बिनापैसे के हासिल करने का यह तरीका है और मीडिया समूह इस प्रकार केवल बड़ी कंपनियों कोविज्ञापन स्पेस ही उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस प्रकार के निजीसमझौतों के बाद क्या कोई अखबार या चैनल पूरी तरह निष्पक्ष होकर उन कंपनियों की कवरेजकर सकता है जिनका कि वे स्वयं शेयरधारक है?बड़ी बड़ी काॅरपोरेट कंपनियां तो यही चाहती हैं कि वे अधिक विज्ञापनों के जरिए इन अखबारों औरचैनलों के कंटेंट मंे भी अपनी जगह बना सकें और ऐसा होना कोई असंभव भी नहीं दिखता जैसाकि ऐसे समझौते करने वाले अखबार या टीवी चैनल कहते नहीं अघाते कि इनका संपादकीयमसलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछले कुछ समय में बाजारवाद के नाम पर प्रिंट औरइलेकट्राॅनिक मीडिया में ‘ब्रांड पत्रकारिता’ की प्रवृत्ति बढ़ी है उसको देख कर नहीं लगता किसंपादकीय विभाग ऐसे समझौतों से खुद को बचा पाएंगे।कंटंेट के जरिए मुनाफा कमाने के उद्देश्य और प्रतिस्पर्धा के नाम पर धीरे-धीरे अखबारों और चैनलोंके कंटंेट (विषय सामग्री) पर मार्केटिंग वालों का कब्जा बढ़ता ही जा रहा है। इसकी शुरूआतसबसे पहले संपादकों की हैसियत कम करने से हुई थी ताकि वे खबर को बेचने के रास्ते कीरूकावट न बनंे। उनके कद को छोटा करने के लिए मार्केटिंग और विज्ञापन विभागों का संपादकीयविषयों पर दखल बढ़ाया गया।अखबारों में 60 प्रतिशत कंटंेट और 40 प्रतिशत विज्ञापन की नीति लागू होती है। लेकिन मार्केटिंगके हाथों में कमान आते ही उन्होंने विज्ञापनों का प्रतिशत बढ़ाने के लिए नए-नए रास्ते निकाललिए। इसके लिए पहले अखबार के ‘मास्ट हेड’ मुख पृष्ठ बिके। फिर विज्ञापनों के विशेष पन्ने शुरूहुए। पहले पन्ने पर विज्ञापन की कवायद भी शुरू हुई। इसी होड़ में फिर खबरों के रूप मेंविज्ञापन भी छपने लगे। इसके लिए अखबारों ने बकायदा खबरों का कुछ स्पेस ‘विज्ञापनी’ खबरोंके लिए निर्धारित किया। इस स्पेस में खबरों के रूप में किसी कंपनी, वस्तु के बारे में जानकारी दीजाने लगी। इन ‘विज्ञापनी’ खबरों को इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है कि पाठक के लिए यहसमझना कठिन होता है कि यह वास्तविक खबर है या प्राॅपोगेंडा। टीवी चैनलों में भी बकायदा ऐसेकार्यक्रम दिखाए जाते हैं कि यह अंतर करना मुश्किल हो जाता है कि खबर है या पैसे से खरीदागया विज्ञापन। अब स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी नए प्रोडक्ट या फिर कोई इलेक्ट्राॅनिक संयंत्र नयाकैमरा या कोई नए स्पा, रिर्सोट के बारे में जानकारी खबरों का ही हिस्सा होती हैं। देश-विदेश कीखबरों के साथ इन प्रोडक्ट की जानकारी भी उसी तर्ज पर दी जाती है कि यह अंतर करना भीकठिन हो जाता है कि अमुक कोई खबर है या स्पांसर कार्यøम।अब जबकि संपादकीय और मार्केटिंग के बीच की रेखा दिन प्रतिदिन धुंधली पड़ रही हो, ऐसे मेंयह उम्मीद करना कि मीडिया कंपनियों के निजी समझौतांे का असर संपादकीय विषय-वस्तु परनहीं पडे़ेगा नासमझी होगी। पत्रकारिता के मूल्यों और उसकी बची हुई विश्वसनीयता के लिए यहप्रवृत्ति बेहद घातक साबित हो सकती हैं खासकर जबकि मझोले और क्षेत्रीय अखबारों में भी ऐसेसमझौतांे की संभावनाएं बढ़ रही हैं। 􀂄
(यह आलेख अक्तूबर-दिसंबर 2007 के विदुर अंक में प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, 9 December 2008

अन्याय के खिलाफ गुलाबी गिरोह



अन्नू आनंद
मानवी अब अपने हकों के लिए इस कदर जागरूक हो रही है कि अगर कोई उसके अधिकारों के रास्ते में रूकावट बनता है तो वह इस नाइंसाफी के खिलाफ अवैध तरीका भी इस्तेमाल करने से परहेज नहीं करती।
उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके बुंदेलखंड में इन दिनों ‘गुलाबी गिरोह’ नामक महिलाओं के एक बहुत बड़े समूह ने क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ कर प्रशासन की नींद उड़ा दी है। वर्ष 2006 में बना यह गिरोह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग लड़ रहा है। यह समूह कमजोर और गरीब वर्गों के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं के अमलीकरण में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। इस क्षेत्र में बहुत सी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ गरीबों और वंचितों को नहीं मिल रहा है। गुलाबी गिरोह की मुखिया अर्धशिक्षित, गरीब 45 वर्षीया संपत देवी पाल है।
बांदा के अटारा गांव से करीब 100 सदस्यों के साथ शुरू हुए इस समूह के अब करीब 20 हजार समर्थक सदस्य हैं। समूह के पास सबसे अधिक शिकायतें राशन की दुकानों से राशन न मिलने की आती है। इसकी एक वजह यह है कि इस गिरोह को बांदा और चित्रकूट जिले के कोटे का राशन काला बाजार में पहुंचने से रोकने में सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल हो चुकी है। इन जिलों का अभी तक 70 फीसदी राशन काला बाजार में पहुंच जाता था। अटारा के राशन विक्रेता रामअवतार दारा राशन न देने की शिकायतें मिलने के बाद गिरोह के सदस्यों ने उसपर नजर रखनी शुरू कर दी। आखिर समूह के सदस्यों ने उन दो टैक्टरों को बीच रास्ते में रोक लिया जिन पर बीपीएल लोगों के हिस्से का राशन खुले बाजार में बेचने के लिए जा रहा था। संपत देवी के मुताबिक प्रमाण दिखाने के बावजूद जब पुलिस ने रामअवतार के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं की तो हमारा संदेह विश्वास में बदल गया कि पुलिस और राशन विक्रेताओं की मिलीभगत के चलते ही गरीबों का राशन खुुले बाजार में बेचा जा रहा है। बाद में समूह की सदस्यों ने गुस्से में अटारा पुलिस स्टेशन को घेर लिया ओर डयूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारियों के साथ हाथापाई की। इस घटना के बाद भले ही इन जिलों में राशन वितरण में हेराफेरी की घटनाएं कम हो गईं लेकिन गिरोह के पास अन्य क्षेत्रों से राशन न मिलने की शिकायतें की संख्या बढ़ने लगीं हैं। गिरोह अब तक राशन के अलावा बिजली, पानी और पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है।
अपने सदस्यों को अलग पहचान देने के लिए गिरोह ने एक ही रंग के कपड़े पहनना तय किया। गुलाबी रंग क्योंकि किसी भी राजनैतिक पार्टी से जुड़ा नहीं इसलिए गिरोह इस रंग का इस्तेमाल करता है। गुलाबी रंग के चुनाव पर संपत देवी कहती है, ‘‘अपनी अलग पहचान स्थापित करने के लिए हमने एक ही रंग के कपड़े पहनना तय किया है और गुलाबी रंग जीवन का प्रतीक भी है। इसके अलावा धरना प्रदर्शन और भीड़ में हमें अपने साथियों को पहचानने में भी आसानी होती है।
आर्थिक दष्टि से पिछड़े इस क्षे़त्र की जनसंख्या लगभग 2 करोड़ है। यहां की अधिकतर महिलाएं खासकर दलित इस समूह से जुड़ कर भोजन, आवास और सामाजिक न्याय की लड़ाई में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करतीं है। जैसा कि समूह की एक सदस्य कहती है हमारी संख्या ही हमारी ताकत है।
भारतीय दंड संहिता के तहत इस गिरोह पर गैरकानूनी सभा, दंगा, सरकारी अधिकारी पर हमला और सरकारी कर्मचारियों का अपना काम करने से रोकने के आरोप लग चुके है। लेकिन स्थानीय स्तर पर ‘गुलाबी गिरोह’ को मिल रहे भारी समर्थन और उनकी मजबूत इच्छा शक्ति के चलते उन पर अकुंश लगाना संभव नहीं होगा।
गिरोह का मानना है कि जब मांगने से नहीं मिलता तो छीनना पड़ता है। इसलिए इस के लिए समूह के कुछ सदस्य अपने पास लाठी भी रखते हैं लेकिन संपत देवी कहती है कि यह लाठी हमारा सहारा है लेकिन अन्याय के खिलाफ और आरोपी अधिकारियों को सबक सिखाने के लिए यह उठ भी सकती है। गिरोह ने अपने संदेश को अधिक से अधिक महिलाओ तक पहुचांने के लिए नारों को गीतों में बुनने की शुरूआत की है। ‘‘नेताओ हो जाओ होश्यार, बहने हो गई तैयार’’ और ‘‘बहनो हो जाओ तैयार नेता हो गए गददार’’, जैसे गीतों से महिलाओं को सचेत किया जा रहा हैै।
हांलाकि गुलाबी गिरोह की शुरूआत गुलाबी संगठन के रूप में हुई थी लेकिन बाद में इसकी चर्चा ‘गिरोह’ के रूप में होने लगी। संपत देवी के मुताबिक गिरोह का मतलब केवल नकारात्मक ही नहीं। अपने हको के लिए लड़ने वाले मजदूरों आदि के समूह का भी गिरोह कहा जाता है। दूसरा गिरोह के रूप में ख्याति फैलने से पुलिस और प्रशासन भी हमसे डरता है। कुछ लोग संपत देवी की तुलना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से करते हैं।
बचपन से ही संपत को लड़कियों के साथ किए जाने वाले भेदभाव के रवैये को झेलना पड़ा। छोटी उमर में ही उसे खेतों में काम करने के लिए भेज दिया गया जबकि उसके भाई स्कूल पढ़ने के लिए जाते। 12 साल की हुई तो उसकी शादी कर दी गई और 15 वर्ष में वह मां बन चुकी थी। दो लडकियां पैदा होने के बाद भी सास ने आपरेशन कराने से मना कर दिया क्योंकि उसे बेटा चाहिए था। उसके बाद संपत के चार बच्चे पैदा हुए। संपत के मुताबिक सास उसे पुरूषों के सामने चुप रहने और पर्दा करने के लिए कहती जो उसे मंजूर नहीं था।
महिलाओं के प्रति इस प्रकार के उपेक्षित रवैये ने ही शायद संपत को क्रांतिकारी बनने पर मंजूर कर दिया। आज संपत और उसका गिरोह महिलाओं की हर प्रकार की सहायता करने के लिए तैयार रहता है। नशेड़ी पतियों से पीड़ित महिलाओं के पतियों को सबक सिखाने के अलावा गिरोह विधवा महिलाओं को पेंशन दिलाने में भी मदद करता है। गिरोह की साख अब इस कदर बढ़ गई है कि अब पुरूष भी अपने मसले सुलझाने के लिए गिरोह से मदद मांगने लगे हैं। इसी वर्ष फसल नष्ट हो जाने पर बांदा के हजारों किसानों ने प्रशासन से मुआवजे की रकम हासिल करने के लिए गिरोह से मदद मांगी थी।
अपने हकों की खातिर भले ही ये महिलाएं कानून को भी अपने हाथों में लेने से गुरेज नहीं करतीं लेकिन नांइसाफी के खिलाफ लड़ी जानी वाली इस जंग में उनके लिए वे सब जायज है जिससे वे अपने बुनियादी अधिकारों को हासिल कर सकती हैं। भले ही इसके लिए उन्हें हिंसा पर उतारू होना पड़े। आखिर मानवी के साहस की परीक्षा क्यों?





Tuesday, 2 December 2008

बस और नहीं



सैकरों मासूम लोगों और देश के सब से वरिष्ठ और जांबाज़ अधिकारियों का मरना सहनशीलता नहीं कायरता और बुज्द्ली की निशानी है । इसलिए यह गर्व करना की हम बड़े सहनशील हैं और कोई भी हमले के बाद भी हम फिर
उसी हौंसले से खरे होने की ताकत रखते हैं का राग अलापना बंद करना होगा। अब आपना होंसला नहीं अपनी ताकत दिखाने की आवश्कता है ताकि बाहरी लोग हमारे घर में घुसकर अब हमारे अपनों को नुक्सान पहुचने की हिम्मत न करे।
मुंबई हमले से देश के राजनेताओं, मीडिया कर्मियों और सरकारी अफसरों को कई सबक सीखने होंगे।
जिस प्रकार से चैनल के रिपोर्टर्स ने इस घटना की लाइव कवरेज की है उस से लगता है की अभी भी हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया काफ़ी इम्मेच्यौर है । लाइव कवरेज को सब से पहले और सब से एक्सक्लूसिव दिखाने के चक्कर में कई चैनल ऐसे दर्शय दिखाते नज़र आए जो की सुरक्षा के लिहाज़ से उचित नहीं कहे जा सकते। एक लोकप्रिय और बेहतर समझे जाने वाले अंग्रेजी चैनल ने ताज के पीछे की लेन में जाकर खंभों के पीछे छुपे सुरक्षा गार्डस पर कैमरा घुमाते हुएय कहा कि आंतकवादी कहीं पीछे से न भाग जाए इसलिए गार्डस ने यहाँ भी पोसिशन ले ली है । जब कैमरा सुरक्षा कर्मी पर घुमा तो वह स्वयं को खम्भे के पीछे छुपाने कि पूरी कोशिश करता रहा। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण देखने को मिले जब कई चैनलों ने बेहद ही बचकाना बरताव किया।
घटना का राजनैतिककरण न करने कि दुहाई देने वाला मीडिया ही स्टूडियो में विभिन्न पार्टियों कि प्रतिनेधियों को बुला कर उन कि राजनैतिक प्रतिक्रियों को जानने और एक के बयाँ पर दूसरे कि टिपननी जानने और उन्हे उकसाने कि कोशिश करता रहा। अन्नू आनंद

Monday, 17 November 2008

फिर कम हो रही हैं लड़कियां






अन्नू आनंद

राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न उत्तरीय राज्यों में लड़कियों को गर्भ में खत्म करने का सिलसिला जारी है। लड़कियों के भू्रणों को खत्म करने की यह प्रवृति संपन्न राज्यों के संपन्न परिवारों में अधिक बढ़ रही है। हाल ही में हुई एक सर्वे के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, के अधिकतर जिलों में लड़कियों का अनुपात वर्ष 2001 की जनगणना से भी कम हो रहा है। पंजाब में स्थिति और भी खराब है। यहां के कुछ इलाकों में धनी पंजाबी परिवारों 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 300 ही पाई गई है।

चाहे उच्च वर्ग का शिक्षित परिवार हो पिछड़े वर्ग का गरीब और अनपढ़ परिवार लड़कियों की चाहत के प्रति दोनों की सोच में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता इसलिए केवल गरीबी और अशिक्षा को लड़कियों की संख्या कम होने के लिए दोषी ठहराना उचित नहीं। वर्ष 2001 की जनगणना से यह पहले ही साफ साबित हो चुका है कि कन्या भ्रूणों को खत्म करने की रिवायत संपन्न इलाकों में अधिक है। इस जनगणना में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लड़कियों की संख्या 900 से भी कम पाई गई। इस में फतेहगढ़ साहिब में 1000 लडकों के पीछे 766 लड़कियों की संख्या थीं लेकिन अब यह कम होकर 734 तक पहुंच गई है। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में यह 836 से कम होकर 789 पहुंच गई है। ऐसी ही प्रवृति अन्य संपन्न इलाकों में भी पाई गई।

देखा जाए तो पिछले सात वर्षो में देश में शिक्षा का विस्तार हुआ है। स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं की साक्षरता के आंकड़ो का ग्राफ भी बड़ा है। देश की आर्थिक वृद्दि दर 9 तक पहुच गई है। देश सुपर पावर बनने का दावा कर रहा है। सूचना क्रांति से लोगों में जागरूकता बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन इस सब के बावजूद लड़की के प्रति सोच पर अभी भी जंग लगा हुआ है। लड़कियों को गर्भ में ही खत्म करने की प्रवृति का सबसे बड़ा कारण वह रिवायत हैं जो लड़के को वंश आगे बढ़ाने और विरासत के रूप में देखती है। दूसरा लड़की को दिया जाने वाला दहेज जो लड़के के लिए बेयरर चेक का काम करता है।
दिल्ली की सेंटर फाॅर सोशल रिसर्च संस्था ने स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के सहयोग से हाल ही में दिल्ली में लिंग अनूपात से जुड़े आर्थिक ,सामाजिक और नीति संबंधी कारणों की जांच करने के लिए एक सर्वे कराई। सर्वे की रिर्पोट के मुताबिक पुराने रीति रिवाज और पारिवारिक परंपराओं के कारण दिल्ली में अधिकतर परिवार लिंग निर्धारित गर्भपात कराते हंै। दिल्ली में लड़कियों के कम अनुपात वाले तीन क्षेत्र नरेला, पंजाबी बाग और नजफगढ़ में कराई गई सर्वे में सभी अनपढ़, कम पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले उतरदात्ताओं ने माना कि लडकी की बजाए लड़के के जन्म को परिवार में अधिक बेहतर माना जाता है क्योंकि वह मरने के बाद अतिंम रस्मों को पूरा कर मोक्ष दिलाता है। इसके अलावा परिवार का नाम भी आगे बढाता है। सर्वे के नतीजे साफ इस बात की ओर इशारा करते हैं कि गरीब और पिछड़ा वर्ग अगर लड़की को आर्थिक बोझ के रूप में देखता है तो मध्य और उच्च वर्ग के संपन्न लोग लड़के को अपनी संपति का वारिस और अतिंम रस्मों को पूरा करने का जरिया मानते हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले एक्शन एड द्वारा देश के पांच खुशहाल माने जाने वाले राज्यों पंजाब राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा के विभिन्न जिलों में की गई एक अन्य सर्वे सेे भी स्पष्ट होता है कि सभी दावों और प्रयासों के बावजूद लड़की को ‘अनचाही’ मानने की प्रवृति बढ़ती जा रही है। सर्वे में पाया गया कि मौजूदा समय में इन राज्यों में लड़कियों का अनुपात लड़कांे की अपेक्षा कम ही नहीं है बल्कि 2001 की जनगणना के बाद से शहरी क्षेत्रों में और कम हो रहा है। केवल राजस्थान को छोड़कर शेष सभी चार राज्यों में पहले से ही लड़कियों की कम संख्या में और भी कमी आ रही है। हांलाकि राजस्थान में भी यह आंकड़ा अभी औसत राष्ट्रीय अनुपात 1000 पर 927 लड़कियों तक नहीं पहुंच पाया। सर्वे से पता चलता है कि जिन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं और अल्ट्रासांउड मशीनों की पहुंच नहीं है, उन इलाकोे में लड़कियां पैदा तो हो जाती हैं लेकिन जीवित कम बचती हैं। इसके लिए पैदा हुई लड़कियों को या तो बीमार होने पर मेडिकल सहायता नहीं दी जाती या फिर ऐसे तरीके अपनाए जातें हैं कि वे जीवित न बचें। जैसे मध्यप्रदेश के मुरैना इलाके में बच्चे की नाड़ को जानबूझ कर इन्फेक्शन के लिए छोड़ने जैसी घटनाओं का पता चला है ताकि ‘अनचाही’ बच्ची से छुटकारा मिल सके। सर्वे किए गए सभी इलाकों में पैदा हुए दूसरे बच्चे में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। इसी प्रकार तीन इलाकों में तो तीसरे नंबर पर पैदा हुए बच्चों में लड़कियों की संख्या 750 से भी कम थी।

जिस प्रकार से पिछले एक वर्ष में उड़ीसा और चण्डीगढ़ से अजन्मी बच्चियों के फेंके गए भू्रण पाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं उससे पता चलता है कि लड़की को लेकर समाज के किसी वर्ग की सोच में बदलाव नहीं आया। लांसेट की रिर्पोट के मुताबिक भारत में हर साल 5 लाख लड़कियों का गर्भपात किया जा रहा है। लिंग निर्धारण तकनीकों की अधिक उपलब्धता हांलाकि इसका एक बड़ा कारण है। इसके लिए 1994 मे बना भू्रण परीक्षण निर्वारण कानून भी अधिक सहायक साबित नहीं हो रहा क्योंकि अल्ट्रासाउंड मशीनों का इस्तेमाल, लिंग परीक्षण के लिए करने वाले डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई के अधिक मामले सामने नहीं आ रहे। दरअसल इस की एक वजह यह भी है कि भू्रण परीक्षण एक निहायत ही निजी मामला है। इस प्रक्रिया में पति पत्नी और डाक्टर के अलावा अन्य कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं रहता। ऐसे में न तो परीक्षण करने वाले और न ही कराने वाले का पता चल सकता है। कानून को प्रभावी बनाने के लिए अधिक जरूरत महिलाओं के स्तर को उठाने की है। जिस प्रकार से लड़की से लड़के को अधिक प्राथमिकता देने की प्र्रवृति हर वर्ग में बढ़ती जा रही है उससे यह साफ जाहिर होता है कि समाज में महिलाओं का निम्न स्तर इस बुराई की सबसे बड़ी जड़ हैै। इस से निपटने के लिए लड़की के सामाजिक, आर्थिक अधिकारों को समान स्तर पर लाना होगा। लड़कियों को पिता की संपति में समान हक का कानूनी अधिकार भले ही मिल गया हो लेकिन इसे अमल में लाने वाले प्रयासांे को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। लड़कियों द्वारा मां- बाप के अतिंम संस्कार करने के भी छिटपुट प्रयास शुरू हो चुके हैं लेकिन ऐसे प्रयासों को ओर बढ़ावा मिलने की जरूरत है। परिवार में लड़की की अहमियत किसी भी प्रकार से लड़कों से कम नहीं, इस सोच को हर प्रकार से विकसित करना होगा। जब तक हर मोर्चे पर लड़की के स्तर को उठाने की प्रक्रिया शुरू नहीं होगी लड़कियों के गायब होने की संख्या कम नहीं होगी।


लेखिका प्रेस इंस्टीट्यूट की पत्रिका ग्रासरूट और विदुर की संपादक रही हैं

Thursday, 13 November 2008

प्रतिबंध के बावजूद


छोटू और मोनू जैसे असंख्य बच्चों के नाम जो बाल दिवस की खुशी से कोसों दूर हैं

अन्नू आनंद
पिछले दिनों गुड़गांव के एक घर में काम करने वाली बच्ची लखी को मालिकों द्वारा निर्ममता से पीटे जाने की घटना ने एक बार फिर घरों में काम करने वाली असंख्य बच्चियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अक्तूबर माह में घरेलू बाल मजदूरी पर लगे प्रतिबंध को दो साल पूरे हो गए। लेकिन घरों और ढाबों में काम करने वाले बच्चे अभी भी हिंसा और शोषण के माहौल में जी रहे हैं। दिल्ली-जयपुर हाईवे के एक ढाबे में काम करने वाले 10 साल के मोनू की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया। उसके दिन की शुरूआत सुबह चार बजे होती है। अपने छोटे छोटे हाथों से भारी भरकम बर्तन मांजने, फिर मेज कुर्सियां लगाने के बाद भाग भाग कर ग्राहकों को चाय, पानी पिलाने और खाना खिलाने में उसका पूरा दिन बीत जाता है। मोनू यह नहीं जानता कि दिन भर जो मेहनत वह कर रहा है वह उसका हकदार नहीं और और ऐसा करना या कराना अपराध है। सरकार ने दो साल पहले वर्ष 2006 में 14 साल से कम उमर के बच्चों का घरों, ढाबों और होटलों पर काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन इस प्रतिबंध के बावजूद आज भी देश भर में मोनू जैसे करीब 1.3 करोड़ (अधिकारिक आंकड़ांे के मुताबिक) बच्चे अभी भी पढ़ने की उमर में मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार हो रहे हंै। गैर सरकारी सूत्रों के मुताबिक यह संख्या 6करोड़ से ऊपर है।

काम करने वाले बच्चों का आंकड़ा करोडों़ में है। लेकिन सरकारी मशीनरी पिछले 19 महीनों में सारे देश में से केवल 6782 बच्चों को ही बचा सकी। कुल मिलाकर आठ हजार के करीब ऐसे मामलों का पता चला जिनमें कि सरकारी प्रतिबंध के बावजूद बच्चों से काम कराया जा रहा था। लेकिन इनमें से भी केवल 1680 मालिकों के खिलाफ ही मामला दर्ज किया गया। इस नियम को लागू करने की जिम्मेदारी श्रम मंत्रालय पर है। लेकिन श्रम मंत्रालय की ‘काबिलियत’ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी दिल्ली में ऐसे इस कानून का उल्लघंन करने वाले केवल 26 मामलों का ही पता लगाया जा सका। उन में से भी 12 मामले ही दर्ज हुए। जबकि दिल्ली में गैर सरकारी आंकड़ो के मुताबिक काम करने वाले बच्चों की संख्या 10 लाख बताई जाती है। बहुत से राज्यों में बचाए गए बच्चों का रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं। जिन राज्यों मंे पता लगाए गए मामलों की संख्या अधिक है वहां भी बहुत कम मामलों मंे ही मुकदमा चलाया गया। जैसे उत्तर प्रदेश में अधिनियम का उल्लघंन करने वाले 726 मामलों का पता लगाया गया लेकिन मुकदमा केवल 92 मामलों में ही चला।

बाल मजदूरी (उन्मूलन एवं प्रतिषेध) अधिनियम 1986 की खतरनाक श्रेणी में मौजूद 13 व्यवसायों में घरेलू नौकर, होटलों और स्पा को शामिल करने का मुख्य मकसद यह था कि कम आयु में बच्चों को काम की कठोर स्थितियों से बचाकर उन्हें स्कूलों का रास्ता दिखाया जाए। ग्रामीण इलाकों में स्कूलों में बढ़ते ड्राप -आउट का एक बड़ा कारण यह भी है कि मां बाप बच्चों को शहरों में भेजकर उन्हें काम पर लगाने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं ताकि उन्हें घर की कमाई में मदद मिल जाए। सेव द चिल्ड्रन संस्था द्वारा पिछले साल कराई गई एक सर्वे में बताया गया है कि दिल्ली और कोलकाता में घरों में काम करने वाले बाल मजदूरों में अधिकतर संख्या लड़कियों की है जो देश के विभिन्न हिस्सों से काम करने के लिए इन शहरों में पहुंचती हैं। सर्वे से पता चला कि 68 प्रतिशत बच्चे मारपीट के शिकार हुए और 47 प्रतिशत बच्चे मारपीट के कारण कई बार जख्मी हो चुके थे। उम्मीद यह की जा रही थी कि घरेलु बाल मजदूरी पर प्रतिबंध के चलते घर की चारदीवारी में जुल्म सहने वाले बहुत से बच्चों को राहत मिलेगी। बाल अधिकारों के समर्थकों का भी मानना था कि इस प्रतिबंध के बाद स्कूलों में बच्चों की भर्ती बढ़ेगी। प्रतिबंध के मुताबिक इसका उल्लघंन करने वाले किसी भी व्यक्ति को बाल मजदूरी (उन्मूलन एवं प्रतिषेध) अधिनियम 1986 के तहत तीन माह से दो साल की साल की कैद और 10 से 20 हजार रूपए का जुर्माना हो सकता है। लेकिन हैरत की बात यह है कि जो मुकदमे दर्ज भी हुए हैं उनमें अभी तक किसी भी मामले में किसी व्यक्ति को सजा मिलना का मामला सामने नहीं आया। बाल अधिकार से जुड़ी संस्थाएं इस बात से सहमत हैं कि प्रतिबंध प्रभावी साबित नहीं हो सका। श्रम मंत्रालय का मानना है कि उनके पास संसाधनों की कमी है इसलिए जल्द कुछ कर दिखाना संभव नहीं। लेकिन बाल मजदूरी से जुड़े अधिनियमों के अनुभव इस बात के गवाह हैं कि प्रतिबंध से वांछित सफलता की उम्मीद उचित नहीं।

होटलों और घरों में बच्चों के काम करने पर प्रतिबंध लगे दो साल ही बीते हैंै इसलिए सरकारी अमला कम समय की दुहाई देकर अपना पल्ला झाड़ सकता है लेकिन बाल मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1986 को लागू हुए कईं साल बीत गए फिर भी पटाखे, फुटबाल और कालीन बनाने से लेकर अन्य खतरनाक उधोगांे में आठ सालों के भीतर केवल 22588 मामलों में ही कार्रवाई की गई जबकि इन सभी उधोगों में काम करने वाले बाल मजदूरों की संख्या 6.70 करोड़ (गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक) है। बाल अधिकारों पर काम करने वाली बचपन बचाओं संस्था के हाल ही में कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक मेरठ, जालंधर सहित उत्तर प्रदेश और पंजाब के अन्य शहरों में 5000 बच्चे फुटबाल सिलने के कामों में लगे हैं। सर्वे के मुताबिक यह बच्चे 12 से 14 घंटों में एक से दो फृटबाल ही सिल पाते हैं और एक फुटबाल सिलने के लिए उन्हें 3 से 5 रूपए मिलते हैंै।

दरअसल सरकारी विफलता का ग्राफ ऊंचा होने का एक बड़ा कारण यह है कि सरकार ने कानून बनाकर बच्चों के काम करने पर तो प्रतिबंध लगा दिया लेकिन उसके अमलीकरन के लिए और बचाए गए बच्चों के पुनर्वास की कोई व्यापक नीति उनके पास नहीं। यह पहले से ही तय था कि प्रतिबंध के बाद घरों और होटलों मे काम करने वाले लाखों बच्चे काम से बाहर हो जाएंगे। लेकिन फिर भी छुड़ाए गए बच्चों को स्कूलों में भर्ती कराने अथवा अन्य किसी भी प्रकार से शोषण से बचाने के लिए सरकार के पास कोई प्रभावी वैक्लपिक नीति तैयार नहीं है। इनमें से कई बच्चे परिवार की कमाई का मुख्य जरिया है। इन बच्चों के काम न करने की स्थिति में उनका घर कैसे चलेगा? ऐसे काम से निकाले जाने वाले बच्चों के परिवारों में वयस्कों को काम देने संबंधी कोई भी नीति तैयार नहीं की गई। अधिनियम को लागू करने से पहले सरकार के पास घरों, होटलों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने और उनको छुड़ाने के प्रति कोई ठोस योजना प्रक्रिया नहीं थी। पिछले साल केंद्र सरकार ने विभिन्न राज्यों से बचाव और पुनर्वास संबंण्ी कार्य योजना की मांग की थी लेकिन तीन राज्यों अलावा किसी राज्य ने ऐसी योजना नहीं बनाई। वर्ष 1987 से देश के कुछ राज्यों में लागू मौजूदा पुनर्वास नीति - ‘राष्ट्रीय बाल मजदूर परियोजना’ अभी तक प्रभावी साबित नहीं हो पाई। हर बच्चे का यह मौलिक अधिकार है कि वह उचित रूप से अपना मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास कर सके। बच्चों से संबंधित सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का यही निचोड़ है। लेकिन इसके बावजूद दुनिया के 76 प्रतिशत बच्चे इस अधिकार से वंचित है।

बाल मजदूरी एक गंभीर और जटिल समस्या है और इससे निजात पाने के लिए एक ऐसी दीर्घकालीन योजना की जरूरत है जिस में बच्चे के उचित विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल अधिकार जैसे सभी मुद्दों को शामिल करना होगा। यह तभी संभव है जब स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मंत्रालय भी बाल मजदूरों के पुनर्वास में अपनी सक्रिय भगीदारी निभाएं। जब तक बचाव और पुनर्वास की बेहतर प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती बच्चों को घरों या होटलों से छुड़ाना उनके लिए अधिक शोषण के दरवाजे खोलना है। ऐसी घटनाएं भी सुनने को मिली हैं जहां काम से छुड़ाए गए बच्चों घरों में वापस नहीं पहुंचे जिनमें से कुछ ने कूडे़ बीनने का काम अपना लिया और कईं अन्य प्रकार के शोषण को झेलने के लिए मजबूर हो गए। नेपाल के केंद्रीय बाल कल्याण बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक गत साल में 500 नेपाली बच्चे तस्करी के जरिए भारतीय सर्कसों में बेचे गए। इन सर्कसों में ये मासूम बच्चे किस प्रकार के शोषण का शिकार हो रहेे हैं क्या सरकार और बाल अधिकारों के चिंतक इस ओर ध्यान देंगे।

Thursday, 6 November 2008

अंधेरे से उजाले की ओर


अन्नू आनंद
नसरीन परवीन के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई पड़ रही थी। इस खुशी का कारण उसका आत्मविश्वास था जो उसे आश्रम की पढ़ाई से मिला था। अभी तक मदरसे के स्कूल में महज उर्दू पढ़ना सीखने वाली नसरीन की यह हसरत थी कि वह भी स्कूल में जाने वाले दूसरे बच्चों की तरह हिंदी अग्रेंजी भी पढ़ना सीखे। नसरीन के पांचों भाई बहन मदरसे में पढ़ते हैं। लेकिन 14 वर्षीय नसरीन यहां तीसरी कक्षा तक की शिक्षा हासिल करने के बाद नियमित स्कूल में जाने का रास्ता तैयार कर रही है।
हसीना खातून 13 साल तक कभी स्कूल नहीं जा पाई क्योंकि उसके गांव बरान में कोई स्कूल नहीं था। दूसरे गांव स्थित स्कूल जाने के रास्ते मंे नदी पड़ती थी। बरसात के दिनों में नदी में पानी भर जाने के कारण गांव के अधिकतर बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। इसलिए हसीना चाह कर भी अपनी पढ़ने की इच्छा को पूरा नहीं कर पाई। हसीना ने कभी सोचा नहीं था कि अब भी उसके स्कूल जाने का सपना हकीकत में बदल सकता है। लेकिन आवासीय आश्रम में आने के बाद उसे अपना पढ़कर टीचर बनने का सपना साकार होता नजर आ रहा है।
नसरीना और परवीन जैसी कई लड़कियों की किताबों को पढ़ने की तीव्र लेकिन दमित ख्वाहिश पूरी हो सकी क्योंकि स्थानीय शिक्षा कार्यकत्र्ताओं ने यहां के मुस्लिम बहुल गावों में जाकर लड़कियों के घरवालों और स्थानीय मौलानाओं को समझाया कि वे गांव की लड़कियों को पास के गांव में स्थित आश्रम के आवासीय स्कूल मे पढ़ने के लिए भेजे।
वनवासी विकास आश्रम झारखण्ड के गिरडीह जिले के बगोदर ब्लाॅक में स्थित है। यह आश्रम 10 से 14 साल की उन बच्चियों के लिए आवासीय ब्रिज स्कूल चलाता है जो लड़किया काम या दूरी के कारण कभी स्कूल नहीं जा पाई या फिर किन्हीं कारणों से उन्हें बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ा। लेकिन अब इन लड़कियों को सामान्य स्कूलों मंे उमर के मुताबिक उन कक्षाओं में दाखिला नहीं मिल पाता जिनमें उन्हें होना चाहिए।
बगोदर ब्लाॅक झारखंड राज्य की कम साक्षरता दर वाले क्षेत्रों मंे एक है। खासकर लड़कियों की साक्षरता दर यहां 30 प्रतिशत से भी कम है। इस का एक बड़ा कारण कुछ समय पहले तक यहां स्कूलों की कमी थी। प्राथमिक शिक्षा से वंचित अधिकतर यहां की लड़कियां पशु चराने और घर और बच्चों को संभालने के कामों में लगी रहती हैं।
हांलाकि पिछले कुछ सालों में सर्व शिक्षा अभियान के तहत यहां के गावों में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है लेकिन पहले स्कूल छोड़ चुके बच्चों को कोई खास लाभ नहीं पहुंचा। लड़कियां खासकर दस से चैदह साल की उमर की लड़कियों को सेकेंडरी और हाई-स्कूलों में तब तक दाखिला नहीं मिलता जब तक कि उन की प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई का स्तर मजबूत नहीं होता।
एक से पांच कक्षा की बुनियादी शिक्षा में उन्हें निपुण बना मुख्यधारा के नियमित स्कूलों तक पहुचांना ही बनवासी आश्रम स्कूल का मुख्य मकसद है। आश्रम के संस्थापक सुरेश कुमार शक्ति के मुताबिक इसके लिए ब्लाॅक के उन 20 गावों को लक्ष्य बनाया गया है, जहां की साक्षरता की दर बेहद कम है। हर साल 100 के करीब लड़कियों को दाखिला दिया जाता है। एक साल के अंतराल के दौरान उन्हें एक से पांच तक की सभी कक्षाओं का कोर्स पढ़ाया जाता है। इसके लिए शिक्षा के नए और अनूठे तरीकों का उपयोग किया जाता है।
कक्षा तीन में पढ़ने वाली 14 साल की सोनी कुमारी बताती है, ‘‘जब मैं यहां आई तो शुरू शुरू में मुझे सुबह उठना फिर कक्षा शुरू होने से पहले अपना सारा काम निपटाना उसके बाद स्कूल की पढ़ाई और फिर स्कूल के बाद अपने पाठ याद करना सभी बेहद कठिन लगता था। लेकिन अब मुझे हर काम समय पर करने की आदत हो गई है और अब खेल- खेल में पढ़ाई और नाच-गाना सीखने में मुझे बेहद मजा आता है।’’ सोनी को बड़े होकर टीचर बनना है इसलिए वह कहती है मैं आगे भी पढ़ना चाहती हूं।
पिछले कईं सालों से स्कूल में पढ़ाई से लेकर स्कूल के अन्य कार्यकलापों को देखने वाली टीचर रेनु कुमारी के मुताबिक वर्ष 2000 में जब आश्रम की शुरूआत हुई थी तो गावों मे जाकर लड़कियों को स्कूल आने के लिए तैयार करना बेहद कठिन काम था। लेकिन अब तो इतनी अधिक संख्या में लड़कियां आने लगीं हैं कि हमारे पास सीटें कम होती हैं।
रेणु के मुताबिक लड़कियों को सब से पहले साफ सफाई की जानकारी दी जाती है। नहाने कपड़ो को साफ रखने बालों और नाखूनों की सफाई जैसी बुनियादी बातों से उनकी सीखने की प्रक्रिया शुरू होती है। उन्हें हर काम अनुशासन में करने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
स्कूल में लडकियों की भर्ती के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। सब से पहले संबंधित क्षेत्र के शैक्षिक आंकड़ों की जांच की जाती है। फिर उन गावों में नुक्कड़ नाटक, दीवार पेपर और जलसे जलूसों के जरिए लड़की की शिक्षा के महत्व के संबंध में समुदाय के लोगों को जागरूक बनाया जाता है। इसी दौरान आश्रम के कार्यकत्र्ता ग्राम पंचायतों के साथ बैठकें कर स्कूलों से बाहर 10 से 14 साल की लड़कियों का पता लगााते हैं। फिर आर्थिक और जातीय आधार पर इन बच्चों का वर्गीकरण किया जाता है ताकि हर वर्ग की लड़की को पढ़ने का अवसर मिले।
श्री सुरेश के मुताबिक कुल 100 साटों में से 25 फीसदी आदिवासी, 25 फीसदी अनुसुचित जाति और 25 फीसदी आर्थिक रूप से पिछड़े और 25 अल्प समुदाय के लिए आरक्षित रखी गई हैं।
दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद योगयता और समझ के आधार पर उन्हें एबीसीडी श्रेणियों में बांटा जाता है। फिर उनकी योगयता स्तर के मुताबिक सिखाने का पैमाना तय किया जाता है। पढ़ाने के लिए यहां के ऐसे तरीकांे का इस्तेमाल किया जाता है जिससे कम समय में और खेल खेल में अधिक सिखाया जा सके। जैसे कक्षा दो में करीब 40 लड़कियों के समूह को एक से 100 तक की गिनती सिखाने के लिए एक से 100 तक लिखे कार्डो को एक लाइन में लगाने के लिए कहा गया। सभी लड़कियां को सही नंबर का कार्ड ढेर में से ढंूढने को कहा गया जो सही कार्ड ढूंढ कर लगाती उसके लिए सभी तालियां बजाते। पढ़ाने के अलावा सास्कृतिक और सामूहिक कार्यकलापों पर यहां अधिक ध्यान दिया जाता है। हसीना के मुताबिक स्कूल में दिन की शुरूआत प्रार्थना और योगा के साथ होती है। उसके बाद अलग-अलग विषयों पर नियमित कक्षाएं शुरू होती हैं। मुख्य तौर पर स्कूल में गणित, ंिहंदी, पर्यावरण पढ़ाया जाता है। शाम का समय खेल का होता है। सोने से पहले अंग्रेजी की क्लास होती हैं। सप्ताह के आखिरी दिन रविवार को बच्चों को चित्रकारी, कढ़ाई और दूसरे काम की चीजें सिखाई जाती हैं। इस के अलावा पढ़ाई में कमजोर रहने वाले बच्चों के लिए इस दिन विशेष कक्षाएं भी आयोजित की जाती हैं। यह दिन मां -बाप को भी अपने बच्चों से मिलने आने की छूट होती है। बच्चों मंे जिम्मेदारी और नेतृत्व की भावना पैदा करने के लिए उन्हें आश्रम के विभिन्न काम सौंपे जाते हैं। इसके लिए आश्रम में एक बाल संसद का गठन किया गया है। बाल संसंद के लिए एक प्रधानमंत्री और मंत्रियों का चुनाव किया जाता है। चयनित बाल मंत्रियों को स्वास्थ्य साफ सफाई, सांस्कृतिक और खेल कूद की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। बाल संसद के तहत विशेष समितियां भी बनाई गई हैं जो परिसर की साफ सफाई, बर्तन मांजने और समय पर हर काम को पूरा करने जिम्मा उठाती है।
जिस समय लेखक ने इस आश्रम में प्रवेश किया बहुत सी लड़कियों को अलग अलग समूहों में बंटा पाया। एक समूह में संवाददाताओं का चयन किया जा रहा था। पूछने पर पता चला कि यह हर माह लड़कियों द्वारा निकाले जाने वाले समाचारपत्र की तैयारी चल रही है। इसमें हर बार चक्रीय प्रक्रिया से चयनित संवाददाता माह के दौरान के अपने अनुभवों और अन्य मुद्दों पर लिखती हैं। एक समूह में गाने की रिहर्सल चल रही थी और एक अन्य कमरे में कुछ लड़कियां वाद विवाद और निबंध याद करने में व्यस्त थीं। यह तैयारी हर माह होने वाली बाल सभा के लिए की जा रही थी
श्री सुरेश के मुताबिक जब हमने इस प्रोजेक्ट को शुरू किया था तो सबसे पहले हमें युनिसेफ से दो साल के लिए सहयोग मिला था। उसके बाद वर्ष 2002 से यह प्रोजेक्ट दो सालों के लिए रीच इंडिया के सहयोग से चला। लेकिन उसके बाद पिछले दो सालों से सर्व शिक्षा के अभियान के ब्रिज कोर्स योजना से इसे वित्तीय मदद मिल रही है। लेकिन इसमें फंड अधिक न होने के कारण अभी हमें बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। श्री सुरेश के मुताबिक वर्ष 2005-06 में 100 में से 75 लड़कियों को हम नियमित स्कूलों में दाखिल कराने मे सफल रहे। इसी तरह वर्ष 2006-07 में 53 लड़कियांे को यहां ब्रिज कोर्स करने के बाद नियमित स्कूलों में दाखिला मिला। इस साल दो लड़कियां बोर्ड की परीक्षा भी दे रही हैं।
आश्रम के माहोल की बोरियत को तोड़ने के लिए समय समय पर लड़कियों को ऐतिहासिक स्थलों या दूसरे पिकनिक स्थलों पर भी लेजाया जाता है। इससे उन्हें अपने गांव के अतिरिक्त बाहरी दुनिया को देखने और समझने का मौका मिलता है।
जैसा कि कभी स्कूल न जाने वाली यहां की शाहीना कहती है मैं यहां आने से पहले अंधेरे से बहुत डरती थी लेकिन अब मुझे अधेंरे में भी डर नहीं लगता, मैं नहीं जानती थी कि शिक्षा की लौ इतनी तेज होती है।