पेड न्यूज से भी खतरनाक है अंधविश्वासों का प्रचार
अन्नू आनंद
आखिर क्या कारण है कि अंधविश्वासों और पाखंडों पर लोगों का विश्वास शिक्षा के स्तर में सुधार के बावजूद बढ़ता जा रहा है? सही जवाब यह है कि अब अंधविश्वासों के साथ बाजार जुड़ गया है। बाजार के जुड़ने के साथ ही सभी प्रकार के प्रपंचों, आंडबरों, पाखंडों और अवैज्ञानिक सोच के प्रति मीडिया की रूचि बढ़ रही है। अभी तक चमत्कारों, भूतप्रेतों और अंधविश्वासों को फैलाने के लिए केवल टीवी चैनलों को ही दोष दिया जाता था। सांप सपेरे का खेल, प्रलयों की झूठी भविष्यवाणियों का प्रचार- प्रसार करने में चैनल अभी भी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि विजुअल मीडिया से स्वयं को अधिक मैच्योर मानने वाला प्रिंट मीडिया भी इस होड़ में अब पीछे नहीं रहा। पाठकों की गिनती बढ़ाने की चाह में विभिन्न अखबार हर तबके को अपना लक्ष्य बनाने में जुटे हैं। स्पर्धा की इस लड़ाई में वे यह भूल रहे हैं कि लोगों की आस्थाओं और विश्वास को बाजार में तब्दील करने में वे लोगों को अज्ञानता की उस दलदल में धकेलने का काम भी कर रहें हैं जहां से उबरने में कईं सदियां लग गईं। मीडिया के लिए फिलहाल ‘बेचना’ ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली से निकलने वाले मुख्य दैनिक समाचारपत्र की एक बायलाइन स्टोरी में लिखा हुआ था कि ‘‘रात्रि़ को सोने से पूर्व बालकनी से वस्त्रों (खासतौर पर सफेद रंग) को उतार लेना चाहिए ऐसी मान्यता है कि रा़ित्र में वस़्त्र बाहर सूख रहे हों तो अतृप्त आत्माएं उन वस्त्रों पर कुदृष्टि डालकर उन वस्त्रों के पहनने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं।’’
खराब स्वास्थ्य का कारण अत्ृप्त आत्माओं को बताना और वस्त्रों के माध्यम से उनकी कुदृष्टि पड़ने की बात किसी फूहड़ सोच का नतीजा है।
मीडिया के किसी भी माध्यम में किसी भी खबर, आलेख, कार्यक्रम या फिर विज्ञापन के जरिए लोगों मंे भ्रम फैलाना, उन्हें अज्ञानता का पाठ पढ़ाना, डराना, धमकाना या फिर अंधविश्वासों को प्रकाशित या प्रसारित करना एक खतरनाक अपराध है। इसकी एक वजह यह भी है कि अखबार में छपे और टीवी में आने वाले किसी भी खबर को अभी भी बहुत बड़ा वर्ग सत्य मानकर चलता है। ऐसे लोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि, ‘‘अरे भई गलत कैसे होगा मैंने अखबार में पढ़ा था। या ‘‘टीवी में देखा था।’’ लेकिन झूठ और आडंबरों पर आधारित ऐसी खबरों और प्रोग्रामों की गिनती बढ़ती ही जा रही है।
पाठकों को भ्रमित करने वाली और कुतर्कों पर आधारित 10 अक्तूबर को छपी इसी स्टोरी में आगे लिखा था ‘‘घर के मुख्य द्वार से यदि रसोई कक्ष दिखाई दे तो घर की स्वामिनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और उसके बनाए खाने को ज्यादा लोग पसंद नहीं करते हैं। कौन सी वास्तुकला ऐसे विचारों को प्रचारित कर रही है? किसी भी शास्त्र, कला के नाम पर इस प्रकार के कुतर्कों को प्रचारित करने का मुख्य कारण केवल मुनाफा हो सकता है जो लोगों को भ्रमित कर ऐसे अंधविश्वास के झूठे समाधानों को बेचकर कमाया जा सकता है। मीडिया ऐसे उपायों और समाधानों को बेचने का मुख्य माध्यम बनता जा रहा है। विके्रताओं और मीडिया मालिकांे के इस मिले -जुले खेल में आम आदमी खासकर जो निराश और शोषित हैं, ऐसे प्रपंचों में जकड़ जाते हंै।
अभिव्यक्ति की आजादी का जो अधिकार हम पत्रकारों और लेखकों को लिखने की आजादी प्रदान करता हैे वही पाठको और दर्शकों को सही तार्किक और तथ्यों पर आधारित सूचनाएं और ज्ञान प्रकाशित-प्रसारित करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी मांग करता है।
ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जब अखबार और टीवी चैनल लोगों को महज गुमराह करते नजर आते है। लेकिन इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। इन दिनों कुछ टीवी चैनलों पर बाधा मुक्ति यंत्र और नजर सुरक्षा कवच को बेचने के लिए लोगों को पूरी तरह से गुमराह किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में पढ़ने के बावजूद बच्चे के अंक कम आने, व्यापार में घाटा होने या बेटी की सगाई टूटने का कारण किसी रिश्तेदार या मित्र की नजर लगना बताया जा रहा है। इसके लिए नाटक रूपातंरण के रूप में ऐसी झूठी कहानियों को फिल्माया जाता है और समाधान के रूपमें यंत्र या कवच खरीदने पर जोर दिया जाता है।
अपने प्रोडेक्ट को बेचने के लिए उसे विज्ञापित करना जायज ठहराया जा सकता है लेकिन उसके लिए लोगों को भयभीत करना या फिर झूठी कहानियों के माध्यम से यह प्र्रचारित करना कि यह यंत्र यानी गले में पहनने वाला पेंडेट न लिया गया तो आप के अधूरे काम कभी पूरे नहीं हो पाएंगे। किसी भी चीज को बेचने के लिए विज्ञापन की भी कोई आाचार संहिता है। बेचने का मतलब यह नहीं कि लोगों को गुमराह किया जाए वह भी नेशनल चैनल पर। मीडिया के नाम पर सरकार से लाइसेंस और दूसरी सुविधाएं लेने का अर्थ यह नहीं कि आम लोगों में भूत प्रेत, अतृप्त आत्माओं अंधविश्वासों से भरा फूहड़ अज्ञान का प्रचार करो। पेड न्यूज से भी खतरनाक इस मर्ज से भी मीडिया को सावधान रहना होगा। समाचारों के रूप में हर समय आंतक और जिज्ञासा बनाकर खबरों को बेचने वाले चैनलों और अतार्किक, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिक तथ्यों और जादू टोनो जैसे अज्ञान को फैलाने वाले हर माध्यम के खिलाफ भी आवाज उठाने की जरूरत है क्योंकि यह एक उन्नतशील समाज के लिए बेहद खतरनाक प्रवृति है।
आखिर क्या कारण है कि अंधविश्वासों और पाखंडों पर लोगों का विश्वास शिक्षा के स्तर में सुधार के बावजूद बढ़ता जा रहा है? सही जवाब यह है कि अब अंधविश्वासों के साथ बाजार जुड़ गया है। बाजार के जुड़ने के साथ ही सभी प्रकार के प्रपंचों, आंडबरों, पाखंडों और अवैज्ञानिक सोच के प्रति मीडिया की रूचि बढ़ रही है। अभी तक चमत्कारों, भूतप्रेतों और अंधविश्वासों को फैलाने के लिए केवल टीवी चैनलों को ही दोष दिया जाता था। सांप सपेरे का खेल, प्रलयों की झूठी भविष्यवाणियों का प्रचार- प्रसार करने में चैनल अभी भी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि विजुअल मीडिया से स्वयं को अधिक मैच्योर मानने वाला प्रिंट मीडिया भी इस होड़ में अब पीछे नहीं रहा। पाठकों की गिनती बढ़ाने की चाह में विभिन्न अखबार हर तबके को अपना लक्ष्य बनाने में जुटे हैं। स्पर्धा की इस लड़ाई में वे यह भूल रहे हैं कि लोगों की आस्थाओं और विश्वास को बाजार में तब्दील करने में वे लोगों को अज्ञानता की उस दलदल में धकेलने का काम भी कर रहें हैं जहां से उबरने में कईं सदियां लग गईं। मीडिया के लिए फिलहाल ‘बेचना’ ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली से निकलने वाले मुख्य दैनिक समाचारपत्र की एक बायलाइन स्टोरी में लिखा हुआ था कि ‘‘रात्रि़ को सोने से पूर्व बालकनी से वस्त्रों (खासतौर पर सफेद रंग) को उतार लेना चाहिए ऐसी मान्यता है कि रा़ित्र में वस़्त्र बाहर सूख रहे हों तो अतृप्त आत्माएं उन वस्त्रों पर कुदृष्टि डालकर उन वस्त्रों के पहनने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं।’’खराब स्वास्थ्य का कारण अत्ृप्त आत्माओं को बताना और वस्त्रों के माध्यम से उनकी कुदृष्टि पड़ने की बात किसी फूहड़ सोच का नतीजा है।
मीडिया के किसी भी माध्यम में किसी भी खबर, आलेख, कार्यक्रम या फिर विज्ञापन के जरिए लोगों मंे भ्रम फैलाना, उन्हें अज्ञानता का पाठ पढ़ाना, डराना, धमकाना या फिर अंधविश्वासों को प्रकाशित या प्रसारित करना एक खतरनाक अपराध है। इसकी एक वजह यह भी है कि अखबार में छपे और टीवी में आने वाले किसी भी खबर को अभी भी बहुत बड़ा वर्ग सत्य मानकर चलता है। ऐसे लोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि, ‘‘अरे भई गलत कैसे होगा मैंने अखबार में पढ़ा था। या ‘‘टीवी में देखा था।’’ लेकिन झूठ और आडंबरों पर आधारित ऐसी खबरों और प्रोग्रामों की गिनती बढ़ती ही जा रही है।
पाठकों को भ्रमित करने वाली और कुतर्कों पर आधारित 10 अक्तूबर को छपी इसी स्टोरी में आगे लिखा था ‘‘घर के मुख्य द्वार से यदि रसोई कक्ष दिखाई दे तो घर की स्वामिनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और उसके बनाए खाने को ज्यादा लोग पसंद नहीं करते हैं। कौन सी वास्तुकला ऐसे विचारों को प्रचारित कर रही है? किसी भी शास्त्र, कला के नाम पर इस प्रकार के कुतर्कों को प्रचारित करने का मुख्य कारण केवल मुनाफा हो सकता है जो लोगों को भ्रमित कर ऐसे अंधविश्वास के झूठे समाधानों को बेचकर कमाया जा सकता है। मीडिया ऐसे उपायों और समाधानों को बेचने का मुख्य माध्यम बनता जा रहा है। विके्रताओं और मीडिया मालिकांे के इस मिले -जुले खेल में आम आदमी खासकर जो निराश और शोषित हैं, ऐसे प्रपंचों में जकड़ जाते हंै।
अभिव्यक्ति की आजादी का जो अधिकार हम पत्रकारों और लेखकों को लिखने की आजादी प्रदान करता हैे वही पाठको और दर्शकों को सही तार्किक और तथ्यों पर आधारित सूचनाएं और ज्ञान प्रकाशित-प्रसारित करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी मांग करता है।
ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जब अखबार और टीवी चैनल लोगों को महज गुमराह करते नजर आते है। लेकिन इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। इन दिनों कुछ टीवी चैनलों पर बाधा मुक्ति यंत्र और नजर सुरक्षा कवच को बेचने के लिए लोगों को पूरी तरह से गुमराह किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में पढ़ने के बावजूद बच्चे के अंक कम आने, व्यापार में घाटा होने या बेटी की सगाई टूटने का कारण किसी रिश्तेदार या मित्र की नजर लगना बताया जा रहा है। इसके लिए नाटक रूपातंरण के रूप में ऐसी झूठी कहानियों को फिल्माया जाता है और समाधान के रूपमें यंत्र या कवच खरीदने पर जोर दिया जाता है।
अपने प्रोडेक्ट को बेचने के लिए उसे विज्ञापित करना जायज ठहराया जा सकता है लेकिन उसके लिए लोगों को भयभीत करना या फिर झूठी कहानियों के माध्यम से यह प्र्रचारित करना कि यह यंत्र यानी गले में पहनने वाला पेंडेट न लिया गया तो आप के अधूरे काम कभी पूरे नहीं हो पाएंगे। किसी भी चीज को बेचने के लिए विज्ञापन की भी कोई आाचार संहिता है। बेचने का मतलब यह नहीं कि लोगों को गुमराह किया जाए वह भी नेशनल चैनल पर। मीडिया के नाम पर सरकार से लाइसेंस और दूसरी सुविधाएं लेने का अर्थ यह नहीं कि आम लोगों में भूत प्रेत, अतृप्त आत्माओं अंधविश्वासों से भरा फूहड़ अज्ञान का प्रचार करो। पेड न्यूज से भी खतरनाक इस मर्ज से भी मीडिया को सावधान रहना होगा। समाचारों के रूप में हर समय आंतक और जिज्ञासा बनाकर खबरों को बेचने वाले चैनलों और अतार्किक, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिक तथ्यों और जादू टोनो जैसे अज्ञान को फैलाने वाले हर माध्यम के खिलाफ भी आवाज उठाने की जरूरत है क्योंकि यह एक उन्नतशील समाज के लिए बेहद खतरनाक प्रवृति है।
(विदुर की पूर्व सम्पादक)
अनसुनी आवाज़ उन लोगों की आवाज़ है जो देश के दूर दराज़ के इलाकों में अपने छोटे छोटे प्रयासों के द्वारा अपने घर, परिवार समुदाय या समाज के विकास के लिए संघर्षरत हैं। देश के अलग अलग हिस्सों का दौरा करने के बाद लिखी साहस की इन कहानियों को मैं अख़बारों और इस ब्लॉग के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ क्योंकि ये खामोश योधाओं के अथक संघर्ष की वे कहानियाँ हैं जिनसे सबक लेकर थोड़े से साहस और परिश्रम से कहीं भी उम्मीद की एक नयी किरण जगाई जा सकती है।
Saturday, 23 October 2010
Tuesday, 3 August 2010
कुलपति जी, बस और नहीं!
अन्नू आनंद
कुलपति जैसे प्रतिष्ठित पद पर रहते हुए कोई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। यह सोच कर भी आश्चर्य होता है। इन शब्दों ने केवल महिला लेखिकाओं का ही नहीं समूचे महिला समाज का अपमान किया है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय जैसा संस्थान जिस पर हिंदी भाषा को अन्य देशों में प्रतिष्ठित करने की जिम्मेदारी हो वहां का कुलपति देश की लेखिकाओं के लिए ‘छिनाल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करे और उसे एक प्रतिष्ठित संस्थान साहित्य संसथान की पत्रिका प्रकाशित भी करे तो समझ में आ जाना चाहिए कि शिक्षा और साहित्य का स्तर किस हद तक गिर गया है। शालीनता की सभी हदें पार कर किसी भी लेखिका के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल दिमागी दिवालियापन और घटिया सोच की निशानी है और ऐसे पुरूषों को ऊंचें पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं।
अपने वक्तव्य के बचाव में दिए गए कुलपति के तर्क भी संतोषजनक नहीं है।
अपने बचाव में वे कहते हैं इस शब्द का इस्तेमाल प्रेमचंद कई बार कर चुके हैं। हांलाकि मेरा साहित्य में कोई दखल नहीं है लेकिन कुलपति जी जो साहित्यकारों की जमात में अच्छा रसूख रखते हेैं यह कैसे भूल गए कि प्रेमचंद की कहानियों मंे इस्तेमाल इस शब्द का संदर्भ दूसरा रहा है। कहानी का पात्र किस पृष्ठभूमि में और किस संदर्भ के तहत इस शब्द का इस्तेमाल कर रहा है यह सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। उन्होंने कुलपति की तरह कभी अपनी किसी टिप्पणी में महिलाओं या लेखिकाओं के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।
अपने बचाव में उन्होंने एक अखबार को दूसरा तर्क देते हुए कहा कि उन्होंने किसी एक विशेष लेखिका के लिए नहीं बल्कि बहुत सी लेखिकाओं के लिए इसका इस्तेमाल किया है यानी गाली एक को नहीं बहुत सी महिला लेखिकाओं को दी गई है। क्या बहुत सी महिलाओं के लिए ये शब्द तर्कसंगत हैं?
उनका कहना है कि बहुत सी लेखिकाएं स्त्री विमर्श के सवाल पर केवल देह से मुक्ति पर विमर्श को केंद्रित रखती हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे विचार रखे। यह आपति भी जायज नहीं। स्त्री विमर्श का फोकस क्या होना चाहिए इसपर उनके अपने विचार हो सकते हैं। जिस पर बहस की जा सकती है। लेकिन कोई भी लेखिका अपनी आत्मकथा में या अपने लेखों में किस प्रकार की मुक्ति को वरीयता दे यह उसकी अपनी अभिवयक्ति की आजादी का मसला है। अगर वह देह की मुक्ति को अपना विषय बनाती है तो क्या उसकोेे गालियां दी जाएं ? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि कोई लेखिका क्या लिखे इसके लिए भी उसे मर्दों से राय लेनी होगी। महिलाओं के प्रति उनकी यह टिप्पणी अपरोक्ष रूप से उसी कट्टरपंथी सोच को प्रतिबिंबित करती है जो कभी महिलाओं को पब न जाने की हिदायत देती है तो कभी अकेले मंदिर में न जाने की नसीहतें। कभी राजनीति से दूर रहने में ही महिलाओं का भला मानती है। अब वार महिलाओं के लेखन पर है और वह भी गालियों के साथ। यानी अब लेखन पर पाबंदी के लिए गालियों का सहारा।
ताकि महिलाएं कुछ भी लिखने से पहले ऊंचे ओहदों मंे बैठे ऐसे मर्दों से खौफ खाएं जो उनकी आवाज को दबाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। लेकिन इन मर्दों के लिए एक नसीहत महिला यह बखूबी जान चुकी है कि पाबंदियों के घेरों से कैसे निकलना है, मर्दों के बनाए रूढ़ीवादी खांचों को कैसे तोड़ना है और अपने रास्तों को कैसे चुनना है अगर चाहें तो उसके हौंसलों के साथ खड़ा होना सीखें। उनकी बढ़ती हैसियत से खार खाकर उनमें फच्चर फसाने की कोशिशें बहुत मंहगी पड़ सकती हैं। महिलाओं का चरित्रहनन कर उन पर लगाम लगाने का पुराना और घटिया नुस्खा अब औेर नहीं चलेगा कुलपति जी!
कुलपति जैसे प्रतिष्ठित पद पर रहते हुए कोई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। यह सोच कर भी आश्चर्य होता है। इन शब्दों ने केवल महिला लेखिकाओं का ही नहीं समूचे महिला समाज का अपमान किया है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय जैसा संस्थान जिस पर हिंदी भाषा को अन्य देशों में प्रतिष्ठित करने की जिम्मेदारी हो वहां का कुलपति देश की लेखिकाओं के लिए ‘छिनाल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करे और उसे एक प्रतिष्ठित संस्थान साहित्य संसथान की पत्रिका प्रकाशित भी करे तो समझ में आ जाना चाहिए कि शिक्षा और साहित्य का स्तर किस हद तक गिर गया है। शालीनता की सभी हदें पार कर किसी भी लेखिका के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल दिमागी दिवालियापन और घटिया सोच की निशानी है और ऐसे पुरूषों को ऊंचें पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं।
अपने वक्तव्य के बचाव में दिए गए कुलपति के तर्क भी संतोषजनक नहीं है।
अपने बचाव में वे कहते हैं इस शब्द का इस्तेमाल प्रेमचंद कई बार कर चुके हैं। हांलाकि मेरा साहित्य में कोई दखल नहीं है लेकिन कुलपति जी जो साहित्यकारों की जमात में अच्छा रसूख रखते हेैं यह कैसे भूल गए कि प्रेमचंद की कहानियों मंे इस्तेमाल इस शब्द का संदर्भ दूसरा रहा है। कहानी का पात्र किस पृष्ठभूमि में और किस संदर्भ के तहत इस शब्द का इस्तेमाल कर रहा है यह सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। उन्होंने कुलपति की तरह कभी अपनी किसी टिप्पणी में महिलाओं या लेखिकाओं के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।
अपने बचाव में उन्होंने एक अखबार को दूसरा तर्क देते हुए कहा कि उन्होंने किसी एक विशेष लेखिका के लिए नहीं बल्कि बहुत सी लेखिकाओं के लिए इसका इस्तेमाल किया है यानी गाली एक को नहीं बहुत सी महिला लेखिकाओं को दी गई है। क्या बहुत सी महिलाओं के लिए ये शब्द तर्कसंगत हैं?
उनका कहना है कि बहुत सी लेखिकाएं स्त्री विमर्श के सवाल पर केवल देह से मुक्ति पर विमर्श को केंद्रित रखती हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे विचार रखे। यह आपति भी जायज नहीं। स्त्री विमर्श का फोकस क्या होना चाहिए इसपर उनके अपने विचार हो सकते हैं। जिस पर बहस की जा सकती है। लेकिन कोई भी लेखिका अपनी आत्मकथा में या अपने लेखों में किस प्रकार की मुक्ति को वरीयता दे यह उसकी अपनी अभिवयक्ति की आजादी का मसला है। अगर वह देह की मुक्ति को अपना विषय बनाती है तो क्या उसकोेे गालियां दी जाएं ? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि कोई लेखिका क्या लिखे इसके लिए भी उसे मर्दों से राय लेनी होगी। महिलाओं के प्रति उनकी यह टिप्पणी अपरोक्ष रूप से उसी कट्टरपंथी सोच को प्रतिबिंबित करती है जो कभी महिलाओं को पब न जाने की हिदायत देती है तो कभी अकेले मंदिर में न जाने की नसीहतें। कभी राजनीति से दूर रहने में ही महिलाओं का भला मानती है। अब वार महिलाओं के लेखन पर है और वह भी गालियों के साथ। यानी अब लेखन पर पाबंदी के लिए गालियों का सहारा।
ताकि महिलाएं कुछ भी लिखने से पहले ऊंचे ओहदों मंे बैठे ऐसे मर्दों से खौफ खाएं जो उनकी आवाज को दबाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। लेकिन इन मर्दों के लिए एक नसीहत महिला यह बखूबी जान चुकी है कि पाबंदियों के घेरों से कैसे निकलना है, मर्दों के बनाए रूढ़ीवादी खांचों को कैसे तोड़ना है और अपने रास्तों को कैसे चुनना है अगर चाहें तो उसके हौंसलों के साथ खड़ा होना सीखें। उनकी बढ़ती हैसियत से खार खाकर उनमें फच्चर फसाने की कोशिशें बहुत मंहगी पड़ सकती हैं। महिलाओं का चरित्रहनन कर उन पर लगाम लगाने का पुराना और घटिया नुस्खा अब औेर नहीं चलेगा कुलपति जी!
Friday, 23 July 2010
कोख का कारोबार
सरोगेसी पर महिला विरोधी विधेयक
अन्नू आनंद
हाल ही में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने देश में सरोगेसी यानी किराए पर कोख से जुड़े विधेयक का मसौदा स्वास्थय मंत्रालय को भेजा है। मंत्रालय और परिषद में कईं सालों से चल रही कवायद के बाद जो प्रारूप तैयार किया है वह निराशाजनक है। अस्सिटिड रिर्पोडेक्टिव टेकनाॅलाजी (एआरटी) को नियं़ित्रत करने का जो मसौदा बना है उसमें महिला के हितों को कम बाजार को अधिक ध्यान में रखा गया है। प्रारूप के अधिकतर प्रावधानों से स्पष्ट है कि सरकार एआरटी के जरिए कीमती और खतरनाक प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करने के पक्ष में है।
विधेयक में सरोगेसी के नाम पर किराए पर कोख देने वाली महिला को आर्थिक मुआवजा देने, सीमेंन बैंक, फर्टीलिटी क्लीनिक, दवा कंपनियां और एआरटी बैंकों को बिचैलिए बनाकर किराए पर कोख देने और लेने के प्रावधानों का उल्लेख है। ये बैंक बकायदा कानूनी तौर पर विज्ञापन के माध्यम से सरोगेट मांओं, शुक्राणुओं और अण्डाणुदात्ताओं का पता लगाने का काम करेंगे। बैंक इन दात्ताओं को इसकी फीस भी अदा करेगा। विधेयक के एक अन्य प्रावधान के मुताबिक सरोगेट मां किराए पर कोख लेने वाले दंपति से भी वित्तीय मुआवजा ले सकती है। विधेयक में जिस प्रकार से बैंकांे, क्लीनिकों, ग्राहकों और पैसे के लेन -देन की सिफारिशों का जिक्र किया गया है उससे साफ जाहिर है कि सरकार और दवा कंपनियां एक औरत की जनन अक्षमता को भुना कर देश में कृत्रिम तरीके से बच्चा जनने के एक बड़े उधोग को बढ़ावा देने के पक्ष में है।
यह सही है भारतीय समाज में महिला के मां के रूप को अधिक सम्मानित किया जाता है। विवाह के बाद ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ जैसे पारंपरिक आर्शीवचन आज भी उसकी परिपूर्णता मां बनने पर केंद्रित करते हैं। जो महिला शादी के कुछ सालों के बाद मां नहीं बन पाती उसे घर परिवार में ही नहीं समाज में भी हीन भावना से देखा जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि महिला के प्राकृतिक रूप से संतान पैदा करने से जुड़े महत्व को खारिज करने की बजाय तकनीकी विकास का इस्तेमाल ऐसी प्रक्रियाओं को प्रचारित करने मेें किया जा रहा है जो महिला के लिए बच्चा जनने के तरीके को व्यापार में बदल रहा है। इससे भले ही उसका स्वास्थ्य दाव पर लग जाए। शर्म की बात यह है कि सरकारी एजंसिया भी इसमें ‘बिजनेस’ के पहलु को अधिक महत्व दे रही हैं। विधेयक में आईवीएफ बैंक, अण्डाणु-शुक्राणु बैंक और आईवीएफ की तकनीकों का जिक्र कर एआरटी को जादू की छड़ी के रूप में पेश किया जा रहा है और ऐसा करने में उन खतरों और आशंकाओं को भुला दिया जा रहा है जो महिला के स्वास्थ्य से जुड़े हैं। विधेयक में केवल किराए पर कोख लेने के संबंध में किए जाने वाले समझौते से जुड़े विशेष प्रवधानों का उल्लेख है लेकिन कोख किराए पर देने वाली महिला के अधिकारों और उसके स्वास्थ्य के हितों की कोई चर्चा नहीं। विधेयक में स्वास्थ्य को होने वाले खतरों को केवल ‘छोटे खतरों’ं के रूप में वर्णित किया गया है। विधेयक के मुताबिक एक महिला अपने बच्चों के अलावा पांच सफल जन्मों के लिए अपनी कोख किराए पर दे सकती है। लेकिन बार बार गर्भवती बनाने या आईवीएफ तकनीक के अधिक प्रयोग से महिला या बच्चे के जीवन से जुड़े गंभीर खतरों को इसमें महत्व नहीं दिया गया।
पिछले कुछ सालों के अंदर भारत में सरोगेसी एक बहुत बड़े व्यापार में तबदील हो चुका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में सरोगेसी का व्यापार 445 मिलियन डालर का है। यहां एक दंपति को एकबार कोख किराए पर लेने का कुल खर्चा 8 से 10 लाख तक का है। जबकि अमेरिका में यही खर्चा 25 से 35 लाख है।
इनमें 70 प्रतिशत ग्राहक गैर प्रवासी भारतीय हैं। दरअसल जिन देशों में कृत्रिम प्रजनन से संबंधित कानून ढीले हैं या फिर जिन देशों में इन तकनीकों से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं अधिक विकसित हैं उन देशों में ‘प्रजनन टूरिज्म’ अधिक पनप रहा है। भारत में विदेशियों द्वारा कोख किराए पर लेने के प्रति कोई दिशा निर्देश नहीं इस कारण पिछले कुछ समय से भारत में कम लागत और कम कड़े कानूनों के चलते सरोगेसी का व्यापार और बाजार बढ़ा है।
भारत में गरीबी के चलते आर्थिक मजबूरी के कारण गरीब और पिछड़ी महिलाएं किराए पर कोख देने के लिए तैयार रहती हैं। लेकिन बिचैलिए के रूप में काम करने वाली एजेंसियां इन जरूरतमंद महिलाओं को मात्र प्रजनन की वस्तु मानकर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का शोषण कर रही हैं। उम्मीद की जा रही थी कि सरोगेसी और एआरटी तकनीको को नियंत्रित करने वाले कानून से महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए तकनीकों के दुरूपयोग पर रोक लगाई जाएगी। लेकिन विधेयक के प्रारूप से स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को महिलाओं के स्वास्थ्य की कितनी चिंता है। फिलहाल सरकार की पूरी मंशा देश में ‘प्रजनन स्वास्थ्य टूरिज्म’ को बढ़ाने में दिखाई दे रही है।
(यह लेख 22 जुलाई 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है। )
अन्नू आनंद
हाल ही में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने देश में सरोगेसी यानी किराए पर कोख से जुड़े विधेयक का मसौदा स्वास्थय मंत्रालय को भेजा है। मंत्रालय और परिषद में कईं सालों से चल रही कवायद के बाद जो प्रारूप तैयार किया है वह निराशाजनक है। अस्सिटिड रिर्पोडेक्टिव टेकनाॅलाजी (एआरटी) को नियं़ित्रत करने का जो मसौदा बना है उसमें महिला के हितों को कम बाजार को अधिक ध्यान में रखा गया है। प्रारूप के अधिकतर प्रावधानों से स्पष्ट है कि सरकार एआरटी के जरिए कीमती और खतरनाक प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करने के पक्ष में है।
विधेयक में सरोगेसी के नाम पर किराए पर कोख देने वाली महिला को आर्थिक मुआवजा देने, सीमेंन बैंक, फर्टीलिटी क्लीनिक, दवा कंपनियां और एआरटी बैंकों को बिचैलिए बनाकर किराए पर कोख देने और लेने के प्रावधानों का उल्लेख है। ये बैंक बकायदा कानूनी तौर पर विज्ञापन के माध्यम से सरोगेट मांओं, शुक्राणुओं और अण्डाणुदात्ताओं का पता लगाने का काम करेंगे। बैंक इन दात्ताओं को इसकी फीस भी अदा करेगा। विधेयक के एक अन्य प्रावधान के मुताबिक सरोगेट मां किराए पर कोख लेने वाले दंपति से भी वित्तीय मुआवजा ले सकती है। विधेयक में जिस प्रकार से बैंकांे, क्लीनिकों, ग्राहकों और पैसे के लेन -देन की सिफारिशों का जिक्र किया गया है उससे साफ जाहिर है कि सरकार और दवा कंपनियां एक औरत की जनन अक्षमता को भुना कर देश में कृत्रिम तरीके से बच्चा जनने के एक बड़े उधोग को बढ़ावा देने के पक्ष में है।
यह सही है भारतीय समाज में महिला के मां के रूप को अधिक सम्मानित किया जाता है। विवाह के बाद ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ जैसे पारंपरिक आर्शीवचन आज भी उसकी परिपूर्णता मां बनने पर केंद्रित करते हैं। जो महिला शादी के कुछ सालों के बाद मां नहीं बन पाती उसे घर परिवार में ही नहीं समाज में भी हीन भावना से देखा जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि महिला के प्राकृतिक रूप से संतान पैदा करने से जुड़े महत्व को खारिज करने की बजाय तकनीकी विकास का इस्तेमाल ऐसी प्रक्रियाओं को प्रचारित करने मेें किया जा रहा है जो महिला के लिए बच्चा जनने के तरीके को व्यापार में बदल रहा है। इससे भले ही उसका स्वास्थ्य दाव पर लग जाए। शर्म की बात यह है कि सरकारी एजंसिया भी इसमें ‘बिजनेस’ के पहलु को अधिक महत्व दे रही हैं। विधेयक में आईवीएफ बैंक, अण्डाणु-शुक्राणु बैंक और आईवीएफ की तकनीकों का जिक्र कर एआरटी को जादू की छड़ी के रूप में पेश किया जा रहा है और ऐसा करने में उन खतरों और आशंकाओं को भुला दिया जा रहा है जो महिला के स्वास्थ्य से जुड़े हैं। विधेयक में केवल किराए पर कोख लेने के संबंध में किए जाने वाले समझौते से जुड़े विशेष प्रवधानों का उल्लेख है लेकिन कोख किराए पर देने वाली महिला के अधिकारों और उसके स्वास्थ्य के हितों की कोई चर्चा नहीं। विधेयक में स्वास्थ्य को होने वाले खतरों को केवल ‘छोटे खतरों’ं के रूप में वर्णित किया गया है। विधेयक के मुताबिक एक महिला अपने बच्चों के अलावा पांच सफल जन्मों के लिए अपनी कोख किराए पर दे सकती है। लेकिन बार बार गर्भवती बनाने या आईवीएफ तकनीक के अधिक प्रयोग से महिला या बच्चे के जीवन से जुड़े गंभीर खतरों को इसमें महत्व नहीं दिया गया।
पिछले कुछ सालों के अंदर भारत में सरोगेसी एक बहुत बड़े व्यापार में तबदील हो चुका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में सरोगेसी का व्यापार 445 मिलियन डालर का है। यहां एक दंपति को एकबार कोख किराए पर लेने का कुल खर्चा 8 से 10 लाख तक का है। जबकि अमेरिका में यही खर्चा 25 से 35 लाख है।
इनमें 70 प्रतिशत ग्राहक गैर प्रवासी भारतीय हैं। दरअसल जिन देशों में कृत्रिम प्रजनन से संबंधित कानून ढीले हैं या फिर जिन देशों में इन तकनीकों से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं अधिक विकसित हैं उन देशों में ‘प्रजनन टूरिज्म’ अधिक पनप रहा है। भारत में विदेशियों द्वारा कोख किराए पर लेने के प्रति कोई दिशा निर्देश नहीं इस कारण पिछले कुछ समय से भारत में कम लागत और कम कड़े कानूनों के चलते सरोगेसी का व्यापार और बाजार बढ़ा है।
भारत में गरीबी के चलते आर्थिक मजबूरी के कारण गरीब और पिछड़ी महिलाएं किराए पर कोख देने के लिए तैयार रहती हैं। लेकिन बिचैलिए के रूप में काम करने वाली एजेंसियां इन जरूरतमंद महिलाओं को मात्र प्रजनन की वस्तु मानकर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का शोषण कर रही हैं। उम्मीद की जा रही थी कि सरोगेसी और एआरटी तकनीको को नियंत्रित करने वाले कानून से महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए तकनीकों के दुरूपयोग पर रोक लगाई जाएगी। लेकिन विधेयक के प्रारूप से स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को महिलाओं के स्वास्थ्य की कितनी चिंता है। फिलहाल सरकार की पूरी मंशा देश में ‘प्रजनन स्वास्थ्य टूरिज्म’ को बढ़ाने में दिखाई दे रही है।
(यह लेख 22 जुलाई 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है। )
Thursday, 13 May 2010
निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल
अन्नू आनंद
निरूपमा किसी गांव, बस्ती की रहने वाली कम पढ़ी लिखी या अशिक्षित परिवार की बेटी नहीं थी। देश की राजधानी में दिल्ली में रहने वाली, आथर््िाक रूप से संपन्न और बुद्विजीवी कहलाए जाने वाल व्यवसाय पत्रकारिता से संबंधित थी। ऐसे में अगर उसके प्रेम विवाह की इच्छा उसकी मौत का कारण बनती है और जात से बाहर विवाह करने को अपमान मानने वाला पढ़ा लिखा परिवार अगर अपने सम्मान के लिए अपनी ही बेटी की जान ले लेता है तो निश्चिय ही यह प्रवृति काफी खतरनाक है। इस पर गंभीरता से बहस की जरूरत है।
निरूपमा की मौत से सब से अधिक स्तब्ध और सदमे का एक कारण यह भी है कि आनॅर किलिंग यानी ‘मान के लिए जान’ के इस घृणित और तालिबानी रिवायत को अभी तक केवल एक विशेष समुदाय, जाति और विशेष भौगोलिक क्षेत्रों से ही जोड़ कर देखा जाता था। जात बिरादरी से बाहर या गौत्र में शादी करनेे के कारण जिन युवा लड़के -लड़कियों की जाने गईं उसके लिए मुख्य दोषी वे दकियानूसी खाप पंचायतें थीं जिनके तुगलकी फरमानों से डरकर मां बाप या रिश्तेदारों ने मान के लिए अपने बच्चों को ही मार डाला। लेकिन निरूपमा की हत्या ने साबित कर दिया है कि जात को अपना मान सम्मान मानने की प्रवृति उच्च, सभ्य और शिक्षित परिवारों में भी हावी है। केवल जात से बाहर प्रेम करने या विवाह करने की इच्छा जाहिर करने पर उसकी हत्या कर देना घरेलु हिंसा का वह घृणित स्वरूप है जहां घर का व्यक्ति घर के सदस्य (खासकर महिलाओं ) के साथ बर्बर से बर्बर बर्ताव करने को भी अपना हक मानता है।
दरअसल जात और धर्म को लेकर जो मानसिकता हमारे समाज में घर कर चुकी है उसकी जड़े केवल पिछड़े और अनपढ़ वर्ग तक सीमित नहीं। यह हमारी सामाजिक बुनावट में रसी बसी है। जातिगत सूचक के रूप में उपनाम हमें खास पहचान देते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा या उच्च स्तर पर हो लेकिन जातिगत आधरित उसके उपनाम से ही उसकी काबिलियत और हैसियत को आंका जाता है। इन जातिगत सूचकों को त्यागकर अगर कोई महज अपने नाम से अपनी पहचान बनाना चाहता है तो उसे निम्न या पिछड़ी जाति का मान कर उस से भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है। निरूपमा की मौत समाज में जाति के महत्व पर कईं सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जात के आधार पर समाज को विभिन्न खंाचों में बांटना क्या उचित है? प्रतिभा, गुण, शिक्षा की बजाय जात के आधार पर उच्च निम्न स्तर का वर्गीकरण क्या एचित है?
इन्ही सवालों के बीच दूसरी ओर सम्मान के लिए जान लेने वाली खाप पंचायतों के विभिन्न नेताओं ने हरियाणा में एक बड़ी बैठक कर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गौत्र में विवाह करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग रखी है। इसके लिए उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों को मांग का समर्थन करने के लिए एक माह का समय दिया है। गौत्र में विवाह के कारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कईं युवाओं को पिछले दिनों अपनी जानें गवानी पड़ी। मीडिया और सामाजिक संगठनों की द्वारा इन पंचायतों के खिलाफ आवाज उठाने के बावजूद सरकार राजनैतिक हितों की खातिर इन पंचायतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न कर सकी। सरकार की लापरवाही के चलते अब खाप पंचायत की प्रवृति सभ्य पढ़े लिखे परिवारों ने भी अपनानी शुरू कर दी है। इन परिवारों में भी छोटे से मान के लिए हत्या करना एक सामान्य व्यवहार का रूप ले रहा है। इस प्रवृति को रोकने के लिए गंभीरता से सोचना होगा। बहस का मुद्दा तो यह है कि हमारा फर्ज क्या सदियों से चले आ रहे जाति के दकियानूसी बंधन को तोड़ने वाले युवाओं को प्रोत्साहित करना है या फिर जातीय खांचांे को बढ़ाने वाली प्रवृतियों को। आने वाली जनगणना में जात के वर्गीकरण का समर्थन करने वाले नेताओं को भी अपनी राय बनाने से पहले जातिगत समाज से होने वाले खतरों के प्रति गंभीरता से विचार करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार
निरूपमा किसी गांव, बस्ती की रहने वाली कम पढ़ी लिखी या अशिक्षित परिवार की बेटी नहीं थी। देश की राजधानी में दिल्ली में रहने वाली, आथर््िाक रूप से संपन्न और बुद्विजीवी कहलाए जाने वाल व्यवसाय पत्रकारिता से संबंधित थी। ऐसे में अगर उसके प्रेम विवाह की इच्छा उसकी मौत का कारण बनती है और जात से बाहर विवाह करने को अपमान मानने वाला पढ़ा लिखा परिवार अगर अपने सम्मान के लिए अपनी ही बेटी की जान ले लेता है तो निश्चिय ही यह प्रवृति काफी खतरनाक है। इस पर गंभीरता से बहस की जरूरत है।
निरूपमा की मौत से सब से अधिक स्तब्ध और सदमे का एक कारण यह भी है कि आनॅर किलिंग यानी ‘मान के लिए जान’ के इस घृणित और तालिबानी रिवायत को अभी तक केवल एक विशेष समुदाय, जाति और विशेष भौगोलिक क्षेत्रों से ही जोड़ कर देखा जाता था। जात बिरादरी से बाहर या गौत्र में शादी करनेे के कारण जिन युवा लड़के -लड़कियों की जाने गईं उसके लिए मुख्य दोषी वे दकियानूसी खाप पंचायतें थीं जिनके तुगलकी फरमानों से डरकर मां बाप या रिश्तेदारों ने मान के लिए अपने बच्चों को ही मार डाला। लेकिन निरूपमा की हत्या ने साबित कर दिया है कि जात को अपना मान सम्मान मानने की प्रवृति उच्च, सभ्य और शिक्षित परिवारों में भी हावी है। केवल जात से बाहर प्रेम करने या विवाह करने की इच्छा जाहिर करने पर उसकी हत्या कर देना घरेलु हिंसा का वह घृणित स्वरूप है जहां घर का व्यक्ति घर के सदस्य (खासकर महिलाओं ) के साथ बर्बर से बर्बर बर्ताव करने को भी अपना हक मानता है।
दरअसल जात और धर्म को लेकर जो मानसिकता हमारे समाज में घर कर चुकी है उसकी जड़े केवल पिछड़े और अनपढ़ वर्ग तक सीमित नहीं। यह हमारी सामाजिक बुनावट में रसी बसी है। जातिगत सूचक के रूप में उपनाम हमें खास पहचान देते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा या उच्च स्तर पर हो लेकिन जातिगत आधरित उसके उपनाम से ही उसकी काबिलियत और हैसियत को आंका जाता है। इन जातिगत सूचकों को त्यागकर अगर कोई महज अपने नाम से अपनी पहचान बनाना चाहता है तो उसे निम्न या पिछड़ी जाति का मान कर उस से भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है। निरूपमा की मौत समाज में जाति के महत्व पर कईं सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जात के आधार पर समाज को विभिन्न खंाचों में बांटना क्या उचित है? प्रतिभा, गुण, शिक्षा की बजाय जात के आधार पर उच्च निम्न स्तर का वर्गीकरण क्या एचित है?
इन्ही सवालों के बीच दूसरी ओर सम्मान के लिए जान लेने वाली खाप पंचायतों के विभिन्न नेताओं ने हरियाणा में एक बड़ी बैठक कर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गौत्र में विवाह करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग रखी है। इसके लिए उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों को मांग का समर्थन करने के लिए एक माह का समय दिया है। गौत्र में विवाह के कारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कईं युवाओं को पिछले दिनों अपनी जानें गवानी पड़ी। मीडिया और सामाजिक संगठनों की द्वारा इन पंचायतों के खिलाफ आवाज उठाने के बावजूद सरकार राजनैतिक हितों की खातिर इन पंचायतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न कर सकी। सरकार की लापरवाही के चलते अब खाप पंचायत की प्रवृति सभ्य पढ़े लिखे परिवारों ने भी अपनानी शुरू कर दी है। इन परिवारों में भी छोटे से मान के लिए हत्या करना एक सामान्य व्यवहार का रूप ले रहा है। इस प्रवृति को रोकने के लिए गंभीरता से सोचना होगा। बहस का मुद्दा तो यह है कि हमारा फर्ज क्या सदियों से चले आ रहे जाति के दकियानूसी बंधन को तोड़ने वाले युवाओं को प्रोत्साहित करना है या फिर जातीय खांचांे को बढ़ाने वाली प्रवृतियों को। आने वाली जनगणना में जात के वर्गीकरण का समर्थन करने वाले नेताओं को भी अपनी राय बनाने से पहले जातिगत समाज से होने वाले खतरों के प्रति गंभीरता से विचार करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार
Friday, 2 April 2010
ऐसी तालिबानी सोच का क्या करें
अन्नू आनंद
मुलायम सिंह कहते हैं कि अभिजात्य वर्ग की महिलाओं के संसंद में आने से छेड़खानी की घटनाएं बढ़ेंगी। उन का कहना है कि बड़े घर की महिलाओं के संसंद में आने से लोग सीटियां बजाएंगे। महंत नृत्यगोपाल दास का कहना हैं कि महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय नहीं जाना चाहिए। इन जगहों पर उन्हें पुरूषों को साथ लेकर ही जाना चाहिए। धर्मगुरू रामविलास वेदांती तो महिलाओं के अकेले मंदिर में जाने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है। शिया कल्बे ज़व्वाद का कहना है कि महिलाओं को घर संभालना चाहिए, बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हेें राजनीति से दूर रहना चाहिए। उन्हें अच्छे नेता पैदा करने चाहिए न कि स्वयं नेता बनना चाहिए।
एक बार फिर से मुखर होती इस मर्दवादी सोच से साफ जाहिर है कि महिलाओं की बढ़ती सबलता से राजनेता और धर्मभीरू अपनी सत्ता में सुराख होते देख पूरी तरह बौखला गए हैं। एक ओर वे महिलाओं की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए राजनीति में उनके प्रवेश का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अपने पापों को छिपाने के लिए धर्म का सहारा लेकर महिलाओं को ऐसे खांचों में कैद करने की चाल चल रहे हैं जिससे उनकी पुरूषों पर निर्भरता बनी रहे। मुलायम सिंह समर्थक महिलाओं कीे राजनैतिक ताकत से डरे हुए हैंे इसलिए वे हर जायज और नाजायज हथकंडा अपनाकर महिलाओं को संसद से बाहर रखना चाहते हैं। धर्मगुरू राजनीति के साथ महिलाओं की वैयक्तिक आजादी पर भी प्रतिबंध की बात कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने साथी साधू संतों के चरित्र पर भरोसा नहीं।
मुलायम सिंह जिन्हें संसद में महिलाओं की तादाद बढ़ाने से सीटियों का डर सता रहा है वे ऐसी ओछी हरकतों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की बजाय महिलाओं को संसद से बाहर रहने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन वह यह भूल रहें हैं कि संसद के दोनो सदनों में अभी भी जितनी महिलाएं मौजूद हैं वे सिरफिरों की सीटियों का जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे ओछों से निपटने के गुर वे जानती हैं और इसके लिए उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं। लिहाजा जरूरत उन ओछे कठमुल्लापंथियों से लड़ने की है जो महिलाओं के राजनीति में आने से इस प्रकार भयभीत हैं कि कभी जाति कभी धर्म और अब उनकी अस्मिता और सुरक्षा का खोखला आधार बनाकर उन्हें घर की चारदीवारी में कैद करने की साजिश रच रहे हैं।
बाबा भीमानंद और स्वामी परमहंस नित्यानंद के सेक्स सकंेडलों में लिप्त होने के खुलासे के बाद नृत्यगोपाल दास और वेदांती जैसे धर्मगुरूओं को महिलाओं का मंदिरों में जाना नागवार लग रहा है। हास्यस्पद तो यह है कि ढोंगी साधू महात्माओं को सजा देने, उन्हें संयम सिखाने और महिलाओं का सम्मान करने का पाठ पढ़ाने की बजाय ये धर्मभीरू महिलाओं पर ही शिकंजा कसने लगे। कोई भी साधू का चोला पहन कर ही सच्चे अर्थों में साधू नहीं हो जाता। ऐसे फर्जी साधू तो हर जगह हैं लेकिन इसके लिए महिलाएं घरों में कैद तो नहीं हो सकतीं। उचित तो यह होता कि सभी धर्माचार्य ढोंगी बाबाओं की हवस पर लगाम लगाने और उन्हें उनके अपराध की कड़ी सजा देने की हिमायत करते। लेकिन इसका समाधान भी कट्टरपंथियों की इस जमात को महिलाओं के मंंिदर में अकेले प्रवेश पर रोक लगाने में दिख रहा है। यह तो वही बात हुई हाथ पर लगी चोट का इलाज करने के लिए हाथ काटने की सलाह देना। तरस आता है ऐसी सोच पर और इसको खमोशी से सुनने वाले समाज पर जो आज भी हर क्षेत्र में अपनी कौशलता से र्कीति के नए आयाम बनाने वाली मानवियों की सुरक्षा के नाम पर अपना भय, कमजोरी ओर कामुकता को छिपाने का गंदा खेल खेल रहे हैं। ऐसी मर्दवादी सोच का इतिहास काफी लंबा है।
तलिबानो ने महिलाओं पर पाबंदी लगाने के लिए हमेशा ही धर्म का सहारा लिया है। ऐसा ही एक फरमान के द्वारा वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में तालिबानों ने महिलाओं की सभी बसों पर पर्दे लगाने और इन बसों में टिकट काटने के लिए 15 साल से कम उमर के लड़कों को रखने का हुक्म सुनाया। आदेश के पीछे इस्लाम धर्म का हवाला दिया गया। महिलाओं को बसों में पर्दों के पीछे रहनेे के इस हुक्म का कारण भी महिलाओं की इज्जत की रक्षा बताया गया था। ऐसी ही तालिबानी सोच अब भारत में भी लगातार सिर उठा रही है। महिलाओं को सुरक्षित रखने की यही दलील अब वेदातीं जैसे महंत और जव्वाद जैसे मौलना दे रहे है। यानी महिलाएं पुरूषों की हवस और दरिदंगी का शिकार न हो उनके रूप और सौन्दर्य को देख कर उनका मन न डोल जाए इसका इंतजाम भी महिलाएं करें।
यह प्रवृति सदा से महिलाओं को पीछे धकेलने की साजिश रचती रही है। इन धार्मिक कठमुल्लाओं का मकसद एक ही है कि अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए महिलाओं को ज्ञान और शिक्षा से दूर रखना। जहां उनके आत्मनिर्भर या सबल होने की बात होती है तो कभी इस्लाम, कभी हिंदू धर्म और कभी भारतीय संस्कृत के नाम पर महिलाओं के विचारात्मक शोषण करने की साजिश शुरू हो जाती है।
वर्ष 1990 में कोलकाता से प्रकाशित होने वाली एक बंगला पत्रिका को बांगलादेश में प्रवेश की अनुमति इसलिए नहीं मिली क्योंकि यह पत्रिका नारी शरीर की संपूर्ण जानकारी देने के साथ स्त्री शरीर के विकास की विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी देती थी। लेकिन बांग्लादेश के तत्कालीन कत्र्ताधत्र्ताओं को यह अंक नागवार लगा इसलिए इस पर पाबंदी लगा दी गई। दरअसल नारी शरीर और उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी आम महिलाओं को मिलना पुरूषों के हित में नहीं था। महिला अगर यह समझ हासिल कर ले कि बच्चे के लिंग की जिम्मेदारी उस की नहीं पुरूष की है,े यौन संबंधों मे जितना सुख का अधिकारी पुरूष है उतनी महिला भी तो पुरूषों को महिला पर मनमानी चलाने और ‘लड़की जनने’ के उलाहने देने की तानाशाही चलाने में कष्ट होता।
जो तर्क इस पत्रिका के पर रोक लगाने के लिए है वही भारत में फायर जैसी फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए उत्पात मचाने वालों के थे। ऐसी ही तालिबानी सोच रखने वाले ‘मनसे’ के लोग कितनी बार भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर कभी फिल्मों के पोस्टर जलाते हैं, कभी पब जाने से रोकते हैं कभी वेलंनटाइन डे को मुद्दा बनाते हैं। महिलाओं के पहनावे से लेकर उनके उपनाम तक उनके निशाने पर है। भारत में धर्म और राजनीति में ऐसी तालिबानी सोच बेहद उफान पर है। लिहाजा अभी सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं को इन धर्मभीरूओं, कठमुल्लापंथियों की चालों को नाकाम करने की है।
मुलायम सिंह कहते हैं कि अभिजात्य वर्ग की महिलाओं के संसंद में आने से छेड़खानी की घटनाएं बढ़ेंगी। उन का कहना है कि बड़े घर की महिलाओं के संसंद में आने से लोग सीटियां बजाएंगे। महंत नृत्यगोपाल दास का कहना हैं कि महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय नहीं जाना चाहिए। इन जगहों पर उन्हें पुरूषों को साथ लेकर ही जाना चाहिए। धर्मगुरू रामविलास वेदांती तो महिलाओं के अकेले मंदिर में जाने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है। शिया कल्बे ज़व्वाद का कहना है कि महिलाओं को घर संभालना चाहिए, बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हेें राजनीति से दूर रहना चाहिए। उन्हें अच्छे नेता पैदा करने चाहिए न कि स्वयं नेता बनना चाहिए।
एक बार फिर से मुखर होती इस मर्दवादी सोच से साफ जाहिर है कि महिलाओं की बढ़ती सबलता से राजनेता और धर्मभीरू अपनी सत्ता में सुराख होते देख पूरी तरह बौखला गए हैं। एक ओर वे महिलाओं की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए राजनीति में उनके प्रवेश का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अपने पापों को छिपाने के लिए धर्म का सहारा लेकर महिलाओं को ऐसे खांचों में कैद करने की चाल चल रहे हैं जिससे उनकी पुरूषों पर निर्भरता बनी रहे। मुलायम सिंह समर्थक महिलाओं कीे राजनैतिक ताकत से डरे हुए हैंे इसलिए वे हर जायज और नाजायज हथकंडा अपनाकर महिलाओं को संसद से बाहर रखना चाहते हैं। धर्मगुरू राजनीति के साथ महिलाओं की वैयक्तिक आजादी पर भी प्रतिबंध की बात कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने साथी साधू संतों के चरित्र पर भरोसा नहीं।
मुलायम सिंह जिन्हें संसद में महिलाओं की तादाद बढ़ाने से सीटियों का डर सता रहा है वे ऐसी ओछी हरकतों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की बजाय महिलाओं को संसद से बाहर रहने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन वह यह भूल रहें हैं कि संसद के दोनो सदनों में अभी भी जितनी महिलाएं मौजूद हैं वे सिरफिरों की सीटियों का जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे ओछों से निपटने के गुर वे जानती हैं और इसके लिए उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं। लिहाजा जरूरत उन ओछे कठमुल्लापंथियों से लड़ने की है जो महिलाओं के राजनीति में आने से इस प्रकार भयभीत हैं कि कभी जाति कभी धर्म और अब उनकी अस्मिता और सुरक्षा का खोखला आधार बनाकर उन्हें घर की चारदीवारी में कैद करने की साजिश रच रहे हैं।
बाबा भीमानंद और स्वामी परमहंस नित्यानंद के सेक्स सकंेडलों में लिप्त होने के खुलासे के बाद नृत्यगोपाल दास और वेदांती जैसे धर्मगुरूओं को महिलाओं का मंदिरों में जाना नागवार लग रहा है। हास्यस्पद तो यह है कि ढोंगी साधू महात्माओं को सजा देने, उन्हें संयम सिखाने और महिलाओं का सम्मान करने का पाठ पढ़ाने की बजाय ये धर्मभीरू महिलाओं पर ही शिकंजा कसने लगे। कोई भी साधू का चोला पहन कर ही सच्चे अर्थों में साधू नहीं हो जाता। ऐसे फर्जी साधू तो हर जगह हैं लेकिन इसके लिए महिलाएं घरों में कैद तो नहीं हो सकतीं। उचित तो यह होता कि सभी धर्माचार्य ढोंगी बाबाओं की हवस पर लगाम लगाने और उन्हें उनके अपराध की कड़ी सजा देने की हिमायत करते। लेकिन इसका समाधान भी कट्टरपंथियों की इस जमात को महिलाओं के मंंिदर में अकेले प्रवेश पर रोक लगाने में दिख रहा है। यह तो वही बात हुई हाथ पर लगी चोट का इलाज करने के लिए हाथ काटने की सलाह देना। तरस आता है ऐसी सोच पर और इसको खमोशी से सुनने वाले समाज पर जो आज भी हर क्षेत्र में अपनी कौशलता से र्कीति के नए आयाम बनाने वाली मानवियों की सुरक्षा के नाम पर अपना भय, कमजोरी ओर कामुकता को छिपाने का गंदा खेल खेल रहे हैं। ऐसी मर्दवादी सोच का इतिहास काफी लंबा है।
तलिबानो ने महिलाओं पर पाबंदी लगाने के लिए हमेशा ही धर्म का सहारा लिया है। ऐसा ही एक फरमान के द्वारा वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में तालिबानों ने महिलाओं की सभी बसों पर पर्दे लगाने और इन बसों में टिकट काटने के लिए 15 साल से कम उमर के लड़कों को रखने का हुक्म सुनाया। आदेश के पीछे इस्लाम धर्म का हवाला दिया गया। महिलाओं को बसों में पर्दों के पीछे रहनेे के इस हुक्म का कारण भी महिलाओं की इज्जत की रक्षा बताया गया था। ऐसी ही तालिबानी सोच अब भारत में भी लगातार सिर उठा रही है। महिलाओं को सुरक्षित रखने की यही दलील अब वेदातीं जैसे महंत और जव्वाद जैसे मौलना दे रहे है। यानी महिलाएं पुरूषों की हवस और दरिदंगी का शिकार न हो उनके रूप और सौन्दर्य को देख कर उनका मन न डोल जाए इसका इंतजाम भी महिलाएं करें।
यह प्रवृति सदा से महिलाओं को पीछे धकेलने की साजिश रचती रही है। इन धार्मिक कठमुल्लाओं का मकसद एक ही है कि अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए महिलाओं को ज्ञान और शिक्षा से दूर रखना। जहां उनके आत्मनिर्भर या सबल होने की बात होती है तो कभी इस्लाम, कभी हिंदू धर्म और कभी भारतीय संस्कृत के नाम पर महिलाओं के विचारात्मक शोषण करने की साजिश शुरू हो जाती है।
वर्ष 1990 में कोलकाता से प्रकाशित होने वाली एक बंगला पत्रिका को बांगलादेश में प्रवेश की अनुमति इसलिए नहीं मिली क्योंकि यह पत्रिका नारी शरीर की संपूर्ण जानकारी देने के साथ स्त्री शरीर के विकास की विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी देती थी। लेकिन बांग्लादेश के तत्कालीन कत्र्ताधत्र्ताओं को यह अंक नागवार लगा इसलिए इस पर पाबंदी लगा दी गई। दरअसल नारी शरीर और उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी आम महिलाओं को मिलना पुरूषों के हित में नहीं था। महिला अगर यह समझ हासिल कर ले कि बच्चे के लिंग की जिम्मेदारी उस की नहीं पुरूष की है,े यौन संबंधों मे जितना सुख का अधिकारी पुरूष है उतनी महिला भी तो पुरूषों को महिला पर मनमानी चलाने और ‘लड़की जनने’ के उलाहने देने की तानाशाही चलाने में कष्ट होता।
जो तर्क इस पत्रिका के पर रोक लगाने के लिए है वही भारत में फायर जैसी फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए उत्पात मचाने वालों के थे। ऐसी ही तालिबानी सोच रखने वाले ‘मनसे’ के लोग कितनी बार भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर कभी फिल्मों के पोस्टर जलाते हैं, कभी पब जाने से रोकते हैं कभी वेलंनटाइन डे को मुद्दा बनाते हैं। महिलाओं के पहनावे से लेकर उनके उपनाम तक उनके निशाने पर है। भारत में धर्म और राजनीति में ऐसी तालिबानी सोच बेहद उफान पर है। लिहाजा अभी सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं को इन धर्मभीरूओं, कठमुल्लापंथियों की चालों को नाकाम करने की है।
Wednesday, 31 March 2010
धर्म का बाजारवादी चेहरा
अन्नू आनंद
पिछले कुछ समय से महाराज, बाबाओं और गुरूओं के काले कारनामों का भण्डाफोड़ हो रहा है। एक के बाद एक फर्जी गुरू की असलियत खुल कर सामने आ रही है। पिछले कुछ सालों से अपने को संत, महात्मा बता कर लोगों के साथ छल करने वाले बाबाओं की संख्या बढ़ी है। हकीकत तो यह है कि शिक्षा के विस्तार और सूचना क्रांति के विस्फोट के बावजूद इन बाबाओं की दुकाने बढ़ती जा रही हैंै। अगर जरा ध्यान दें ंतो पता चलेगा कि छल और धोखे का यह फलता फूलता धंधा केवल बाबाओं तक ही सीमित नहीं। कस्बों और महानगरों की गलियां पिछले एक दशक में ऐसे ज्योतिषियों और पंडितों की बडीे बडी दुकानों से भरी पड़ी हैं जिस पर लगे लंबे चौड़े बोर्ड राशि-दोष दूर करने से लेकर किसी भी प्रकार की मुसीबत का तोड़ निकालने का दावा करते हैं। जो काम पहले केवल कुछ धर्माचार्याओं और विशेष पंडित बिना किसी होर्डिंग और विज्ञापन के छोटे स्तर पर करते थे। अब वह उस बाजार का बड़ा हिस्सा है जहां खरीदने की बढ़ती क्षमता के चलते हर चीज बिकाउ है।
दरअसल मुक्त बाजार व्यवस्था ने जहां आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया। लोगों की क्रय शक्ति में इज़ाफा किया। आर्थिक दर के ग्राफ को ऊपर उठाया। शिक्षा और ज्ञान का विस्तार किया। उसी मुक्त आर्थिक व्यव्स्था ने लोगों की धार्मिक प्रवृतियों को बढ़ाने का काम भी किया। 1991 से लागू हुए मुक्त व्यापार ने लोगों को सुख संपन्न बनाने के साथ उस संपन्नता को कायम रखने के प्रति उनमें भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने का काम किया। असुरक्षा की इसी भावना ने भगवानों, बाबाओं और पीर बाबाओं में लोगों की आस्था भी बढ़ा दी। परिणामस्वरूप नए भगवानों, नए बाबाओं, नए मंदिरों और तीर्थ स्थलों की गिनती भी बढ़ने लगी है। आर्थिक सुधारों के चलते मध्य वर्ग की बढ़ती आय ने धार्मिक सेवाओं की मांग और पूर्ति को बढ़ाने का काम किया है।
वर्ष 2007 की स्टेट आफॅ नेशन की सर्वे के मुताबिक पिछले पांच सालों में भारतीयों में धार्मिक प्रवृति बढ़ी है। इस सर्वे में 30 फीसदी लोगों ने माना कि वे पहले के मुकाबले पिछले कुछ सालों में अधिक धार्मिक हुए हैं। सर्वे के मुताबिक आधुनिकता और शहरी जीवन की ओर खुलाव के कारण भारतीय पहले से अधिक धार्मिक हुए हैं। हैरत की बात यह है कि शहर के शिक्षित ग्रामीण अशिक्षितों की तुलना में अधिक धार्मिक हुुआ है। मीरा नंदा की पुस्तक द गाॅड मार्किट के मुताबिक आर्थिक समृद्दि ने मिडल वर्ग की हिंदु धार्मिकता को तीन प्रकार से प्रभावित किया है। पहली नए गुरूओं का अवतार, गुरूओं की संस्कृति को बढ़ावा और गुरूओं का भद्रकरण। नंदा के मुताबिक यह स्पष्ट है कि पाॅपुलर हिंदुत्व अत्यंत परिवर्तनशील है क्योंकि यह भारत की तेजी से बदलती अर्थव्यव्स्था और समाज का अनुकरण कर रहा है। मंदिरों का पुनरूद्धार हो रहा है। इन मंदिरों में श्रद्धालु अपने पुराने देवी देवताओं और अनुष्ठानों को नया रूप दे रहे हैं। कुछ नए भगवान और नए अनुष्ठान भी खोजे जा रहे़े हैं। कर्नाटक में मरीअम्मां जिसे छोटी चेचक निर्वारण देवी माना जाता था अब वह एड्स अम्मा या एड्स को ठीक करने वाली माता के रूप में प्रचलित है। कुछ स्थानीय देवी देवता जो बीमारियों को ठीक करने के लिए पूजे जाते थे अब सफलता और स्पर्धा भरे शहरी जीवन में समझदारी व सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए पूजे जा रहे हैं। खर्च की बढ़ती क्षमता और आस्था में वृद्धि ने पूजा स्थलों की गिनती को कई गुणा बढ़ाने का काम किया। पवन वर्मा की पुस्तक बीनंग इडियन (2004) के मुताबिक वर्ष 2000 तक देश में 2.5 मिलियन पूजा के स्थल थे लेकिन स्कूल 1.5 मिलियन और अस्पतालों की संख्या 75 हजार थी।
इसी प्रकार एनसीएईआर की सर्वे से पता चलता है कि भारत के कुल पैकेज टूर में 50 फीसदी धार्मिक यात्राओं का बिजनेस है।
बाजार ने लोगों की आस्था को भुनाने के लिए केवल भगवानों या धर्म को ही साधन नहीं बनाया बल्कि त्यौहार, पूजा और दूसरे सभी अनुष्ठान भी बाजारी चमक के कारण अपनी मूलता खोते जा रहे हैं। जो त्यौहार या अनुष्ठान कभी घर के आंगन तक सीमित होते थे बाजार ने उन्हें बड़े उत्सवों में बदल दिया है। तीज, छठ, करवा चौथ दीवाली हर त्यौहार का राष्ट्रीयकरण हो चुका है और इन में क्षेत्रीयता की महक कम और बाजार के समान रंग अधिक नजर आते हैं। अधिक खरीदने और बेचने की चाह, विज्ञापनों की होड़ ने बाजारों को तो सजा दिया लेकिन किसी भी अनुष्ठान या त्यौहार की पवित्रता और सही मायनों को धुंधला बना दिया। अक्षय तृतीया कभी विवाह के लिए शुभ माना जाता था अब सोना खरीदने के लिए अधिक जाना जाता है। द वल्र्ड गोल्ड काउंसिल ने इस दिन को सोने के सिक्के और गहने खरीदने के लिए विशेष शुभ दिन घोषित कर दिया है। एक आंकड़े के मुताबिक 2006-2007 में इस दिन 38 टन की खरीददारी हुई जबकि रोज 2 टन की बिक्री होती है।
धर्म और आस्था भारतीय समाज में बेहद संवेदनशील मसले हैं। लोगों की भावनाओं को भुनाने का सबसे सरल साधन भी। पोंगा पडितों और फर्जी बाबाओं के लिए बाजार ने इन भावनाओं को कैश करना और सरल बना दिया है। यही कारण है कि ऐसे ढोंगी बाबाओं की जमात फलने फूलने लगी है जो लोगों को अध्यात्मिक बनाने के नाम पर अंधविश्वासों, आडंबरांे और कर्मकाण्डों को बढ़ावा देकर अपनी दुकान चमका रहे हंै। दुख की बात यह है कि वैज्ञानिक मानसिकता को प्रोत्साहित करने वाले सरकारी और गैरसरकारी संस्थान भी खमोशी से इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं। जरूरत है तार्किक सोच को बढ़ावा देने की। इसके लिए सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं के साथ मीडिया को आगे आना होगा।
(यह लेख 31 मार्च 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)
पिछले कुछ समय से महाराज, बाबाओं और गुरूओं के काले कारनामों का भण्डाफोड़ हो रहा है। एक के बाद एक फर्जी गुरू की असलियत खुल कर सामने आ रही है। पिछले कुछ सालों से अपने को संत, महात्मा बता कर लोगों के साथ छल करने वाले बाबाओं की संख्या बढ़ी है। हकीकत तो यह है कि शिक्षा के विस्तार और सूचना क्रांति के विस्फोट के बावजूद इन बाबाओं की दुकाने बढ़ती जा रही हैंै। अगर जरा ध्यान दें ंतो पता चलेगा कि छल और धोखे का यह फलता फूलता धंधा केवल बाबाओं तक ही सीमित नहीं। कस्बों और महानगरों की गलियां पिछले एक दशक में ऐसे ज्योतिषियों और पंडितों की बडीे बडी दुकानों से भरी पड़ी हैं जिस पर लगे लंबे चौड़े बोर्ड राशि-दोष दूर करने से लेकर किसी भी प्रकार की मुसीबत का तोड़ निकालने का दावा करते हैं। जो काम पहले केवल कुछ धर्माचार्याओं और विशेष पंडित बिना किसी होर्डिंग और विज्ञापन के छोटे स्तर पर करते थे। अब वह उस बाजार का बड़ा हिस्सा है जहां खरीदने की बढ़ती क्षमता के चलते हर चीज बिकाउ है।
दरअसल मुक्त बाजार व्यवस्था ने जहां आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया। लोगों की क्रय शक्ति में इज़ाफा किया। आर्थिक दर के ग्राफ को ऊपर उठाया। शिक्षा और ज्ञान का विस्तार किया। उसी मुक्त आर्थिक व्यव्स्था ने लोगों की धार्मिक प्रवृतियों को बढ़ाने का काम भी किया। 1991 से लागू हुए मुक्त व्यापार ने लोगों को सुख संपन्न बनाने के साथ उस संपन्नता को कायम रखने के प्रति उनमें भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने का काम किया। असुरक्षा की इसी भावना ने भगवानों, बाबाओं और पीर बाबाओं में लोगों की आस्था भी बढ़ा दी। परिणामस्वरूप नए भगवानों, नए बाबाओं, नए मंदिरों और तीर्थ स्थलों की गिनती भी बढ़ने लगी है। आर्थिक सुधारों के चलते मध्य वर्ग की बढ़ती आय ने धार्मिक सेवाओं की मांग और पूर्ति को बढ़ाने का काम किया है।
वर्ष 2007 की स्टेट आफॅ नेशन की सर्वे के मुताबिक पिछले पांच सालों में भारतीयों में धार्मिक प्रवृति बढ़ी है। इस सर्वे में 30 फीसदी लोगों ने माना कि वे पहले के मुकाबले पिछले कुछ सालों में अधिक धार्मिक हुए हैं। सर्वे के मुताबिक आधुनिकता और शहरी जीवन की ओर खुलाव के कारण भारतीय पहले से अधिक धार्मिक हुए हैं। हैरत की बात यह है कि शहर के शिक्षित ग्रामीण अशिक्षितों की तुलना में अधिक धार्मिक हुुआ है। मीरा नंदा की पुस्तक द गाॅड मार्किट के मुताबिक आर्थिक समृद्दि ने मिडल वर्ग की हिंदु धार्मिकता को तीन प्रकार से प्रभावित किया है। पहली नए गुरूओं का अवतार, गुरूओं की संस्कृति को बढ़ावा और गुरूओं का भद्रकरण। नंदा के मुताबिक यह स्पष्ट है कि पाॅपुलर हिंदुत्व अत्यंत परिवर्तनशील है क्योंकि यह भारत की तेजी से बदलती अर्थव्यव्स्था और समाज का अनुकरण कर रहा है। मंदिरों का पुनरूद्धार हो रहा है। इन मंदिरों में श्रद्धालु अपने पुराने देवी देवताओं और अनुष्ठानों को नया रूप दे रहे हैं। कुछ नए भगवान और नए अनुष्ठान भी खोजे जा रहे़े हैं। कर्नाटक में मरीअम्मां जिसे छोटी चेचक निर्वारण देवी माना जाता था अब वह एड्स अम्मा या एड्स को ठीक करने वाली माता के रूप में प्रचलित है। कुछ स्थानीय देवी देवता जो बीमारियों को ठीक करने के लिए पूजे जाते थे अब सफलता और स्पर्धा भरे शहरी जीवन में समझदारी व सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए पूजे जा रहे हैं। खर्च की बढ़ती क्षमता और आस्था में वृद्धि ने पूजा स्थलों की गिनती को कई गुणा बढ़ाने का काम किया। पवन वर्मा की पुस्तक बीनंग इडियन (2004) के मुताबिक वर्ष 2000 तक देश में 2.5 मिलियन पूजा के स्थल थे लेकिन स्कूल 1.5 मिलियन और अस्पतालों की संख्या 75 हजार थी।
इसी प्रकार एनसीएईआर की सर्वे से पता चलता है कि भारत के कुल पैकेज टूर में 50 फीसदी धार्मिक यात्राओं का बिजनेस है।
बाजार ने लोगों की आस्था को भुनाने के लिए केवल भगवानों या धर्म को ही साधन नहीं बनाया बल्कि त्यौहार, पूजा और दूसरे सभी अनुष्ठान भी बाजारी चमक के कारण अपनी मूलता खोते जा रहे हैं। जो त्यौहार या अनुष्ठान कभी घर के आंगन तक सीमित होते थे बाजार ने उन्हें बड़े उत्सवों में बदल दिया है। तीज, छठ, करवा चौथ दीवाली हर त्यौहार का राष्ट्रीयकरण हो चुका है और इन में क्षेत्रीयता की महक कम और बाजार के समान रंग अधिक नजर आते हैं। अधिक खरीदने और बेचने की चाह, विज्ञापनों की होड़ ने बाजारों को तो सजा दिया लेकिन किसी भी अनुष्ठान या त्यौहार की पवित्रता और सही मायनों को धुंधला बना दिया। अक्षय तृतीया कभी विवाह के लिए शुभ माना जाता था अब सोना खरीदने के लिए अधिक जाना जाता है। द वल्र्ड गोल्ड काउंसिल ने इस दिन को सोने के सिक्के और गहने खरीदने के लिए विशेष शुभ दिन घोषित कर दिया है। एक आंकड़े के मुताबिक 2006-2007 में इस दिन 38 टन की खरीददारी हुई जबकि रोज 2 टन की बिक्री होती है।
धर्म और आस्था भारतीय समाज में बेहद संवेदनशील मसले हैं। लोगों की भावनाओं को भुनाने का सबसे सरल साधन भी। पोंगा पडितों और फर्जी बाबाओं के लिए बाजार ने इन भावनाओं को कैश करना और सरल बना दिया है। यही कारण है कि ऐसे ढोंगी बाबाओं की जमात फलने फूलने लगी है जो लोगों को अध्यात्मिक बनाने के नाम पर अंधविश्वासों, आडंबरांे और कर्मकाण्डों को बढ़ावा देकर अपनी दुकान चमका रहे हंै। दुख की बात यह है कि वैज्ञानिक मानसिकता को प्रोत्साहित करने वाले सरकारी और गैरसरकारी संस्थान भी खमोशी से इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं। जरूरत है तार्किक सोच को बढ़ावा देने की। इसके लिए सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं के साथ मीडिया को आगे आना होगा।
(यह लेख 31 मार्च 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)
Subscribe to:
Posts (Atom)