Tuesday, 10 July 2012

सरकार की दोहरी नीति ने बच्चों से छुड़वाया स्कूल


अन्नू आनंद
(देवास, मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश में मैला ढोने वालों के पुनर्वास को लेकर कर्इ प्रकार की अनियमितताएं देखने को मिल रही हैं। सरकार की पुनर्वास नीति में इतने सुराख हैं कि यहां पर कर्इ जिलाें में इस काम को छोड़ने वाले कर्इ लोग फिर से इस काम को अपनाने लगे हंै। फरवरी 2002 में देवास जिले में चलने वाले 'गरिमा अभियान के तहत किरन सहित बस्ती की 26 महिलाओं ने यह काम करना छोड़ दिया। मध्य प्रदेश में इस अभियान के तहत मैला ढोने वालों को अपनी मान मर्यादा और सम्मान की खातिर इस काम को छोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है। किरन बताती है कि यह काम छोड़ने के बाद उन सभी महिलाओं के पास बच्चों का पेट पालने के लिए कोर्इ विकल्प नहीं था। उन्होंने खेतों में मजदूरी करना शुरू किया लेकिन यह मजदूरी का काम भी कभी-कभार मिलता। मजदूरी के काम से अनजान किरन अक्सर नौ बीघा सोयाबीन काटती जबकि उसे मजदूरी केवल सात बीघा की ही मिलती। किरन सहित काम छोड़ने वाली बस्ती की अन्य महिलाओं के बच्चों को स्कूल में मिलने वाली छात्रवृत्ति भी बंद कर दी गर्इ। अब बस्ती के अधिकतर बच्चे स्कूल से बाहर हंै।
केंद्र सरकार ने जब वर्ष 1993 में मैला ढोने के अमानवीय कार्य को बंद करने का सफार्इ कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सनिनर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया था तो साथ में काम छोड़ने वाले लोगों के लिए पुनर्वास की राष्ट्रीय योजना भी लागू की थीं। इनमें से एक योजना अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के बच्चों को शिक्षित बनाने के संबंध में थी। अप्रैल 1993 से लागू इस योजना के तहत अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के दो बच्चों को दस माह तक पहली से दसवीं कक्षा तक छात्रवृत्ति प्रदान करने का प्रावधान है। योजना के मुताबिक एक से पांचवीं तक 40 रुपए प्रति माह और छठी से आठवीं तक 60 रुपए प्रति माह तक की छात्रवृत्ति निर्धारित की गर्इ थी। इस आर्थिक प्रोत्साहन ने देश भर में मैला ढोने के काम में लगे बहुत से परिवारों के बच्चों को स्कूलों में पहुंचाने का काम किया।
लेकिन जब वर्ष 2000 से कानून के तहत सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों के चलते मैला ढोने वाले लोगों द्वारा काम को त्यागने की प्रवृति ने जोर पकड़ा तो इसका सबसे बुरा प्रभाव स्कूली बच्चों पर पड़ा। स्कूलों में उनको मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद होने लगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि बच्चों को छात्रवृत्ति की इस कल्याणकारी योजना और कानून में ही विरोधाभास है। कानून अस्वच्छ धंधे पर रोक लगाता है जबकि योजना अस्वच्छ धंधे में लगे बच्चों को ही स्कूली शिक्षा के लिए सहायता देती है।


मैला ढोने का काम बंद करने वाली बस्ती की शोभा ने अपनी दो लड़कियों का स्कूल छुड़वा दिया। वह बताती है कि एक तो काम नहीं ऊपर से बच्चों की फीस, वर्दी और दूसरे खर्चे हम कहां से लाएं। किरन ने बताया कि जब स्थानीय सरकारी अधिकारियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि छात्रवृत्ति तो अस्वच्छ धंधों में लगे लोगों के बच्चों के लिए है जब काम छोड़ दिया तो छात्रवृत्ति क्यों मिलेगी। किरन तर्क देती है कि एक तरफ तो सरकार यह प्रथा बंद करना चाहती है और इसके लिए कानून भी बनाया है दूसरी ओर उसी कानून का सहारा लेकर हमारे बच्चों के पढ़ने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं हम बच्चों की जरूरतें कैसे पूरी करें। ऐसे में हमारे पास बच्चों को स्कूल से हटाने के अलावा क्या विकल्प है। पिछले वर्ष किरन ने गरिमा अभियान के तहत आयोजित जनसुनवार्इ में भी सरकार से ऐसे धंधों को छोड़ने वालों के बच्चों को दोगुनी छात्रवृत्ति देने की मांग की थी।
किरन की बातों में दम है लेकिन स्थानीय सरकारी अधिकारी सिर्फ कागजों की भाषा समझते हंै। इस छात्रवृत्ति को पाने के लिए साल में 100 दिन काम करने का हलफनामा देना पड़ता है। जिस पर सरकारी अधिकारी को हस्ताक्षर करने होते हैं। कोर्इ भी सरकारी अधिकारी यह मानना नहीं चाहता कि उनके जिले में मैला ढोने का काम चल रहा है। इसलिए बच्चों को छात्रवृत्ति नहीं मिल पाती।     
2500 की आबादी वाले सिआ गांव में वर्षों से मैला ढोने के काम को त्यागने वाली 54 वर्षीया मन्नू बार्इ कहती है, ''जब मैं और मेरी बहुएं यह काम करते थे तो मेरे पोते-पोतियों  के साथ स्कूल में भेदभाव होता था। अब काम छोड़ दिया तो हम बच्चों को स्कूल भेजने के काबिल ही नहीं रहे। सरकारी सहायता भी तो बंद कर दी गर्इ। संतोष बताती है कि पहले मैं मैला सिर पर ढोकर ले जाती थी बदले में मुझे बासी रोटी फेंक कर दी जाती थी। बच्चे स्कूल जाते तो उन्हें नल से पानी नहीं पीने दिया जाता। उनको टाटपल्ली पर बैठने भी नहीं देते थे। बच्चे घर आकर शिकायत करते। दोपहर के भोजन में भी उन्हें अलग बिठाकर भोजन खाने को मिलता। लेकिन बाद में जब गांव में इस काम को छोड़ने का अभियान शुरू हुआ और कानून के बारे में जानकारी दी गर्इ तो हमने काम छोड़ दिया, लेकिन हमें काम छोड़कर क्या मिला। आज न हमारे पास काम है उस पर बच्चों को शिक्षा में मिलने वाली मदद भी बंद हो गर्इ। आज जब हमारे काम की वजह से स्कूल में उन्हें शर्मसार नहीं होना पड़ता और वे सभी बच्चों के समान व्यावहार पाने के काबिल हुए हैं तो प्रशासन ने बच्चों को मिलने वाली राशि बंद कर दी। यह कहां का न्याय है।
वास्तव में मैला ढोने जैसे श्राप से मुकित दिलाने के लिए चालू की गर्इ सरकारी पुनर्वास योजनाओं में इतनी कमियां हैं कि निर्धारित समय सीमा तक इस काम को बंद करने का लक्ष्य अभी बेहद दूर जान पड़ता है। केंद्र की यूपीए सरकार ने सामाजिक न्याय मंत्रालय को यह आदेश दिया है कि दिसंबर 2007 तक सभी राज्यों में यह काम पूरी तरह बंद हो जाना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए योजना आयोग ने 'मैला ढोने से मुकित राष्ट्रीय कार्ययोजना 2007 भी बनार्इ है। जिस का मकसद 2007 के अंत तक इस काम को पूरी तरह बंद किया जाना है। लेकिन जमीनी हकीकत अलग ही कहानी बयां करती है।
मध्य प्रदेश सरकार ने हार्इकोर्ट में हलफनामा दिया है कि मध्य प्रदेश में अब कोर्इ भी  मैला ढोने का काम नहीं कर रहा। जबकि यहां के नौ जिलों में पिछले वर्ष गरिमा अभियान द्वारा करार्इ गर्इ सर्वे से पता चलता है कि अभी भी यहां 618 लोग इस काम में लगे हैं। इस के अलावा 52 ऐसे लोगों का भी पता चला जिन्होंने काम छोड़ने के बाद उचित पुनर्वास के अभाव में फिर से इस काम को अपना लिया है। जो लोग ये काम छोड़ चुके हैं उन से  आज भी अन्य हीन काम जैसे गांव में मरे पशुओं को फेंकना, श्मशान से मृतक के कपड़े लेना, लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना, जजमानी करना और किसी की मृत्यु होने पर ढोल बजाना इत्यादि कामों को कर रहें हैं और इन जातिगत कामों के बंटवारे को रोकने के लिए सरकार के पास कोर्इ ठोस नीति नहीं है।
सरकार का पूरा जोर आर्थिक पुनर्वास पर है। अधिकतर योजनाएं भी पुरुषों को ध्यान में रखकर बनार्इ जा रही हैं। जबकि इस धंधे में 93 प्रतिशत महिलाएं लगी हुर्इ हैं। जिन रोजगारों के लिए कर्जा दिए जाने की व्यवस्था है वे अधिकतर पुरुषों द्वारा किए जाते हैं। देवास जिला में इस मुíे पर काम करने वाली संस्था 'जनसाहस के प्रमुख आसिफ के मुताबिक अधिकतर ऐसे कामों के लिए कर्जा दिया जा रहा है जो पुरुष करते हैं। जैसे आटो, दुकानदारी आदि। ऐसा नहीं है कि ये काम महिलाएं नहीं कर सकतीं लेकिन उन्हें प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त बनाने की जरूरत है और ये लंबी प्रक्रिया है। आसिफ के मुताबिक स्कूलों से मिलने वाली आर्थिक मदद के बंद होने की नीति इन लोगों को यह काम न छोड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। उन्होंने बताया कि भावरासागर में मैला ढोने के काम मे लगी शोभा की छह लड़कियां स्कूल जाती थीं, लेकिन जब उसने वर्ष 2003 में काम छोड़ा तो कुछ समय बाद उसकी सभी बेटियों को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि स्कूल से मिलने वाली आर्थिक सहायता यानी कि छात्रवृत्ति बंद हो गर्इ और शोभा के लिए बिना सहायता के उन्हें पढ़ाना संभव नहीं था। 
किरन, शोभा, संतोष जैसी बाल्मीकी बस्ती की अधिकतर महिलाओं को यह काम छोड़े पांच वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी वे कभी खेतों में दाने तो कभी अनाज की फसल आने का इंतजार करती हैं तो कभी नगर पंचायत से नाली या गटर साफ करने की पर्ची कटने का इंतजार। यह काम केवल 15 दिनों के लिए बारी-बारी से हर परिवार को दिया जाता है।
सरकार नौ प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का भले ही जश्न मनाती रहे लेकिन हकीकत तो यह है कि आज भी छह लाख के करीब लोग इस अमानवीय काम को करने का खामियाजा भुगत रहे हैं। अब देखना यह है कि सरकार दिसंबर 2007 तक इन लोगों को इस प्रथा से निजात दिलाने के साथ ही उनके स्कूलों मे पढ़ने वाले बच्चों के साथ भी न्याय कर पाती है या फिर कोर्इ नर्इ तारीख, नया साल इनकी उम्मीद की परीक्षा लेगा।
(यह लेख २००७ में जनसत्ता, ग्रासरूट में कवर स्टोरी सहित क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है.)    

Tuesday, 28 February 2012

मॉडर्निटी क्या कोई थोपने की चीज है




भारत सरकार के विशेष दबाब के बावजूद भी नॉर्वे सरकार २३ मार्च तक ही बच्चों को उनके परिवार को सौपने के लिए तैयार हई है. आखिर आपने ही बच्चों कि कस्टडी पाने के लिए परिवार को धरने पर बैठना पड़ा है.  लेकिन नॉर्वे सरकार अभी भी बच्चों की उचित देखभाल के नाम पर उन्हें माँ बाप को सौंपने को तैयार नहीं, क्या  बच्चों को पारिवार से दूर,नए परिवेश, नयी भाषा और नए कल्चर में रखने से उनका  सही विकास संभव है ? क्या नॉर्वे की चाइल्ड वेल्फेयर एजेंसी इस का जवाब देगी. 

अन्नू  आनंद 
क्या भारतीयों का बच्चों को पालने का सामान्य तरीका बच्चों के विकास के लिए उचित नहीं है? बच्चों के पालन-पोषण की शैली क्या उन्हें विदेशों से सीखनी होगी? बच्चों की बेहतर परवरिश किसे कहेंगे? क्या देश बदलने के साथ जीवन शैली भी बदलना बच्चों के हित में है? क्या अपनी संस्कृति से जुड़े मूल्यों के मुताबिक बच्चों की देख-रेख करने में कोई बुराई है? इस तरह के कई सवाल इन दिनों चिंता का कारण बने हुए हैं। इसकी खास वजह है नॉर्वे में उन दो मासूम बच्चों को सरकारी स्तर पर उनके मां-बाप से अलग करने की घटना, जिसने देश और विदेशों में रहने वाले करोड़ों भारतीय परिवारों को असमंजस में डाल दिया है। इन सवालों पर बहस से पहले घटना को ठीक से जानना जरूरी है । 

साथ सुलाने का अपराध 
नार्वे के स्टावंगर शहर में रहने वाले अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य से उनके तीन साल के बेटे अभिज्ञान और एक साल से भी कम उमर की उनकी बेटी ऐश्वर्या को वहां की सरकारी एजेंसी ने कुछ समय पहले इस आधार पर अलग कर दिया कि वे बच्चों का पालन-पोषण सही ढंग से नहीं कर रहे। इस सिलसिले की शुरुआत तब हुई
 जब किंडरगार्टन में पढ़ने वाले अभिज्ञान के स्कूल को लगा कि वह कुछ चीजों को जल्दी नहीं समझ पा रहा है। उन्होंने इसकी जानकारी चाइल्ड प्रोटेक्टिव संस्था को दे दी। इसके बाद संस्था से जुड़े अधिकारी जांच के लिए उसके घर आने लगे। उनकी राय यह बनी कि बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं हो रही। अधिकारियों को शिकायत थी कि दंपति बच्चों को हाथ से खाना खिलाते हैं और खाने में दही-चावल देते हैं। इसके अलावा वे बच्चों को अपने साथ बिस्तर पर सुलाते हैं। जो बातें हमारी दिनचर्या का आम हिस्सा हैं, वही भट्टाचार्य दंपति के लिए अपराध बन गईं। 

कोर्ट-कचहरी के चक्कर 
सरकारी अधिकारियों ने बच्चों के अधिकारों से संबंधित नार्वे के कड़े कानूनों का हवाला देते हुए दोनों बच्चों को मां-बाप से जबरन अलग कर बारनेवर्ने नार्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विस सेंटर में भेज दिया। पिछले आठ माह से भट्टाचार्य दंपति अपने बच्चों की कस्टडी के लिए अदालत, सरकारी दफ्तरों और दूतावास के चक्कर काट रहे हैं। वहां की अदालत ने भी वेलफेयर सेंटर के पक्ष में फैसला देते हुए 18 साल तक बच्चों को अलग-अलग फोस्टर केयर में रखने और मां-बाप को साल में केवल दो बार बच्चों से मिलने की इजाजत दी। भारत सरकार के भारी दबाव के बाद नार्वे सरकार बच्चों को कोलकाता स्थित उनके चाचा के हवाले करने को तैयार हुई है। उम्मीद है कि बच्चे मार्च तक यहां पहुंच पाएंगे। 
 

नार्वे की इस घटना से उठा विवाद विदेशों में रहने वाले करीब तीन करोड़ भारतीयों के धार्मिक, सांस्कृतिक, और कानूनी अधिकारों पर सवालिया निशान लगाता है। विदेशी जमीन पर अपनी संस्कृति और जीवन शैली को भूलकर बाहरी कल्चर अपनाना और उसी के आधार पर बच्चों को ढालना आसान नहीं है। हर बच्चे को, चाहे वह कहीं भी रहे, अपने धार्मिक, सामाजिक, जातीय और भाषाई माहौल में पलने का हक है। कानून का डर दिखा कर उसका यह हक छीनना अन्याय है। नार्वे में बच्चों को हाथ से खिलाना अपराध है। वहां बच्चे को पैदा होते ही अलग सुलाने की रिवायत है। हमारी संस्कृति में बच्चों को हाथ से खिलाना आम बात है। 


दही-चावल हमारे रोजाना के भोजन का हिस्सा है। पांच साल तक बच्चों का मां-बाप के साथ सोना यहां सामान्य बात है। एक हद तक यह हमारी मजबूरी भी है। कम जगह के चलते अक्सर हमारे बच्चे मां-बाप के साथ या उनके कमरे में ही सोते हैं। बच्चों का मां-बाप की देख-रेख में रहना उनकी सुरक्षा तथा उनमें उचित मूल्यों के विकास के लिए भी बेहतर माना जाता है। भारत में लड़के शादी के बाद भी मां-बाप के साथ ही रहते हैं। हमारी इस रिवायत को पश्चिमी देशों में हैरत से देखा जाता है। इन देशों में बेटा अगर 21 साल की उमर के बाद माता-पिता के साथ रहे तो उन्हें इसे 'असामान्य प्रवृत्ति' समझा जाता है। 

यह संस्कृति का अंतर ही है कि हम आज भी बूढ़े मां-बाप को परिवार के साथ रखने में गर्व महसूस करते हैं, उन्हें ओल्ड एज होम या वेलफेयर सेंटर में नहीं रखते। ऐसा नहीं कि नार्वे या किसी और देश की संस्कृति खराब है, या उसे अपनाना गलत है। लेकिन इसे किसी पर थोपना ठीक नहीं है। सबसे ज्यादा हैरत की बात यह है कि नार्वे की अदालत ने भी फैसला दिया है कि दोनों बच्चे 18 साल की उम्र तक अलग-अलग फॉस्टर होम में रहेंगे और उनके मां-बाप साल में केवल एक बार उनसे मिल सकते हैं। अदालत के मुताबिक अगर पति-पत्नी अलग होते हैं तो बच्चे पिता को सौंपे जा सकते हैं। 

दूसरों को भी समझें 
इस फैसले से यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या भारत से बाहर रहने वाले भारतीयों को स्थानीय सिविल और क्रिमिनल लॉ के पालन के साथ अब अपने घरों में भी विदेशी कानूनों का पालन करना होगा? नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे यूरोपीय देशों में बच्चों के अधिकारों से जुड़े कानून इतने सख्त हैं कि बच्चों के हित के नाम पर उन्हें परिवारों से अलग रखने से भी गुरेज नहीं किया जाता। लेकिन इस मामले में भारतीय दंपति के पर्सनल लॉ को ताक पर रख कर नार्वे ने अपने देश के पालन-पोषण के नियमों को अधिक महत्वपूर्ण माना। 

यह मामला दूसरी संस्कृतियों के प्रति असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। जिस तरह वहां के कानून और कल्चर में बच्चे को हाथ से खिलाना 'फॉर्स्ड फीडिंग' है, उसी तरह मां का दूध पीने वाली आठ माह की बच्ची को मां से अलग करना भारतीय दृष्टि में बाल उत्पीड़न है। यूरोप को अपनी संस्कृति को उच्च मानने की प्रवृत्ति छोड़ कर दूसरे देशों की जीवन शैली को समझने का प्रयास भी करना चाहिए।

Thursday, 23 February 2012

सिंगल है तो क्या हुआ अकेली क्यों रहे




अन्नू आनंद 
इन दिनों टीवी चैनल पर एक नए सीरियल कीशुरूआत हुई है। सीरियल की कहानी एक ऐसीसिंगल यानी एकल महिला के इर्द 
 गिर्द घूमती हैजो अपने पति की मृत्यु के बाद अपने दो छोटेबच्चों की परवरिश के लिए ससुराल पड़ोस औरसमाज के अन्य लोगों के तानों और उलाहनों काशिकार रहती है। परिवार और समाज अक्सर उसेशक की नजर से देखता है। सीरियल की कहानीकाफी हद तक इस युवा सिंगल महिला के प्रेम -प्रसंगों पर फोकस है जो अपनी आकांक्षाओं को पूराकरने के साथ अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाएरखने की भी जद्दोजहद से जूझती है। लेकिन इसकेसाथ ही यह सीरियल एक शिक्षित समाज में एक सिंगल महिला के संघर्ष की ओर इशारा कर ऐसीमहिलाओं की समस्याओं पर विचार करने और समाज की तंग सोच को बदलने की ओर भीध्यान आकर्षित करता है।

दस फीसदी का सवाल 
भारत में कुल महिला आबादी का दस फीसदी हिस्सा सिंगल महिलाओं का है। इनमें अविवाहित 
,विधवा तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाएं शामिल हैं। ये अपनी इच्छा से या इच्छा के विपरीतया किसी हादसे के कारण अकेले जीवन जी रही हैं लेकिन अफसोस की बात है कि दिनोंदिनउन्नत आधुनिक और शिक्षित होता हमारा समाज आज भी उन्हें समानता के साथ सामान्यजीवन जीने का अधिकार नहीं दे पाया है। बच्चों की परवरिश से लेकर अपनी हर छोटी बड़ीआंकाक्षा को पूरी करने के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ता है।

हैरत की बात है कि आर्थिक रूप से संपन्न महिला भी पुरुष साथी का साथ छूटने के बाद एकसहज जीवन की कल्पना नहीं कर पाती। कुछ समय पहले पुणे में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरतपल्लवी का पति संदीप बनर्जी उसे छोड़कर चला गया। पढ़ी 
लिखी होने के बावजूद पल्लवी कोलगा जैसे संदीप के बिना उसका कोई काम पूरा नहीं हो पाएगा। पति के धोखे से उबरना बच्चोंका लालन पालन और मानसिक यातनाओं से लड़ना उसके लिए आसान  था। पल्लवी जैसी नजाने कितनी संपन्न और योग्य महिलाएं सिंगल होने पर अपने को ऐसी समस्याओं से घिरा पातीहैं।

सिंड्रेला सिंड्रोम 
इसका एक बड़ा कारण 
सिंड्रेला सिंड्रोम है। भारत में हर किशोरी की यही कल्पना होती है किजैसे ही उसके सपनों का राजकुमार उसे मिलेगा उसके जीवन की हर परेशानी दूर हो जाएगी।वह एक ऐसे राजकुमार की चाहत लिए बड़ी होती है जो उसे दुनिया के सारे दुखों से छुटकारादिलाए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इस युवती के सपनों का राजकुमार किसी कारण सेउसे छोड़कर चला जाता है या उसकी समस्याओं को दूर करने की बजाए स्वयं उसके लिएसमस्या बन जाता है।

शहरों में रहने वाली पढ़ी 
लिखी एकल महिलाओं के लिए जहां महानगरों का एकाकीपन असुरक्षाकी भावना मानसिक यातनाएं बच्चों की परवरिश और अपनों का उपेक्षापूर्ण रवैया अधिकयातनाओं का कारण बनता है वहीं छोटे कस्बों और गांवों में रहने वाली सिंगल महिलाओं कोआर्थिक तंगी सामाजिक परंपराओं और समाज के शंकालु नजरिए जैसी समस्याओं से गुजरनापड़ता है।

हाल ही में नेशनल फोरम फॉर सिंगल विमिन राइट्स ने देश के छह राज्यों में कम आय वालीएकल महिलाओं पर एक सर्वे कराया। इससे पता चला कि 
2002 की जनगणना में इन महिलाओंकी गिनती करीब चार करोड़ थी। अभी यह मानकर चला जाता है कि सिंगल महिलाओं में विधवाया बूढ़ी महिलाओं की गिनती अधिक है। लेकिन सर्वे में पाया गया कि बहुत सी युवा महिलाएं भीसिंगल रह कर चुनौतीपूर्ण स्थितियों में जीवन गुजारती है। सर्वे के मुताबिक इन महिलाओं कोटूटा विवाह वैधव्य बीमारी बच्चों को अकेले पालना कहीं जाने की जगह  होना हिंसा ,शारीरिक  मानसिक उत्पीड़न कम शिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।युवा महिलाएं यह दबाव भी झेलती हैं कि उन्हें मदद की क्या जरूरत वे अपनी और अपने बच्चोंकी देखरेख खुद कर सकती हैं।

फोरम की अध्यक्ष जिन्नी श्रीवास्तव के मुताबिक सरकार को आर्थिक अभाव से ग्रस्त एकलमहिलाओं तक अपनी पहुंच बनाने के लिए पर्याप्त बजट रखना चाहिए। जब तक केंद्र सरकार ऐसेप्रावधान अपने बजट में शामिल नहीं करती 
निचले स्तर पर अकेला जीवन जीने वाली महिलाओंकी मुश्किलें कम नहीं होंगी। सामाजिक सुरक्षा पेंशन में एकल महिलाओं को शामिल कर उनकीदिक्कतों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। देखने में आया है कि तलाकशुदा औरपरित्यक्त महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा की जरूरतों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। सर्वेमें पाया गया कि ये महिलाएं अब केवल परिवार या समाज पर निर्भर रहने के लिए तैयार नहींहैं।

अनुराधा और सोनाली 
संपन्न परिवार की जिन महिलाओं को आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता 
उनके लिए भीएकल होने का दर्द कम नहीं है। बच्चों के लिए मां और बाप दोनों की भूमिका निभाने के साथपड़ोसियों और परिवार द्वारा शक की नजर से देखा जाना और असुरक्षा का माहौल अपनी इच्छासे जीने के उनके अधिकार में बड़ी बाधा बनते हैं। अपनों की उपेक्षा और जीवन भर एकाकी रहनेकी आशंका कितनी भयावह हो सकती है यह हम पिछले साल नोएडा में रहने वाली दो बहनोंअनुराधा और सोनाली बहल के स्वयं को घर में कैद कर खुद को भूखों मरने के लिए छोड़ देनेकी घटना में देख चुके हैं।

भाई के छोड़ जाने के बाद उन्होंने केवल इसलिए स्वयं को अलग कर लिया था कि उन्हें लगताथा 
उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। आर्थिक अभाव को तो सरकारी योजनाओं केमाध्यम से दूर किया जा सकता है लेकिन एकल महिलाओं के प्रति अपना तंग नजरिया बदलनेके लिए समाज को ही कुछ करना होगा। समाज से इन महिलाओं की कोई बड़ी अपेक्षा नहीं है।जरूरत उन्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने की है कि उनका होना बाकी दुनिया के लिए भी महत्वपूर्णहै।

पत्रकार और टिप्पणीकार 
सिंगल है तो क्या हुआ अकेली क्यों रहे

अन्नू आनंद 
इन दिनों टीवी चैनल पर एक नए सीरियल कीशुरूआत हुई है। सीरियल की कहानी एक ऐसीसिंगल यानी एकल महिला के इर्द 
 गिर्द घूमती हैजो अपने पति की मृत्यु के बाद अपने दो छोटेबच्चों की परवरिश के लिए ससुराल पड़ोस औरसमाज के अन्य लोगों के तानों और उलाहनों काशिकार रहती है। परिवार और समाज अक्सर उसेशक की नजर से देखता है। सीरियल की कहानीकाफी हद तक इस युवा सिंगल महिला के प्रेम -प्रसंगों पर फोकस है जो अपनी आकांक्षाओं को पूराकरने के साथ अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाएरखने की भी जद्दोजहद से जूझती है। लेकिन इसकेसाथ ही यह सीरियल एक शिक्षित समाज में एक सिंगल महिला के संघर्ष की ओर इशारा कर ऐसीमहिलाओं की समस्याओं पर विचार करने और समाज की तंग सोच को बदलने की ओर भीध्यान आकर्षित करता है।

दस फीसदी का सवाल 
भारत में कुल महिला आबादी का दस फीसदी हिस्सा सिंगल महिलाओं का है। इनमें अविवाहित 
,विधवा तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाएं शामिल हैं। ये अपनी इच्छा से या इच्छा के विपरीतया किसी हादसे के कारण अकेले जीवन जी रही हैं लेकिन अफसोस की बात है कि दिनोंदिनउन्नत आधुनिक और शिक्षित होता हमारा समाज आज भी उन्हें समानता के साथ सामान्यजीवन जीने का अधिकार नहीं दे पाया है। बच्चों की परवरिश से लेकर अपनी हर छोटी बड़ीआंकाक्षा को पूरी करने के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ता है।

हैरत की बात है कि आर्थिक रूप से संपन्न महिला भी पुरुष साथी का साथ छूटने के बाद एकसहज जीवन की कल्पना नहीं कर पाती। कुछ समय पहले पुणे में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरतपल्लवी का पति संदीप बनर्जी उसे छोड़कर चला गया। पढ़ी 
लिखी होने के बावजूद पल्लवी कोलगा जैसे संदीप के बिना उसका कोई काम पूरा नहीं हो पाएगा। पति के धोखे से उबरना बच्चोंका लालन पालन और मानसिक यातनाओं से लड़ना उसके लिए आसान  था। पल्लवी जैसी नजाने कितनी संपन्न और योग्य महिलाएं सिंगल होने पर अपने को ऐसी समस्याओं से घिरा पातीहैं।

सिंड्रेला सिंड्रोम 
इसका एक बड़ा कारण 
सिंड्रेला सिंड्रोम है। भारत में हर किशोरी की यही कल्पना होती है किजैसे ही उसके सपनों का राजकुमार उसे मिलेगा उसके जीवन की हर परेशानी दूर हो जाएगी।वह एक ऐसे राजकुमार की चाहत लिए बड़ी होती है जो उसे दुनिया के सारे दुखों से छुटकारादिलाए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इस युवती के सपनों का राजकुमार किसी कारण सेउसे छोड़कर चला जाता है या उसकी समस्याओं को दूर करने की बजाए स्वयं उसके लिएसमस्या बन जाता है।

शहरों में रहने वाली पढ़ी 
लिखी एकल महिलाओं के लिए जहां महानगरों का एकाकीपन असुरक्षाकी भावना मानसिक यातनाएं बच्चों की परवरिश और अपनों का उपेक्षापूर्ण रवैया अधिकयातनाओं का कारण बनता है वहीं छोटे कस्बों और गांवों में रहने वाली सिंगल महिलाओं कोआर्थिक तंगी सामाजिक परंपराओं और समाज के शंकालु नजरिए जैसी समस्याओं से गुजरनापड़ता है।

हाल ही में नेशनल फोरम फॉर सिंगल विमिन राइट्स ने देश के छह राज्यों में कम आय वालीएकल महिलाओं पर एक सर्वे कराया। इससे पता चला कि 
2002 की जनगणना में इन महिलाओंकी गिनती करीब चार करोड़ थी। अभी यह मानकर चला जाता है कि सिंगल महिलाओं में विधवाया बूढ़ी महिलाओं की गिनती अधिक है। लेकिन सर्वे में पाया गया कि बहुत सी युवा महिलाएं भीसिंगल रह कर चुनौतीपूर्ण स्थितियों में जीवन गुजारती है। सर्वे के मुताबिक इन महिलाओं कोटूटा विवाह वैधव्य बीमारी बच्चों को अकेले पालना कहीं जाने की जगह  होना हिंसा ,शारीरिक  मानसिक उत्पीड़न कम शिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।युवा महिलाएं यह दबाव भी झेलती हैं कि उन्हें मदद की क्या जरूरत वे अपनी और अपने बच्चोंकी देखरेख खुद कर सकती हैं।

फोरम की अध्यक्ष जिन्नी श्रीवास्तव के मुताबिक सरकार को आर्थिक अभाव से ग्रस्त एकलमहिलाओं तक अपनी पहुंच बनाने के लिए पर्याप्त बजट रखना चाहिए। जब तक केंद्र सरकार ऐसेप्रावधान अपने बजट में शामिल नहीं करती 
निचले स्तर पर अकेला जीवन जीने वाली महिलाओंकी मुश्किलें कम नहीं होंगी। सामाजिक सुरक्षा पेंशन में एकल महिलाओं को शामिल कर उनकीदिक्कतों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। देखने में आया है कि तलाकशुदा औरपरित्यक्त महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा की जरूरतों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। सर्वेमें पाया गया कि ये महिलाएं अब केवल परिवार या समाज पर निर्भर रहने के लिए तैयार नहींहैं।

अनुराधा और सोनाली 
संपन्न परिवार की जिन महिलाओं को आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता 
उनके लिए भीएकल होने का दर्द कम नहीं है। बच्चों के लिए मां और बाप दोनों की भूमिका निभाने के साथपड़ोसियों और परिवार द्वारा शक की नजर से देखा जाना और असुरक्षा का माहौल अपनी इच्छासे जीने के उनके अधिकार में बड़ी बाधा बनते हैं। अपनों की उपेक्षा और जीवन भर एकाकी रहनेकी आशंका कितनी भयावह हो सकती है यह हम पिछले साल नोएडा में रहने वाली दो बहनोंअनुराधा और सोनाली बहल के स्वयं को घर में कैद कर खुद को भूखों मरने के लिए छोड़ देनेकी घटना में देख चुके हैं।

भाई के छोड़ जाने के बाद उन्होंने केवल इसलिए स्वयं को अलग कर लिया था कि उन्हें लगताथा 
उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। आर्थिक अभाव को तो सरकारी योजनाओं केमाध्यम से दूर किया जा सकता है लेकिन एकल महिलाओं के प्रति अपना तंग नजरिया बदलनेके लिए समाज को ही कुछ करना होगा। समाज से इन महिलाओं की कोई बड़ी अपेक्षा नहीं है।जरूरत उन्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने की है कि उनका होना बाकी दुनिया के लिए भी महत्वपूर्णहै।
 नवभारत टाइम्स में  28 जनवरी 2012 को प्रकाशित  

Thursday, 5 January 2012

एचआईवी के खिलाफ एक गांव की जंग



कोल्हापुर से लौटकर अन्नू आनंद

कोल्हापुर का नाम कोल्हापुरीे जूतियों के लिए जाना जाता है। व्यापारी जगत में यह चीनी की मिलों के लिए भी मशहूर है। फिल्मों में रूचि रखने वाले इसेे पद्मिनी कोल्हापुरी के नाम से भी पहचानते हंै। लेकिन महाराष्ट्र के कोल्हापुर नाम का यह जिला अब जन-भागीदारी के अनूठे प्रयास के लिए समूचे देश में एक नई मिसाल कायम कर रहा है। एचआईवी के खिलाफ जंग मंे विभिन्न समुदायों ने मिलकर  यहां ऐसे प्रयासों की शुरूआात की है कि देश के अन्य उच्च एचआईवी दर वाले राज्यों में भी कोल्हापुर के माॅडल को अपनाया जा रहा है। साल 2007 में इस जिले को नाको (नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन) ‘ए’ श्रेणी में रखा था जिसका मतलब था कि कोल्हापुर में एचआईवी पाॅजिटिव लोगांे की गिनती कुल जिले की कुल जनसंख्या के 1 प्रतिशत से भी अधिक है। इससे साफ था कि जिले का नंबर महाराष्ट्र के सबसे अधिक तीन एचआईवी ग्रस्त जिलों के बाद चैथे नंबर पर आता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इसका मुख्य कारण जिले में चीनी और पाॅवर लूम उधोग हैं जिनके चलते कर्नाटक और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों से मौसमी और अस्थायी आवागमन बना रहता है। इसके अलावा कर्नाटक आंध्रप्रदेश से जुड़े नेशनल हाईवे से गुजरने वाले ट्रक डाइवरों के चलते इस इलाके में एचआईवी का खतरा हमेशा अधिक रहा है।

पिछले कुछ सालों में जिले के विभिन्न गांवों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही थी जो एचआईवी पाॅजिटिव होने के कारण गुमनामी का जीवन जी रहे थे। एड्स से जुड़े भ्रम, अज्ञानता और कलंकित होने के भय के चलते अधिकतर लोग पाॅजिटिव होने की बात को छिपाते और टेस्ट कराने से कतरातेे। साल 2009 में इसी जिले के लोन्जे गांव में एक ऐसी घटना घटी जिसने एचआईवी के खिलाफ काम करने वाले सभी लोगों को चेताने का काम किया। दरअसल गांव में एक आंगनवाड़ी कार्यकत्र्ता को उस समय नौकरी से निकाल कर उसे गांव से बेदखल कर दिया जब उसके खून की जांच में एचआईवी पाॅजिटिव के लक्षण पाए गए। उस कार्यकत्र्ता के साथ हुए अपमान और घृणा के चलते चारों तरफ निराशा फैल गई। इस खबर से पाॅजिटिव लोगांे में विश्वास जगाने के मिशन को एक बड़ा धक्का लगा। इलाके के लोगों को अहसास हुआ कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से परीक्षण कराना और एड्स व्यक्ति की इलाज में मदद करना ही समस्या का हल नहीं बल्कि मुख्य समस्या एचआईवी को लेकर आम लोगों में बैठा डर और पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ उनका भेदभाव पूर्ण रवैया है। इस सोच को बदलने के लिए जरूरी था कि आम आदमी समस्या के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा हो।
जिले के 30 हजार जनसंख्या वाले सबसे बड़े गांव कोडोली में जहां एचआईवी का प्रकोप अपेक्षाकृत अधिक था। लागों ने इस चुनौती का सामना किया। जनभागीदारी के कई अनूठे प्रयासों को एकसाथ शुरू कर गांव के हर व्यक्ति को एचआईवी की हकीकत का ऐसा पाठ पढ़ाया कि आज यहां के करीब हर बच्चे के लिए पाॅजिटिव होना न तो कोई बड़ा हौवा है और न ही शर्म। यहां किसी भी एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव किया जाता है। गांव का सामान्य व्यक्ति भी अब यहां टेस्ट कराने में हिचक महसूस नहीं करता।

ऐसा माहौल बनाने के लिए इस गांव के सभी प्रबुद्व व्यक्तियों ने सेंटर फाॅर एडवोकेसी एण्ड रिसर्च संस्था की मदद से गांव के अलग अलग आयु वर्ग के समूहों को एचआईवी जागरूकता अभियान में शामिल करने की पहल की। इसके लिए सब से पहले गांव के कोल्हापुर स्थित मास्टर आॅफ सोशल वर्क में पढ़ने वाले छात्रों ने एक मंच बनाया इसमें इस गांव की कई युवा लड़कियों को भी शामिल किया गया। युवा मंच ने एड्स के कारणों, लक्षणों और इससे जुड़े भ्रमों को दूर करने के लिए गांव के हर हिस्से में नुक्कड़ नाटक किए।  इन नाटकांे में शामिल कुछ लड़कियां के मां-बाप  गरीब अशिक्षित और खेती का काम कर अपना गुजारा करते हैं। उनके लिए अपनी बेटियों का सड़क पर यौन संबंधों पर खुलेआम चर्चा करना और कंडोम की बात करना गवारा नहीं था। लेकिन इन युवा लड़कियों ने अपने मां बाप को कईं दिनों तक बातचीत के जरिए यह समझाया कि एचआईवी कोई छूत की बीमारी नहीं। युवा मंच से जुड़ी कृषक परिवार की सोनाली ने बताया, ‘‘उसके लिए मां बाप को तैयार करना आसान नहीं था। लेकिन जब वे मान गए तोे पहले हमने विभिन्न खेलों के माध्यम से गांववालों को एचआईवी की सही जानकारी दी। पाॅजिटिव लोगों के संबंध में फैले भ्रमों को दूर करने के लिए लगातार डाक्टरों और विशेषज्ञों से उनके बीच संवाद बनाया फिर आमजन को टेस्ट कराने के लिए प्रेरित किया।’’


जब ब इन युवाओं के नाटकों से गांव में एचआईवी के प्रति जागरूकता का माहौल पैदा हुआ उसकेबाद गांव की महिलाओं को इस प्रयास में शामिल करने की कवायद शुरू हुई। इसके लिए सेंटर की मदद से गांव में 500 महिलाओं के लिए एक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। गांव के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाने वाली 70 आंगनवाड़ी महिला कार्यकर्ताओं ने इस कार्यशाला में हिस्सा लिया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ताई मतसागर का कहती हंै,‘‘हमारा गांव की महिलाओं के साथ नजदीकी रिश्ता है। हमने महिलाओं को मातृत्व स्वास्थ्य की जानकारी देने के साथ गर्भवती महिलाओं को एचआईवी का प्रशिक्षण कराने के लिए भी प्रेरित करना शुरू किया। इसके लिए 10 महिलाओं का एक सखी मंच बनाया गया जो घर घर जाकर जिन महिलाओं को टेस्ट कराने में हिचक होती उनके भ्रमों को दूर करता। मंच की सखी दिलशाद नजीर बताती है कि हमने कभी अपने घरों में भी यौन संबंधों के बारे मे बात नहीं की लेकिन हमने पहले अपने मन से इस झिझक को खत्म किया फिर दूसरी महिलाओं के मन से इसे खत्म करने की कोशिश की। सखी मंच ने जब महिलाओं को समझाया कि महिलाओं को एचआईवी का खतरा अधिक है और इसका असर गर्भवती महिला के बच्चे पर भी पड़ सकता है। एक घर में सखी मंच के जाने के बाद उस घर की महिला ने आंगनवाड़ी में आकर स्वीकार किया वह पाॅजिटिव है और वह दवाई लेने के लिए सांगली जाती है जोकि उसके गांव से बहुत दूर है। बाद हमने उसे नजदीक के कोल्हापुर के केंद्र में रजिस्ट्रेशन कराने की हिदायत दी।  


 लेकिन गांववालों ने इन कोशिशों पर यहीं पर ही रोक नहीं लगााई। किसी भी पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ छूआछूत और उसके साथ भेदभाव के बर्ताव पर अभी पूरी तरह रोक लगााना बाकी था। गांववालों ने एक अनोखा तरीका अपनाया। गांव की सरपंच मनीषा गाधव की मदद से ग्रामसभा का आयोजन कर एचआईवी से जुड़े कलंक को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया।  तमिलनाडू के एक गांव के बाद यह देश दूसरा गांव है जिसने ऐसा प्रस्ताव पारित किया है। 6 महिला वार्ड पंचों और 11 पुरूषों वाली इस पंचायत ने सभी ग्रामसभा सदस्यों को शपथ दिलाई कि वे एचआईवी से संबंधित जानकारी को हर व्यक्ति तक पहुंचाएगें और किसी भी पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव  नहीं करेंगे। सरपंच मनीषा गाधव के मुताबिक, ‘‘हमारा मकसद केवल प्रस्ताव पारित कराना ही नहीं था असली परीक्षा प्रस्ताव पारित करने के बाद की थी। हमने ग्रामसभा में मौजूद हर व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह इस बात का खास ध्यान रखे कि गांव का कोई भी व्यक्ति टेस्ट कराने या फिर किसी पाॅजिटिव से उपेक्षा का बर्ताव न करे।’’ इसके लिए जिला के पाॅजिटिव नेटवर्क के सदस्यों को अभियान के साथ जोड़ा गया।

 जिला के स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक प्रस्ताव पारित होने के बाद टेस्ट कराने वाले लोगों की गिनती बढ़ने लगी। साल 2011 में टेस्ट कराने वालों की संख्या पूरे जिले में बढ़कर 2133 हो गई  जबकि इससे  पहले साल 2009-10 में यह गिनती 1251 ही थी। अब गांव में एड्स के खिलाफ ऐसा माहौल बना कि गांव के गणेश मंदिर ने भी जन-जागरण अभियान में हिस्सेदारी शुरू करू दी। मंदिर के अंदर सभी दीवारें एड्स से लेकर बेटी -बचाओ आदोलन के पोस्टरों से भरी पड़ी है। मंिदर के उपाध्यक्ष संतोष राजाराय हुजरे के मुताबिक, ‘‘उनका युवा गणेश तरूण मंडल कईं सालों से स्वास्थ्य और समाज सुधार के कामों में लगा हुआ है। अगली गणेश चतुर्थी पर एड्स के प्रति जागरण अभियान ही मंडल का मुख्य मुद्धा होगा।’’ पिछली बार इस मंडल ने कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ बेटी बचाओ को फोकस करते हुए जिन परिवारों में पहली लड़की है उन महिलाओं से गणेश विर्सजन कराया था।
गांववालों की कोशिशें अभी थमी नहीं। एडवोकेसी सेंटर की अध्यक्ष अखिला शिवदास मानती है कि एचआईवी के प्रति जागरूकता फैलाने में और पाजिॅटिव लोगों के साथ समानता के बर्ताव में गांव ने पूरी तरह सफलता हासिल कर ली है। लेकिन अब गांव को एचआईवी मामलों की गिनती को कम कर उच्च खतरे वाली श्रेणी से बाहर  निकलने की तरफ भी ध्यान देना होगा। जिस गांव के मदिंर में पूजा अर्चना के साथ समुदाय की सामाजिक समस्याओं और बीमारियों की रोकथाम की पहल हो, जहां ग्रामसभा, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य संस्थाओं सहित युवा समूह भी एकजुट खड़ा हो क्या ऐसे माॅडल गांव के लिए यह मुश्किल है। कोडोली वासी तो ऐसा नहीं समझते।
  ( यह आलेख १ जनवरी को नई दुनिया में प्रकाशित हुआ है )
पत्ता
अन्नू आनंद
ए-65 परवाना अपार्टमेंटस
मयूर विहार, फेज1 एक्सटेंशन
नई दिल्ली-110091