Monday, 14 December 2009

आदिवासी बच्चों के भविष्य की उम्मीद

आदिवासी बच्चों के भविष्य की उम्मीद

अन्नू आनंद

(कठिवारा (झाबुआ) मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ में कठिवाड़ा एक विषेश प्रकार का गांव है। कस्बों की गहमागहमी से दूर, विकास से अछूता यह गांव चारों तरफ से पहाड़ियों और जंगलों से घिरा है। सुबह छह बजे का समय है। चारों तरफ फैला सन्नाटे में अचानक प्रार्थना के स्वर गंूजने लगते हैं। यह आवाज बच्चों की है। आवाज की पीछा करने पर पता चलता है कि इस प्रार्थना के स्वर एक खुले से आश्रय के प्रागण में से आ रहे हैं। यहां खाकी निकर और सफेद कमीज पहने दो सौ के करीब बच्चे बंद आखों और जुड़े हाथों से प्रार्थना करने में तल्लीन थे। सुबह की प्रार्थना खत्म होते ही बच्चे टोलियों में बंट जाते हैं। एक टोली कमरे साफ करने लग जाती है। दूसरी रसोई में पड़े धान की सफाई और सब्जियां काटने में जुट जाती है एक अन्य टोली पौधों को पानी देने और बगीचे की साफ-सफाई कर रही है। ये युवा बच्चे अपने काम में इस तरह मग्न थे कि उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं हुआ कि बाहर से आकर कोई अजनबी उनके बीच खड़े हैं। आदिवासी लड़कों में बचपन से ही अनुसासनबद्ध तरीके से सामूहिक नेतृत्व की भावना पैदा कर उन्हें अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त जीवन के विभिन्न उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने का प्रषिक्षण देने वाला यह आश्रम है गुजरात राज्य की सीमा पर स्थित कट्ठिवाडा का ‘राजेंद्र आश्रम’। यह स्कूल आश्रम पद्धति के स्कूलों में अनूठी मिसाल है। क्योंकि यह स्कूल इन इलाकों के आदिवासी बच्चों को प्रषिक्षिति कर रहा है जिन के लिए सामान्य स्कूल भी कल्पना मात्र है। झाबुआ जिले की 87 फीसदी जनसंख्या आदिवासियों की है। इन में साक्षरता केवल 13 प्रतिषत है। ये आदिवासी सूदूर जंगलों में बसे हुए हैं। अधिकतर आदिवासियों का मुख्य धंधा खेतबाड़ी हैै। ये आदिवासी सामूहिक बस्तियों में न रह कर अलग टप्पर बना कर निवास करते हैं। इस तरह हर गांव अलग-अलग फलियों (मोहल्लों) में बंटा प्रषासन द्वारा हर गांव में स्कूल का प्रावधान है। लेकिन अधिकतर स्कूल कागजों पर चल रहे हैं। इस की एक वजह यह भी है कि इन सूदूर बस्तियों में षिक्षक आना नहीं चाहते। जिन की नियुक्ति होती भी है तो वे लंबे अवकाष पर चले जाते हैं। इसलिए इन गांवों के सरकारी स्कूल या तो बंद पड़े रहते हैं या षिक्षकों की अनुपस्थिति में बच्चे आना बंद कर देते हैं। अषिक्षा, अज्ञानता और विकास से दूर अधिकतर आदिवासी षराब पीकर अपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। जिस का असर बच्चों पर भी पड़ता है। इस लिए यहां आर्थिक सामाजिक सुधार के लिए केवल किताबी षिक्षा ही नहीं पर्याप्त बहुमुखी प्रसिक्षण की जरूरत है। राजेंद्र आश्रम इस दिषा में मील की पत्थर कहा जा सकता है। यहां बच्चे छात्रावास में रह कर कृशि, बागवानी, सामाजिक वानिकी के साथ-साथ छोटे मोटे उद्योगों का प्रषिक्षण भी प्राप्त करते हैं। यहां इस समय छात्रावास में रह कर 250 के करीब लड़के षिक्षा पा रहे हैं। आदिवासियों के जीवन की जरूरतों को ध्यान में रख कर विभिन्न क्रियाकलापों में प्रषिक्षण का प्रावधान रखा गया है। आदिवासी बच्चे आश्रम में रह कर अपने मूल पेषे खेती से दूर न हो जांए इस के लिए आश्रम में 25 एकड़ की ज़मीन पर बेहतर तकनीक से फसल उगाने, बागवानी, सामाजिक वानिकी, पषुपालन इत्यादि का व्यावहारिक प्रषिक्षण दिया जाता है। आश्रम में ही ‘राजेंद्र फ्लोर’ मिल (आटा चक्की) पर छात्र चक्की चलाने का काम सीखते हैं। इस के अलावा छोटे मोटे दूसरे गृह उद्योगों की षिक्षा दी जाती है। पषु पालन कार्य की षिक्षा के लिए मधुबन गोषाला है। सुबह की दिनचर्या सुबह पांच बजे से षुरू होती है। आधे घंटे के स्वाध्याय के बाद छह बजे प्रार्थना होती है। उस के बाद विभिन्न टोलियां अपनी-अपनी ड्यूटी का निर्धारित काम करती हैं। इसके लिए सफाई, कृशि, बगीचा, रसोई, संडास और सामान्य टोलियां बनी हुई हैं। हर टोली का एक नायक और एक उपनायक है। जो काम का संचालन करने के साथ-साथ षाम को प्रार्थना के समय समूचे दिन की रिपोर्ट पेष कर करता है। हर सप्ताह इन टोलियों का कार्य बदल जाता है। आठ बजे के करीब सभी बच्चे एक साथ बैठ कर दलिया, मूंग या पोहे इत्यादि का नाष्ता करते हैं। नाष्ते के बाद का समय होम वर्क का होता है। फिर नहाना धोना। साढ़े दस बजे भोजन। और साढ़े ग्यारह से साढ़े चार बजे तक का समय स्कूल। पांच से छह बजे का समय खेल कूद का रहता है। षाम सात-साढ़े सात बजे सर्वधर्म प्रार्थना। प्रार्थना के बाद एक षिक्षक कहानी के माध्यम से कोई नया विचार बच्चों को बताताहै। फिर रात के खाने के बाद छात्र ढोलक, हारमोनियम इत्यादि वाद यंत्रों के साथ संगीत का अभ्यास करते हैं। स्कूल का काम खत्म करने के बाद दस बजे का समय सोने का होता है। रविवार और अवकाष के दिनों में खेती बाड़ी और कटाई बुआई के अलावा दूसरे गृह उद्योगों के कार्य सिखाए जाते हैं। रोजा गांव तहसील अलिराजपुर का रहने वाला छठी कक्षा का छात्र अरविंद की आज ड्यूटी अपनी टोली के साथ सब को खाना परोसने की है। परोसने के बाद वह खाना खाते हुए बताता है कि उसे यहां रहना बहुत अच्छा लगता है। घर में तीन भाई बहन हैं। भाई भी इसी आश्रम में पढ़ता है। वह केवल दीवाली के दिन घर जाता है। अरविंद बड़ा होकर इंस्पेक्टर बनना चाहता है। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले चांदपुर गांव के सुरेष (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उस के मां-बाप नहीं। उस के घर में भाई बहन काका हैं लेकिन उसे आश्रम में रहना पंसद है। उसे पढ़ने का खास षौक है। आश्रम की षिक्षिका सुमित्रा वाखला के मुताबिक सुरेष के पिता हत्या के जुर्म में जेल में हैं। मां ने बच्चों को छोड़ कर दूसरी जगह षादी कर ली। तब से वह आश्रम में रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा है। सुरेष बड़ा होकर पुलिस में भर्ती होना चाहता है। ताकि गांव को अपराधों से मुक्त कर सके। नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले योगेंद्र भिंडे के माता-पिता उस की छोटी उमर में ही किसी बीमारी में चल बसे। जब वह पांच साल का था उसे उसके काका आश्रम में लाए थे। इसी आश्रम में उसे मां की ममता और पिता का प्यार मिला। आज वह आश्रम में रहते हुए खुष है। वह बड़ा होकर डाक्टर बनना चाहता है। छात्र अवकाष के दिन आसपास के गांवों में आदिवासियों को प्रषासनिक योजनाओं की जानकारी देने दूसरे जन जागृति के अभियान में भी हिस्सा लेते हैं। प्रधानाध्यापक नाहर सिंह वाखला के मुताबिक जब ये छात्र अपने फलियों में जाकर ताड़ी और षराब पीने के खिलाफ अभियान चलाते हैं तो भले ही उन के अभियान का कोई प्रभाव पड़े या न पड़े लेकिन यह आषा जरूर बंधती है कि बड़े होकर ये बच्चे षराब या ताड़ी को नहीं छुएंगे। इस तरह आने वाली पीढ़ी का आदिवासी समाज जरूर षराबबंदी को मानेगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से यहां के छात्र आदिवासी समाज में फैली रूढ़िवादिता और कुरीतियों पर प्रहार करते हैं। तीन से पांचवीं की करीब 150 लड़कियों के लिए अलग कन्या छात्रावास और कन्या विद्यालय भी है। तीन से पांच साल तक के बच्चों के लिए बालवाड़ी भी संचालित की जा रही है। सूदूर आदिवासी क्षेत्र में बहुमुखी प्रतिभा का विकास करने वाले इस आश्रम की षुरूआत की कहानी भी रोचक है। राजेंद्र आश्रम की स्थापना गुजरात के प्रसिद्ध समाज सेवी चुन्नीलाल महाराज ने नवंबर 1962 में की थी। चुन्नीलाल लंबे समय से कच्छ क्षेत्र में समाज सेवा का काम करते रहे। जब उन को झाबुआ के आदिवासियों के पिछड़ेपन की जानकारी मिली तो वे इस इलाके में आए। यहां आदिवासियों में काम करने के बाद वे कट्ठीवाड़ा आए। कट्ठीवाड़ा रियासत के महाराज से उन्होंने बच्चों के लिए एक आश्रम की षुरूआत करने के लिए ज़मीन मांगी। उस समय के रियासत महाराज ओंकार सिंह ने ज़मीन देने के लिए एक षर्त रखी। उन्होंने चुन्नीलाल जी से कहा कि वे पंद्रह मिनट की समयावधि में नदी के किनारे की जितनी ज़मीन दौड़ कर कवर की महाराज ने उसी समय वे आश्रम के लिए स्थानांतरित कर दी। तब दस बच्चों से इस आश्रम की षुरूआत हुई। बाद में बिल्ंिडग का निर्माण 1987 में हुआ। आज यह आश्रम मध्य प्रदेष के आदिम जाति कल्याण विभाग की ओर से मिलने वाले अनुदान पर चल रहा है। हर बच्चे पर 300 रुपए प्रति मासिक और षिक्षकों और अन्य कर्मचारियों का वेतन। लेकिन यहां के षिक्षक केंद्रीय वेतनमान के मुताबिक वेतन न मिलने की वजह से असंतुश्ट हैं। वेतन भी छह माह नौ माह और बाहर माह की तीन किष्तों मे मिलता है। आदिवासियों तक षिक्षा का ज्ञान पहुंचाने में विषेश व्याकुल रहने वाली सरकार की यह नीति दूरस्थ आदिवासी इलाकों में कार्यरत षिक्षण संस्थाओं के याथ भेदभाव के रवैये को उजागर करती है। जब कि आदिवासी इलाकों के बच्चों में किताबी ज्ञान के अलावा अच्छे संस्कारों का विकास करने और बहुआयामी प्रषिक्षण प्रदान करने वाले राजेंद्र आश्रम जैसी संस्थाओं को विषेश प्रोत्साहित करने की जरूरत है। (ग्रासरूट फीचर्स)

जंग अभी भी जारी है

अन्नू आनंद
आजादी के राष्ट्रीय संघर्ष में महिलाओं की भूमिका केवल अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन तक सीमित नहीं थी उन्होंने उस दौरान भी हथियारबंद क्रांति और समाजिक परिवर्तन में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया था। स्वदेशी आंदोलन में डा। सरोजिनी नायडू, श्रीमती उर्मिला देवी, दुर्गाबाई देशमुख और मद्रास की श्रीमती एस अम्बुजा और कृष्णाबाई रामदास का नाम आता है तो लतिका घोष (महिला राष्ट्रीय संघ), वीणा दास, कमला दास गुप्ता, कल्याणी दास और सुर्या सेन जैसी महिलाओं की कमी नहीं जो क्रांतिकारी समूहों का हिस्सा बनीं। इसके अलावा राष्ट्रीयकार्यकर्ता एनी बेसेंट, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, राजकुमारी अमृतकौर, बेगम हामिद अली, रेणुका रे आदि ने महिलाआंे के उत्थान के लिए काम किया। देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं की फेहरिस्त काफी प्रभावी है ओर ये महिलाएं केवल आजादी की खातिर नहीं बल्कि महिलाओं के हितों को प्रोत्साहित करने के लिए भी संघर्ष कर रहीं थीं। आजादी के 60 वर्ष बाद आज भी महिलाएं खासकर ग्रामीण और समाज के निचले स्तर की महिलाएं देश के दूर-दराज के इलाकों में हर स्तर पर अपने हक के लिए हर चुनौती का सामना कर रही हैं। अपने मकसद को हासिल करने और समाज में अपनी पहचान कायम करने के लिए वह पूरे दम खम के साथ संघर्षरत है। लड़ाई अपने आत्मसम्मान की हो या आर्थिक संबलता की। सामाजिक न्याय की हो या फिर शासकीय सत्ता में अपनी क्षमता साबित करने की। गरीब, अनपढ़ और पिछड़े समाज की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे किसी की गुलामी और अन्याय को अब सहन नहीं करेंगी। उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके बुंदेलखंड में इन दिनों ‘गुलाबी गिरोह’ नामक पांच सौ महिलाओं के एक समूह ने क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़कर प्रशासन की नींद उड़ा दी है। वर्ष 2006 में बना यह गिरोह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रहा है। गिरोह उन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन न होने पर ध्यान केंद्रित करता है जो सरकार ने कमजोर और गरीब वर्गों के लिए बनाई जाती हैं। भ्रष्टाचार के चलते इन सरकारी योजनाओं का गरीबों को लाभ नहीं मिल रहा। गुलाबी गिरोह की मुखिया एक गरीब और अर्धशिक्षित 45 वर्षीया संपत देवी पाल है। इस गिरोह को बांदा और चित्रकूट जिले में कोटे का राशन काला बाजार में पहुंचने से रोकने में सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। इन जिलों का अभी तक 70 फीसदी राशन काला बाजार में पहुंच जाता था। कुछ लोग संपत देवी की तुलना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से करते हैं। इस गिरोह की समर्थक महिलाओं की संख्या दस हजार से कम नहीं है। अपने सदस्यों को अलग पहचान देने के लिए गिरोह ने एक ही रंग के कपड़े पहनना तय किया। गुलाबी रंग, क्योंकि किसी भी राजनैतिक पार्टी से जुड़ा नहीं इसलिए गिरोह इस रंग का इस्तेमाल करता है। भारतीय दंड संहिता के तहत इस गिरोह पर गैरकानूनी सभा, दंगा, सरकारी अधिकारी पर हमला और सरकारी कर्मचारियों का अपना काम करने से रोकने के आरोप लग चुके है। लेकिन स्थानीय स्तर पर ‘गुलाबी गिरोह’ को मिल रहे भारी समर्थन और उनकी मजबूत इच्छा शक्ति के चलते उन पर अकुंश लगाना संभव नहीं होगा। गिरोह की मुखिया संपत देवी कहती है, ‘‘देश ऐसे ही थोड़े ही आजाद हुआ है। अरे जान तो एक बार जाएगी। दस खलनायक हमें परेशान करे तो क्या पूरा बंुदेलखंड हमारे साथ है।’’ देश के करीब सभी राज्यों में महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों के जरिए छोटी-छोटी बचतों से आर्थिक आत्मनिर्भरता की एक क्रांति खड़ी कर दी है। महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में स्वयं सहायता समूह पूरे देश में सक्रिय है। देश के पिछड़े राज्यों में से एक माने जाने वाले छत्तीसगढ़ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली दस लाख से भी अधिक आदिवासी, दलित तथा अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाएं, 76 हजार स्वयं सहायता समूहों की सदस्य हैं और इन सभी समूहों की कुल मिलाकर परिसंपत्तियां 13 करोड़ रुपए से भी अधिक है। आमतौर पर ये अनपढ़ महिलाएं, खदानें, मछली का कारोबार, खेतिहर जमीनों और साप्ताहिक हाट बाजार चला रही हैं। इन्हीं बाजारों में आदिवासियों के सभी बड़े आर्थिक कारोबार चलते हंै। कोई भी चुनौती उनके लिए मुश्किल नहीं रही है। चूना पत्थर और पत्थर की खदानों के ठेकों का काम यहां अभी तक पुरुष किया करते थे लेकिन अब महिलाओं ने इस क्षेत्र में भी दखल बना लिया है और वे विशाल निर्माण प्रोजेक्टों के भी ठेके ले रही हैं। राजनांद गांव में ‘मां बम्बलेश्वरी’ स्वयं सहायता समूह की तेजतर्रार सुकुलाया का कहना है, ‘‘बाजार चलाने के शुरूआती चार महीनों में ही हमने न केवल बैंक से उधार ली कुल राशि में से 35 हजार रुपए लौटा दिए बल्कि मुनाफा कमाने में भी हम कामयाब रहे। यहां की महिलाओं का सबसे अधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चार साल पहले चार हजार एकड़ से भी अधिक जमीन पर फसल उगाने के लिए पांच लाख रुपए की बोली लगाना था। पहले तो भारतीय स्टेट बैंक के अधिकारियों ने भी इतना बड़ा कर्जा देने से इंकार कर दिया लेकिन बाद में महिलाओं ने जब संगठित होकर दबाव बनाया तो उन्हें कर्जा मिल गया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में उन्हें न केवल सफलता मिली, बल्कि इन्होंने अपने सदस्यों को अपने गांव में चावल बैंक बनाने के लिए राजी किया और शर्त यह रखी कि स्थानीय व्यापारियों को अपनी फसल बेचने से पहले वे अपनी जरूरतों के लिए इन बैंकों में बफर स्टाक बनाएंगे। इसी प्रकार देश के सात अन्य राज्यों में ‘स्वशक्ति’ स्वयं सहायता समूह के जरिए महिलाओं की ऋण पर निर्भरता कम हो रही है। बिहार में स्वशक्ति आंदोलन का रूप ले चुका है। यहां के मुज्जफरपुर जिले की महिलाएं इस ‘स्वशक्ति’ समूहों के जरिए बचत और आमदनी के कार्यकलापों के अलावा विकास संबंधी सरकारी योजनाओं और पंचायती राज की जानकारियां हासिल कर सामुदायिक स्तर की जरूरतें पूरी करने के निर्णयों में भागीदार बन रही हैं। स्वशक्ति स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनकर वे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने और सामुदायिक संपत्तियों जैसे पेयजल, शौचालय और डे-केयर जैसे केंद्र बनाने जैसे कार्यों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। जम्मू कश्मीर में महिलाओं ने आंतकवादियांे से अपनी रक्षा की खातिर हथियार उठा लिए हैं। जम्मू कश्मीर की हिलकाका पवर्तमाला में आतंकवादियों से लड़ने के लिए महिलाओं ने ‘‘आवामी फौज’’ नामक दल का गठन किया है। मार्च 2004 में मुस्लिम महिलाओं का रक्षा दल बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली मुनीरा बेगम के मुताबिक आतंकवादी हमें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। वे हमें खाने-ठहरने की सुविधा देने के लिए मजबूर करते हैं। जब महिलाओं ने विरोध किया तो उनके साथ बलात्कार हुआ या उन्हें बदनाम किया गया उनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई। इसका एक ही तरीका था कि हम यह सीख लें कि बंदूकों और हथगोलों से अपनी रक्षा कैसे की जाए।’’ हर महीने ये महिलाएं सेना के पास के शिविर में हथियारों की संभाल रखने और शूटिंग का प्रशिक्षण लेने के लिए जाती हैं। नब्बे के दशक में उत्तरांचल से निकला महिलाओं का शराब विरोधी आंदोलन अब झारखंड से लेकर मध्य प्रदेश तक पहुंच चुका है। झारखंड के पेसरा बड़ीयारी गांव में कुछ समय पहले तक उतने घर नहीं थे जितनी शराब की दुकानें। यहां भी महिलाएं अपने आदमियों की नशाखोरी की आदत और इसके कारण बर्बाद होते घरों को लेकर अरसे से परेशान थीं। आज गांव में एक भी ऐसी दुकान नहीं है। यहां की दलित महिलाओं ने शराबखोरी के खिलाफ प्रदर्शन और दुकानों की तोड़फोड़ कर पुरुषों को धमकाने का काम किया। झारखंड के गिरिडीह जिले के नौ गांवों में यही कहानी दुहराई गई है। गांव से हटकर मध्य प्रदेश की शहरी इलकों में भी महिलाओं ने शराब की सैकड़ों दुकानों को बंद करने का काम किया। खासकर आदिवासी इलाकों में यह आंदोलन और भी जोर पकड़ता जा रहा है। कुछ समय पहले उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं ने शराब बनाने और बेचने पर रोक की मांग करते हुए आंदोलन किया था। आंध्र प्रदेश में औरतों ने शराबबंदी की मांग को लेकर लाखों लीटर अर्क नष्ट कर दिया था। हरियाणा के मोहम्मदपुरा माजरा गांव में उन्होंने आंदोलन चलाते हुए यह धमकी दी थी कि अगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर ठेके नहीं हटाए गए तो वे शराबियों को पीटेंगी। विदेशी हुकूमतों से भले ही आजादी मिल गई हो लेकिन आतंकवाद और समाज में पनप रही विभेदकारी ताकतों के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई अभी भी जारी है।
यह लेख अमर उजाला में मार्च 2007 में प्रकाशित हुआ है

Monday, 7 December 2009

बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार की खातिर

अन्नू आनंद
पिछले दिनों महिला बाल विकास मंत्रालय ने कुपोषण पर काबू पाने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया। इसके लिए मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों को स्वस्थ बनाने के लिए शुरू की गई योजनाओं का प्रचार किया गया। महिला बाल विकास मंत्री ने कुपोषण पर काबू पाने के लिए किशोरियों के लिए राजीव गांधी ‘सबला’ योजना और इंंिदरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना शुरू करने भी घोषणा की। इस मौके पर लंबे अरसे से बच्चों को उचित पोषण प्रदान करने के लिए चल रही एकीकृत बाल विकास योजना सप्ताह भी मनाया गया। इन आयोजनों के मात्र एक सप्ताह के बाद यूनीसेफ ने विश्व के बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट में बताया कि भारत में प्रतिदिन पांच साल से कम आयु के पांच हजार बच्चे मर रहे हैं। यह शर्मनाक आंकड़ा चैंक्काने के साथ बच्चों के प्रति सरकार की नीतियों की पोल खोलता है। एक दिन मे पांच हजार बच्चों की मौत महज सोचने का ही नहीं गहन समीक्षा का विषय है। हमारे देश में बच्चों के पोषण से जुड़ी सबसे बड़ी योजना एकीकृत बाल विकास सेवाएं 1975 से चल रही हैं। पिछले 34 सालों में कई बार इस योजना का विस्तार कर उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की नीतियां बनी। लेकिन आज भी लक्षित लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। योजना का मुख्य फोकस अनुसुचित जाति और जनजाति होने के बावजूद अभी भी कुपोषण के कारण मरने वाले दलित और आदिवासी बच्चों की संख्या अधिक है। कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने योजना के बजट में चार गुणा बढ़ोतरी की थी। लेकिन फिर भी स्थिति यह है कि अभी भी विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में है। 6500 करोड़ से भी अधिक का बजट, लंबी अवधि तथा कईं संशोधनों के बावजूद यदि एकीकृत बाल विकास सेवाएं जरूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंच रही तो सुराख इन सेवाओं के अमलीकरण में है।। योजना के तहत देश के सभी जरूरतमंद बच्चों तक पोषित भोजन पहुंचाने के लिए चार लाख के करीब आगनवाड़ियां बनाई गई हैं। लेकिन दूरदराज के गांवों में कई आंगनवाड़ियंा ऐसी जगह स्थित हैं जहां नवजात शिशुओं या गर्भवती माओं के लिए पहुंचना संभव नहीं। अधिकतर आंगनवाड़ियो में कार्यकर्ताओं की भारी कमी है। मिनी आंगनवाड़ी में एक और बड़ी में दो कार्यकर्ताओं को रखने का प्रावधान है। इस लेखिका ने पिछले साल राजस्थान, छतीसगढ़,झारख्ंाड के दूरदराज के इलाकों में स्थित कईं आंगनवाड़ियों के दौरे में पाया कि कार्यकर्ताओं की कमी के चलते बहुत से जरूरतमंद बच्चों को पोषित भोजन नहीं मिल पा रहा। थ्जन आंगनवाड़ियों में कार्यकर्ता मौजूद हैं वहां भी उनके पास महिलाओं को फोलिक एसिड, नवजात शिशुओं को विटामिन और पोषित आहार देने के अलावा मिड डे मील में सहायता करने और अन्य सरकारी कामों को बोझ इतना अधिक है कि वे चाह कर भी लक्षित बच्चों तक नहीं पहुंच पातीं। लेकिन जमीनी हकीकत से अनजान मंत्री महोदया ने बालदिवस पर जिन दो नई योजनाओ की घोषणा की उसको लागू करने का काम भी आंगनवाड़ियों को ही सौंपा है। यही नहीं पिछले दिनों उन्होंने राज्य सरकारों को आंगनवाड़ियों मंे गर्म खाना और एक से अधिक बार खाना देने की हिदायत भी दी है। पहले से ही विभिन्न सरकारी मंत्रालयों की योजनाओं को पूरा करने के कामों में जुटे कार्यकर्ताओं पर और योजनाओं का बोझ लादना क्या उचित है? मंत्री महोदया का तर्क है कि हाल ही में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताआंे के मेहनताने में बढ़ोतरी की गई है ताकि वे बच्चों के प्रति अधिक समर्पित भाव से कार्य कर सकें। लेकिन वेतन की बढ़ोतरी क्या उनके बहुउद्देश्यीय कार्य बोझ को कम कर पाएगा ताकि वे लक्षित बच्चे तक पहुंचने के लिए अधिक समय निकाल सकें। कार्यकर्ताओं की कमी, आंगनवाड़ियों की जर्जर स्थिति और सेवाओं को लागू करने की बुनियादी जरूरतों की तरफ ध्यान देना नई योजनाएं लागू करने से भी अधिक अहम है। कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य को सुधारने में वांछित परिणामों को हासिल करने के लिए एकीकृत बाल विकास जैसी पुरानी योजना के गहन मूल्यांकन के अलावा सोशल आॅडिट करा यह जानना अधिक जरूरी है कि खामियां कहां है। इस आॅडिट से सरकार को जमीनी स्तर पर अमलीकरण के कई नए सबक मिलेंगे। केवल योजनाओं का उत्सव मनाकर बच्चों का स्वास्थ्य नहीं सुधारा जा सकता।
(यह लेख 4 दिसंबर 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है)

Sunday, 29 November 2009

स्त्री का अस्तित्व

इन दिनों स्त्री विमर्श की बहसों में स्त्री के यौन अधिकार पर चर्चाओं ने बेहद जोर पकड़ लिया है। इन बहसों में अक्सर जब मध्यम वर्ग की महिलाओं के अधिकारों की बात होती हैं तो अधिकतर बहसें भू्रण हत्याओं, महिला हिंसा पर थोड़ा ज्ञान बखारने के बाद स्त्री के यौन अधिकारो की ओर मुड़ जाती हंै। इन दिनों यह रिवायत कुछ अधिक ही दिखाई पड़ रही है। (शायद टीआरपी के खेल के चलते)। स्त्री केे यौन अधिकार एक बड़ा मसला है इससे इंकार नहीं लेकिन जिस समाज में वह पुरूष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व ढूंढती हो, अपने नाम से अधिक ‘मिसेज फलां’ कहलाने में गर्व महसूस करती हो, जो अपने हर छोटे बड़े फैसले के लिए पति पर निर्भर हो और अपनी इच्छाओं अपने वजूद को भुलाकर जीने के आदी हो चुकी हो उनसे से उम्मीद करना कि वे पति के साथ दैहिक संबंधों में अपने सुख, अपनी इच्छा- अनिच्छा को तरजीह दे कितना उचित है? स्त्री अधिकार के हिमायतियों की नई पौध में स्त्री के पारिवारिक और घरेलु अधिकारों की बजाय यौन अधिकारों के प्रति चिंता अधिक है। इस में कोई संदेह नहीं कि स्त्री मंे किसी भी परिस्थिति, वातावरण में स्वयं को ढालने की क्षमता गजब की है। अपनी इस कला में वह इस कदर माहिर है कि इसके लिए वह स्वयं को पूरी तरह भुला देती हैं। खासकर शादी के बाद वह जिस प्रकार अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को भूलकर एक नया अवतार धारण करती है उससे मुझे बेहद झल्लाहट होती है। अपनी इस अदाकारी के लिए वह प्रशंसा की पात्र हो या नहीं इस पर मेरी सोच अलग हो सकती है। लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैं हर दूसरी स्त्री में अपना वजूद मिटाकर भी खमोश, संतुष्ट और सहज रहने वाली ‘कलाकार स्त्री’ के दर्शन करती हूं। इसलिए मेरा संताप बढ़ता ही जा रहा है। कुछ समय पहले मुझे अपनी बेहद पुरानी सहेली से मिलने का अवसर मिला। मेरे लिए उससे मिलना किसी उत्सव से कम नहीं था। इस सहेली से मैंने अपने स्कूल और कालेज के दिनों में बहुत कुछ सीखा था। शलिनी, उसके नाम से ही मैं स्कूल के दिनों में रोमांचित हो जाती थी। पढ़ाई में तो वह हमेशा अव्वल आती ही थी। अन्य पढ़ने लिखने के कामों मे भी उसका दिमाग खूब चलता था। उससे प्रतिस्पर्धा के चलते अक्सर मेरी उत्सुकता रहती कि कोई किताब ऐसी न रह जाए जिसे पढ़ने में वह मेरे से आगे निकल जाए। नईं चीजांे को जानने समझने की उसे हमेशा उत्सुकता रहती। हर विषय में उसकी महारत मेरी हर चुनौती की प्रेरणा बनती। उसकी प्रतिभा, वाक-शैली और विचारों के कईं ट्राफीनुमा साक्ष्य, सालों तक स्कूल और कालेज में प्रिसींपल के आफिस की शोभा बढ़ाते रहे। उसे जब पता चला कि मैं शहर में हूं तो वह मिलने आई फिर हम दोनों मिलकर उसके घर गए। मैं उससे 13 सालों में शादी के बाद पहली बार मिल रही थी। बातचीत का सिलसिला लंबा चला। बातचीत में ‘‘ये कहते हैं,’’ ‘‘इन्होंने बताया’’, ‘‘इन्हीं को पता है’’, जैसे वाक्यों की गिनती घड़ी की आगे बढ़ती सुइयों के साथ बढ़ती जा रही थी। उसकी बातों का केंद्र पति, बच्चे और ‘‘हमारे यहां तो ऐसा होता है’’ जैसे विषयों पर ही रहा। चलने का समय हो गया था। शालिनी को अपने घर परिवार में खुश और संतुष्ट देखकर मुझे संतोष हुआ। लेकिन मेरे मन में उस की दबी बैठी पुरानी छवि कुछ और जानने के लिए उत्सुक थी इसलिए पूछ बैठी, ‘‘अरे भई तुम्हारी किताबों का कलेक्शन तो बहुत बढ़ गया होगा क्या वह नहीं दिखाएगी। इतने सालों में तो तुमने ढेरों बुक्स जमा कर ली हांेगी। उसने हैरत से मुझे देखते हुए पूछा, ‘‘कौन सी किताबें भई? मैंनें तो कभी कोई किताब नहीं पढ़ी। ‘‘अरे, तुम्हें याद नहीं स्कूल और कालेज में तो तू कोई भी किताब आते ही पढ़ लेती थी। दरअसल किताबें पढ़ने की आदत तो मुझे तुमसे ही पड़ी।’’ उसने जैसे कुछ याद करते हुए जबाब दिया, ‘‘अरे तब। वह तो और बात थी तब तो स्कूल -कालेज के दिन थे। मैनें तो अरसे से किसी किताब को हाथ भी नहीं लगाया।’’ वास्तव में उसके करीने से सजे सजाए पूरे घर में न तो कोई किताबों की अलमारी नजर आई और न ही कोई शेल्फ। घर लौटते हुए मैं सिदंूर से सजी मांग, हाथों में चूड़ियां और मुंह में ‘इन्होंने कहा’ की रंटत वाली शालिनी में कभी स्कूल-कालेज के विभिन्न आयोजनों पर दहेज, विधवा विवाह, स्त्री अधिकार पर अपने वक्तव्यों से कईं प्रतियोगियों के छक्के छुड़ाने वाली शालिनी की छवि ढूंढ रही थी। शालिनी को मिलने के बाद कईं दिन तक मुझे यह बात कचोटती रही कि क्या शालिनी को इस बात का अहसास है कि अपने घर परिवार की सेवा में वह अपनी वास्तविक अस्तित्व को होम कर चुकी है। शायद नहीं या फिर वह जानना नहीं चाहती। मीनू से मेरी पहली मुलाकात उससे उस समय हुई जब वह हमारे पड़ोस में अपने दो साल के बच्चे और पति के साथ रहने के लिए आई। मीनू का सारा दिन पति और बच्चे के इर्द-गिर्द उनकी इच्छाओं को पूरा करने में बीतता। कहीं घूमने जाना हो, बच्चों को कहीं घूमने लेजाना हो या मिलकर खाना खाने से लेकर बच्चों को कौन से स्कूल में डालें हर एक बात का उसके पास संक्षिप्त सा उतर होता ‘इनससे पूछकर बताऊंगी’। उसे साड़ी पहनना बहुत पसंद है। हमें भी वह साड़ी में बेहद अच्छी लगती लेकिन जब भी हम कहते तुम साड़ी क्यों नहीं पहनती तो उसका जवाब होता ‘इन्हे’ं मेरा सूट पहनना पसंद है। एक बार बातों बातों में उसने बताया कि जानती हो कभी कभी तो मेरा मन चाहता है कि मुझे पंख लग जाएं और मैं जी भरकर आकाश में उडं़ू। ऐसे ही एकबार जब मैं उसके घर में बैठी थी और वह घर की सफाई कर रही थी तो मेरी नजर एक फाइल पर पड़ी जिस पर लिखा था। डा।ममता त्रिवेदी। मैंने पूछ लिया यह डा. ममता त्रिवेदी कौन है? उसने बताया अरे मेरा ही नाम ममता है और मेैं संस्कृत में पीएचडी हूं इसलिए मैं डा.ममता त्रिवेदी हुई। उसी बातचीत में उसने बताया कि अव्वल दर्जे में पीएचडी करने के बाद उसे कालेज में पढ़ाने की नौकरी मिल रही थी। उसे लेक्चरर बनना बेहद पसंद भी है। लेकिन उसका कहना था बच्चे के साथ यह संभव कैसे होता। मैंने उससे समझाते हुए सवाल किया कि मेरी बेटी भी तो तुम्हारे बेटे जितनी है और हमारी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी समान है, मैं भी तो नौकरी कर रही हूं। उसका जवाब था, ‘‘लेकिन ‘इन्हे’ं पसंद नहीं। इसलिए मैंने काम करने का विचार त्याग दिया। मेरी डिग्री भी बेकार गई पर क्या करूं। आखिर पति के ‘अगेंस्ट’ भी तो नहीं जाया जा सकता।’’ स्त्री पुरूष में विषमता की जड़े तो मुझे इस पढ़े लिखे वर्ग में भी कम होते दिखाई नहीं पड़ती। चुटकी से सिंदूर और मंगलसूत्र में लिपटी वह अपने को एक सधे सधाए खांचे में देखने और उस पर खरी उतरने में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है। ऐसी महिलाओं का प्रतिशत कितना होगा जिनके नाम का बैंक में अपना या ज्वांइट एकाउंट होगा? कितनी प्रतिशत परिवारों में घर पति और पत्नी दोनों के नाम पर होता है? कितनी प्रतिशत महिलाएं बिना पति की आज्ञा के बैंक से पैसा निकाल पाती हैं? कुछ अपवादों को छोड़ दें तो मध्यम वर्ग की हर स्त्री अपने सामान्य परिवारिक अधिकारों को ही नहीं जानती। लेकिन इस सोच को हम चुनौती बहुत कम देते हैं। स्त्री को यौन सुख के अधिकार का पाठ पढ़ाने वालों के लिए जरूरी है कि वे पहले उसे अपने अस्तित्व को पहचानने की सीख दें। जब वह घरेलु हकों के साथ परिवार के आर्थिक- सामाजिक तथा अन्य छोटे बडे मसलों में फैसले लेने की हकदार बन जाएगी तो शारीरिक संबंधों में अपने सुख को तलाशने की परिपक्वता भी हासिल कर लेगी। (यह लेख 27 नवंबर को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ है।)

Saturday, 14 November 2009

दलितों की थाली अलग क्यों ?








अन्नू आनंद

पिछले दिनों राहुल गांधी का दलित प्रेम उमड़ा तो उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई गांवों का दौरा कर दलितों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं को सुना और समझा। यही नहीं उन्होंने गरीब और दलितों के घर रात बिताने के बाद अपनी पार्टी के नेताओं को भी यही समानता का पाठ पढ़ाने की कोशिश की। उनकी हिदायत को मानते हुए गांधी जयंती पर सत्तारूढ़ पार्टी के कई मंत्री, सांसद, विधायक और क्षेत्रीय नेताओं ने भी अपने क्षेत्र के दलित बाहुल्य गांवो में जाकर दलितों के साथ चैपाल लगाई। उनके साथ अपनी थाली लगाकर ऐसा स्वांग रचा मानो उन्होंने ‘समानता’ की गंगा में डुबकी लगा ली हो।

अगर राहुल गांधी सहित इन मंत्री और नेताओं ने गावों में जाकर यह टोकन दलित-प्रेम दिखाने की बजाय गरीबों और दलितों के लिए चालू की गई सरकारी योजनाओं को चलाने वाले मुलाजिमांे के साथ बैठक कर उन्हें समानता की सीख दी होती तो देश के लाखों बच्चे स्कूलों में चल रही मिड डे मील योजना में अपनी अलग थाली लगाने की जिल्लत से बच जाते। संभव है कि सरकार की यह सीख मिड डे मील से वचिंत रहने वाले दलित बच्चों को बिना अपमान सहे एक समय का भोजन उपलब्ध कराने में सहायक साबित होती। अक्सर राजनेता चुनावी स्वार्थ को पूरा करने के लिए गरीबों और दलितों के प्रति ऐसी प्रतीकात्मक उदारता दिखाते हैं लेकिन जमीनी सचाई बेहद ही अलग है।

एक तरफ सरकार भोजन का अधिकार विधेयक लाने की तैयारी कर रही है और दूसरी और देश में भोजन की सुरक्षा से जुड़ी दो सबसे बड़ी योजनाओं मिड डे मील और जन वितरण प्रणाली(पीडीएस) का लाभ देश के लाखों दलितों को नहीं मिल पा रहा। इसका मुख्य कारण इन योजनाओं में जात के आधार पर बहिष्कार और भेदभाव का नजरिया है।

देश के पांच राज्यों के 531 गांवांे में मिड डे मील पर की गई सर्वे में पाया गया है कि अधिकतर सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के साथ बहिष्करण और भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है। दलित बच्चों को अन्य बच्चों से अलग बिठाकर भोजन परोसने, उन्हें भोजन देने से इंकार करने और उन्हें सबसे अंत में भोजन परोसने की घटनाएं आम देखने को मिली। इसके अलावा कई स्कूलों में दलित बच्चों को भोजन पहले परोसने की मांग पर सजा देने और उन्हें अन्य बच्चों से अलग हटकर घटिया और कम मात्रा में भोजन देने जैसी घटनाएं भी इन मंे शामिल हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश मंे इंडियन इस्टीटयूट आॅफ दलित स्टडीज की सर्वे के मुताबिक हर तीन में से एक से अधिक स्कूल के मिड डे मील में और तीन में से एक राशन की दुकान पर दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है। यह भेदभाव दलितों के भोजन के अधिकार में सबसे बड़ी बाधा है जिसे दूर किए बिना भोजन के अधिकार विधेयक को लागू करने का मकसद पूरा नहीं होगा।

अधिकतर गावों में किसी दलित व्यक्ति को भोजन बनाने के लिए नियुक्त करने के प्रति सबसे अधिक विरोध देखा गया। सर्वे के मुताबिक राजस्थान में केवल 8 फीसदी गावों में स्कूलों में दिया जाने वाला भोजन दलित व्यक्ति द्वारा बनाया जा रहा है। 88 फीसदी में उच्च जात के लोग ही खाना बनाने के काम में लगे हैं। इस प्रदेश में एक भी दलित आर्गेनाइजर यानी मिड डे मील का संचालक नहीं है। तमिलनाडू में 65 और आंध्र प्रदेश में 47 फीसदी गैर दलितों को खाना बनाने का काम सौंपा गया है। दलितों को खाना पकाने का काम न देने के पीछे दलील यह दी जाती है कि दलितों के खाना बनाने से दूसरे जात के लोग खाना नहीं खाएंगे और इससे जातिगत तनाव बढ़ेगा।
जिन स्कूलों में पहले दलित महिला या पुरूष खाना पकाने के काम में लगे थे वहां उच्च जात के लोगों ने स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए अपने बच्चों को स्कूल में भेजना बंद कर दिया। आखिर प्रशासन ने वहां भी गैर दलितों को ही खाना पकाने के काम में लगा दिया।

उत्तर प्रदेश और बिहार में देश के एक तिहाई दलित निवास करते हैं लेकिन इन राज्यों में स्कूलों में पका हुआ खाने की बजाय सूखा राशन माह में एक बार दिया जाता है लेकिन यहां भी भ्रष्टाचार और जात आधारित भेदभाव से ही राशन का वितरण होता है। ऐसेे भी उदाहरण देखने को मिले जहां दलित बच्चों को सूखा राशन भी नसीब नहीं होता। इन राज्यों में सूखा राशन स्कूलों में देने की बजाय 37 फीसदी राशन विक्रेता के घर या दुकान से दिया जाता है। जिन स्कूलों में यह योजना चल रही है वे अधिकतर उच्च जाति के कालोनियों मे स्थित है। उत्तर प्रदेश में मिड डे मील का 85 प्रतिशत सूखा राशन उच्च जात की कालोनियों में स्थित दुकानों या घरों से दिया जाता है।
राजस्थान में 12 फीसदी और तमिलनाडू में 19 फीसदी स्कूल हीं ऐसे हैं जो दलित कालोनियों में स्थित हैं। किसी भी राष्ट्र के लिए इस से शर्म की बात क्या हो सकती है कि देश की जनसंख्या का पांचवा हिस्सा होते हुए भी दलितों के साथ आज भी करीब सभी राज्यों में उच्च जात के लोगों द्वारा छूआछात का बर्ताव किया जाता है। गांव के कुंए से पानी भरन,े मंदिर में प्रवेश करने या यहां तक की दलित का कोई जानवर भी अगर उनके खेत या घर में गलती से चला जाए तो पूरे गांव में बवाल मच जाता है। ऐसे में उच्च जात की कालोनियों से चलाई जा रही इस मिड डे मील तक दलित बच्चों की पहुंच कितनी संभव है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।
सर्वे किए गए सभी गावों में औसतन 37 प्रतिशत गावों में जातिगत भेदभाव जैसे दलित बच्चों को अलग बिठाना उनकी थाली अलग परोसना, बाद मे खाना देना या आठ गावों में घटिया खाना और कम मात्रा में खाना देने के उदाहरण भी देखे गए। भोजन के अधिकार के मद्देनजर कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया था कि केंद्र सरकार को भोजन से संबंधित कोई भी योजना शुरू करते समय उसके अमलीकरण में जात आधारित भेदभाव और बहिष्करण को रोकने के प्रावधानों को शामिल करना होगा। जन वितरण प्रणाली यानी सरकारी राशन की दुकानों में भी दलितों के साथ भेदभाव का यही सिलसिला जारी है। हांलाकि इस योजना को शुरू हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है लेकिन अभी भी सर्वे किए गए सभी गावों में इन दुकानो पर राशन का वितरण जात को देख कर किया जाता है। सभी राज्यों में पाया गया कि 40 प्रतिशत दलितों को पूरी लागत देने के बाद भी राशन कम मात्रा में दिया जाता है। बिहार में 66 फीसदी दलितों से राशन के वास्तविक मोल से अधिक लागत वसूली जाती है। यही नहीं यह राशन विक्रेता की अपनी जात पर भी निर्भर करता है कि वे किन लोगों को राष्श्न देने में प्राथमिकता दे। बिहार में सब से अधिक 86 प्रतिशत मामालों में राशन विक्रेता के द्वारा अपनी जात के लोगों को राशन वितरण करने में प्राथमिकता देने के मामले देखे गए।
सरकार के इन दो बड़े कार्यक्रमों में दलितों के साथ होने वाले भेदभावों का ही नतीजा है कि आज भी अन्य बच्चों के मुकाबले में दलित बच्चों की मृत्यु दर का आंकड़ा अधिक है। भोजन के अधिकार का मकसद हासिल करना है तो सबसे पहले गरीबों और दलितों के लिए बनी इन योजनाओं से छूआअूत के कीेड़े को खत्म करना होगा और यह तभी संभव है जब दलित भी इन योजनाओं के अमलीकरण में हिस्सेदार और भागीदार दोनों बनंेगे। वरना भोजन के अधिकार को लागू करने का मकसद कभी हासिल नहीं होगा।
यह लेख दैनिक भास्कर में १३ नवम्बर २००९ को प्रकाशित हुआ है

Tuesday, 27 October 2009

ताकि महिलाओं का सफर हो सुरक्षित

अन्नू आनंद

आखिर कामकाजी महिलाओं को घर और दफ्तर की जद्दोजहद से थोड़ी राहत मिली। बड़े शहरों और उसके आसपास के क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती ट्रेन या बस में यात्रा करने की होती है। इन भीड़ भरी बसों में किसी भी महिला के लिए सफर करना किसी यातना से कम नहीं होता। लेकिन हाल ही में रेल मंत्रालय ने दिल्ली सहित चार बड़े शहरों मुंबई, कोलकाता और चेन्नई से आठ ‘लेडिज स्पेशल’ ट्रेनों की शुरूआत कर महिलाओं की लंबे समय से चली आ रही सुखद और सुरक्षित यात्रा की मांग को कुछ हद तक पूरा करने का काम किया है। अगस्त माह से शुरू होने वाली इन रेलगाड़ियों का मकसद इन महानगरों में काम करने वाली महिलाओं की यात्रा को सरल और सुरक्षित कर महिलाओं के प्रति निरंतर बढ़ते अपराधों को कम करना है। राजधानी दिल्ली के लिए हरियाणा के पलवल शहर से ऐसी ही एक ट्रेन सुबह चलाई गई है जो शाम को वापस पलवल जाती है। पीले और नीले चटख रंग की इन ट्रेनों का अधिकतर इस्तेमाल इन शहरांे के आसपास बसे छोटे शहरों से महानगरों के कालेजों में पढ़ने वाली लड़कियों और दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। इन ट्रेनों में महिलाओं के बैठने के लिए गद्दे वाली सीट के साथ बेहतर बिजली के पंखे और साफ सफाई का खास ख्याल रखा गया है। दस रूपए की टिकट में भीड़भाड़ और धक्कामुक्की से हटकर सीट पर बैठकर गंतव्य तक पहुंचाने वाली ये ट्रेने महिलाओं में काफी लोकप्रिय हो रही हैं। इसके अलावा इन ट्रेनों में महिला टिकट क्लेक्टर और महिला सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी इन्हें पूरी तरह ‘लेडिज-फेंड्रली’ बनाती है। देश के विभिन्न शहरों में काम करने वाली महिलाओं को घर से निकलते ही सबसे बड़ी चिंता सही-सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचने की होती है। इसके लिए उपलब्ध रेल या बस जैसे सार्वजनिक परिवहनों में पुरूषों की भीड़ से जूझते हुए उसमें सफर करना किसी महिला के लिए कोई आसान काम नहीं। हांलाकि पिछले कुछ समय में भीड़ को कम करने के लिए ट्रेनों की संख्या काफी बढ़ाई गई है लेकिन इसके बावजूद अधिकतर कामकाजी महिलाओं को महज टेªन में चढ़ने के लिए मर्दों के साथ धक्कामुक्की का सामना करना पड़ता है। सीट मिलना तो दूर की बात है, महज इन टेªेनों में खड़े होने के लिए जगह बनाने के लिए भी उसे कम मशक्कत नहीं करने पड़ती। खड़े होने की जगह मिल गई तो फिर मर्दो की घूरती निगाहों से बचना, जानबूझकर छूने की कोशिशों को नाकाम करना और उन की गंदी टिप्पणियों को अनसुना करने की कोशिशें भी काफी तकलीफदायक होती हैं। अधिकतर महिलाओं को शिकायत रहती है कि घर और दफ्तर के कार्यों से कहीं अधिक थकाऊ इन टेªनों का सफर होता है। कभी बैठने की सीट मिल भी गई तो अपराधी तत्वों द्वारा पर्स छीनने या फिर छेड़खानी की आशंका हमेशा बनी रहती है। इन समस्याओं पर काबू पाने के मकसद से हांलाकि सामान्य ट्रेनों में एक या दो महिला कोच महिलाओं के लिए आरक्षित रखे जाते हैं। लेकिन आर्थिक सबलता के लिए घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं की बढ़ती तादाद के लिए ये एक या दो कोच कभी भी पर्याप्त साबित नहीं हुए। इसके अलावा इन गाड़ियों में यात्रा करने वाली महिलाओं का मानना है कि महिला कोच भी अक्सर पुरूषों से भरे रहते हैं क्योंकि महिला कोचों में बैठने वाले पुरूषों का अक्सर तर्क रहता है कि जब महिलाएं परूषों के डिब्बों में यात्रा कर सकतीं हैं तो फिर पुरूष महिलाओं के कंपार्टमेंट में क्यों नहीं। ट्रेनों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती छेड़खानी की घटनाओं को देखते हुए वर्ष 1992 में सबसे पहले मुंबई में दो ‘लेडिज स्पेशल’ टेªेनों की शुरूआत की गई थी लेकिन ये दो टेªेने यहां की कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या के लिए पर्याप्त नहीं थीं। इसके बाद भारी मांग के बावजूद भी यहां पिछले सत्रह सालों में ऐसी रेलगाड़ियों की गिनती में अभी तक बढोत्तरी नहीं हो पाई थी। अन्य बढ़े शहरों में इस मांग के बावजूद महिला आरक्षण विरोधी रहे लालू प्रसाद जी को ‘लेडिज़ स्पेशल’ का सुझाव कभी नहीं सुहाया । लेकिन ममता बनर्जी ने जब रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला तो उन्होंने अपने पहले रेल बजट में महिलाओं के लिए आठ स्पेशल ट्रेने चलाने का ऐलान किया। भले ही सरकार के इस प्रयास से बहुत सी कामकाजी महिलाओं को राहत पहुंची हो लेकिन केवल ‘स्पेशल रेलगाडियां’ हर महिला को आरामदायक और चिंतामुक्त सफर करने का अधिकार प्रदान नहीं करता। महिला हकों की पक्षधर बहुत सी महिलाओं का यह भी मानना है कि महिलाओं के लिए सुरक्षा की व्यवस्था केवल लेडिज स्पेशल में ही नही ंबल्कि हर टेªेन में होनी चाहिए। अपने पुरूष रिश्तेदारों के साथ सामान्य रेलगाड़ियों में यात्रा करने वाली महिलाओं को भी सुखद और आरामदायक यात्रा करने का पूरा अधिकार है। यह सही है कि पिछले एक दशक में महिलाओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित ट्रांसपोर्ट प्रदान करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों में कई स्पेशल बसों और ट्रेनों को शुरू किया गया है। मैक्सिको में असुरक्षित परिवहन प्रणाली को रोकने के लिए वर्ष 2008 में ‘केवल महिला बसों’ की शुरूआत की गई थी। लेकिन अब इसे आगे बढ़ाते हुए वहां अनुचित छूने को अवैध मानने के अभियान के साथ वहां की सरकार एक ऐसा अध्यादेश लाने का प्रयास कर रही है जिससे महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर तंग करने वालों को सजा दी जा सके। भारत में भी महिलाओं को घर से बाहर रेल बस या कार्यालय में अपराध मुक्त सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए ऐसे कई प्रयासों की जरूरत है। शुरूआत उनकी सुखद यात्रा से ही सही।

(यह लेख 21 अक्तूबर को अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है)

Friday, 23 October 2009

विश्वास नहीं होता इन आंकडों पर

अन्नू आनंद

दिल्ली सरकार का दावा है कि दिल्ली में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई है। सरकार के मुताबिक दिल्ली में लड़कियों के अनुपात का आंकड़ा 1004 यानी 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या 1004 हो गई है। जबकि वर्ष 2007 में यह संख्या 848 थी। महज एक साल के भीतर आंकडों में आए इस ‘चमत्कारी’ बदलाव को भुनाने की सरकार पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए दिल्ली सरकार के विभिन्न मंत्री अपनी पीठ थपथपाते हुए इसका श्रेय सरकार द्वारा शुरू की गई बहुप्रचारित ‘लाडली’ योजना को दे रहे हैं। लड़कियों के स्तर में सुधार लाने के लिए मार्च 2008 में सरकार ने लाडली योजना शुरू की थी। योजना के मुताबिक एक लाख रूपए तक की वार्षिक आमदन वाले परिवारों को जनवरी 2008 के बाद पैदा होने वाली लड़कियों की शिक्षा में मदद के लिए सरकार 18 वर्ष तक की आयु तक एक लाख रूपए की आर्थिक मदद देगी। लेकिन महज एक साल के अंतराल में योजना शहर के लैंगिक अनुपात में ऐसा सकारात्मक बदलाव लाएगी इसकी कल्पना योजना निर्माताओं ने भी नहीं की होगी। दिल्ली सरकार के रजिस्ट्रार (जन्म और मृत्यु) की वार्षिक रिपोर्ट 2008 को जारी करते हुए वित और शहरी विकास मंत्री ने इस बात को बढा़ -चढ़ा कर प्रचारित किया कि लाड़ली योजना के चलते इस साल लड़कियों के रजिस्ट्रेशन में बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2007 में लड़कियों की गिनती 1।48 लाख थी जबकि साल 2008 में यह बढ़कर 1.67 लाख पहुंच गई है। दिल्ली में कुल रजिस्टर्ड जन्मों में 49.89 फीसदी लड़कों और 50.11 फीसदी लड़कियों की संख्या है। इन आंकडों जरिए यह बात साबित करने की कोशिश की जा रही है कि राजधानी में लड़कियों के गिरते अनुपात पर काबू पाने मे सरकार सफल हो गई है और एक साल के भीतर ही सरकार ने औसत आंकड़े 848 को बढा़ कर 1004 पर पहुंचा दिया है। लेकिन इन आंकड़ो के हवाले से यह साबित करना कि लड़कियों के अनुपात में बढ़ोतरी का कारण लड़कियों के प्रति बदली सोच या शहर में कन्या भू्रण हत्याओं में कमी है, बेहद भ्रामक है। इसके लिए इन आंकडों के पीछे की हकीकत को समझने की जरूरत है। लेकिन सरकार जानबूझकर इन तथ्यों से आखें मूंदकर आंकडों का राजनैतिक लाभ उठाने की फिराक में है। दरअसल योजना में लड़कियों के जन्म के पंजीकरण पर प्रोत्साहन का प्रावधान है इसलिए लड़कियों के पंजीकृत जन्मों में बढ़ोतरी स्वाभविक थी लेकिन लड़के के जन्म को रजिस्टर्ड कराने में ऐसे किसी आर्थिक प्रोत्साहन के अभाव में उनके रजिस्ट्रेशन में कमी होना भी स्वाभाविक है। इसके अलावा आर्थिक योजना का लाभ पाने के लिए कुछ जाली नामों के पंजीकरण से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इनमें बहुत से ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जो दिल्ली के आसपास के इलाकों में रहते हुए भी योजना का लाभ लेना चाह रहें हैं। रिपोर्ट में 1000 लड़कों पर संस्थागत लड़कियों के जन्मों की संख्या 915 बताई गई है लेकिन घरों में पैदा हुई लड़कियों की गिनती 1303 जो कि आश्चर्यजनक है। यूं भी दिल्ली में लडकियों के कम अनुपात का दोषी केवल गरीब तबका नहीं हैं दक्षिण-पश्चिमी जैसे संपन्न इलाके में लड़कियों का अनुपात 2001 की जनगणना के मुताबिक 845 है। संपन्न इलाकों के अधिकतर लोग लाडली योजना से बाहर हैं। ऐसे में समूचे शहर के अनुपात का यह आकडा़ संशय पैदा करता है। शहर में इस साल पैदा हुए लडकों की गिनती 1.66 लाख बताई गई है जबकि 2007 में यह 1.74 लाख थी। लड़को की संख्या में अचानक आई यह कमी भी कई सवाल खड़े करती है। लड़की को बोझ समझने की प्रवृति किन्ही आर्थिक खंाचों में बंधी हुई नहीं है जिसे सरकार के आर्थिक सहायता के प्रलोभन से खत्म किया जा सके। महज आंकडों के छलावे से यह भ्रम पालना कि लड़कियों के प्रति शहर की सोच बदल गई है गलत होगा। फिलहाल जरूरत बहुस्तरीय प्रयासों की है जिसमें सबसे अहम प्रयास लड़की के प्रति जंग खाई मानसिकता को बदलना है।

(यह लेख ८ अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकशित हुआ है )