Friday, 31 October 2008

मानवी के साहस


अन्नू आनंद
यहां उन महिलाओं की बात की जा रही है जिनकी उपलब्धियां तो असीम हंै लेकिन वे खबर बहुत कम बनती हैं। उनके संघर्ष, साहस और मेहनत के साथ काम की बात करें तो वे किसी भी लिहाज से ऐश्वर्या राय, इंदिरा नुयी, किरण मजूमदार शाॅ या सानिया मिर्जा से कम नहीं लेकिन वे टीवी चैनलों या अखबारों के पन्नों पर ढूंढने पर भी नहीं मिलतीं। ये वे महिलाएं हैं जो सभी प्रकार की विपरीत स्थितियों में भी नदी की धाराओं को मोड़ने का दम रखती हैं। इन्हें किसी नाम और शोहरत की भूख नहीं उनका मुख्य मकसद अपनी मंजिल तक पहुंचना है। असली भारत की ये योद्दाएं बिना किसी बड़े संगठन या संस्था की छत्रछाया के अपने गांव, समुदाय या समाज के विकास और उनके कायाकल्प के लिए दूर-दराज के गांवों मंे खमोशी से अपने काम को अंजाम देने में जुटी हैं।
ऐसी ही एक मानवी से मेरी मुलाकात उस दौरान हुई जब मंै मैला ढोने वाली महिलाओं की एक स्टोरी के सिलसिले में मध्यप्रदेश के देवास जिले की विभिन्न गावों का दौरा कर रही थी। उस का नाम क्रांति था लेकिन नाम के विपरीत वह स्वभाव से बेहद ही शांत और सौम्य थी। करीब 20 वर्ष की यह फुर्तीली युवती मुझे तीन दिन तक देवास के दूर -दराज की बस्तियों में घुमाती रही। उसके पास मेरे हर सवाल का जवाब था। वह मैला ढोने वाली महिलाओं के पुनर्वास से जुड़े एक अभियान की जिला संयोजक के नाते पूरे दौरे में मुझे मुद्दे से जुड़ी बारिकियों को समझाती रही। जिस बस्ती में भी हम गए, बस्ती के बच्चे और महिलाएं उसको देखते ही भागते आते और उसे हर महिला और बच्चे का नाम जुबानी याद था। महिलाओं को काम छोड़ने के लिए प्रेरित करना, बच्चों का स्कूलों में भर्ती कराना, पुनर्वास के कामों की व्यवस्था करने में मदद करना और फिर बस्ती में दलितों के साथे अन्य जातियों द्वारा किए जाने वाले अन्याय के खिलाफ खड़े होना, वह इन सब कामों में माहिर थी। काम के प्रति उसके समर्पण को देखकर मैं मन ही मन उससे प्रभावित हुए बिना न रह सकी।
एक बस्ती में उसने मुझे रेवती (बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला से मिलाया। रेवती की शादी बहुत ही छोटी उमर में हो गई थी और ससुराल में कदम रखते ही अपनी परंपरा के मुताबिक झाड़ू और टोकरा हाथ में ले लिया था। 20 सालों तक शहरी कालोनियों में मैला ढोकर अपने परिवार का पेट पालने वाली रेवती के जीवन से बदबू का नाता अभी पूरी तरह नहीं छूटा। हांलाकि रेवती को यह काम छोड़े सात साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी वह अपने बच्चों की खातिर कभी-कभार फिर से टोकरा हाथ में लेने के लिए मजबूर महसूस करती है। छोटी सी उमर में मन में पढ़ने का सपना पाले और सिर पर टोकरा उठाए लोगों की गंदगी को साफ करने के दिनों के बारे में जब वह बताती है तो सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन क्रांति के प्रयासों से रेवती जैसी कई महिलाएं अब यहां जीना सीख रहीं हैं।
क्रांति इन महिलाओं को जागरूक बनाने के काम के साथ देवास से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही है। दौरे के आखिरी दिन एक रेस्तरां में खाना खाते हुए मैंने उससे पूछा कि वह पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर आगे क्या करेगी तो उसने जवाब दिया कि वह लाॅ करने की सोच रही है। इसके अलावा वह यह फील्ड वर्क भी जारी रखेगी। काम के साथ लाॅ की पढ़ाई क्या संभव हो पाएगा? वह बेहद संजीदा लेकिन हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘अगर मैं पढ़ती नहीं तो मेैं भी आज अपनी बहन ‘रेवती दीदी’ जैसे होती। उन की तरह पिता जी ने मेरी शादी भी 15 साल में कर दी होती और मैं भी दीदी की तरह -----’’
रेवती कौन? मैंने एकदम चैंकते हुए पूछा। रेवती वही बस्ती में रहने वाली जिससे आपने लंबी बातचीत की थी। वह मेरी सगी बहन है। हम दलित जाति से हैं इसलिए पिताजी ने उसकी शादी जल्दी कर दी थी। उसकी शादी के बाद मैंने ठान ली थी कि कुछ भी हो जाए मैं पढ़ना नहीं छोड़ंूगी। इसके लिए मुझे अपने परिवार और बिरादरी से एक लंबा विरोध करना पड़ा।
वह बता रही थी और मैं इस कल्पना से ही सहमी जा रही थी कि उसे अपने को इस श्राप से बचाने के लिए किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा। खुद को इस नरक से बचाने के साथ अपनी बड़ी बहन और उन जैसी कई महिलाओं को बचाने में उसके संघर्ष और साहस के आगे मैं स्वयं और उन महिलाओं के व्यक्तित्व को बेहद बौना महसूस कर रही थी जिन्हें मैं अक्सर चैनल सर्फ करते हुए देखती रहती हूं।
ऐसी ही एक अन्य साहसी मानवी से मेरी मुलाकात राजस्थान के गांव सुरजुनपुर में हुई। अरावली के पर्वत की छाया में खुले आकाश में उसका डेरा था। छोटे छोटे टेंटों में आसमान के नीचे यहां कई परिवार रह रहे हैं। केला भी उन में एक है। केला बंजारन उस समुदाय से है जिनकी गिनती न तो बीपीएल परिवारों में होती है और न ही न ही वोटरों में उनका नाम आता है। जनसंख्या के आकड़ों में भी वे पूरी तरह शामिल नहीं। केला बंजारा जाति सहित घुमंतु समुदाय की अन्य जातियों बावरिया, भोपा और नट जाति के लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए दिनभर उनकी बस्तियों में घूमती रहती है। बच्चों के स्कूलों मे नाम लिखान,े पट्टे की जमीन के लिए आवेदन देने और बुनियादी सेवाएं हासिल करने के अधिकारों के बारे में समुदाय के लोगों को बताना उसका मुख्य मकसद है।
50 साल की केला ने दिल्ली, हरिद्वार सोनीपत, पानीपत जैसे शहरों में ढेरा लगा कर मुलतानी मिट््टी और नमक बेचकर अपने बच्चों को बड़ा किया है। लेकिन अब वह कहती है, ‘‘मेरा मकसद अब केवल अपने समुदाय के लोगों को इस घुमंतु जीवन से छुटकारा दिलाना है। इसके लिए वह राजस्थान में स्थायी डेरा लगा कर महिलाओं के बीच में काम कर रही है। पारंपरिक लहंगा, सिर पर बड़ी सी ओढ़नी, हाथों और पावों में चांदी के दिखने वाले पारंपरिक गहने और बाजूओं पर गोदने के निशान के साथ केला जब तेज तेज चलते हुए एक बस्ती से दूसरी बस्ती तक का लंबा रास्ता तय करती है तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि जीवन के इस पड़ाव में इतने कठिन जीवन जीने के बाद भी वह एक नई उर्जा ओर उत्साह के साथ इतने बड़े मिशन को पूरा करने का संकल्प रखती है। लेकिन अनपढ़ केला समुदाय की महिलाओं की मसीहा बन चुकी है। वह उनकी हर छोटी बड़ी समस्या को बेहद ध्यान से सुनती है और बीचबीच में उससे निपटने की सलाह भी देती जाती है।
राजस्थान के अजमेर जिले के तिहारी गांव की कमला देवी को मिलने के बाद मुझे सेलिबे्रटी की वास्तविक परिभाषा को समझने का एक और अवसर मिला। कमला दिखने में किसी भी देहाती महिला से भिन्न नहीं। सिर पर पल्लू, नाक में बड़ी सी नथ और हाथ पावों में चांदी के चमकते गहने। लेकिन वह साधारण महिलाओं की तरह खाना बनाने या सिलाई बुनाई की बातों की बजाए तारों के सक्रिट चार्ज कंट्रोलर और पैनलों को जोड़कर सौर लालेटन बनाने की जानकारी देती है। उसके द्वारा बनाए सौर लालटेन राजस्थान के गांवों के र्कइं अधेरे घरों और स्कूलों में प्रकाश फैला रहे हैं। कमला जब 12 साल की आयु में अपने ससुराल सिरोंज गांव में आई तो उसने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा था। वह अपनी चारों बहनों की तरह ही बिल्कुल अनपढ़ थी। उसके घर में स्कूल जाने का अवसर केवल उसके भाइयों को ही मिला। उसका काम अपनी बहनों की देखभाल करना, खाना बनाना और पानी ढोना और पशु चराना था। सिरांेज गांव में जब उसने बिजनवाड़ा के रात्रि स्कूल के बारे में सुना तो उसके मन में भी पढ़ने की इच्छा जागृत हुई। उसे लगा कि वह दिन भर घर के सारे काम खत्म कर भी स्कूल जा सकती है। लेकिन उसके पति सास इस बात के लिए तैयार नहीं थे। आखिर उसके ससुर ने उसका साथ दिया और उसने रात्रि स्कूल में पांचवी कक्षा तक पढ़ाई की। रात्रि स्कूल में पढ़ते हुए वह रात के अंधेरे में जलने वाले सौर लैंप से बेहद प्रभावित हुई क्योंकि गैर बिजलीकृत के क्षेत्र में इन लैंपों का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। यही सोच उसे केंद्र के ‘सोलर लाईट’ प्रशिक्षण कोर्स ले गई। इससे पहले गांव की किसी भी महिला ने सौर इंजीनियर का प्रशिक्षण नहीं लिया था। केवल पुरुष ही इसमें दाखिल होते थे। लेकिन अब कमला के कारण क्षेत्र की कई महिलाएं इसमे महारत हासिल कर अपने गावों में उजाला कर रही हैं।क्रांति, केला और कमला जैसी कई महिलाएं बेहद खामोशी से बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्यप्रदेश में बदलाव के नए अध्याय लिख रही हैं लेकिन जरूरत इन्हें पढ़ने और सराहने की है।





Thursday, 9 October 2008

पंचायतों में घुमंतू महिलायें


अन्नू आनंद
(अलवर, राजस्थान)वह समाज के सबसे पिछड़े समुदाय से हैं और समाज केसबसे निचले पायदान पर खड़ी हैं। उनके समुदाय के अधिकतरलोगों को वोट देने जैसे बुनियादी अधिकार भी हासिल नहीं।लेकिन वे अब लोकतंत्र की पहली सीढ़ी पर बेहद मजबूती केसाथ अपने कदम रख चुकी हैं। अपने समुदाय के विकास के लिएउन्होंने स्थानीय शासन का हिस्सा बनकर अपने संघर्ष की शुरूआतकर दी है।ये हैं पिछले वर्ष पहली बार राजस्थान की पंचायतों में नियुक्तहुई नट, बंजारा, बावरिया, भोपा जैसे घुमंतु समुदायों की उत्साही,उद्यमी महिलाएं।32 वर्षीय सावड़ी सूकड़ गांव की विमला पिलखुड़ी पंचायतकी उपसरपंच है। वह घुमंतु समाज के नट समुदाय से है औरकाफी समय से नट समाज की मुखिया रह चुकी है। विमला औरउसके परिवार की अन्य महिलाएं दौसा, भरतपुर और अलवर केग्रामीण इलाकों में नाच, तमाशा और नौटंकी कर अपनी जीविकाचलाते हैं। दिल्ली-जयपुर हाईवे से कुछ किलोमीटर की दूरी परबसी सावड़ी बस्ती में सात-आठ सौ परिवार रहते हैं। कच्चे-पक्केघरों में रहने वाले अधिकतर लोग नट समुदाय के हैं। गांव केकालूराम नट बताते हैं, ‘‘हमारे परिवारों में महिलाएं नाचती हैं यातमाशा करती है और पुरुष ढोलक आदि बजाने का काम करतेहैं। हम दीवाली के समय घरों से निकलते हैं और होली पर वापसघर लौटते हैं।’’ कुछ लोगों ने अब इस काम को छोड़कर अन्यछोटे-मोटे व्यवसायों को अपनाया है लेकिन जीविका के अभाव मेंउन्हें अपने पारंपरिक काम को ही करना पड़ता है। लेकिन अबउन्होंने निरंतर घुमंतु जीवन को छोड़कर पिछले कई वर्षों से यहींअपना स्थायी ठिकाना बना लिया है।विमला ने जब उपसरपंच के लिए अपना नामांकन भरा तोउसे कई गांवों का विरोध सहना पड़ा। विमला बताती है, ‘‘गांव केदूसरी जाति के लोगों ने स्पष्ट कह दिया कि हम नटिनी को बड़ापद नहीं देंगें। हमारा रास्ता भी रोक लिया गया। लेकिन नटसमुदाय के सहयोग से मैंने चुनाव लड़ा और 17 वोटों से जीतगई।’’उपसरपंच के रूप में विमला ने सबसे पहले गांव में पानी कीसमस्या को दूर करने के लिए नल लगाने का काम किया। गांवमें मौजूद दो पम्प गांववालों की पानी की जरूरतें पूरी करने केलिए काफी नहीं थे। उसने पंचायत में मामला उठाया और फिरएक नया पम्प लग गया। लेकिन उसकी मुख्य चिंता गांव की ओरजाने वाले रास्ते को पक्का बनाने की है।विमला पंचायत की हर बैठक में जाती है। पंचायत प्रतिनिधिबनने के बाद उसने बाहर गांवों में जाने का अपना काम भी कमकर दिया है ताकि विकास के कामों में अधिक रूचि ले सके।विमला के मुताबिक गांव में 40-50 बीघा जमीन एनीकट बनाने केलिए पड़ी है। लेकिन एनीकट न बनने के कारण बरसात के दिनोंमें इसमें पानी भर जाता है जिससे पूरे गांव में कीचड़ और गंदगीफैल जाती है। इसलिए उसकी मुख्य चिंता यहां एनीकट बनाने कीहै। विमला जिस उत्साह से पंचायत कार्यों में दिलचस्पी ले रही हैउसको देखकर लगता है कि वह बहुत जल्द नट समुदाय केविकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगी।पारंपरिक लहंगा, ओढ़नी चांदी के गहने और बाजूओं परगोदने के बड़े बड़े निशान-- यह है गांव राढ़ी की 45वर्षीय मूमलबंजारन, जो बामनवास कांकड़ पंचायत से निर्विरोध वार्ड पंचनियुक्त हुई है। अलवर से 20-25 किलोमीटर की दूरी के बादएक किलोमीटर तक पक्की चट्टानों का रास्ता तय करने के बादयह बस्ती आती है। मूमल और उसके गांव के अधिकतर लोगबेवाड़ी, अलवर और राजस्थान के अन्य गांवों में नमक औरमुलतानी मिट्टी बेचकर गुजारा करते हैं। यह जानकर किसी को भीहैरत हो सकती है कि हमारे यहां आज भी वस्तुओं की अदला-बदलीप्रचलित है।मूमल बताती है कि एक मुट्ठी गेहूं के बदले चार मुट्ठी नमकदेना पड़ता है। गेहूं को बनिए को बेचकर वे लोग अपनी जरूरतोंको पूरा करते हैं। यह उनका पारंपरिक व्यवसाय है। अब वे कईअन्य छोटे-मोटे काम भी करते हैं लेकिन उसके समुदाय की मुख्यआय का साधन गांवों में गधों पर लादकर नमक और मुलतानीमिट्टी ही बेचना है।वार्ड पंच के रूप में उसकी मुख्य समस्या गांव में बिजली कीव्यवस्था करना है। उसने बताया कि गांव के पास की सड़क तकलाईट आती है लेकिन उनकी बस्ती को कनेक्शन नहीं दिया जारहा क्योंकि बस्ती के लोगों के पास पट्टे नहीं हैं। मूमल केमुताबिक, ‘‘पहले हम लोग एक जगह पर नहीं रहते थे लेकिनपिछले कई सालों से हमने अपना यहां स्थायी ठिकाना बना लियाहै लेकिन आज दो-तीन दशक बिताने के बाद भी हमें जमीन केपंचंचंचायतों ें में ें गूंजूंजूंजी घुमुमुमंतंतंतुअुअुओं ें की आवाज़अन्नू आनंदंदंदपट्टे नहीं मिले हैं। उसने बताया कि पंचायत में उसने बिजली औरसड़क को पक्का बनाने का मुद्दा उठाया है लेकिन उसे अन्यसदस्यों का सहयोग नहीं मिल रहा।मूमल के मुताबिक, ‘‘हमने पंचायत में जगह तो बना ली है औरहम अपनी बात रखने में समर्थ हैं लेकिन वहां अभी भी हमारे साथभेदभाव किया जाता है। विकास की सारी बहस गुज्जरों केसुझावों पर ही होती है। हमें अपनी बात मनवाने में अभी और समयलगेगा’’।किशोरी पंचायत की शारदा बंजारन का भी यही मानना है।वह कहती है कि मुलतानी मिट्टी और नमक बेचकर वह जो भीकमाती है वह भी बीडीओ के पास चक्कर लगाने में खर्च हो जाताहै। लेकिन वह पंचायत की हर बैठक में उपस्थित रहना चाहती हैताकि वह जान सके कि विकास कार्यों का पैसा कहां खर्च हो रहाहै। पृथ्वीपुरा पंचायत की सुआ बंजारन भी अपने गांव में पानी कानल लगाने के लिए संघर्ष कर रही है। वह शिकायत करती है,‘‘पंचायत बैठक में वह मेरी हर मांग लिखते हैं लेकिन जब मैंबीडीओ के पास जाकर पूछती हूं कि क्या हुआ है तो मुझे जवाबमिलता है कि यह प्रस्ताव तो आया ही नहीं।’’गेंदी बावरिया विराटनगर से केवल दो किलोमीटर की दूरी परबसे गोपीपुरा बस्ती से सोठाना ग्राम पंच नियुक्त हुई है। बावरियासमुदाय के लोग लंबे समय से जंगली जानवरों का शिकार करतेआए हैं। लेकिन 1972 में जानवरों के शिकार पर प्रतिबंध लगने केबाद से वे खेतों की जानवरों से रखवाली या पशुओं को चराने काकाम कर अपनी जीविका चलाते रहे हैं। 1871 में लागू एक्ट केतहत उन्हें आपराधिक जाति दबाव अधिनियम में शामिल कर लियागया था। इसी प्रकार भारत सरकार ने 1952 में इस अधिनियम कोखत्म कर इन पर आदतन अपराधी अधिनियम लागू कर दिया।जिसकी वजह से वे नागरिकों, पुलिस और दूसरे कानून लागू करनेवाली एजेंसियों के शोषण का शिकार हो रहे हैं।गेंदी बाई सहित उसके गांव के करीब पांच सौ परिवारों नेपिछले 14 वर्षों से घुमंतु जीवन छोड़कर राजस्थान की इस बस्तीमें अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। गेंदी बाई बताती है, ‘‘इतनेसालों के बाद भी हमें न तो जमीन के पट्टे मिले हैं और न ही उन्हेंकहीं और बसाया गया है। बस्ती में सबसे बड़ी दिक्कत पानी कीहै। गांव से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर लगे एक नल सेसमूची बस्ती पानी की जरूरतों को पूरा कर रही है। पंचायत मेंहमारी सुनवाई नहीं होती। सरपंच ब्राह्मण जाति का है इसलिएबैठक में हमारी कोई नहीं सुनता।’’ गेंदी और उसकी बस्ती केलोग जिस बस्ती में रह रहे हैं वह वन क्षेत्र की जमीन घोषित हैइसलिए उसे और उसके परिवार वालों को अक्सर वन अधिकारियोंकी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है।’’ गेंदी बताती है, ‘‘हमारेघर में एक लकड़ी के टुकड़े को देखते ही जुर्माने की परची कटजाती है।’’इन सब समस्याओं के बावजूद पंचायत बैठक में वह अपनीबात रखने में संकोच नहीं करती। वह अभी पंचायत की बैठक सेलौटी है जिसमें विधवा पेंशन और बीपीएल कार्ड से संबंधित कुछफैसले लिए गए। गेंदी कहती है, ‘‘आज नहीं तो कल उन्हें हमारीसमस्याओं को सुनना ही पड़ेगा आखिर कब तक वे हमें खामोशरख पाएंगे।’’भोपा समुदाय की शीला केसरोली ग्राम पंचायत की वार्ड पंचनिर्वाचित हुई हैं। 45 वर्षीय शीला 120 भोपा परिवारों के साथपिछले तीन वर्षों से रामगढ़ गांव (भोपावास) में स्थायी रूप से रहरही है। भोपा समुदाय के लोग गाकर और पुरानी चित्रकलाओं कीकहानियां सुनाकर अपना पेट भरते आए हैं। शीला और उसकेपति आज भी गांव के लोगों का सारंगी बजाकर मनोरंजन करतेहैं। शीला ने सारंगी बजाना अपने घर के बड़े-बूढ़ों से सीखा है।शीला की बस्ती में 40-50 घर हैं। घास-फूस और मिट्टी के बनेइन घरों के पट्टे किसी के पास नहीं। गांव के सभी बच्चे खुले मेंपढ़ते हैं। पानी का भी कोई प्रबंध नहीं है।शीला के मुताबिक वह हर पंचायत की बैठक में बस्ती में पानीऔर बिजली की समस्या के बारे में बताती है। लेकिन पंचायत केलोग हमसे लिखवा तो लेते हैं पर उसका समाधान नहीं होता। वहबताती है, ‘‘लेकिन मैं चुप नहीं बैठूंगी। मैं अपनी मांगें तब तकरखती रहूंगी जब तक कि वे पूरी नहीं हो जातीं।’’पंचातयों में निर्वाचित घुमंतु समाज की इन महिलाओं कीसमस्या पंचायत बैठकों में न बोल पाना या पंच/सरपंच पति नहींहै। जिस बड़ी समस्या का सामना इन्हें करना पड़ा है वह हैविभिन्न जातियों के लोगों द्वारा इनकी स्वीकृति। इनके अस्तित्वको स्वीकारना और उनके साथ समान बर्ताव करना।घुमंतु समुदाय के विकास के लिए कार्यरत मुक्ति धारा संस्थाके संस्थापक रतन कात्यायनी के मुताबिक, ‘‘ये महिलाएं जागरूकहैं और स्थानीय प्रशासनिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आगे आरही हैं। वे पंचायत बैठकों में बोलने से नहीं डरती लेकिन समाजउनके प्रति भेदभाव करता है। लेकिन समय के साथ और इनमहिलाओं की क्षमता से उसमें बदलाव आएगा।’’ कात्यायनी कोपूरी उम्मीद है कि ये घुमंतु महिलाएं अपने संकल्प में आखिरसफल होंगी। मुक्तिधारा पहली बार पंचायतों में चुनकर आने वालीइन महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए एक हजार रुपए प्रतिमाह की फेलोशिप दे रहा है।

मध्यप्रदेश में युवाओं ने किया गावों का कायाकल्प


अन्नू आनंद


(सीहोर, मध्य प्रदेश)


अरुण के चेहरे की मासूमियत और आंखों से झलकती शरारतदेखकर यह कयास लगाना कठिन था कि गांव के विकास मेंउसका भी कोई योगदान हो सकता है। किसी भी अजनबी केआगमन से बेखबर वह बड़ी तन्मयता के साथ गांव के बीचोबीचबने छोटे से चबूतरे पर एकत्रित हुए गांव के सभी छोटे-बड़े बच्चोंके हाथों के नाखूनों की जांच कर रहा था। ‘‘क्या तुम्हारे हाथों केनाखून कटे हैं,’’ इस सवाल को सुनते ही उसने अपनी गर्दन ऊपरउठाई और अपने कटे हुए नाखून वाले हाथ झट आगे कर दिए।इतना करने के बाद वह फिर से अपने काम में मग्न हो गया।दस वर्षीय अरुण मेवाड़ा गांव की ‘आजाद बाल विकाससमिति’ का सदस्य है। गांव के सभी बच्चों की साफ-सफाईजांचने की जिम्मेदारी इस समिति पर है। गांव में पोलियो कीखुराक दी जा रही है। धीरज और हृदयेश गांव के पांच वर्ष तकके सभी बच्चों को पोलियो बूथ भेजने का काम संभाले हुए थे।दोपहर तक वे गांव के सभी बच्चों को दवाई पिलाने का काम पूराकर चुके थे। 12 वर्षीय प्रमोद सभी घरों की दीवार पर बने सफाईके ग्राफ को चाक से भरने का काम कर रहा था। यह ग्राफ बताताहै कि अमुक घर में आज नाली की सफाई, घर के बाहर की सड़ककी सफाई और शौचालय की सफाई की गई है या नहीं।यह दृश्य है राजूखड़ी गांव का। भोपाल से करीब 45 किलोमीटरकी दूरी पर सीहोर जिले के दस गांवों में पानी, शौचालय औरस्वच्छता के सामुदायिक प्रयासों ने गावों का पूरी तरह कायाकल्पकर दिया है।तीन वर्ष पहले तक इन गावों में पानी की बेहद कमी थी बहुतसे घरों में शौचालय न होने के कारण गंदगी और पेट कीबीमारियां अधिक थीं। अधिकतर लोग शौच के लिए खुले में जातेथे। बच्चों में भी स्वच्छता की जानकारी का अभाव था। इस सबकाअसर गांव के अन्य विकास कार्यों पर भी पड़ रहा था। गांव केज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाते थे क्योंकि गांव का इकलौताप्राइमरी स्कूल कभी-कभार ही खुलता था।वर्ष 2005 में भोपाल के गैर सरकारी संगठन ‘समर्थन’ नेसीहोर ब्लाॅक के 10 गावों में जल और शौचालय की एक परियोजनाकी शुरूआत की। इसके लिए यूके की एजेंसी ‘वाॅटर एड्’ सेवित्तीय मदद ली गई। संस्था ने प्रत्येक परिवार को घर मेंशौचालय बनाने के लिए 500 रुपए की मदद दी। शेष 2000 रुपएका खर्चा स्वयं परिवारों ने वहन किए। इसके अलावा उन्होंनेशौचालय बनाने में श्रम दान भी किया।सीहोर से करीब चार किलोमीटर कच्चा रास्ता पार करने केबाद राजूखड़ी गांव पहुंचा जा सकता है। गांव में कुल 88 घर हैंजिनमें से 80 परिवार पिछड़े वर्ग और आठ परिवार अनुसूचितजाति के हैं। यहां के अधिकतर लोग खेतों मंे मजदूरी का कामकरते हंै। गांव में करीब सभी घर कच्चे हैं, रास्ता भी कच्चा हैलेकिन फिर भी गांव का साफ-सुथरा और व्यवस्थित वातावरणकिसी काल्पनिक गांव का अहसास देता है। गांव के सभी घरों मेंशौचालय मौजूद है। घरों के गंदे पानी के निकास के लिए हर घरके बाहर एक पाइप की व्यवस्था है। इस पाइप को घर के बाहरबनाए गए सोक्ता (सोक-पिट) से जोड़ा गया है। सोक्ता के ऊपरबोरी का टुकड़ा लगा रहता है ताकि गंदी मिट्टी पानी के साथछनकर अंदर न जाए।इस व्यवस्था के बारे में गांव के सरपंच चंदन सिंह बताते हैं,‘‘गांव के पानी का स्तर कम न हो जाए इसलिए घरों से निकलनेवाले पानी को सोक-पिट के माध्यम से रिचार्ज किया जाता है।इसके अलावा पानी को संरक्षित करने के लिए मिली 36 हजाररुपए की सरकारी सहायता और गांववालों की मजदूरी की मददसे स्टाॅप डैम और चेक डेम भी बनाए गए हैं।’’गांव में लगे चार सार्वजनिक नल के अलावा कपड़े धोने केलिए अलग से प्लेटफाॅर्म बने हुए हैं। इन नलों और प्लेटफाॅर्म कीसफाई के लिए जिम्मेदार बाल समूह समिति के सदस्य प्रमोदबताते हैं कि किसी को भी नल के नीचे कपड़े धोने की इजाजतनहीं है क्योंकि इससे अन्य लोगों को पानी लेने में दिक्कत होतीहै और नल के नीचे गंदगी भी फैलती है।कुल 21 घरों में वर्षा का पानी संरक्षित करने की भी व्यवस्थाकी गई है। चंदन सिंह के मुताबिक, ‘‘तीन वर्ष पहले यहां पानीऔर शौचालय मुख्य समस्याएं थीं लेकिन स्थानीय संस्था ‘समर्थन’ने जब ‘पानी, स्वच्छता और शौचालय’ की परियोजना गांव में शुरूकी तो सभी परिवारों ने आर्थिक और श्रम का योगदान देकर इसेसफल बनाने में पूरा सहयोग किया।’’ इसके लिए बच्चे, युवा,महिला और पुरुष विभिन्न स्तरों पर अपना योगदान दे रहे हैं। हरग्रामीण को हिस्सेदार बनाने के लिए गांव में विभिन्न समितियांमप्र में ें युवुवुवा औरैरैर बच्चों ें ने किया गांवंवंवों ें का कायाकल्पअन्नू आनंदंदंदबनाई गई हैं। पांच से बारह वर्ष तक के बच्चों का ‘बाल समूह’ हैजिसकी जिम्मेदारी व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना है। इसकेअलावा वे गांव के हैंडपंप, वाशिंग प्लेटफाॅर्म और घर की साफ-सफाईका भी संचालन करते हंै। गांव के युवाओं का समूह ‘युवा विकासमंडल’ सामुदायिक संरचनाओं जैसे गांव के कुएं, टंकी, स्कूल औरस्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं की देखभाल करता है।‘युवा विकास मंडल’ के सदस्य धर्म प्रकाश ने बताया, ‘‘पिछलेकई वर्षों से हमारे गांव का प्राइमरी स्कूल केवल दो घंटे के लिएही खुलता था क्योंकि स्कूल की शिक्षिका भोपाल में रहने के कारण12 बजे के करीब स्कूल आती थी। हमारी समिति ने शिक्षिका सेकई बार इसकी शिकायत की। लेकिन कोई कार्रवाई न होने परहमने स्कूल में ताला लगा दिया और चेतावनी दी कि स्कूल पूरासमय नहीं खुला तो इसे बंद कर दिया जाएगा।’’युवा समिति की इस चेतावनी पर शिक्षिका ने अपने रहने कीव्यवस्था सीहोर में ही कर ली और अब स्कूल नियमित समय परखुलने लगा। इसी प्रकार इन युवाओं ने गांव में आने वालीअनियमित डाक के खिलाफ सूचना के अधिकार के तहत शिकायतदर्ज की तो पता चला कि गांव का डाकिया गांव की डाक नहीं लेजाता जिसकी वजह से काफी डाक पड़ी रहती है।धर्म प्रकाश के मुताबिक, ‘‘हमारी शिकायत के बाद अब रोजडाकिया आता है और गांव के बहुत से युवा जिन्हें अपने नौकरी केआवेदन के जवाब का इंतजार रहता था, वे अब अपने पत्रों केजवाब से खुश हैं।’’राजूखड़ी गांव में आज स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और साफ-सफाईसब कुछ नियमित ढंग से चल रहा है। इसका पूरा श्रेय गांव कीसामूहिक भागीदारी को जाता है। गांव की महिलाएं स्वयं सहायतासमूह की सदस्य हैं। बचत के पैसे का इस्तेमाल ये महिलाएंछोटे-मोटे धंधे की शुरूआत में लगाती हंै।गांव में एक छोटे लेकिन बेहद ही सलीकेदार ढंग से सजेकमरे को ‘सूचना कंेद्र’ बनाया गया है। इस केंद्र में गांव में लागूहर सरकारी योजना की जानकारी के अलावा गांव से संबंधितदूसरे हर प्रकार की सूचना उपलब्ध है।सीहोर से आठ किलोमीटर दूर मानपुरा गांव में भी पानी औरशौचालयों की व्यवस्था ने पूरे गांव का नक्शा बदल दिया है। इसगांव में भी पानी की बेहद किल्लत थी। गांव के बीचोबीच बनेपुराने कुएं का जलस्तर भी काफी नीचे चला गया था। वर्ष के कुछमहीने ही यहां पानी उपलब्ध होता था। इस कमी को पूरा करने केलिए ‘समर्थन’ संस्था की मदद से यहां भी पानी और शौचालययोजना के तहत पानी आपूर्ति, शौचालय और स्वच्छता की एकीकृतपरियोजना शुरू की गई। इसके लिए समुदाय ने स्वयं औरसरकारी माध्यमों से फंड एकत्रित किया।यहां घरों की छतों पर वर्षा के पानी को संरक्षित किया जा रहाहै। कुल 60 घरों वाले इस गांव के हर घर की छत पर पानी कोएकत्रित करने की व्यवस्था है। पाइपों के माध्यम से वर्षा के पानीको पुराने कुएं में पहुंचाया जाता है। जिससे पानी रिचार्ज होकरनल में आता है। गांव के स्कूल में मिड-डे मील के प्रभारी दशरथका मानना है कि प्रोजेक्ट की शुरूआत से पहले गांव में दिसंबरआने तक पानी खत्म हो जाता था, लेकिन इस बार जनवरी-फरवरीमाह में भी पानी नलों में आ रहा है।सरकारी और सामुदायिक सहायता से दो लाख 36 हजाररुपए की लागत वाली 20 हजार लीटर पानी की एक बड़ी टंकीबनाई गई है। इस टंकी को पाइप के माध्यम से गांव की कुछ दूरीपर बने एक बोरवेल से पानी मिलता है। इस से गांव के 8सामूदायिक नल चल रहे हंै। इन नलों से पानी का इस्तेमाल करनेवाले परिवारों को गांव की ‘पानी और शौचालय निगरानी समिति’को दस रुपए प्रति माह फीस देने पड़ते हैं। इसके अलावा समिति30 रुपए प्रति माह की दर से घरों में भी पानी का कनेक्शन देतीहै।‘एकता युवा मंडल’ के पिंटू गांव के घरों की छत पर बने वर्षाके पानी को संरक्षित करने वाले ढंाचे को दिखाते हुए कहते हैं,‘‘कुछ साल पहले तक हमें पानी लेने के लिए एक किलोमीटर दूरजाकर बैलगाड़ियों पर पानी लाना पड़ता था, लेकिन अब हमनेपानी को बचाना सीख लिया है। अब हमें पानी की कोई कमी नहींहै।’’ पानी और शौचालयों से आई खुशहाली के बाद ग्रामीण जलऔर शौचालय समिति ने गांव में मिडिल स्कूल खोलने के प्रयासकिए। आज गांव में मिडिल स्कूल भी है जिसमें अन्य दो गावों केबच्चे पढ़ने आते हैं।‘समर्थन’ संस्था के जिला समन्वयक शाफिक का कहना है किराजूखड़ी, मानपुरा और जहांगीरपुरा सहित जिले के दस गांवों मेंआने वाले इस सार्थक बदलाव का मुख्य कारण सामूहिक भागीदारीहै। इसमें बच्चों और युवाओं की भगीदारी सबसे अधिक है, जोविभिन्न समितियों के माध्यम से इसे अंजाम देते हैं। इसके अलावापानी और शौचालयों के स्थाई संचालन के लिए हम पंचायतों कीक्षमता का निर्माण करते हैं। इसलिए कोई भी निर्णय पंचायतों कीभागीदारी के बिना नहीं होता।‘समर्थन’ के सामुदायिक समन्वयक लाखन सिंह के मुताबिककिसी भी योजना को लागू करने से पहले पंचायत समिति में उसपर बहस की जाती है। पंचायत सदस्य किसी भी मसले कोनिपटाने के लिए ग्रामसभा बुलाते हैं और सबकी सहमति से निर्णयलिया जाता है। राजूखेड़ी गांव के सरपंच चंदन सिंह का कहना हैकि उनके गांव की चैपाल आज भी संसद का काम करती है।सारे फैसले आज भी चौपाल पर ही लिए जाते हैं।साामूहिक भागीदारी की इस परियोजना ने यहां के लोगों केजीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। शाफिक के मुताबिक पानीऔर शौचालय योजना की इस सफलता को देखते हुए जिले केअन्य गांव भी इसे अपनाना चाहते हैं। 􀂄

Monday, 6 October 2008

शिक्षा का प्रकाश फैलाते रात के स्कूल

अन्नू आनंद
(तिलोनिया, राजस्थान)
रात के आठ बजे का समय। जयपुर से करीब 120 किलोमीटरकी दूरी पर स्थित गांव तिलोनिया में एक स्कूल में सौर उर्जालैम्पों की रोशनी में 6 से 13 वर्ष की आयु के करीब 32 बच्चे पढ़नेमें तल्लीन हंै।जयपुर से अजमेर तक का अधिकतर रास्ता अरावली कीबंजर पहाड़ियों और पथरीली जमीन से घिरे होने के कारण अधिकही सुनसान है। रात का अंधेरा इसे और भी वीरान बना देता है।ऐसे वातावरण में स्कूलों से गूंजती बच्चों की प्रार्थनाओं की आवाजकिसी को भी हैरत में डाल सकती है।लेकिन यह द्वश्य केवल तिलोनिया गांव का नहीं। जयपुरऔर अजमेर और सीकर जिलों के कुछ गावों में चलने वाले रात्रिस्कूल इस समय कई परिवारों में शिक्षा का प्रकाश फैला रहे हैं।हालांकि सरकार शिक्षा आप के द्वार योजना के तहत हर बच्चे कोशिक्षित करने का दम भरती है लेकिन हकीकत में ऐसे बच्चों कीकमी नहीं जो गरीबी के कारण पारिवारिक आय में सहयोग करनेके कारण दिन के स्कूलों से बाहर हैं। यह बच्चे दिन के समयखेतों में मजदूरी या लकड़ियां लाने, पशुओं को चारा चराने तथापानी लाने के अलावा र्कइं घरेलू काम निपटाते हैं। इस के अलावादिन के स्कूलों की अधिकतर शिक्षा उनकी व्यावहारिक जरूरतोंकी दृष्टि से उपयोगी नहीं होती। इन स्कूलों में पढ़ाने का माध्यमग्रामीण बच्चों की रोजाना की भाषा से पूर्णतया भिन्न होता है।स्कूल का पाठ्यक्रम उनके परिवेश को ध्यान में रखकर नहींबनाया जाता। पांचवी या सांतवी पास करने के बाद भी छात्रकिसी प्रकार की हस्तकला या खेती बाड़ी के कामों में दक्ष नहीं होपाते। ये कारण ग्रामीण इलाकों के बहुत से बच्चों को औपचारिकशिक्षा प्रणाली से दूर रखते हैं।लेकिन तिलोनिया स्थित बहुचर्चित संस्था समाज कार्य एवंअनुसंधान क्षे़त्र (बेयरफुट कालेज) ने इन बच्चों को उनकी जरूरतोंके मुताबिक शिक्षित करने के लिए रात्रि स्कूलों की शुरूआत कीहै। इन स्कूलों के कारण बच्चे दिन भर अपने कामकाज खत्म कररात को सात बजे स्कूल पढ़ने आते हैं। यह स्कूल सामुदायिकभवन, धर्मशाला या किसी औपचारिक स्कूल की इमारतों में चलतेहैं।अजमेर जयपुर और सीकर जिले के गांवों में 150 ऐसे स्कूलचल रहे हैं। जिन में 3000 के करीब बच्चे पढ़ते हैं। इन में 90प्रतिशत संख्या लड़कियों की है। इन स्कूलों की सफलता सेप्रोत्साहित होकर केंद्रीय सरकार ने भी अन्य कई राज्यों मंे ऐसे125 रात्रि स्कूल खोले हैं।इन स्कूलों की देख-रेख का काम बेयरफुट कालेज काशैक्षणिक स्टाफ देखता है। स्कूलों का पाठ्यक्रम बच्चों की जरूरतोंऔर उनके परिवेश को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है।स्कूलों में मुख्यतः पर्यावरणीय शिक्षा, हस्तकला के अलावा हिन्दीऔर गणित पढ़ाए जाते हैं।इसके अलावा पाठयक्रम को गावों की सामाजिक- आर्थिकऔर पर्यावरणीय स्थितियों से भी जोड़ा जाता है। ये स्कूल केवलपांचवी कक्षा तक ही सीमित हंै। चैथी और पांचवी की कक्षाओं मेंसरकारी स्कूलों के पाठयक्रम को भी शामिल किया जाता है ताकिरात्रि स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे बाद में औपचारिक स्कूलों में भी प्रवेशपा सकें।तिलोनिया स्थित रात्रि स्कूल नं 1 की कुल पांच लड़कियों नेपिछले वर्ष बोर्ड की परीक्षा पास की है। यहां कुल 32 छात्र हैं। इनमें लड़कियों की संख्या अधिक है। यह स्कूल 1998 से एक पुरानीखाली पड़ी धर्मशाला में चल रहा है। इस स्कूल में पढ़ने वाली10-11 वर्षीय जमुना दिन के समय पानी और लकड़ी लाने काकाम करती है। अनु दिन में बकरियां चराती है इसी तरह चंतादिन में घरेलु काम निपटाती है। यहां पढ़ाने की जिम्मेदारी दो अध्यापकों मुल्ला राम और चंद्रकातां पर है। मुल्ला राम हायर सेंकड्रीपास हैं जबकि चंद्रकाता सांतवी पास। बच्चों को पढ़ाने के बादरात नौ बजे अध्यापक सभी बच्चों को उनके घरों में छोड़ने के बादघर जाते हैं। चंद्रकाता हिन्दी और कला पढ़ाती हैं। च्ंाद्रकांताबताती है, ‘‘जब बच्चे रात के स्कूलों मंे पढ़ने के लिए आते हैं तोवे थके हुए होते हैं इसलिए हमें पढ़ाई को रूचिकर बनाने के लिएखेल और अन्य रूचिकर माध्यमों का इस्तेमाल करना पड़ता है।क्योंकि अगर पढ़ाई दिलचस्प नहीं होगी तो बच्चे पढ़ने नहींआएंगे।12 वर्षीय नदूं बताता है कि, ‘‘उसे रात में स्कूल आना अच्छालगता है। दिन में घर के कामों के कारण कोई स्कूल भेजता भीनहीं।’’ सात वर्षीय वनफूल बड़ी उत्सुकता से अपनी कापियांदिखाती है कि उसने गिनती और क ख ग सीख लिया है। उसकीशिक्षा का प्रक्रक्रकाश फैलैलैलाते रात के स्कूलूलूलअन्नू आनंदंदंदशादी हो चुकी है। यहां पढ़ने वाली दस वर्षीय चांत कुमारी भीविवाहित हैं। बचपन में हुई इस शादी की व्यर्थता को अब वे शिक्षाके माध्यम से समझ रही हैं। सभी स्कूलों में शिक्षकों के चुनाव कीजिम्मेदारी ग्राम सभा की शिक्षा समिति ही करती है। इस समितिमें गांव के कुछ वरिष्ठ व्यक्ति शामिल रहते हैं। सलाह-मशिवरे केअलावा ये समितियां स्कूलों के बजट बनाने का काम भी देखतीहैं।शिक्षक के चुनाव में शिक्षा स्तर की बजाय ऐसे व्यक्ति कोअधिक प्राथमिकता दी जाती है जो समुदाय के प्रति जिम्मेदार होऔर अच्छे प्रेरक का काम कर सके। इन शिक्षकों को बेयरफुटकालेज की ओर से प्रशिक्षण भी दिया जाता है। बेयरफुट कालेजके संस्थापक बंकर राय के मुताबिक इन स्कूलों से निकलने वालेकई अच्छे छात्र और छात्राएं उनके संस्थान में बतौर बेयरफुटइंजीनियर कार्य कर रहे हैं और वे रात्रि स्कूल से शिक्षित लोगों कोप्राथमिकता भी देते हैं।’’

Friday, 26 September 2008

सामुदायिक पुलिस व्यवस्था से गावों में सुधार

(रायपुर, छत्तीसगढ़)

अन्नू आनंद

धनेली गांव की 19 वर्षीया रानी साहू की आखों में खुशी साफदेखी जा सकती थी। अपने बाएं हाथ की बैसाखी को संभालते हुए,बड़े-बड़े कदमों के साथ गांव की तंग गलियों से गुजरते हुए वहबड़े उत्साह के साथ उन घरों की ओर इशारा करती जा रही थीजहां पहले या तो अवैध शराब की भट्ठी चलती थी या अवैध शराबबिकती थी। लेकिन अब यहां भट्ठी का कोई नामो-निशान नहीं है।रानी का कहना है, ‘‘अब आपको गांव में अवैध शराब की कोई भट्ठीनहीं मिलेगी। हमारे गांव में अब शांति है। शराब के कारण अबगांव में कोई दंगा नहीं होता। अगर कोई बाहर से लाकर भी यहांशराब बेचने की कोशिश करता है तो ग्रामीणों के साथ होने वालीमासिक बैठक में उसे उठाया जाता है और दोषी व्यक्ति केखिलाफ कार्रवाई की जाती है।’’ अपनी बड़ी-बड़ी आखों को औरबड़ा करते हुए बड़े गर्व के साथ बताती है कि बहुत सालों के बादइस बार होली गांव में शांतिपूर्वक बीती। ‘‘न कोई लड़ाई-झगड़ाहुआ और न ही किसी के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज हुई। अबतो हमारा गांव काफी सुधर चुका है।’’रानी की बातों में सचाई थी। 1200 की जनसंख्या वाले रायपुरजिले के इस गांव में सुधार की छाया साफ दिखाई दे रही थी।गांव की जो महिलाएं पति या घर के अन्य सदस्यों के शराब पीनेके कारण परेशान रहती थीं, अब महिला समूह के माध्यम से गांवके बेकार पड़े तालाब को खरीद कर उसमें मछली पालन काव्यवसाय शुरू करने की योजना बना रही हैं। कुछ समय पहलेतक पति की मारपीट को चुपचाप सहन करने वाली यहां की अध्िाकतर महिलाएं अब जानती हैं कि उन्हें ऐसी स्थिति में क्या करनाहै। गांव के प्राथमिक स्कूल में बच्चों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़रही है। गांववाले गांव में होने वाले किसी भी प्रकार के लड़ाई-झगड़ेकी सूचना के अलावा पानी, सिंचाई या स्कूल से संबंधित शिकायतको समुदाय संपर्क समूह यानी कम्युनिटी लेसन ग्रुप (सीएलजी) केसदस्य को देते हैं। संपर्क समूह का यह सदस्य उसे बाद में गांवमें होने वाली पुलिस अधिकारियों के साथ सामुदायिक कानूनव्यवस्था की बैठक में उठाता है।धनेली गांव में ऐसे संपर्क समूह के 12 सदस्य हैं जो गांव मेंकानून व्यवस्था कायम रखने तथा ग्रामीणों को उनके अधिकारों केप्रति सचेत करने का काम कर रहे हैं। रानी भी ऐसे ही एक संपर्कसमूह की सदस्य है और वह गांव की किसी प्रकार की समस्या कोसुलझाने में हमेशा उत्सुक रहती है।जिले के अन्य गांव टेमरी की महिला बुकय्या साहू जब गांवकी सरपंच बनी तो वह यहां के पुरुषों की शराब की लत से बेहददुखी थी। सरपंच बनने के बाद उसके लिए सबसे बड़ी चुनौतीगांव में चलने वाली अवैध शराब की भट्ठी को बंद कराना था। वहबताती है कि पंचायत के पुरूष सदस्यों का मानना था कि जब वेपंचायत की बैठक में पीकर आते हैं तभी बाघ बन पाते हैं। वे हंसतेहुए कहती है, ‘‘लेकिन पिछले करीब एक साल से सभी ‘बाघ’बकरी बन चुके हैं क्योंकि अब गांव के अधिकतर पुरुष न तो शराबपीते हैं और न ही लड़ाई-झगड़ा कर सकते हैं क्योंकि वे जानतेहैं कि इसकी तुरंत रिपोर्ट पुलिस थाने में हो जाएगी। इसलिएहमारी पंचायत में अब काम होने लगा है।’’रानी और बुकय्या साहू अपने गांवों में आए इस बदलाव कापूरा श्रेय ‘सामुदायिक पुलिस व्यवस्था’ को देते हैं। मानव अधिकारोंपर कार्य करने वाली दिल्ली स्थित गैर सरकारी संस्था ‘कामनवेल्थह्यूमन राइटस इनिशिएटिव’ और राज्य मानव अधिकार आयोग केसहयोग से वर्ष 2004 से पाॅयलट प्रोजेक्ट के रूप में यह योजनारायपुर जिले के माना पुलिस स्टेशन से चल रही है। योजना कामुख्य उद्देश्य पुलिस और समुदाय के परस्पर संबंधों को बेहतरबनाकर गांवों में कानून व्यवस्था कायम करना और ग्रामीणों कोउनके कानूनी अधिकारों के प्रति सचेत कर उन्हें सबल बनाना है।अपनी तरह के इस अनोखे माॅडल को माना पुलिस स्टेशन से 12गांवों की 33 हजार जनसंख्या पर चलाया जा रहा है।आदिवासियों से घिरे इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या अवैधशराब, सट्टा, जुआ और गैर सामाजिक तत्व है। अधिकतर गांवों मंेअवैध शराब के कारण समूचा सामाजिक ताना-बाना बिखरा हुआथा। देश की अधिकतर जनसंख्या की तरह यहां के गांवों के भीभोले-भाले ग्रामीणों ने पुलिस को कभी अपनी समस्याओं केसमाधान के रूप में नहीं देखा था। अवैध शराब के अधिक प्रचलनके कारण यहां कानून और व्यवस्था की समस्या अक्सर रहती थी।दो साल साल पहले तक गांववालों ने कभी सोचा भी नहीं था किपुलिसकर्मी उनकी किसी भी समस्या को सुलझा सकते हैं। लेकिनअब वे केवल कानून-व्यवस्था के अलावा पानी और स्कूल जैेसीबुनियादी जरूरतों के लिए भी पुलिस की मदद लेते हैं।सीएचआरआई की योजना निदेशक डोयल मुखर्जी के मुताबिक,‘‘1861 का पुलिस एक्ट पुलिस और समुदाय के संबंधों के प्रतिखामोश है। इस एक्ट में विकेंद्रीकृत पुलिस व्यवस्था या निजीपुलिस व्यवस्था का कोई वर्णन नहीं है। अतः आमतौर पर लोगस्वयं को पुलिस से अलग रखते हैं और समाज और पुलिस कीभूमिकाएं विपरीत रहती हैं। माना पुलिस स्टेशन के प्रयोग में हमनेपुलिस और समुदाय को जोड़ कर उनमें संवाद बनाने की प्रक्रियास्थापित की जिसका परिणाम बेहद सार्थक रहा।’’ग्रामीण पुलिस व्यवस्था और सामुदायिक पुलिस व्यवस्था केइस मुद्दे पर राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिर्पोटों में भी चर्चा होतीरही है। आयोग की सिफारिश थी कि प्रभावी कानून के लिएव्यवस्था पंचायतों और सब-डिवीजन पुलिस अधिकारियों के बीचनिकट संबंध होने चाहिए। कुछ राज्यों मंे पुलिस मैन्यूएल में ग्रामीणसमुदायों के साथ बेहतर संबंधों, और सामुदायिक पुलिस व्यवस्थाके सहायक के रूप में ग्रामीण सुरक्षा समितियों के गठन का जिक्रभी है। केरल के तिरुअनंतपुरम में ‘कम्बाइन्ड एक्शन अगेंस्टथीव्स, चीट्स एण्ड होलीगन्स (कैच) नाम की सामुदायिक पुलिसव्यवस्था चल रही है।लेकिन स्थानीय पुलिस को इस प्रकार की व्यवस्था के लिएतैयार करना हमेशा एक चुनौती रहा है। माना में सीएचआरआई नेइस प्रयोग को शुरू करने से पहले छत्तीसगढ़ सरकार, राज्य मानवअधिकार आयोग और गैर सरकारी संगठनों से लंबा संवाद किया।लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती पुलिसकर्मियों को तैयारकरना था। डोयल के मुताबिक सबसे पहले माना के पुलिस अध्िाकारियों के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम किए गए जिनमें उन्हें समुदायको संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया गया।उनके मनोवृति को परिवर्तित करने के लिए प्रशिक्षण में कई प्रकारके तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। गांवों में किए गए सर्वे सेपता चला कि लोग ऐसी पुलिस व्यवस्था चाहते हैं जो दिखाई पड़ेऔर जिसमें तत्काल कार्रवाई के साथ जवाबदेही बने।योजना के तहत माना थाना क्षेत्र के 12 गांवों को चार बीटों मेंबांटा गया है। हर बीट की जिम्मेदारी एक सब इंस्पेक्टर और दोकांस्टेबल पर है। ये बीट अधिकारी अपने बीट क्षेत्र की समस्याओंको चिन्हित करते हैं। हर बीट में चार ग्रामीण सदस्यों वालेसमुदाय संपर्क समूह (सीएलजी) यानी कम्युनिटी लेसन ग्रुप बनाएगए हैं। इन समूहों के सदस्य गांव में कानून व्यवस्था कायम करनेऔर कानूनी साक्षरता के अलावा लोगों को उनके अधिकारों केप्रति जागृत करने में सहायता करते हैं। हर बीट अधिकारी कीअपने क्षेत्र के लोगों के साथ माह में एक बैठक होती है जिसमेंआम ग्रामीण अपनी समस्याएं रखते हैं। इन समस्याओं को रजिस्टरमें नोट किया जाता है और क्या कार्रवाई की जाएगी उसके प्रतिनोट लिखा जाता है। अगली बैठक में फिर इस बात की समीक्षाकी जाती है कि क्या कार्रवाई हुई और नहीं तो क्यों?जो समस्याएं इस बैठक में हल नहीं हो पाती उन्हें फिर हरमाह पुलिस स्टेशन में संपर्क समूहों के साथ मुख्य पुलिस अधिकारीके साथ होने वाली बैठक में उठाया जाता है। समुदाय के साथकाम करने वाले प्रोजेक्ट सहायक अंशुमन झा के मुताबिक, ‘‘इसबैठक में संपर्क समूहों के सदस्य स्कूली शिक्षा में अनियमितताएं,सिंचाई और तालाब की व्यवस्था करने जैसी समस्याओं पर भीचर्चा की जाती है। फिर संबंधित अधिकारियों को इसके प्रतिलिखा जाता है। दहेज या बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओंके खिलाफ गांवों में अभियान चलाने के लिए संपर्क समूह केसदस्यों को तैयार किया गया है। स्थानीय संगठनों, पंचायतों औरपुलिस की मदद से संपर्क समूहों के माध्यम से समय-समय परगांवों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।माना पुलिस स्टेशन के एसएचओ जेपी दुबे का कहना है, ‘‘इसप्रयोग के कारण अब जनता और पुलिस की दूरी कम हुई है। गांवके लोग अपनी पंचायतों के काम न करने की शिकायतें भी लेकरआते हैं और अब वे आपसी झगड़े भी पुलिस के माध्यम सेनिपटाना चाहते हैं। सामुदायिक पुलिस व्यवस्था के चलते गांवोंकी पंचायतें सक्रिय हुई हैं क्योंकि उन्हें आशंका रहती है कि गांवके किसी भी विकास कार्य में गड़बड़ी होने या कुछ कार्य न होनेकी शिकायत सामुदायिक बैठकों में हो जाएगी।’’श्री दुबे के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के तहत जब गांव में कामशुरू हुआ तो हमें पता चला कि 12 पंचायतों में से आठ पंचायतोंके सरपंच निष्क्रिय हैं। ग्रामीणों के साथ होने वाली बैठकों मेंउनकी शिकायतें आने लगी।’’बड़ौदा गांव के सरपंच द्वारा एकाउंट न देने पर संपर्क समूह(सीएलजी) के सदस्यों ने जब उसकी शिकायत थाने में की तो वहतुरंत एकाउंट देने को तैयार हो गया। इस प्रकार गांव डूमरतराईमें एक केमिकल फैक्टरी के प्रदूषण से परेशान लोगों ने सीएलजीके माध्यम से फैक्टरी मालिक के खिलाफ थाने में शिकायत दर्जकी। इस गांव के संपर्क समूह के सदस्य लीलाराम साहू ने बतायाकि पुलिस ने फैक्टरी से नमूना लेकर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डको भेजा। बाद में राज्य मानव अधिकार आयोग में मामला उठायागया। परिणामस्वरूप जांच से घबराकर फैक्टरी के मालिक नेजांच शुरू होने से पहले ही स्वयं ही गांव से फैक्टरी को स्थानांतरितकर दिया।इन शिकायतों को बेहतर मंच प्रदान करने के लिए प्रोजेक्ट केतहत माना पुलिस स्टेशन से एक त्रैमासिक न्यूज लेटर की भीशुरूआत की गई है। जनता पुलिस संबंधों पर आधारित इसपत्रिका ‘सहयोग माना’ में पुलिस सुधार के लेखों के अलावापंचायतों के सदस्य अपनी मूलभूत समस्याओं को रखते हैं। पत्रिकाके संपादक ग्रामीण कृष्णकांत ठाकुर का मानना है कि पत्रिका केमाध्यम से लोग स्वयं को प्रशासन से जुड़ा हुआ मानते हैं। यहपत्रिका उनके और प्रशासन के बीच संवाद की एक बेहतर कड़ीका काम करती है।कभी पुलिसकर्मियों को अपना विरोधी मानने वाले ग्रामीणकेवल अपनी समस्याओं के प्रति ही अब चिंतित नहीं बल्कि अब वेपुलिसकर्मियों की सीमाओं और सरोकारों को समझने लगे हैं।वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ एक बैठक में इन ग्रामीणों नेमाना पुलिस स्टेशन के लिए एक छोटी जीप प्रदान करने की मांगरखी, ताकि गांवों में उनकी पेट्रोलिंग बढ़ सके। आखिर पुलिसस्टेशन को गाड़ी मिल गई।अपने प्रकार का यह अनूठा माॅडल इन गांवों में कानून व्यवस्थाकायम करने के अलावा गांववासियों को सशक्त बनाने का भीकाम कर रहा है। इसकी सफलता को देखते हुए अब इसेछत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में भी अपनाने की कवायद चल रही है।जैसा कि सुश्री डोयल कहती है कि निजी स्तर पर सामुदायिकपुलिस व्यवस्था के कुछ प्रयोग तो हुए हैं लेकिन ग्रामीण क्षे़त्र मेंसंस्थागत स्तर पर अपनी तरह का यह पहला प्रयोग है।छत्तीसगढ़ पुलिस महानिदेशक श्री ओपी राठौर इस प्रयोग सेबेहद आश्वस्त हैं वह कहते हैं, इस प्रयोग से थाने में दर्ज होनेवाले मामलों की गिनती बड़ी है। अब महिलाएं भी अधिक संख्यामें शिकायतें लेकर आती हैं। इस प्रयोग की सफलता से खुशहोकर राज्य पुलिस विभाग राज्य के अन्य जिलों में भी इसे शुरूकरने की योजना बना रहा है।सुविधाओं के अभाव में पुलिसकर्मियों के लिए ऐसा प्रयोगचलाना सरल नहीं। बिना किसी विशेष प्रोत्साहन के उन परअतिरिक्त जिम्मेदारियां डालना एक मुश्किल ही नहीं कठिन चुनौतीहै, जैसा कि अंशुमन कहते हैं, ‘‘लेकिन इससे गांववालों के दिलोंमें पुलिस वालों का आदर भाव बढ़ा है, अब वे उन्हें अपना दोस्तऔर मानव अधिकारों के रक्षक मानते हैं।’’ आखिर यह एक बहुतबड़ी उपलब्धि है।

Thursday, 11 September 2008

A school without pen and bag



By : Annu Anand
Udaipur, Rajasthan
It was an unusual classroom of seventh standard in Central Public Senior School in the tribal belt of south Rajasthan, in Udaipur. All forty students in the class were taking geography lessons on their respective computers. They were doing an exercise of a chapter on earth and rocks. All the information on the chapter was accessible on their computer screens. The kids were busy exploring different sections of their lesson with the help of their little mouse. To an outsider, it may appear that a computer class is in session.
But this is a unique class. They study all subjects - mathematics, Hindi or general knowledge - on the computer. Similar was the scene in all other classrooms in the school. Even nursery kids were learning A for Apple and Ant from their computers. As soon as they see pictures, the class would reverberate with sounds of the children.
This school is well on way to becoming the country's first pen-less and bag-less school. It was started in 1998 and has about 1200 students on its rolls. When Alka Sharma, the school's principal, founded the institution she wanted to free children from the burden of school bags on their shoulders. She began thinking of different ways and means of doing so and decided to use computers to translate her ideas into action. After all, she thought, computerized education has a bright future. This inspired her to go ahead and transform her dream into reality. To begin with, she used software to transform syllabus of different subjects into computerized modules.
The whole class is introduced to a new lesson with the help of a liquid crystal display (LCD) and projector. The subject teacher lectures in recorded voice the lesson's main points as in a normal classroom. Then children do the exercises on their computers. For homework and exercises, children are allowed to take computers home by rotation. The head of the Computer Department, Sunil Bawel, says: "Teachers with help from technical staff prepare question papers using special software packages such as Karo Karo." The 'answer sheets' are checked on computers and marks given to students instantly.
All tests for second to the 12th standard are conducted over computers only. Alka Sharma says: "We would like to have the final examination of 12th standard also on computers, but parents are not yet ready for it. Moreover, the state examination board has to agree for the change." So, about half the final examinations in the school are conducted over computers while the rest are taken the traditional way- with paper and pen.
In 2003, the school received second prize for excellence in computer education from the President, Dr. A P J Abdul Kalam. "Initially when I used to talk about pen-less school, people used to be surprised. But now my dream has taken shape. After we got this recognition, parents are also encouraged about the experiment and are now helping the school in conducting all exams on computers," says Alka Sharma. Most children in the school are happy with the new teaching system. Showing pictures of different rock on his computer screen, Mayank, studying in the seventh standard, says this way one can explore different subjects creatively and also get practical information. "We can make power point presentations even on difficult subjects", adds Kirti Jain of the same class.
For children who work for long hours on computers, physical exercises are prescribed. They are taught to practice pranayama and yoga. In addition, there is facility for acupressure also. In every class the computer kept is on a trolley so that it can be moved around in case the teacher has to explain something. All information about the school's e-library and video library is available on compact discs and children can access these.
As the principal says, the school is fully equipped and ready to be the completely computerized teaching institution in the country. Even final examinations will be conducted on computers once the education department gives the go-ahead.

Wednesday, 3 September 2008

सरपंच की सूझबूझ से गांव में आया पानी


अन्नू आनंद
अलवर से कोई 85 किलोमीटर दूर कच्चे और उबड़-खाबड़ रास्ता तय करने के बाद गांव पड़ता है बरवा डूंगरी। यहां रहने वाली बलोदेव पंचायत की सरपंच 45 वर्शीय लालीदेवी अपने घर के खुले अहाते में गांव में लगाई जाने वाली शौचालयों की सीटों को रखवा रही थी। यह सीटें बरवा डूंगरी और बलोदेव गांव के गरीबी की रेखा से नीचे वाले परिवारों के घरों में लगाए जाएंगे। बलोदेव पंचायत मे पांच राजस्व गांव आते हैं।
सरपंच लाली देवी के मुताबिक गांव की सबसे बड़ी समस्या शौचालय की है। सीटों को गिनते हुए वह बताती है कि गांव में सभी घरों में शौचालय नहीं। खासकर गरीबों की बस्ती में। इन परिवारों को काफी दिक्कत होती है। महिलाओं के लिए रात में बाहर जाना उतना आसान नहीं हैं। गांव में जंगली जानवर भी आते हैं। क्षेत्रीय सुधार योजना के तहत लाली देवी ने इन परिवारों में शौचालय की सुविधा प्रदान करने का प्रस्ताव भेजा। जो मंजूर हो गया। अब लाली देवी प्रसन्न है कि गांव की सबसे बड़ी परेशानी दूर हो जाएगी। लेकिन लाली देवी के लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं जिस सूझबूझ से वह दो गांवों में पानी की समस्या को हल कर रही है उस के लिए इन गावों में दनकी विशेष प्रंषसा की जाती है।
बरवा डूंगरी के इस छोटे से गांव में करीब 35 परिवार रहते हैं। इनमें अधिकतर मीणा जात के हैं। इस गांव के साथ सटा हुआ गांव पांवटा है। यहां पर गुर्जर जात के करीब 45 परिवार रहते हैं। ये लोग अधिकतर छोटी मोटी खेती या पशुपालन से अपना गुजारा करते हैं। लेकिन राजस्थान में पिछले कुछ सालों मे पड़ने वाले सूखे और राज्य में हमेशा रहने वाली पानी की कमी ने इनकी समस्याओं को बढ़ाने का काम ही किया। ये गांव पिछले कईं सालांे से पानी की किल्लत झेल रहे थे। जबकि यहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नारायणी माता के गांव में स्थित नारायणी माता के मंदिर का कुण्ड हमेशा पानी से भरा रहता है। इस कुण्ड से एक नाला निकलता है। लेकिन इस नाले का अधिकतर पानी व्यर्थ बह जाता था।
नाले का पानी इस्तेमाल करने के लिए गांववालों ने कई बार उस पर मिट्टी का बांध बनाया लेकिन बरसात आते ही वह टूट जाता और पानी चारों ओर बिखर कर व्यर्थ बहने लगता। दोनो गांववालों ने आपसी सहमति से समस्या का हल करने की सोची। दोनों गांववालों ने अपने-अपने गांव के प्रतिनिधि चुनकर एक समिति बनाई जो इस का हल खोज सके। गांवों के प्रतिनिधि नारायणी माता गांव स्थित ‘चेतना’ संस्था के पास अपनी समस्या लेकर गए। यह संस्था कासा से मिलने वाली आर्थिक सहायता से आसपास के क्षेत्र में सामाजिक आर्थिक विकास के कार्य करती है। संस्था के सचिव दीन दयाल व्यास के मुताबिक वर्ष 99 उनके कार्यकत्र्ताओं ने दोनो गांव के लोगों के साथ बैठकें की और समस्या के हल पर विचार किया गया। आखिर नाले पर छोटा सा पक्का बांध बनाने पर सहमति हुई।’’
गांवों द्वारा नियुक्त समिति की देखरेख में वर्श 99 के जून माह में पक्का बांध बनाकर पानी रोकने का काम शुरू हुआ। दोनों गांववालों ने बांध बनाने की कुल लागत का 25 प्रतिशत वहन करने की पेशकश की। बांध बनाने में कुल 95 हजार रुपए का खर्चा आया। लेकिन पक्का बांध बनाने के बाद पानी का इस्तेमाल न्यायोचित ढंग से इस्तेमाल करने के लिए दोनों गांवों ने एक अनूठा तरीका निकाला। व्यास के मुताबिक पानी के उचित बटवारे गांववालो की सहमति के बिना संभव नहीं था। इस कार्य में लाली देवी ने लोगांे में सहमति बनाने का अद्भुत कार्य किया। बनाए गए बांध में दो रास्ते पानी के निकास के लिए रखे गए। एक निकास से पांवटा गांव को पानी मिलता है दूसरे से बरवा डूंगरी को। दोनों गांवों ने बारी-बारी से पानी लेने पर सहमत हुए। पांवटा गांव के पानी लेने के समय बरवा डूंगरी का निकास बंद कर दिया जाता है और जब बरवा डूंगरी को पानी चाहिए होता है तो पांवटा को पानी देने वाले निकास को बंद कर दिया जाता है। इस तरह आपसी समझ और मेल जोल से दोनों गांव व्यर्थ बहते पानी को अपने खेतों में इस्तेमाल कर रहे हैं। लाली देवी के नेतृत्व में गांववालो ने जिस समझ से पानी की समस्या को हल किया उससे जल विवाद में फसे कर्नाटक और तमिलनाडू राज्यों को भी सीख मिलती है।
इस संबंध में पांवटा गांव की तिबारी में बैठे रामकिषोर कहते है कि नाले पर पक्का बांध बना देने से अब वह दो बीघा की बजाए तीन बीघा जमीन पर फसल बोने में समर्थ हैं। हुक्का गुड़गुड़ाते छोटे लाल भी उनके समर्थन में बोलते हुए बताते हैं, ‘‘अब पानी खूब आयो। पहले कच्चा बांध होने के कारण बरसात से टूट जाता था अब हम दो गांव तीन-तीन घंटे की बारी से पानी इस्तेमाल करते हैं खेत को पानी अच्छा मिल रहा है।’’
लाली देवी वर्ष 2000 में सुरक्षित सीट से बलोदेव पंचायत की सरपंच चुनी गई थी। दो लड़को और दो लड़कियों की मां लाली देवी घर के कामों को निपटाने के बाद खेती का काम भी देखती है। वह मानती है कि सरपंच बनने के बाद उसे बहुत से कामों में पति की सहायता लेनी पड़ी लेकिन धीरे धीरे उन्होंने कामों की बारीकी को पहचानना षुरू किया। इस काम में उन्हें पंचायत सदस्यों के लिए आयोजित प्रशिक्षण से काफी मदद मिली। उनके मुताबिक वह अभी भी गांव के बुर्जगों के सामने घूंघट निकालती हैं लेकिन अब यह घूंघट उसके काम के प्रति उत्साह और आत्मविश्वास मे बाधा नहीं बनता। सरपंच बनने के बाद गांव मंे दो स्कूल और धिरोड़ा गांव मे स्वास्थ्य केंद्र बनवाने के बाद अब वह पंचायत के सभी गावों मे शौचालय बनावाने के कार्य को पूरा करने में जुटी हैं।
इस के बाद उनकी सब से बड़ी प्राथमिकता बरवा डंूुगरी मे स्वास्थ्य केंद्र खोलने की है। लाली देवी के मुताबिक उनके गांव में नर्स दूर गांव से आती है और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी 17 किलोमीटर दूर है जिसकी वजह से रात में डिलीवरी में महिलाओं को बेहद मुश्किल होती है। बलोदेव पंचायत में पांच महिलाएं और सात पुरूश हैं। पंचायत की सभी महिला सदस्यों से राय लेने के बाद ही कोई फैसला हो पाता है। लाली देवी के पति और वार्ड पंच कल्याण सिंह मीणा कहते हैं, ‘‘पहले पंचायत के बहुत से कामों में वह उनकी मदद करते थे लेकिन अब तो पंचायत मींटिग में उनके बहुत से फैसलों को सरपंच रद्द कर देती हैं। उन की इस बात पर लाली देवी हंसते हुए कहती है, ‘‘अब बात तो वही मानी जाएगी जिस पर सब की सहमति हो। फिर अब हमें अपनी समझ पर पूरा भरोसा है। जरूरत है इस समझ को पहचानने की।’’लाली देवी की इस बात में दम है।
जरूरत पड़ने पर एक अनपढ़ और देहाती महिला केवल अपने अनुभव के आधार पर बड़े बड़े विवादों को भीे सुलझा सकती है जो शहर के पढ़े लिखे लोग अपने तर्कों के आधार पर भी नहीं कर सकते। कम से कम सरपंच लालीदेवी का अनुभव तो यही सीख देता है।