<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798</id><updated>2012-02-11T02:45:38.881-08:00</updated><category term='मीडिया विमर्श'/><category term='Views'/><category term='मानवी के साहस'/><category term='Column'/><category term='Grassroots Features'/><title type='text'>अनसुनी आवाज</title><subtitle type='html'>अनसुनी आवाज़ उन लोगों की आवाज़ है जो देश के दूर दराज़ के इलाकों में अपने छोटे छोटे प्रयासों के द्वारा अपने घर, परिवार समुदाय या समाज के विकास के लिए संघर्षरत हैं। देश के अलग अलग  हिस्सों  का  दौरा करने के बाद लिखी साहस की इन कहानियों को मैं अख़बारों और इस ब्लॉग के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ क्योंकि  ये खामोश योधाओं के अथक संघर्ष की वे कहानियाँ हैं जिनसे सबक लेकर थोड़े से साहस और परिश्रम से कहीं भी उम्मीद की एक नयी किरण जगाई जा सकती है।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>70</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-7874865778921749516</id><published>2012-01-05T03:56:00.000-08:00</published><updated>2012-01-05T03:56:46.203-08:00</updated><title type='text'>एचआईवी के खिलाफ एक गांव की जंग</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोल्हापुर से लौटकर अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोल्हापुर का नाम कोल्हापुरीे जूतियों के लिए जाना जाता है। व्यापारी जगत में यह चीनी की मिलों के लिए भी मशहूर है। फिल्मों में रूचि रखने वाले इसेे पद्मिनी कोल्हापुरी के नाम से भी पहचानते हंै। लेकिन महाराष्ट्र के कोल्हापुर नाम का यह जिला अब जन-भागीदारी के अनूठे प्रयास के लिए समूचे देश में एक नई मिसाल कायम कर रहा है। एचआईवी के खिलाफ जंग मंे विभिन्न समुदायों ने मिलकर &amp;nbsp;यहां ऐसे प्रयासों की शुरूआात की है कि देश के अन्य उच्च एचआईवी दर वाले राज्यों में भी कोल्हापुर के माॅडल को अपनाया जा रहा है। साल 2007 में इस जिले को नाको (नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन) ‘ए’ श्रेणी में रखा था जिसका मतलब था कि कोल्हापुर में एचआईवी पाॅजिटिव लोगांे की गिनती कुल जिले की कुल जनसंख्या के 1 प्रतिशत से भी अधिक है। इससे साफ था कि जिले का नंबर महाराष्ट्र के सबसे अधिक तीन एचआईवी ग्रस्त जिलों के बाद चैथे नंबर पर आता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इसका मुख्य कारण जिले में चीनी और पाॅवर लूम उधोग हैं जिनके चलते कर्नाटक और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों से मौसमी और अस्थायी आवागमन बना रहता है। इसके अलावा कर्नाटक आंध्रप्रदेश से जुड़े नेशनल हाईवे से गुजरने वाले ट्रक डाइवरों के चलते इस इलाके में एचआईवी का खतरा हमेशा अधिक रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ सालों में जिले के विभिन्न गांवों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही थी जो एचआईवी पाॅजिटिव होने के कारण गुमनामी का जीवन जी रहे थे। एड्स से जुड़े भ्रम, अज्ञानता और कलंकित होने के भय के चलते अधिकतर लोग पाॅजिटिव होने की बात को छिपाते और टेस्ट कराने से कतरातेे। साल 2009 में इसी जिले के लोन्जे गांव में एक ऐसी घटना घटी जिसने एचआईवी के खिलाफ काम करने वाले सभी लोगों को चेताने का काम किया। दरअसल गांव में एक आंगनवाड़ी कार्यकत्र्ता को उस समय नौकरी से निकाल कर उसे गांव से बेदखल कर दिया जब उसके खून की जांच में एचआईवी पाॅजिटिव के लक्षण पाए गए। उस कार्यकत्र्ता के साथ हुए अपमान और घृणा के चलते चारों तरफ निराशा फैल गई। इस खबर से पाॅजिटिव लोगांे में विश्वास जगाने के मिशन को एक बड़ा धक्का लगा। इलाके के लोगों को अहसास हुआ कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से परीक्षण कराना और एड्स व्यक्ति की इलाज में मदद करना ही समस्या का हल नहीं बल्कि मुख्य समस्या एचआईवी को लेकर आम लोगों में बैठा डर और पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ उनका भेदभाव पूर्ण रवैया है। इस सोच को बदलने के लिए जरूरी था कि आम आदमी समस्या के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा हो।&lt;br /&gt;जिले के 30 हजार जनसंख्या वाले सबसे बड़े गांव कोडोली में जहां एचआईवी का प्रकोप अपेक्षाकृत अधिक था। लागों ने इस चुनौती का सामना किया। जनभागीदारी के कई अनूठे प्रयासों को एकसाथ शुरू कर गांव के हर व्यक्ति को एचआईवी की हकीकत का ऐसा पाठ पढ़ाया कि आज यहां के करीब हर बच्चे के लिए पाॅजिटिव होना न तो कोई बड़ा हौवा है और न ही शर्म। यहां किसी भी एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव किया जाता है। गांव का सामान्य व्यक्ति भी अब यहां टेस्ट कराने में हिचक महसूस नहीं करता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा माहौल बनाने के लिए इस गांव के सभी प्रबुद्व व्यक्तियों ने सेंटर फाॅर एडवोकेसी एण्ड रिसर्च संस्था की मदद से गांव के अलग अलग आयु वर्ग के समूहों को एचआईवी जागरूकता अभियान में शामिल करने की पहल की। इसके लिए सब से पहले गांव के कोल्हापुर स्थित मास्टर आॅफ सोशल वर्क में पढ़ने वाले छात्रों ने एक मंच बनाया इसमें इस गांव की कई युवा लड़कियों को भी शामिल किया गया। युवा मंच ने एड्स के कारणों, लक्षणों और इससे जुड़े भ्रमों को दूर करने के लिए गांव के हर हिस्से में नुक्कड़ नाटक किए। &amp;nbsp;इन नाटकांे में शामिल कुछ लड़कियां के मां-बाप &amp;nbsp;गरीब अशिक्षित और खेती का काम कर अपना गुजारा करते हैं। उनके लिए अपनी बेटियों का सड़क पर यौन संबंधों पर खुलेआम चर्चा करना और कंडोम की बात करना गवारा नहीं था। लेकिन इन युवा लड़कियों ने अपने मां बाप को कईं दिनों तक बातचीत के जरिए यह समझाया कि एचआईवी कोई छूत की बीमारी नहीं। युवा मंच से जुड़ी कृषक परिवार की सोनाली ने बताया, ‘‘उसके लिए मां बाप को तैयार करना आसान नहीं था। लेकिन जब वे मान गए तोे पहले हमने विभिन्न खेलों के माध्यम से गांववालों को एचआईवी की सही जानकारी दी। पाॅजिटिव लोगों के संबंध में फैले भ्रमों को दूर करने के लिए लगातार डाक्टरों और विशेषज्ञों से उनके बीच संवाद बनाया फिर आमजन को टेस्ट कराने के लिए प्रेरित किया।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-r2ZFxRF_0eM/TwWMzvWk8TI/AAAAAAAAAhk/v0XefLt11bA/s1600/DSCF4156.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/-r2ZFxRF_0eM/TwWMzvWk8TI/AAAAAAAAAhk/v0XefLt11bA/s320/DSCF4156.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जब&amp;nbsp;ब इन युवाओं के नाटकों से गांव में एचआईवी के प्रति जागरूकता का माहौल पैदा हुआ उसकेबाद गांव की महिलाओं को इस प्रयास में शामिल करने की कवायद शुरू हुई। इसके लिए सेंटर की मदद से गांव में 500 महिलाओं के लिए एक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। गांव के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाने वाली 70 आंगनवाड़ी महिला कार्यकर्ताओं ने इस कार्यशाला में हिस्सा लिया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ताई मतसागर का कहती हंै,‘‘हमारा गांव की महिलाओं के साथ नजदीकी रिश्ता है। हमने महिलाओं को मातृत्व स्वास्थ्य की जानकारी देने के साथ गर्भवती महिलाओं को एचआईवी का प्रशिक्षण कराने के लिए भी प्रेरित करना शुरू किया। इसके लिए 10 महिलाओं का एक सखी मंच बनाया गया जो घर घर जाकर जिन महिलाओं को टेस्ट कराने में हिचक होती उनके भ्रमों को दूर करता। मंच की सखी दिलशाद नजीर बताती है कि हमने कभी अपने घरों में भी यौन संबंधों के बारे मे बात नहीं की लेकिन हमने पहले अपने मन से इस झिझक को खत्म किया फिर दूसरी महिलाओं के मन से इसे खत्म करने की कोशिश की। सखी मंच ने जब महिलाओं को समझाया कि महिलाओं को एचआईवी का खतरा अधिक है और इसका असर गर्भवती महिला के बच्चे पर भी पड़ सकता है। एक घर में सखी मंच के जाने के बाद उस घर की महिला ने आंगनवाड़ी में आकर स्वीकार किया वह पाॅजिटिव है और वह दवाई लेने के लिए सांगली जाती है जोकि उसके गांव से बहुत दूर है। बाद हमने उसे नजदीक के कोल्हापुर के केंद्र में रजिस्ट्रेशन कराने की हिदायत दी। &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-w8-ZTUxYMxg/TwWNAHeQaxI/AAAAAAAAAhs/vNUSc1ew2zM/s1600/DSC_0218.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="214" src="http://2.bp.blogspot.com/-w8-ZTUxYMxg/TwWNAHeQaxI/AAAAAAAAAhs/vNUSc1ew2zM/s320/DSC_0218.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;लेकिन गांववालों ने इन कोशिशों पर यहीं पर ही रोक नहीं लगााई। किसी भी पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ छूआछूत और उसके साथ भेदभाव के बर्ताव पर अभी पूरी तरह रोक लगााना बाकी था। गांववालों ने एक अनोखा तरीका अपनाया। गांव की सरपंच मनीषा गाधव की मदद से ग्रामसभा का आयोजन कर एचआईवी से जुड़े कलंक को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। &amp;nbsp;तमिलनाडू के एक गांव के बाद यह देश दूसरा गांव है जिसने ऐसा प्रस्ताव पारित किया है। 6 महिला वार्ड पंचों और 11 पुरूषों वाली इस पंचायत ने सभी ग्रामसभा सदस्यों को शपथ दिलाई कि वे एचआईवी से संबंधित जानकारी को हर व्यक्ति तक पहुंचाएगें और किसी भी पाॅजिटिव व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव &amp;nbsp;नहीं करेंगे। सरपंच मनीषा गाधव के मुताबिक, ‘‘हमारा मकसद केवल प्रस्ताव पारित कराना ही नहीं था असली परीक्षा प्रस्ताव पारित करने के बाद की थी। हमने ग्रामसभा में मौजूद हर व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह इस बात का खास ध्यान रखे कि गांव का कोई भी व्यक्ति टेस्ट कराने या फिर किसी पाॅजिटिव से उपेक्षा का बर्ताव न करे।’’ इसके लिए जिला के पाॅजिटिव नेटवर्क के सदस्यों को अभियान के साथ जोड़ा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जिला के स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक प्रस्ताव पारित होने के बाद टेस्ट कराने वाले लोगों की गिनती बढ़ने लगी। साल 2011 में टेस्ट कराने वालों की संख्या पूरे जिले में बढ़कर 2133 हो गई &amp;nbsp;जबकि इससे &amp;nbsp;पहले साल 2009-10 में यह गिनती 1251 ही थी। अब गांव में एड्स के खिलाफ ऐसा माहौल बना कि गांव के गणेश मंदिर ने भी जन-जागरण अभियान में हिस्सेदारी शुरू करू दी। मंदिर के अंदर सभी दीवारें एड्स से लेकर बेटी -बचाओ आदोलन के पोस्टरों से भरी पड़ी है। मंिदर के उपाध्यक्ष संतोष राजाराय हुजरे के मुताबिक, ‘‘उनका युवा गणेश तरूण मंडल कईं सालों से स्वास्थ्य और समाज सुधार के कामों में लगा हुआ है। अगली गणेश चतुर्थी पर एड्स के प्रति जागरण अभियान ही मंडल का मुख्य मुद्धा होगा।’’ पिछली बार इस मंडल ने कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ बेटी बचाओ को फोकस करते हुए जिन परिवारों में पहली लड़की है उन महिलाओं से गणेश विर्सजन कराया था।&lt;br /&gt;गांववालों की कोशिशें अभी थमी नहीं। एडवोकेसी सेंटर की अध्यक्ष अखिला शिवदास मानती है कि एचआईवी के प्रति जागरूकता फैलाने में और पाजिॅटिव लोगों के साथ समानता के बर्ताव में गांव ने पूरी तरह सफलता हासिल कर ली है। लेकिन अब गांव को एचआईवी मामलों की गिनती को कम कर उच्च खतरे वाली श्रेणी से बाहर &amp;nbsp;निकलने की तरफ भी ध्यान देना होगा। जिस गांव के मदिंर में पूजा अर्चना के साथ समुदाय की सामाजिक समस्याओं और बीमारियों की रोकथाम की पहल हो, जहां ग्रामसभा, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य संस्थाओं सहित युवा समूह भी एकजुट खड़ा हो क्या ऐसे माॅडल गांव के लिए यह मुश्किल है। कोडोली वासी तो ऐसा नहीं समझते।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; ( यह आलेख १ जनवरी को नई दुनिया में प्रकाशित हुआ है )&lt;br /&gt;पत्ता&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;ए-65 परवाना अपार्टमेंटस&lt;br /&gt;मयूर विहार, फेज1 एक्सटेंशन&lt;br /&gt;नई दिल्ली-110091&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre;"&gt; &lt;/span&gt; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-7874865778921749516?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/7874865778921749516/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=7874865778921749516' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7874865778921749516'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7874865778921749516'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='एचआईवी के खिलाफ एक गांव की जंग'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-r2ZFxRF_0eM/TwWMzvWk8TI/AAAAAAAAAhk/v0XefLt11bA/s72-c/DSCF4156.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-4047329970655697664</id><published>2011-11-23T00:31:00.000-08:00</published><updated>2011-11-23T00:31:14.123-08:00</updated><title type='text'>नकद से नहीं मिटेगी गरीबों की भूख</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुप्रीम कोर्ट ने हिदायत दी है कि देश में कोई भी व्यक्ति भुखमरी और कुपोषण से नहीं मरना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह गरीबों को उनकी जरूरत के मुताबिक भोजन उपलब्ध कराए। लेकिन क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन कर पाएगी? दिसंबर माह में संसद में प्रस्तुत होने वाले खाध सुरक्षा अधिनियम के प्रारूप को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार देश में बढ़ते कुपोषण की रोकथाम के प्रति गंभीर नहीं है। खाध और उपभोक्ता मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए खाध सुरक्षा अधिनियम के जिस प्रारूप को अधिकार संपन्न मंत्रियों के समूह नेे मंजूरी दी है वह गरीबी और कुपोषण से लड़ने वाले इस देश के हित में नहीं। यह बिल भूखों को अनाज देने वाली 60 साल पुरानी पीडीएस (सार्वजनिक वितरण) प्रणाली को खत्म कर नकद सब्सिडी देने की सिफारिश करता है। बिल के मुताबिक लोगों को प्रति माह दिए जाने वाले राशन (अनाज,तेल,खाद) के बदले नकद राशि प्रदान की जाएगी। देश भर मे पीडीएस को खत्म करने का माहौल बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है।&lt;br /&gt;लेकिन नकद सब्सिडी प्रदान करने की यह सरकारी पहल अधिकतर लोगों खासकर महिलाओं को मंजूर नहीं। भोजन के अधिकार और रोजी रोटी अधिकार अभियान सहित 30 सामाजिक संगठनों का मानना है कि पीडीएस को खत्म करने करने का मतलब है देश में भुखमरी ओर कुपोषण को बढ़ावा देना। उनका मानना है कि हर गरीब के घर अनाज पहुंचे इसके लिए जरूरत पीडीएस में सुधार लाने की है।&lt;br /&gt;भारत में राशन के बदले नकद सब्सिडी देने की नीति को युनाइटेड नेशन डेवलपमेंट आर्गेनेजाइशन(यूएनडीपी) और वल्र्ड बैंक प्रोत्साहित कर रहे हैं। इन संस्थाओं का मानना है कि बुनियादी सेवाओं का लाभ गरीबों और वचिंत समूहों तक नहीं पहुंच रहा। इसकी मुख्य वजह इन सेवाओं के अमलीकरण में होने वाली अनियमितताएं हैं। इनका तर्क है कि सेवाओं और उत्पादों के बदले लक्षित लोगों तक नकद पहुुंचाना बेहतर विकल्प है। यूएनडीपी ने अपनी 2009 की ‘गरीबी को खत्म करने के लिए सशर्त नकद योजनाएं’ &amp;nbsp; रिपोर्ट में भारत में नकद सब्सिडी के माध्यम से सरकारी सेवाओं के वितरण में कुशलता लाने की हिमायत की है। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी सेवाओं और वस्तुओं को लोगों तक पहुंचाने की लागत अधिक है दूसरा एंजेसियों के तालमेल में अभाव के कारण वे लक्षित समूहों तक नहीं पहुंच पातीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राशन के बदले नकद प्रावधान के सर्मथन में यूएनडीपी ने दिल्ली सरकार को चार चरणों में 10 मिलियन डालर की सहायता प्रदान की है। इस आर्थिक सहायता से दिल्ली सरकार ने अनाज के बदले नकद देने का एक पाॅयलट प्रोजेक्ट दिल्ली की रघुवीर बस्ती में शुरू किया है। पिछले मई माह में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत 100 परिवारांे को राशन के बदले प्रतिमाह एक हजार रूपए दिए जा रहे हैं। किसी भी राज्य की नीति को बदलने के लिए इस पाॅयलट प्रोजेेक्ट का आकार बेहद बेहद छोटा है। दूसरा यह भी देखने में आया है कि जिन 100 परिवारों को नकद योजना के लिए चुना गया है उनके पास पहले से ही राशनकार्ड नहीं थे। &lt;br /&gt;राशन या नकद की हकीकत जानने के लिए दिल्ली में &amp;nbsp;कईं संस्थाओं ने मिलकर रोजी रोटी अभियान के तहत दिल्ली की झुग्गीबस्तियों और पुनर्वास कालोनियों के 4005 परिवारों में एक सर्वे कराया और पाया कि केवल 5फीसदी परिवार ही राशन को नकद में बदलने के पक्ष में थे। इसी संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां दे्रज और रितिका खेड़ा ने मार्च से जून 2011 तक देश के 9 राज्यों के 100 चयनित गावों के 1227 परिवारों में एक सर्वे किया और पाया कि 91 प्रतिशत लोग आंध्र प्रदेश में, 88 प्रतिशत उड़ीसा में 99 प्रतिशत छतीसगढ़ और 81 प्रतिशत हिमाचल में नकद नहीं केवल राशन चाहते हैं।&lt;br /&gt;दरअसल पीडीएस को खत्म करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे उचित लक्षित लोगों की पहचान नहीं हो पा रही। यह कहना सही है क्यों कि ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन के लिए एक वक्त खाने की व्यव्स्था करना कठिन है लेकिन उनके पास बीपीएल के कार्ड नहीं। नेशनल सेंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक 2004-2005 में 50 प्रतिशत गरीबों के पास बीपीएल कार्ड नहीं थे। उस दौरान बिहार और झारखंड में बीपीएल कार्ड न रखने वालों की संख्या 80 फीसदी थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बीपीएल परिवारों की पहचान की समस्या नकद सब्सिडी योजना में खत्म हो जाएगी? इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जिन सरकारी कार्यक्रमों में नकद देने का प्रावधान उनके अनुभव भी सुखद नहीं। जैसे सामाजिक सुरक्षा के लिए बूढ़ों और विकलांगों को दी जाने वाली पंेशन सरकारी रिकार्ड में दर्ज बहुत से लोगों को या तो मिल नहीं मिल रही या निर्धारित राशि से कम मिल रही है। &lt;br /&gt;पीडीएस के माध्यम से हर परिवार तक राशन पहुुंचे इसके लिए उस में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जा सकते हैं लेकिन उसको खत्म कर नकद की योजना लागू करना देश में असामनता को बढ़ावा मिलेगा&lt;br /&gt;नकद राशि घर का अनाज खरीदने पर ही खर्च हो इसकी कोई गारंटी नहीं। घर में आने वाले पैसे पर पुरूषों का अधिकार होता है। पीडीएस से घर में खाने के लिए अनाज तो आ जाएगा लेकिन पैसा किस पर खर्च हो यह महिलाओं के अधिकार में नहीं रहता। &amp;nbsp; राशनकार्डों से भले ही कम या देर से ही सही घर में अनाज का इंतजाम तो हो जाता है लेकिन पैसा तो शराब में भी जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नकद सब्सिडी के लिए दिल्ली में एकांउट खुलवाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है ध्याान रहे कि बैंको में एकाउंट खोलने और अधिक संख्या में बैंक उपलब्ध कराने जैसी दिक्कतें पीडीएस से भी अधिक परेशानी पैदा करने वाली हैं। इसके अलावा नकद रूपया जमा होने पर मिडल मेन यहां भी मौजूद होता है। यही नहीं बैंकों में पैसा जमा होने में देरी और लाभार्थी तक पैसा पहंुुचाने में होने वाला भ्रष्टाचार परिवारों की भूख मिटाने में सबसे बड़ी समस्या साबित होगा।&lt;br /&gt;नकद योजना की आलोचना का कारण यह भी है कि इसमें सब्सिडी के लिए नकद राशि निर्धारित होगी और ये मार्किट की कीमतों में बदलाव के साथ नहीं बदेंगी। &amp;nbsp;जिससे कीमतें बढ़ने पर गरीबों को जरूरत से कम राशन उपलब्ध हो पाएगा। हकीकत तो यह है कि नकद सब्सिडी की राशि कईं सालों में नहीं बढ़ती भले ही कीमतें आसमान छूने लगे। अनुभव बताते हैं कि वृद पेंशन योजना की राशि को बढ़ाने में एक दशक से भी अधिक का समय लगा। ऐसे में गरीबों के लिए तेजी से बढ़ती कीमतों से कदमताल करना मुश्किल होगा। नकद सब्सिडी में सरकार को किसानों से अनाज लेने की जरूरत नहीं होगी जबकि न्यूनतम समर्थन कीमतों पर किसानों से अनाज लेन खाध उत्पादन को प्रोत्साहन मिलता है। इससे छोटे किसानों को भी मदद मिलती है। पीडीएस खतम होने से सभी लोगों को सीधा निजी दुकानदारों पर निर्भर होना पड़ेगा क्या पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ प्राइवेट दुकानदारों से राशन सप्लाई की उम्मीद की जा सकती है?&lt;br /&gt;पीडीएस की अनियमितताओं को खत्म करने की बजाय नकद की योजना लागू करना खाध सुरक्षा के सरकारी वादे का सबसे बड़ा मजाक है। खाध सुरक्षा के लिए जरूरी है कि सरकार मौजूदा पीडीएस में सुधार लाने की कोशिश करे। अगर इच्छा शक्ति हो तो पीडीएस में सुधार कर उसे प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है ये हम तमिलनाडू और छतीसगढ़ राज्यों के अनुभवों से जान चुके हंै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वरिष्ठ पत्रकार &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-4047329970655697664?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/4047329970655697664/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=4047329970655697664' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4047329970655697664'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4047329970655697664'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='नकद से नहीं मिटेगी गरीबों की भूख'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-5128326708015139268</id><published>2011-04-26T04:30:00.000-07:00</published><updated>2011-04-26T04:30:20.009-07:00</updated><title type='text'>लड़कियों के प्रति यह नफरत क्यों?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में लड़कियों के लिए कोई जगह नहीं। स्वयं को सुॅपरपावर कहलाने वाले और आर्थिक प्रगति के राग अलापने वाले इस देश का लड़कियों के प्रति नजरिया नफरत भरा है। देश की आधी आबादी के प्रति यह तंग और घटिया सोच हमें कईं पिछड़े देशों की कतार में खड़ा करती है। 2011 की जनगणना के आंकड़े साबित करते हैं कि लड़कियों के प्रति देश के अधिकतर लोगों की सोच बेहद संकुचित और शर्मनाक है इसलिए गर्भ में ही उसे खत्म करने का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनगणना के मुताबिक 6वर्ष की आयुवर्ग में लड़कियों की संख्या में आजादी के बाद से अभी तक सबसे अधिक गिरावट आई है। आंकड़ो में लड़कियों की गिनती 1000 लड़कों पर 914 है। जबकि 2001 की जनगणना में यह संख्या 927 थी यानी 13 अकों की गिरावट है। इसी जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि &amp;nbsp;देश के 27 राज्यों सहित दिल्ली और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में सामान्य से लेकर खतरनाक स्तर तक की गिरावट आई है जो यह साबित करती है कि कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ चलाए जाने वाले अभी तक के सभी प्रयास विफल रहे हैं। संपन्न राज्य हरियाणा और पंजाब में लड़कियों की गिनती सबसे कम क्रमश 774 और 778 है। साफ जाहिर है कि लड़की को हीन मानने का कारण महज गरीबी और शिक्षा ही नहीं। राजस्थान में स्वयंसेवी संगठनों को कन्या भू्रण हत्याओं पर रोक लगाने के प्रयासों के लिए भारी फंडों का वितरण किया गया था। इसके बावजूद यहां लड़कियों के अनुपात में कमी आई है। यह अनुपात 2001 में 909 था लेकिन अब 2011 में कम होकर 883 हो गया है। पूरे देश में लड़कियों की संख्या में यह गिरावट कईं बड़े और गंभीर सबक देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात तो यह भी समझने की है कि भू्रण परीक्षणों पर रोक लगाने के लिए किए गए कानूनी और सामाजिक प्रयासों में अमलीकरण के स्तर पर बेहद सुराख रहे। गर्भ में लड़का है या लड़की का पता लगाने के बाद लड़की के भू्रण को गर्भ में खत्म करने की प्रवृति पर रोक लगाने के लिए 1994 में भू्रण परीक्षण निवारण कानून बना। इसे और सख्त बनाने के लिए तथा गर्भ ठहरने से पहले ही लिंग का निर्धारण करने वाली तकनीकों पर भी रोक लगाने के लिए 1996 में इस कानून में संशोधन भी किया गया। लेकिन अमलीकरण के स्तर पर कामयाबी नहीं मिल सकी। इसकी एक वजह कानून के लचीले प्रावधान हैं। दूसरा इसको अमल में लाने के लिए सरकार का रवैया बेहद ढीला रहा। विभिन्न राज्यों में कानून के क्रियान्वयन पर नजर रखने वाले केंद्रीय सर्तकता बोर्ड के गठन में ही सरकार ने कईं साल बरबाद कर दिए। बोर्ड बनने के बाद उनकी बैठकें भी उसी सुस्त चाल में चली। गैर रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड मशीनों को जब्त करने के प्रयासों के अभाव के कारण इन की गिनती बढ़ती जा रही है। मोबाइल मशीनों ने लिंग परीक्षणों की संख्या में और भी बढ़ोतरी की है। पूरे देश में अभी तक केवल 15 डाक्टरों के खिलाफ ही मामलों की सुनवाई हुई है। जबकि मेडिकल पत्रिका लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल मारी जानी वाली लड़कियों की गिनती 5 लाख है। ये तथ्य साबित करते है कि कानून को एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में देश पूरी तरह से विफल रहे है और अब इसको प्रभावी बनाने के लिए इसके अमलीकरण पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;लड़कियों के भू्रणों को खत्म करने की प्रवृति संपन्न राज्यों के संपन्न परिवारों में अधिक बढ़ी है जो यह दर्शाती है कि गरीबी ही लड़की को मारने का कारण नहीं। 2008 में हुई एक सर्वे ने इस संदर्भ में सरकार को चेताने का काम करते हुए अपनी रिपोर्ट में साफ बताया था कि संपन्न समझे जाने वाले राज्य पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, के अधिकतर जिलों में लड़कियों का अनुपात वर्ष 2001 की जनगणना से भी कम हो रहा है। पंजाब मेें स्थिति सबसे गंभीर पाई गई थी। यहां केे कुछ इलाकों में धनी पंजाबी परिवारों में 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या महज 300 ही थी। लेकिन महिला पुरूष बराबरी के प्रति जागरूकता फैलाने वाले अधिकतर अभियानों का फोकस निम्न वर्ग तक ही रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकीकत यह है कि चाहे उच्च वर्ग का शिक्षित परिवार हो पिछड़े वर्ग का गरीब और अनपढ़ परिवार, लड़कियों की चाहत के प्रति दोनों की सोच में कोई अंतर नहीं। इसलिए केवल गरीबी और अशिक्षा को लड़कियों की संख्या कम होने के लिए दोषी ठहराना उचित नहीं। देखा जाए तो पिछले एक दशक से देश में शिक्षा का विस्तार हुआ है। साक्षरता बढ़ी है। 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत 64 से बढ़कर 74 हो गया है। पुरूषों का 82 फीसदी तक पहुंच गया है। स्कूलों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। सूचना के बढ़ते माध्यमों ने जानकारियां हासिल करने के क्षेत्र का विस्तार किया है। लेकिन इस सब के बावजूद लड़की के प्रति सोच पर अभी भी जंग लगा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका जो बड़ा कारण समझ में आता है वे हमारी पुरानी परपंराए और पुरूष प्रधान समाज है। पुरूषसतात्मक समाज में अभी भी एक मध्यवर्गीय परिवार में लड़की कोे लड़के के बराबर का दर्जा नहीं मिला। भले ही महिलाएं देश के राष्ट्रपति स्पीकर जैसे सर्वोच्च पदों पर पहुंच रही हांे, परीक्षाओं में लड़कांे से आगे निकल रही हो, देश में तगमों की गिनती बढ़ा रही हो। लेकिन आम परिवार में लड़के को अहमियत देने की रिवायत में बदलाव नहीं हो रहा। &amp;nbsp;महज एक या दो फीसदी परिवारों को अपवाद मान लें तो शेष सभी परिवारों में लड़के को वंश आगे बढ़ाने और विरासत मानने की प्रवृति उसे अधिक अहमियत दिलाती है। दो साल पहले दिल्ली की सेंटर फाॅर सोशल रिसर्च संस्था और स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय ने दिल्ली में लिंग अनुपात से जुड़े आर्थिक ,सामाजिक और नीति संबंधी कारणों की जांच करने के लिए एक सर्वे कराई। सर्वे के नतीजों से पता चला कि पुराने रीति रिवाज और पारिवारिक परंपराओं के कारण दिल्ली में अधिकतर परिवार लिंग निर्धारित गर्भपात कराते हंै। दिल्ली में लड़कियों के कम अनुपात वाले तीन क्षेत्र नरेला, पंजाबी बाग और नजफगढ़ में कराई गई सर्वे में सभी लोगों ने जिनमें अनपढ़, कम पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों नेे माना कि उनके परिवारों में लड़की की बजाए लड़के के जन्म को अधिक बेहतर माना जाता है। इसकी वजह के बारे में इन लोंगो ने साफ माना कि बेटा मरने के बाद अतिंम रस्मों को पूरा कर मोक्ष दिलाता है। इसके अलावा परिवार का नाम भी आगे बढ़ाता है। सर्वे के नतीजों से साफ था कि गरीब और पिछड़ा वर्ग अगर लड़की को आर्थिक बोझ के रूप में देखता है तो मध्य और उच्च वर्ग के संपन्न लोग लड़के को अपनी संपति का वारिस और अतिंम रस्मों को पूरा करने का जरिया मानते हैं। दूसरा लड़की को दिया जाने वाला दहेज लड़के के लिए बेयरर चेक का काम करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़कियों को पिता की संपति में समान हक का कानूनी अधिकार भले ही मिल गया हो लेकिन ऐसे परिवारों की संख्या कितनी है जहां लड़कियों को लड़कों के बराबर संपति का वितरण हुआ हो। लड़कियों द्वारा मां- बाप के अतिंम संस्कार करने के भी छिटपुट प्रयास शुरू हो चुके हैं लेकिन ऐसे प्रयासों को ओर बढ़ावा मिलने की जरूरत है। परिवार में लड़की हर पहलु से लड़के के बराबर है यह समझ बनाने के लिए विवाह के बाद उसके सरनेम यानी उपनाम को न बदलना और घर के हर छोटे बड़े फैसले में पत्नी की राय को बराबर अहमियत देना जैसी प्रवृतियों को शामिल करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक्शन एड द्वारा देश के पांच खुशहाल माने जाने वाले राज्यों पंजाब राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा के विभिन्न जिलों में की गई एक सर्वे बसे सह भी पता चलता है कि जिन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं और अल्ट्रासांउड मशीनों की पहुंच नहीं है, उन इलाकोे में लड़कियां पैदा तो हो जाती हैं लेकिन जीवित कम बचती हैं। इसके लिए पैदा हुई लड़कियों को या तो बीमार होने पर मेडिकल सहायता नहीं दी जाती या फिर ऐसे तरीके अपनाए जातें हैं कि वे जीवित न बचें। इस सर्वे से यह भी पता चलता है कि परिवारों में दूसरे बच्चे के रूप में भी लोग लड़का ही चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वे किए गए सभी इलाकों में पैदा हुए दूसरे बच्चे में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। इसी प्रकार तीसरे नंबर पर पैदा हुए बच्चों में लड़कियों की संख्या 750 से भी कम थी। 2011 की जनगणना में जनसंख्या के कम होते आंकड़ो से भी पता चलता है कि लोगों में सीमित परिवार रखने की प्रवृति बढ़ रही है। लेकिन इससे लड़के की चाह में कमी नहीं आई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़कियों की कम होती संख्या का सबसे भयावह परिणाम यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में लड़कों को अपने विवाह के लिए लड़कियों को बाहर देश से आयात करना पड़े। &amp;nbsp;हरियाणा और पंजाब के कईं गावों में लड़को को दुल्हनें नहीं मिल रही। इसके लिए उन्हें बिहार झारखण्ड सहित उतर पूर्वी राज्यों से दुल्हनों को लाना पड़ रहा है। राजस्थान के जैसलमेर जिले का देवरा गांव 110 सालों के बाद किसी बारात का स्वागत करने की पदवी हासिल कर चुका है। अगर लड़कियों के प्रति नफरत का यह सिलसिला थमा नहीं तो वे दिन दूर नहीं जब देश के अन्य इलाकों में भी लड़कांे को अपने लिए दुल्हन पाने के लिए सैंकड़ों सालों तक इंतजार करना पड़े। &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्र स्तंभकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह लेख दैनिक जागरण में अप्रैल २०११ में &amp;nbsp;प्रकाशित हुआ है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-5128326708015139268?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/5128326708015139268/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=5128326708015139268' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5128326708015139268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5128326708015139268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='लड़कियों के प्रति यह नफरत क्यों?'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-9137131779259696342</id><published>2011-03-28T04:31:00.001-07:00</published><updated>2011-03-28T04:49:01.830-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-REsP3_bKq2E/TZBxi_EH86I/AAAAAAAAAhE/rGcW0wXNFpI/s1600/DSC02412.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/-REsP3_bKq2E/TZBxi_EH86I/AAAAAAAAAhE/rGcW0wXNFpI/s320/DSC02412.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;हर परिवार तक अनाज पहुंचाने की खातिर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंदा की खुशी उसकी झुर्रियों से साफ झलक रही थी। आदिवासी आंदा के लिए इससे संतोष की अधिक क्या बात हो सकती कि महीने की छह तारीख को ही उसे महीने भर का चावल तेल और शक्कर मिल गया। आंदा ने दिखाया कि उसने 35 किलो चावल खरीदा है और वह भी केवल एक रूपए किलो के हिसाब से। बस्तर के अंदरूनी इलाके चित्रकोट के आदिवासी आंदा को यह राशन अपने गांव के यमुना स्वयं सहायता समूह द्वारा चलाई जा रही उचित मूल्य की दुकान से मिला। &amp;nbsp;आंदा के पास लाल रंग का कार्ड है जो अति गरीब लोगों को एक रूपए प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए दिए गए हैं।&lt;br /&gt;इस समय पूरे देश में करीब 60 साल पुरानी पीडीएस यानी जन वितरण प्रणाली द्वारा बीपीएल के लोगों को किफायती दर पर राशन देने में विफलता पर विचार विमर्श चल रहा है। इसी विफलता को देखते हुए सरकार ने मौजूदा बजट में इस प्रणाली को खत्म कर नकद सब्सिडी देने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर विभिन्न कोणों से बहस का दौर जारी है। क्या अनाज के बदले नकद की योजना पीडीएस से अधिक कारगर साबित हो सकती है? खासकर जब विधवा पेंशन जैसी नकद राशि देने वाली कई योजनाओं का पैसा लक्षित समूह तक नहीं पहुंच रहा हो। देश में तमिनलाडू के बाद छत्तीसगढ़ का पीडीएस सब से कारगर साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पीडीएस को एक माॅडल के तौर पर लिया जा रहा हैै। आखिर जो प्रणाली देश के अधिकतर हिस्सों में नाकाम साबित हो रही है छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य में इसकी सफलता हैरानी पैदा करती है। &amp;nbsp;&lt;br /&gt;राज्य के दूरदराज के अंदरूनी इलाकों के दौरे से यह जाहिर होता है कि आम आदमी को सस्ता राशन मिल रहा है। &amp;nbsp;हांलाकि शहर के लोगों में खासकर जो वर्ग पीडीएस प्रणाली का हिस्सा नहीं इस बात को लेकर क्षोभ भी है कि अगर हर गरीब आदमी को एक या दो रूपए में 35 किलो अनाज मिल जाएगा तो वह काम पर क्यों जाएगा? लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह इसे शहरी मध्यवर्गीय सोच का परिचायक मानते हुए कहते हैं अगर आज बस्तर के अभुजमाड़ और टोंडवाल जैसे जंगली इलाकों के गरीब लोगों को भी पीडीएस का चावल मिल रहा है तो यह उनकी सोची समझी नीति का नतीजा है। ‘‘गोदाम में अनाज को सड़ने दें लेकिन किफायत पर न दे यह कहां की समझदारी है।’’&lt;br /&gt;आखिर वह सोचा समझा कौन सा फार्मूला है जिसे देश के अन्य राज्यों में भी लागू करने की योजनाएं चल रही है। साल 2004 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने राशन की दुकानों पर अनाज न मिलने की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर नया पीडीएस नियंत्रण आदेश जारी किया। इसके तहत तीन स्तरों पर नए सुधारात्मक आदेश लागू किए गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंदा जैसे हजारों आदिवासियों को घर के नजदीक आटा, चावल, और तेल &amp;nbsp;मुहैया कराने के लिए सरकार ने उचित मूल्यों की दुकानों के लाइंसेस निजी व्यापारियों की बजाए स्थानीय समुदाय जैसे वन कोपोरेटिव, ग्राम पंचायत, ग्राम परिषदों और स्वयं सहायता समूहों को सौंप दिए। इसके लिए 2872 निजी व्यापारियों के लाइसेंस रद्द किए गए। इसका फायदा यह हुआ कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से दुकानें पूरा दिन खुली रहने लगी और गांव वाले अपनी सुविधानुसार राशन लेने लगे। पूरे राज्य में ऐसी 2297 राशन की दुकानें हैं जो स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाई जा रही हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी ने जवाबदेही को भी बढ़ाने का काम किया। अब निजी व्यापारी के तरह दुकान चलाने वाले समूह जल्द दुकान बंद करने और राशन खत्म होने का बहाना नहीं कर सकते थे। संरचनात्मक स्तर पर अगला सुधार राशन की दुकानों की गिनती बढ़ाना था। दुकानों की गिनती 8492 से बढ़ाकर 10465 कर दी गई। इसके तहत हर ग्राम पंचायत में एक दुकान खोली गई। इससे राशन लेने की लंबी कतारों में कमी आई और कम समय में ही राशन मिलने लगा। &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद सबसे बड़ा सुधार राशन को गोदामों से दुकानों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसपोटेशन प्रणाली में बदलाव कर किया गया। अभी तक निजी व्यापारी अपने कोटे का राशन उठाकर दुकान तक पहुंचने से पहले ही ओपन मार्किट में उसे ऊचें दामों पर बेच देते थे। लेकिन नए सिस्टम के तहत सिविल सप्लाई कारपोरेशन ने सभी उचित मूल्यों की दुकानों पर बिना किसी अतिरिक्त लागत के राशन की सप्लाई करने की शुरूआत की। इसके लिए हर महीने की छह तारीख तक पीले रंग के विशेष ट्रकों में पूरी सप्लाई पहुंचाई जाती है। सारी सप्लाई सीधा दुकान तक पहुचने से ब्लैक मार्किटिंग की संभावना में कमी &amp;nbsp;हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकतर राशन की दुकानें घाटे में चलने के कारण व्यापारी अक्सर राशन का चावल या आटा मिल मालिकों को अधिक दामों में बेचकर अपना मुनाफा बढ़ाने की फिराक में रहता था ऐसे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पीडीएस की कमीशन 8रूपए प्रति किवंटल से बढ़ाकर 30 रूपए प्रति किंवटल की गई। इस प्रोत्साहन ने आम आदमी का आटा चावल बाजार में बेचे जाने की प्रवृति पर कुछ हद तक रोक लगाने का काम किया। &amp;nbsp;इसके लिए 40 करोड़ रूपए प्रति वर्ष की अतिरिक्त लागत राज्य सरकार को सहनी पड़ी। पीडीएस चलाने के लिए ब्याज रहित 75 हजार रूपए तक के ऋण देने की योजना ने भी &amp;nbsp;लोगों को पीडीएस की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए प्रोत्साहित किया। &amp;nbsp;पीडीएस के अलावा दूसरी चीजें बेचने की अनुमति ने भी स्थानीय लोगों को पीडीएस की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। इससे पीडीएस की दुकान चलाने वालों का मुनाफा 700 रूपए प्रति माह से बढ़कर 2500 रूपए हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी राज्य में पीडीएस की असफलता का सबसे बड़ा कारण फर्जी कार्ड हैं। हाल ही में कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों की संख्या में फर्जी कार्ड पकड़े जाने का मामला सामने आया। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कार्डों से छुटकारा पाना एक बड़ी चुनौती थी। &amp;nbsp;अधिक लोगों तक राशन पहुुंचाने के लिए सरकार ने पुराने कार्डों को खत्म कर नए प्रकार के कार्ड जारी किए। इस प्रक्रिया में तीन लाख के करीब फर्जी कार्डों को रद्द किया गया। बीपीएल के अलावा बूढ़े,विकलांग, अति गरीब लोगों को भी पीडीएस में शामिल करने के लिए पांच प्रकार के नए कार्ड जारी किए गए। जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों को भी शामिल किया गया और &amp;nbsp;अति गरीबों को एक रूपए प्रति किलो चावल देने के कार्ड दिए गए। इससे करीब 80 प्रतिशत लोगों को कवर किया गया कुल मिलाकर राज्य सरकार इस नई प्रणाली को जारी रखने के लिए फिलहाल प्रति वर्ष 1440 करोड़ रूपए की सब्सिडी प्रदान कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-gAorRTE2FrU/TZB0GDhSaYI/AAAAAAAAAhI/0pg-d9HIKyo/s1600/DSC02448.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/-gAorRTE2FrU/TZB0GDhSaYI/AAAAAAAAAhI/0pg-d9HIKyo/s320/DSC02448.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;पीदीएस चलाने वाली यमुना समूह की महिलायें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमन सिंह सरकार का दावा है कि इन सुधारांे ने हर घर में अनाज पहुंचा कर राज्य की मातृत्व मृत्यु दर को 407 प्रति लाख से कम कर 337 प्रति लाख और नवजात शिशु मृत्यु दर को 76 प्रति हजार से कम कर 56 प्रति हजार तक पहुंचा दिया है। भले ही इन सुधारों के जरिए राज्य सरकार अधिक से अधिक लोगों तक अनाज पहुंचाने में काफी हद तक सफल रही हो लेकिन आलोचकों का मानना है कि 35 किलो अनाज का काफी हिस्सा मंहगे दामों में मार्किट में बिक रहा है। जैसे कि राज्य के कांग्रेस नेता अजित जोगी का मानना है कि एपीएल परिवारों के हिस्सों का अनाज सीमावर्ती राज्यों में बेचा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;दूसरा बड़ी आलोचना का कारण यह है कि छत्तीसगढ़ का पीडीएस एक मंहगा माॅडल माना जा रहा हैं जिन्हें अन्य राज्यों में लागू करना संभव नहीं। इसके लिए अधिक संसाधनों और बजट की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के पास बजट भी अधिक है और अनाज भी। जो कि अन्य राज्यों के लिए संभव नहीं। इसके अलावा इस माॅडल में भी दुकानों तक सप्लाई पहुंचाकर सरकार ने काफी हद तक गरीबों के हिस्से का अनाज ओपन मार्किट तक पहुंचने पर रोक लगा दी है लेकिन दुकानों से परिवारों तक अनाज पहुंच रहा है कि नहीं इस की माॅनिटरिंग में अभी सुधार की जरूरत है। &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;(यह लेख २८ मार्च को दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ )&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-9137131779259696342?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/9137131779259696342/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=9137131779259696342' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/9137131779259696342'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/9137131779259696342'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2011/03/blog-post_4989.html' title=''/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-REsP3_bKq2E/TZBxi_EH86I/AAAAAAAAAhE/rGcW0wXNFpI/s72-c/DSC02412.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6006866839464748179</id><published>2011-01-15T06:42:00.000-08:00</published><updated>2011-01-15T06:42:46.746-08:00</updated><title type='text'>राजनीतिज्ञ, रेप और बयानबाजी-नज़रिया-विचार मंच-Navbharat Times</title><content type='html'>&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7260951.cms"&gt;राजनीतिज्ञ, रेप और बयानबाजी-नज़रिया-विचार मंच-Navbharat Times&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-6006866839464748179?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7260951.cms' title='राजनीतिज्ञ, रेप और बयानबाजी-नज़रिया-विचार मंच-Navbharat Times'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/6006866839464748179/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=6006866839464748179' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6006866839464748179'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6006866839464748179'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2011/01/navbharat-times.html' title='राजनीतिज्ञ, रेप और बयानबाजी-नज़रिया-विचार मंच-Navbharat Times'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-3539119651929940628</id><published>2010-10-23T05:11:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T05:23:18.265-07:00</updated><title type='text'>मीडिया</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;पेड न्यूज से भी खतरनाक है अंधविश्वासों का प्रचार&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्या कारण है कि अंधविश्वासों और पाखंडों पर लोगों का विश्वास शिक्षा के स्तर में सुधार के बावजूद बढ़ता जा रहा है? सही जवाब यह है कि अब अंधविश्वासों के साथ बाजार जुड़ गया है। बाजार के जुड़ने के साथ ही सभी प्रकार के प्रपंचों, आंडबरों, पाखंडों और अवैज्ञानिक सोच के प्रति मीडिया की रूचि बढ़ रही है। अभी तक चमत्कारों, भूतप्रेतों और अंधविश्वासों को फैलाने के लिए केवल टीवी चैनलों को ही दोष दिया जाता था। सांप सपेरे का खेल, प्रलयों की झूठी भविष्यवाणियों का प्रचार- प्रसार करने में चैनल अभी भी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि विजुअल मीडिया से स्वयं को अधिक मैच्योर मानने वाला प्रिंट मीडिया भी इस होड़ में अब पीछे नहीं रहा। पाठकों की गिनती बढ़ाने की चाह में विभिन्न अखबार हर तबके को अपना लक्ष्य बनाने में जुटे हैं। स्पर्धा की इस लड़ाई में वे यह भूल रहे हैं कि लोगों की आस्थाओं और विश्वास को बाजार में तब्दील करने में वे लोगों को अज्ञानता की उस दलदल में धकेलने का काम भी कर रहें हैं जहां से उबरने में कईं सदियां लग गईं। मीडिया के लिए फिलहाल ‘बेचना’ ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली से निकलने वाले मुख्य दैनिक समाचारपत्र की एक बायलाइन स्टोरी में लिखा हुआ था कि ‘‘रात्रि़ को सोने से पूर्व बालकनी से वस्त्रों (खासतौर पर सफेद रंग) को उतार लेना चाहिए ऐसी मान्यता है कि रा़ित्र में वस़्त्र बाहर सूख रहे हों तो अतृप्त आत्माएं उन वस्त्रों पर कुदृष्टि डालकर उन वस्त्रों के पहनने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खराब स्वास्थ्य का कारण अत्ृप्त आत्माओं को बताना और वस्त्रों के माध्यम से उनकी कुदृष्टि पड़ने की बात किसी फूहड़ सोच का नतीजा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया के किसी भी माध्यम में किसी भी खबर, आलेख, कार्यक्रम या फिर विज्ञापन के जरिए लोगों मंे भ्रम फैलाना, उन्हें अज्ञानता का पाठ पढ़ाना, डराना, धमकाना या फिर अंधविश्वासों को प्रकाशित या प्रसारित करना एक खतरनाक अपराध है। इसकी एक वजह यह भी है कि अखबार में छपे और टीवी में आने वाले किसी भी खबर को अभी भी बहुत बड़ा वर्ग सत्य मानकर चलता है। ऐसे लोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि, ‘‘अरे भई गलत कैसे होगा मैंने अखबार में पढ़ा था। या ‘‘टीवी में देखा था।’’ लेकिन झूठ और आडंबरों पर आधारित ऐसी खबरों और प्रोग्रामों की गिनती बढ़ती ही जा रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों को भ्रमित करने वाली और कुतर्कों पर आधारित 10 अक्तूबर को छपी इसी स्टोरी में आगे लिखा था ‘‘घर के मुख्य द्वार से यदि रसोई कक्ष दिखाई दे तो घर की स्वामिनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और उसके बनाए खाने को ज्यादा लोग पसंद नहीं करते हैं। कौन सी वास्तुकला ऐसे विचारों को प्रचारित कर रही है? किसी भी शास्त्र, कला के नाम पर इस प्रकार के कुतर्कों को प्रचारित करने का मुख्य कारण केवल मुनाफा हो सकता है जो लोगों को भ्रमित कर ऐसे अंधविश्वास के झूठे समाधानों को बेचकर कमाया जा सकता है। मीडिया ऐसे उपायों और समाधानों को बेचने का मुख्य माध्यम बनता जा रहा है। विके्रताओं और मीडिया मालिकांे के इस मिले -जुले खेल में आम आदमी खासकर जो निराश और शोषित हैं, ऐसे प्रपंचों में जकड़ जाते हंै। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिव्यक्ति की आजादी का जो अधिकार हम पत्रकारों और लेखकों को लिखने की आजादी प्रदान करता हैे वही पाठको और दर्शकों को सही तार्किक और तथ्यों पर आधारित सूचनाएं और ज्ञान प्रकाशित-प्रसारित करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी मांग करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जब अखबार और टीवी चैनल लोगों को महज गुमराह करते नजर आते है। लेकिन इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। इन दिनों कुछ टीवी चैनलों पर बाधा मुक्ति यंत्र और नजर सुरक्षा कवच को बेचने के लिए लोगों को पूरी तरह से गुमराह किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में पढ़ने के बावजूद बच्चे के अंक कम आने, व्यापार में घाटा होने या बेटी की सगाई टूटने का कारण किसी रिश्तेदार या मित्र की नजर लगना बताया जा रहा है। इसके लिए नाटक रूपातंरण के रूप में ऐसी झूठी कहानियों को फिल्माया जाता है और समाधान के रूपमें यंत्र या कवच खरीदने पर जोर दिया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने प्रोडेक्ट को बेचने के लिए उसे विज्ञापित करना जायज ठहराया जा सकता है लेकिन उसके लिए लोगों को भयभीत करना या फिर झूठी कहानियों के माध्यम से यह प्र्रचारित करना कि यह यंत्र यानी गले में पहनने वाला पेंडेट न लिया गया तो आप के अधूरे काम कभी पूरे नहीं हो पाएंगे। किसी भी चीज को बेचने के लिए विज्ञापन की भी कोई आाचार संहिता है। बेचने का मतलब यह नहीं कि लोगों को गुमराह किया जाए वह भी नेशनल चैनल पर। मीडिया के नाम पर सरकार से लाइसेंस और दूसरी सुविधाएं लेने का अर्थ यह नहीं कि आम लोगों में भूत प्रेत, अतृप्त आत्माओं अंधविश्वासों से भरा फूहड़ अज्ञान का प्रचार करो। पेड न्यूज से भी खतरनाक इस मर्ज से भी मीडिया को सावधान रहना होगा। समाचारों के रूप में हर समय आंतक और जिज्ञासा बनाकर खबरों को बेचने वाले चैनलों और अतार्किक, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिक तथ्यों और जादू टोनो जैसे अज्ञान को फैलाने वाले हर माध्यम के खिलाफ भी आवाज उठाने की जरूरत है क्योंकि यह एक उन्नतशील समाज के लिए बेहद खतरनाक प्रवृति है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्या कारण है कि अंधविश्वासों और पाखंडों पर लोगों का विश्वास शिक्षा के स्तर में सुधार के बावजूद बढ़ता जा रहा है? सही जवाब यह है कि अब अंधविश्वासों के साथ बाजार जुड़ गया है। बाजार के जुड़ने के साथ ही सभी प्रकार के प्रपंचों, आंडबरों, पाखंडों और अवैज्ञानिक सोच के प्रति मीडिया की रूचि बढ़ रही है। अभी तक चमत्कारों, भूतप्रेतों और अंधविश्वासों को फैलाने के लिए केवल टीवी चैनलों को ही दोष दिया जाता था। सांप सपेरे का खेल, प्रलयों की झूठी भविष्यवाणियों का प्रचार- प्रसार करने में चैनल अभी भी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि विजुअल मीडिया से स्वयं को अधिक मैच्योर मानने वाला प्रिंट मीडिया भी इस होड़ में अब पीछे नहीं रहा। पाठकों की गिनती बढ़ाने की चाह में विभिन्न अखबार हर तबके को अपना लक्ष्य बनाने में जुटे हैं। स्पर्धा की इस लड़ाई में वे यह भूल रहे हैं कि लोगों की आस्थाओं और विश्वास को बाजार में तब्दील करने में वे लोगों को अज्ञानता की उस दलदल में धकेलने का काम भी कर रहें हैं जहां से उबरने में कईं सदियां लग गईं। मीडिया के लिए फिलहाल ‘बेचना’ ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। &lt;br /&gt;कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली से निकलने वाले मुख्य दैनिक समाचारपत्र की एक बायलाइन स्टोरी में लिखा हुआ था कि ‘‘रात्रि़ को सोने से पूर्व बालकनी से वस्त्रों (खासतौर पर सफेद रंग) को उतार लेना चाहिए ऐसी मान्यता है कि रा़ित्र में वस़्त्र बाहर सूख रहे हों तो अतृप्त आत्माएं उन वस्त्रों पर कुदृष्टि डालकर उन वस्त्रों के पहनने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं।’’खराब स्वास्थ्य का कारण अत्ृप्त आत्माओं को बताना और वस्त्रों के माध्यम से उनकी कुदृष्टि पड़ने की बात किसी फूहड़ सोच का नतीजा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया के किसी भी माध्यम में किसी भी खबर, आलेख, कार्यक्रम या फिर विज्ञापन के जरिए लोगों मंे भ्रम फैलाना, उन्हें अज्ञानता का पाठ पढ़ाना, डराना, धमकाना या फिर अंधविश्वासों को प्रकाशित या प्रसारित करना एक खतरनाक अपराध है। इसकी एक वजह यह भी है कि अखबार में छपे और टीवी में आने वाले किसी भी खबर को अभी भी बहुत बड़ा वर्ग सत्य मानकर चलता है। ऐसे लोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि, ‘‘अरे भई गलत कैसे होगा मैंने अखबार में पढ़ा था। या ‘‘टीवी में देखा था।’’ लेकिन झूठ और आडंबरों पर आधारित ऐसी खबरों और प्रोग्रामों की गिनती बढ़ती ही जा रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों को भ्रमित करने वाली और कुतर्कों पर आधारित 10 अक्तूबर को छपी इसी स्टोरी में आगे लिखा था ‘‘घर के मुख्य द्वार से यदि रसोई कक्ष दिखाई दे तो घर की स्वामिनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और उसके बनाए खाने को ज्यादा लोग पसंद नहीं करते हैं। कौन सी वास्तुकला ऐसे विचारों को प्रचारित कर रही है? किसी भी शास्त्र, कला के नाम पर इस प्रकार के कुतर्कों को प्रचारित करने का मुख्य कारण केवल मुनाफा हो सकता है जो लोगों को भ्रमित कर ऐसे अंधविश्वास के झूठे समाधानों को बेचकर कमाया जा सकता है। मीडिया ऐसे उपायों और समाधानों को बेचने का मुख्य माध्यम बनता जा रहा है। विके्रताओं और मीडिया मालिकांे के इस मिले -जुले खेल में आम आदमी खासकर जो निराश और शोषित हैं, ऐसे प्रपंचों में जकड़ जाते हंै। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिव्यक्ति की आजादी का जो अधिकार हम पत्रकारों और लेखकों को लिखने की आजादी प्रदान करता हैे वही पाठको और दर्शकों को सही तार्किक और तथ्यों पर आधारित सूचनाएं और ज्ञान प्रकाशित-प्रसारित करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी मांग करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जब अखबार और टीवी चैनल लोगों को महज गुमराह करते नजर आते है। लेकिन इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। इन दिनों कुछ टीवी चैनलों पर बाधा मुक्ति यंत्र और नजर सुरक्षा कवच को बेचने के लिए लोगों को पूरी तरह से गुमराह किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में पढ़ने के बावजूद बच्चे के अंक कम आने, व्यापार में घाटा होने या बेटी की सगाई टूटने का कारण किसी रिश्तेदार या मित्र की नजर लगना बताया जा रहा है। इसके लिए नाटक रूपातंरण के रूप में ऐसी झूठी कहानियों को फिल्माया जाता है और समाधान के रूपमें यंत्र या कवच खरीदने पर जोर दिया जाता है। &lt;br /&gt;अपने प्रोडेक्ट को बेचने के लिए उसे विज्ञापित करना जायज ठहराया जा सकता है लेकिन उसके लिए लोगों को भयभीत करना या फिर झूठी कहानियों के माध्यम से यह प्र्रचारित करना कि यह यंत्र यानी गले में पहनने वाला पेंडेट न लिया गया तो आप के अधूरे काम कभी पूरे नहीं हो पाएंगे। किसी भी चीज को बेचने के लिए विज्ञापन की भी कोई आाचार संहिता है। बेचने का मतलब यह नहीं कि लोगों को गुमराह किया जाए वह भी नेशनल चैनल पर। मीडिया के नाम पर सरकार से लाइसेंस और दूसरी सुविधाएं लेने का अर्थ यह नहीं कि आम लोगों में भूत प्रेत, अतृप्त आत्माओं अंधविश्वासों से भरा फूहड़ अज्ञान का प्रचार करो। पेड न्यूज से भी खतरनाक इस मर्ज से भी मीडिया को सावधान रहना होगा। समाचारों के रूप में हर समय आंतक और जिज्ञासा बनाकर खबरों को बेचने वाले चैनलों और अतार्किक, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिक तथ्यों और जादू टोनो जैसे अज्ञान को फैलाने वाले हर माध्यम के खिलाफ भी आवाज उठाने की जरूरत है क्योंकि यह एक उन्नतशील समाज के लिए बेहद खतरनाक प्रवृति है। &lt;br /&gt;(विदुर की पूर्व सम्पादक)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-3539119651929940628?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/3539119651929940628/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=3539119651929940628' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3539119651929940628'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3539119651929940628'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='मीडिया'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1358455876537513720</id><published>2010-08-03T06:29:00.000-07:00</published><updated>2010-08-03T06:29:22.240-07:00</updated><title type='text'>कुलपति जी, बस और नहीं!</title><content type='html'>अन्नू आनंद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलपति जैसे प्रतिष्ठित पद पर रहते हुए कोई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। यह सोच कर भी आश्चर्य होता है। इन शब्दों ने केवल महिला लेखिकाओं का ही नहीं समूचे महिला समाज का अपमान किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय जैसा संस्थान जिस पर हिंदी भाषा को अन्य देशों में प्रतिष्ठित करने की जिम्मेदारी हो वहां का कुलपति देश की लेखिकाओं के लिए ‘छिनाल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करे और उसे एक प्रतिष्ठित संस्थान साहित्य संसथान की पत्रिका प्रकाशित भी करे तो समझ में आ जाना चाहिए कि शिक्षा और साहित्य का स्तर किस हद तक गिर गया है। शालीनता की सभी हदें पार कर किसी भी लेखिका के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल दिमागी दिवालियापन और घटिया सोच की निशानी है और ऐसे पुरूषों को ऊंचें पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने वक्तव्य के बचाव में दिए गए कुलपति के तर्क भी संतोषजनक नहीं है। &lt;br /&gt;अपने बचाव में वे कहते हैं इस शब्द का इस्तेमाल प्रेमचंद कई बार कर चुके हैं। हांलाकि मेरा साहित्य में कोई दखल नहीं है लेकिन कुलपति जी जो साहित्यकारों की जमात में अच्छा रसूख रखते हेैं यह कैसे भूल गए कि प्रेमचंद की कहानियों मंे इस्तेमाल इस शब्द का संदर्भ दूसरा रहा है। कहानी का पात्र किस पृष्ठभूमि में और किस संदर्भ के तहत इस शब्द का इस्तेमाल कर रहा है यह सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। उन्होंने कुलपति की तरह कभी अपनी किसी टिप्पणी में महिलाओं या लेखिकाओं के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने बचाव में उन्होंने एक अखबार को दूसरा तर्क देते हुए कहा कि उन्होंने किसी एक विशेष लेखिका के लिए नहीं बल्कि बहुत सी लेखिकाओं के लिए इसका इस्तेमाल किया है यानी गाली एक को नहीं बहुत सी महिला लेखिकाओं को दी गई है। क्या बहुत सी महिलाओं के लिए ये शब्द तर्कसंगत हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना है कि बहुत सी लेखिकाएं स्त्री विमर्श के सवाल पर केवल देह से मुक्ति पर विमर्श को केंद्रित रखती हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे विचार रखे। यह आपति भी जायज नहीं। स्त्री विमर्श का फोकस क्या होना चाहिए इसपर उनके अपने विचार हो सकते हैं। जिस पर बहस की जा सकती है। लेकिन कोई भी लेखिका अपनी आत्मकथा में या अपने लेखों में किस प्रकार की मुक्ति को वरीयता दे यह उसकी अपनी अभिवयक्ति की आजादी का मसला है। अगर वह देह की मुक्ति को अपना विषय बनाती है तो क्या उसकोेे गालियां दी जाएं ? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि कोई लेखिका क्या लिखे इसके लिए भी उसे मर्दों से राय लेनी होगी। महिलाओं के प्रति उनकी यह टिप्पणी अपरोक्ष रूप से उसी कट्टरपंथी सोच को प्रतिबिंबित करती है जो कभी महिलाओं को पब न जाने की हिदायत देती है तो कभी अकेले मंदिर में न जाने की नसीहतें। कभी राजनीति से दूर रहने में ही महिलाओं का भला मानती है। अब वार महिलाओं के लेखन पर है और वह भी गालियों के साथ। यानी अब लेखन पर पाबंदी के लिए गालियों का सहारा।&lt;br /&gt;ताकि महिलाएं कुछ भी लिखने से पहले ऊंचे ओहदों मंे बैठे ऐसे मर्दों से खौफ खाएं जो उनकी आवाज को दबाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। लेकिन इन मर्दों के लिए एक नसीहत महिला यह बखूबी जान चुकी है कि पाबंदियों के घेरों से कैसे निकलना है, मर्दों के बनाए रूढ़ीवादी खांचों को कैसे तोड़ना है और अपने रास्तों को कैसे चुनना है अगर चाहें तो उसके हौंसलों के साथ खड़ा होना सीखें। उनकी बढ़ती हैसियत से खार खाकर उनमें फच्चर फसाने की कोशिशें बहुत मंहगी पड़ सकती हैं। महिलाओं का चरित्रहनन कर उन पर लगाम लगाने का पुराना और घटिया नुस्खा अब औेर नहीं चलेगा कुलपति जी!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1358455876537513720?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/1358455876537513720/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=1358455876537513720' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1358455876537513720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1358455876537513720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='कुलपति जी, बस और नहीं!'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-2248459517302553590</id><published>2010-07-23T01:23:00.000-07:00</published><updated>2010-07-23T01:25:53.848-07:00</updated><title type='text'>कोख का कारोबार</title><content type='html'>सरोगेसी पर महिला विरोधी विधेयक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने देश में सरोगेसी यानी किराए पर कोख से जुड़े विधेयक का मसौदा स्वास्थय मंत्रालय को भेजा है। मंत्रालय और परिषद में कईं सालों से चल रही कवायद के बाद जो प्रारूप तैयार किया है वह निराशाजनक है। अस्सिटिड रिर्पोडेक्टिव टेकनाॅलाजी (एआरटी) को नियं़ित्रत करने का जो मसौदा बना है उसमें महिला के हितों को कम बाजार को अधिक ध्यान में रखा गया है। प्रारूप के अधिकतर प्रावधानों से स्पष्ट है कि सरकार एआरटी के जरिए कीमती और खतरनाक प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करने के पक्ष में है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधेयक में सरोगेसी के नाम पर किराए पर कोख देने वाली महिला को आर्थिक मुआवजा देने, सीमेंन बैंक, फर्टीलिटी क्लीनिक, दवा कंपनियां और एआरटी बैंकों को बिचैलिए बनाकर किराए पर कोख देने और लेने के प्रावधानों का उल्लेख है। ये बैंक बकायदा कानूनी तौर पर विज्ञापन के माध्यम से सरोगेट मांओं, शुक्राणुओं और अण्डाणुदात्ताओं का पता लगाने का काम करेंगे। बैंक इन दात्ताओं को इसकी फीस भी अदा करेगा। विधेयक के एक अन्य प्रावधान के मुताबिक सरोगेट मां किराए पर कोख लेने वाले दंपति से भी वित्तीय मुआवजा ले सकती है। विधेयक में जिस प्रकार से बैंकांे, क्लीनिकों, ग्राहकों और पैसे के लेन -देन की सिफारिशों का जिक्र किया गया है  उससे साफ जाहिर है कि सरकार और दवा कंपनियां एक औरत की जनन अक्षमता को भुना कर देश में कृत्रिम तरीके से बच्चा जनने के एक बड़े उधोग को बढ़ावा देने के पक्ष में है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सही है भारतीय समाज में महिला के मां के रूप को अधिक सम्मानित किया जाता है। विवाह के बाद ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ जैसे पारंपरिक आर्शीवचन आज भी उसकी परिपूर्णता मां बनने पर केंद्रित करते हैं। जो महिला शादी के कुछ सालों के बाद मां नहीं बन पाती उसे घर परिवार में ही नहीं समाज में भी हीन भावना से देखा जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि महिला के प्राकृतिक रूप से संतान पैदा करने से जुड़े महत्व को खारिज करने की बजाय तकनीकी विकास का इस्तेमाल ऐसी प्रक्रियाओं को प्रचारित करने मेें किया जा रहा है जो महिला के लिए बच्चा जनने के तरीके को व्यापार में बदल रहा है। इससे भले ही उसका स्वास्थ्य दाव पर लग जाए। शर्म की बात यह है कि सरकारी एजंसिया भी इसमें ‘बिजनेस’ के पहलु को अधिक महत्व दे रही हैं। विधेयक में आईवीएफ बैंक, अण्डाणु-शुक्राणु बैंक और आईवीएफ की तकनीकों का जिक्र कर एआरटी को जादू की छड़ी के रूप में पेश किया जा रहा है और ऐसा करने में उन खतरों और आशंकाओं को भुला दिया जा रहा है जो महिला के स्वास्थ्य से जुड़े हैं। विधेयक में केवल किराए पर कोख लेने के संबंध में किए जाने वाले समझौते से जुड़े विशेष प्रवधानों का उल्लेख है लेकिन कोख किराए पर देने वाली महिला के अधिकारों और उसके स्वास्थ्य के हितों की कोई चर्चा नहीं। विधेयक में स्वास्थ्य को होने वाले खतरों को केवल ‘छोटे खतरों’ं के रूप में वर्णित किया गया है। विधेयक के मुताबिक एक महिला अपने बच्चों के अलावा पांच सफल जन्मों के लिए अपनी कोख किराए पर दे सकती है। लेकिन बार बार गर्भवती बनाने या आईवीएफ तकनीक के अधिक प्रयोग से महिला या बच्चे के जीवन से जुड़े गंभीर खतरों को इसमें महत्व नहीं दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ सालों के अंदर भारत में सरोगेसी एक बहुत बड़े व्यापार में तबदील हो चुका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में सरोगेसी का व्यापार 445 मिलियन डालर का है। यहां एक दंपति को एकबार कोख किराए पर लेने का कुल खर्चा 8 से 10 लाख तक का है। जबकि अमेरिका में यही खर्चा 25 से 35 लाख है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें 70 प्रतिशत ग्राहक गैर प्रवासी भारतीय हैं। दरअसल जिन देशों में कृत्रिम प्रजनन से संबंधित कानून ढीले हैं या फिर जिन देशों में इन तकनीकों से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं अधिक विकसित हैं उन देशों में ‘प्रजनन टूरिज्म’ अधिक पनप रहा है। भारत में विदेशियों द्वारा कोख किराए पर लेने के प्रति कोई दिशा निर्देश नहीं इस कारण पिछले कुछ समय से भारत में कम लागत और कम कड़े कानूनों के चलते सरोगेसी का व्यापार और बाजार बढ़ा है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में गरीबी के चलते आर्थिक मजबूरी के कारण गरीब और पिछड़ी महिलाएं  किराए पर कोख देने के लिए तैयार रहती हैं। लेकिन बिचैलिए के रूप में काम करने वाली एजेंसियां इन जरूरतमंद महिलाओं को मात्र प्रजनन की वस्तु मानकर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का शोषण कर रही हैं। उम्मीद की जा रही थी कि सरोगेसी और एआरटी तकनीको को नियंत्रित करने वाले कानून से महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए तकनीकों के दुरूपयोग पर रोक लगाई जाएगी।  लेकिन विधेयक के प्रारूप से स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को महिलाओं के स्वास्थ्य की कितनी चिंता है। फिलहाल सरकार की पूरी मंशा देश में ‘प्रजनन स्वास्थ्य टूरिज्म’ को बढ़ाने में दिखाई दे रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह लेख 22 जुलाई 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है। )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-2248459517302553590?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/2248459517302553590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=2248459517302553590' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2248459517302553590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2248459517302553590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='कोख का कारोबार'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6103472203832673168</id><published>2010-05-13T02:20:00.000-07:00</published><updated>2010-05-13T02:20:27.141-07:00</updated><title type='text'>अनसुनी आवाज: निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल</title><content type='html'>&lt;a href="http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#links"&gt;अनसुनी आवाज: निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-6103472203832673168?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#links' title='अनसुनी आवाज: निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/6103472203832673168/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=6103472203832673168' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6103472203832673168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6103472203832673168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html' title='अनसुनी आवाज: निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-3626043784179062875</id><published>2010-05-13T01:41:00.000-07:00</published><updated>2010-05-13T01:48:33.412-07:00</updated><title type='text'>निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल</title><content type='html'>अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निरूपमा किसी गांव, बस्ती की रहने वाली कम पढ़ी लिखी या अशिक्षित परिवार की बेटी नहीं थी। देश की राजधानी में दिल्ली में रहने वाली, आथर््िाक रूप से संपन्न और बुद्विजीवी कहलाए जाने वाल व्यवसाय पत्रकारिता से संबंधित थी। ऐसे में अगर उसके प्रेम विवाह की इच्छा उसकी मौत का कारण बनती है और जात से बाहर विवाह करने को अपमान मानने वाला पढ़ा लिखा परिवार अगर अपने सम्मान के लिए अपनी ही बेटी की जान ले लेता है तो निश्चिय ही यह प्रवृति काफी खतरनाक है। इस पर गंभीरता से बहस की जरूरत है।       &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निरूपमा की मौत से सब से अधिक स्तब्ध और सदमे का एक कारण यह भी है कि आनॅर किलिंग यानी ‘मान के लिए जान’ के इस घृणित और तालिबानी रिवायत को अभी तक केवल एक विशेष समुदाय, जाति और विशेष भौगोलिक क्षेत्रों से ही जोड़ कर देखा जाता था। जात बिरादरी से बाहर या गौत्र में शादी करनेे के कारण जिन युवा लड़के -लड़कियों की जाने गईं उसके लिए मुख्य दोषी वे दकियानूसी खाप पंचायतें थीं जिनके तुगलकी फरमानों से डरकर मां बाप या रिश्तेदारों ने मान के लिए अपने बच्चों को ही मार डाला। लेकिन निरूपमा की हत्या ने साबित कर दिया है कि जात को अपना मान सम्मान मानने की प्रवृति उच्च, सभ्य और शिक्षित परिवारों में भी हावी है। केवल जात से बाहर प्रेम करने या विवाह करने की इच्छा जाहिर करने पर उसकी हत्या कर देना घरेलु हिंसा का वह घृणित स्वरूप है जहां घर का व्यक्ति घर के सदस्य (खासकर महिलाओं ) के साथ बर्बर से बर्बर बर्ताव करने को भी अपना हक मानता है।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल जात और धर्म को लेकर जो मानसिकता हमारे समाज में घर कर चुकी है उसकी जड़े केवल पिछड़े और अनपढ़ वर्ग तक सीमित नहीं। यह हमारी सामाजिक बुनावट में रसी बसी है। जातिगत सूचक के रूप में उपनाम हमें खास पहचान देते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा या उच्च स्तर पर हो लेकिन जातिगत आधरित उसके उपनाम से ही उसकी काबिलियत और हैसियत को आंका जाता है। इन जातिगत सूचकों को त्यागकर अगर कोई महज अपने नाम से अपनी पहचान बनाना चाहता है तो उसे निम्न या पिछड़ी जाति का मान कर उस से भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है। निरूपमा की मौत समाज में जाति के महत्व पर कईं सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जात के आधार पर समाज को विभिन्न खंाचों में बांटना क्या उचित है? प्रतिभा, गुण, शिक्षा की बजाय जात के आधार पर उच्च निम्न स्तर का वर्गीकरण क्या एचित है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही सवालों के बीच दूसरी ओर सम्मान के लिए जान लेने वाली खाप पंचायतों के विभिन्न नेताओं ने हरियाणा में एक बड़ी बैठक कर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गौत्र में विवाह करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग रखी है। इसके लिए उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों को मांग का समर्थन करने के लिए एक माह का समय दिया है। गौत्र में विवाह के कारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कईं युवाओं को पिछले दिनों अपनी जानें गवानी पड़ी। मीडिया और सामाजिक संगठनों की द्वारा इन पंचायतों के खिलाफ आवाज उठाने के बावजूद सरकार राजनैतिक हितों की खातिर इन पंचायतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न कर सकी। सरकार की लापरवाही के चलते अब खाप पंचायत की प्रवृति सभ्य पढ़े लिखे परिवारों ने भी अपनानी शुरू कर दी है।  इन परिवारों में भी छोटे से मान के लिए हत्या करना एक सामान्य व्यवहार का रूप ले रहा है। इस प्रवृति को रोकने के लिए गंभीरता से सोचना होगा। बहस का मुद्दा तो यह है कि हमारा फर्ज क्या सदियों से चले आ रहे जाति के दकियानूसी बंधन को तोड़ने वाले युवाओं को प्रोत्साहित  करना है या फिर जातीय खांचांे को बढ़ाने वाली प्रवृतियों को। आने वाली जनगणना में जात के वर्गीकरण का समर्थन करने वाले नेताओं को भी अपनी राय बनाने से पहले जातिगत समाज से होने वाले खतरों के प्रति गंभीरता से विचार करना होगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वरिष्ठ पत्रकार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-3626043784179062875?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/3626043784179062875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=3626043784179062875' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3626043784179062875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3626043784179062875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='निरूपमा की मौत में छिपा ज़ात का सवाल'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1132615288528817680</id><published>2010-04-02T01:20:00.000-07:00</published><updated>2010-04-02T01:22:45.646-07:00</updated><title type='text'>ऐसी तालिबानी सोच का क्या करें</title><content type='html'>अन्नू आनंद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुलायम सिंह कहते हैं कि अभिजात्य वर्ग की महिलाओं के संसंद में आने से छेड़खानी की घटनाएं बढ़ेंगी। उन का कहना है कि बड़े घर की महिलाओं के संसंद में आने से  लोग सीटियां बजाएंगे। महंत नृत्यगोपाल दास का कहना हैं कि महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय नहीं जाना चाहिए। इन जगहों पर उन्हें पुरूषों को साथ लेकर ही जाना चाहिए। धर्मगुरू रामविलास वेदांती तो महिलाओं के अकेले मंदिर में जाने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है। शिया कल्बे ज़व्वाद का कहना है कि महिलाओं को घर संभालना चाहिए, बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हेें राजनीति से दूर रहना चाहिए। उन्हें अच्छे नेता पैदा करने चाहिए न कि स्वयं नेता बनना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर से मुखर होती इस मर्दवादी सोच से साफ जाहिर है कि महिलाओं की बढ़ती सबलता से राजनेता और धर्मभीरू अपनी सत्ता में सुराख होते देख पूरी तरह बौखला गए हैं। एक ओर वे महिलाओं की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए राजनीति में उनके प्रवेश का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अपने पापों को छिपाने के लिए धर्म का सहारा लेकर महिलाओं को ऐसे खांचों में कैद करने की चाल चल रहे हैं जिससे उनकी पुरूषों पर निर्भरता बनी रहे। मुलायम सिंह समर्थक महिलाओं कीे राजनैतिक ताकत से डरे हुए हैंे इसलिए वे हर जायज और नाजायज हथकंडा अपनाकर महिलाओं को संसद से बाहर रखना चाहते हैं। धर्मगुरू राजनीति के साथ महिलाओं की वैयक्तिक आजादी पर भी प्रतिबंध की बात कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने साथी साधू संतों के चरित्र पर भरोसा नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुलायम सिंह जिन्हें संसद में महिलाओं की तादाद बढ़ाने से सीटियों का डर सता रहा है वे ऐसी ओछी हरकतों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की बजाय महिलाओं को संसद से बाहर रहने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन वह यह भूल रहें हैं कि संसद के दोनो सदनों में अभी भी जितनी महिलाएं मौजूद हैं वे सिरफिरों की सीटियों का जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे ओछों से निपटने के गुर वे जानती हैं और इसके लिए उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं। लिहाजा जरूरत उन ओछे कठमुल्लापंथियों से लड़ने की है जो महिलाओं के राजनीति में आने से इस प्रकार भयभीत हैं कि कभी जाति कभी धर्म और अब उनकी अस्मिता और सुरक्षा का खोखला आधार बनाकर उन्हें घर की चारदीवारी में कैद करने की साजिश रच रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा भीमानंद और स्वामी परमहंस नित्यानंद के सेक्स सकंेडलों में लिप्त होने के खुलासे के बाद नृत्यगोपाल दास और वेदांती जैसे धर्मगुरूओं को महिलाओं का मंदिरों में जाना नागवार लग रहा है। हास्यस्पद तो यह है कि ढोंगी साधू महात्माओं को सजा देने, उन्हें संयम सिखाने और महिलाओं का सम्मान करने का पाठ पढ़ाने की बजाय ये धर्मभीरू महिलाओं पर ही शिकंजा कसने लगे। कोई भी साधू का चोला पहन कर ही सच्चे अर्थों में साधू नहीं हो जाता। ऐसे फर्जी साधू तो हर जगह हैं लेकिन इसके लिए महिलाएं घरों में कैद तो नहीं हो सकतीं। उचित तो यह होता कि सभी धर्माचार्य ढोंगी बाबाओं की हवस पर लगाम लगाने और उन्हें उनके अपराध की कड़ी सजा देने की हिमायत करते। लेकिन इसका समाधान भी कट्टरपंथियों की इस जमात को महिलाओं के मंंिदर में अकेले प्रवेश पर रोक लगाने में दिख रहा है। यह तो वही बात हुई हाथ पर लगी चोट का इलाज करने के लिए हाथ काटने की सलाह देना। तरस आता है ऐसी सोच पर और इसको खमोशी से सुनने वाले समाज पर जो आज भी हर क्षेत्र में अपनी कौशलता से र्कीति के नए आयाम बनाने वाली मानवियों की सुरक्षा के नाम पर अपना भय, कमजोरी ओर कामुकता को छिपाने का गंदा खेल खेल रहे हैं। ऐसी मर्दवादी सोच का इतिहास काफी लंबा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तलिबानो ने महिलाओं पर पाबंदी लगाने के लिए हमेशा ही धर्म का सहारा लिया है। ऐसा ही एक फरमान के द्वारा वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में तालिबानों ने महिलाओं की सभी बसों पर पर्दे लगाने और इन बसों में टिकट काटने के लिए 15 साल से कम उमर के लड़कों को रखने का हुक्म सुनाया। आदेश के पीछे इस्लाम धर्म का हवाला दिया गया। महिलाओं को बसों में पर्दों के पीछे रहनेे के इस हुक्म का कारण भी महिलाओं की इज्जत की रक्षा बताया गया था। ऐसी ही तालिबानी सोच अब भारत में भी लगातार सिर उठा रही है। महिलाओं को सुरक्षित रखने की यही दलील अब वेदातीं जैसे महंत और जव्वाद जैसे मौलना दे रहे है। यानी महिलाएं पुरूषों की हवस और दरिदंगी का शिकार न हो उनके रूप और सौन्दर्य को देख कर उनका मन न डोल जाए इसका इंतजाम भी महिलाएं करें।    &lt;br /&gt;यह प्रवृति सदा से महिलाओं को पीछे धकेलने की साजिश रचती रही है। इन धार्मिक कठमुल्लाओं का मकसद एक ही है कि अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए महिलाओं को  ज्ञान और शिक्षा से दूर रखना। जहां उनके आत्मनिर्भर या सबल होने की बात होती है तो कभी इस्लाम, कभी हिंदू धर्म और कभी भारतीय संस्कृत के नाम पर महिलाओं के विचारात्मक शोषण करने की साजिश शुरू हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 1990 में कोलकाता से प्रकाशित होने वाली एक बंगला पत्रिका को बांगलादेश में प्रवेश की अनुमति इसलिए नहीं मिली क्योंकि यह पत्रिका नारी शरीर की संपूर्ण जानकारी देने के साथ स्त्री शरीर के विकास की विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी देती थी। लेकिन बांग्लादेश के तत्कालीन  कत्र्ताधत्र्ताओं को यह अंक नागवार लगा इसलिए इस पर पाबंदी लगा दी गई। दरअसल नारी शरीर और उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी आम महिलाओं को मिलना पुरूषों के हित में नहीं था। महिला अगर यह समझ हासिल कर ले कि बच्चे के लिंग की जिम्मेदारी उस की नहीं पुरूष की है,े यौन संबंधों मे जितना सुख का अधिकारी पुरूष है उतनी महिला भी तो पुरूषों को  महिला पर मनमानी चलाने और ‘लड़की जनने’ के उलाहने देने की तानाशाही चलाने में कष्ट होता।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो तर्क इस पत्रिका के पर रोक लगाने के लिए है वही भारत में फायर जैसी फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए उत्पात मचाने वालों के थे। ऐसी ही तालिबानी सोच रखने वाले ‘मनसे’ के लोग कितनी बार भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर कभी फिल्मों के पोस्टर जलाते हैं, कभी पब जाने से रोकते हैं कभी वेलंनटाइन डे को मुद्दा बनाते हैं। महिलाओं के पहनावे से लेकर उनके उपनाम तक उनके निशाने पर है। भारत में धर्म और राजनीति में ऐसी तालिबानी सोच बेहद उफान पर है। लिहाजा अभी सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं को इन धर्मभीरूओं, कठमुल्लापंथियों की चालों को नाकाम करने की है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1132615288528817680?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1132615288528817680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1132615288528817680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/04/blog-post_02.html' title='ऐसी तालिबानी सोच का क्या करें'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-3155778977429129064</id><published>2010-03-31T05:38:00.000-07:00</published><updated>2010-03-31T05:40:51.079-07:00</updated><title type='text'>धर्म का बाजारवादी चेहरा</title><content type='html'>अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ समय से महाराज, बाबाओं और गुरूओं के काले कारनामों का भण्डाफोड़ हो रहा है। एक के बाद एक फर्जी गुरू की असलियत खुल कर सामने आ रही है।  पिछले कुछ सालों से अपने को संत, महात्मा बता कर लोगों के साथ छल करने वाले बाबाओं की संख्या बढ़ी है। हकीकत तो यह है कि शिक्षा के विस्तार और सूचना क्रांति के विस्फोट के बावजूद इन बाबाओं की दुकाने बढ़ती जा रही हैंै। अगर जरा ध्यान दें ंतो पता चलेगा कि छल और धोखे का यह फलता फूलता धंधा केवल बाबाओं तक ही सीमित नहीं। कस्बों और महानगरों की गलियां पिछले एक दशक में ऐसे ज्योतिषियों और पंडितों की बडीे बडी दुकानों से भरी पड़ी हैं जिस पर लगे लंबे चौड़े बोर्ड राशि-दोष दूर करने से लेकर किसी भी प्रकार की मुसीबत का तोड़ निकालने का दावा करते हैं। जो काम पहले केवल कुछ धर्माचार्याओं और विशेष पंडित बिना किसी होर्डिंग और विज्ञापन के छोटे स्तर पर करते थे। अब वह उस बाजार का बड़ा हिस्सा है जहां खरीदने की बढ़ती क्षमता के चलते हर चीज बिकाउ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल मुक्त बाजार व्यवस्था ने जहां आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया। लोगों की क्रय शक्ति में इज़ाफा किया। आर्थिक दर के ग्राफ को ऊपर उठाया। शिक्षा और ज्ञान का विस्तार किया। उसी मुक्त आर्थिक व्यव्स्था ने लोगों की धार्मिक प्रवृतियों को बढ़ाने का काम भी किया। 1991 से लागू हुए मुक्त व्यापार ने लोगों को सुख संपन्न बनाने के साथ उस संपन्नता को कायम रखने के प्रति उनमें भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने का काम किया। असुरक्षा की इसी भावना ने भगवानों, बाबाओं और पीर बाबाओं में लोगों की आस्था भी बढ़ा दी। परिणामस्वरूप नए भगवानों, नए बाबाओं, नए मंदिरों और तीर्थ स्थलों की गिनती भी बढ़ने लगी है। आर्थिक सुधारों के चलते मध्य वर्ग की बढ़ती आय ने धार्मिक सेवाओं की मांग और पूर्ति को बढ़ाने का काम किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 2007 की स्टेट आफॅ नेशन की सर्वे के मुताबिक पिछले पांच सालों में भारतीयों में धार्मिक प्रवृति बढ़ी है। इस सर्वे में 30 फीसदी लोगों ने माना कि वे पहले के मुकाबले पिछले कुछ सालों में अधिक धार्मिक हुए हैं। सर्वे के मुताबिक आधुनिकता और शहरी जीवन की ओर खुलाव के कारण भारतीय पहले से अधिक धार्मिक हुए हैं। हैरत की बात यह है कि शहर के शिक्षित ग्रामीण अशिक्षितों की तुलना में अधिक धार्मिक हुुआ है। मीरा नंदा की पुस्तक द गाॅड मार्किट के मुताबिक आर्थिक समृद्दि ने मिडल वर्ग की हिंदु धार्मिकता को तीन प्रकार से प्रभावित किया है। पहली नए गुरूओं का अवतार, गुरूओं की संस्कृति को बढ़ावा और गुरूओं का भद्रकरण। नंदा के मुताबिक यह स्पष्ट है कि पाॅपुलर हिंदुत्व अत्यंत परिवर्तनशील है क्योंकि यह भारत की तेजी से बदलती अर्थव्यव्स्था और समाज का अनुकरण कर रहा है। मंदिरों का पुनरूद्धार हो रहा है। इन मंदिरों में श्रद्धालु अपने पुराने देवी देवताओं और अनुष्ठानों को नया रूप दे रहे हैं। कुछ नए भगवान और नए अनुष्ठान भी खोजे जा रहे़े हैं। कर्नाटक में मरीअम्मां जिसे छोटी चेचक निर्वारण देवी माना जाता था अब वह एड्स अम्मा या एड्स को ठीक करने वाली माता के रूप में प्रचलित है। कुछ स्थानीय देवी देवता जो बीमारियों को ठीक करने के लिए पूजे जाते थे अब सफलता और स्पर्धा भरे शहरी जीवन में समझदारी व सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए पूजे जा रहे हैं। खर्च की बढ़ती क्षमता और आस्था में वृद्धि ने पूजा स्थलों की गिनती को कई गुणा बढ़ाने का काम किया। पवन वर्मा की पुस्तक बीनंग इडियन (2004) के मुताबिक वर्ष 2000 तक देश में 2.5 मिलियन पूजा के स्थल थे लेकिन स्कूल 1.5 मिलियन और अस्पतालों की संख्या 75 हजार थी।  &lt;br /&gt;इसी प्रकार एनसीएईआर की सर्वे से पता चलता है कि भारत के कुल पैकेज टूर में 50 फीसदी धार्मिक यात्राओं का बिजनेस है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार ने लोगों की आस्था को भुनाने के लिए केवल भगवानों या धर्म को ही साधन नहीं बनाया बल्कि त्यौहार, पूजा और दूसरे सभी अनुष्ठान भी बाजारी चमक के कारण अपनी मूलता खोते जा रहे हैं। जो त्यौहार या अनुष्ठान कभी घर के आंगन तक सीमित होते थे बाजार ने उन्हें बड़े उत्सवों में बदल दिया है। तीज, छठ, करवा चौथ दीवाली हर त्यौहार का राष्ट्रीयकरण हो चुका है और इन में क्षेत्रीयता की महक कम और बाजार के समान रंग अधिक नजर आते हैं। अधिक खरीदने और बेचने की चाह, विज्ञापनों की होड़ ने बाजारों को तो सजा दिया लेकिन किसी भी अनुष्ठान या त्यौहार की पवित्रता और सही मायनों को धुंधला बना दिया। अक्षय तृतीया कभी विवाह के लिए शुभ माना जाता था अब सोना खरीदने के लिए अधिक जाना जाता है। द वल्र्ड गोल्ड काउंसिल ने इस दिन को सोने के सिक्के और गहने खरीदने के लिए विशेष शुभ दिन घोषित कर दिया है। एक आंकड़े के मुताबिक 2006-2007 में इस दिन 38 टन की खरीददारी हुई जबकि रोज 2 टन की बिक्री होती है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म और आस्था भारतीय समाज में बेहद संवेदनशील मसले हैं। लोगों की भावनाओं को भुनाने का सबसे सरल साधन भी। पोंगा पडितों और फर्जी बाबाओं के लिए बाजार ने इन भावनाओं को कैश करना और सरल बना दिया है। यही कारण है कि ऐसे ढोंगी बाबाओं की जमात फलने फूलने लगी है जो लोगों को अध्यात्मिक बनाने के नाम पर अंधविश्वासों, आडंबरांे और कर्मकाण्डों को बढ़ावा देकर अपनी दुकान चमका रहे हंै। दुख की बात यह है कि वैज्ञानिक मानसिकता को प्रोत्साहित करने वाले सरकारी और गैरसरकारी संस्थान भी खमोशी से इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं। जरूरत है तार्किक सोच को बढ़ावा देने की। इसके लिए सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं के साथ मीडिया को आगे आना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह लेख 31 मार्च 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-3155778977429129064?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3155778977429129064'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3155778977429129064'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html' title='धर्म का बाजारवादी चेहरा'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-7489191047596414399</id><published>2010-03-16T00:39:00.000-07:00</published><updated>2010-03-16T00:41:23.214-07:00</updated><title type='text'>अमल में लाना भी आसान नहीं महिला बिल</title><content type='html'>अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेहद जद्दोजहद के बाद राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल तो पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में यह बिल मौजूदा स्वरूप में पारित होता दिखाई नहीं देता। अब आरक्षण का प्रतिशत घटाने का दबाव बना कर सहमति बनाने की कोशिश चल रही है। हांलाकि सरकार बार-बार मौजूदा स्वरूप में इसे पास कराने के संकल्प को दुहरा रही है। लेकिन यह उतना आसान भी नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तो यह है कि अगर बिल मौजूदा स्वरूप में लोकसभा में पास हो भी गया तो इसे अमल में लाने और आरक्षण के मकसद को पूरा करने का रास्ता बिल पास कराने से भी कठिन साबित होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल को सदन में पहुंचाने के 14 साल के संघर्ष और इसमें ओबीसी महिलाओं को आरक्षण देने के यादव नेताओं के अड़ियल रवैये पर बेहद चर्चा और विश्लेषण हो चुका है। अब जरूरत यह देखने कि है कि महिला आरक्षण बिल को कानूनी जामा पहनने के बाद किन कठिनाइयों और चुनौतियों से गुजरना पड़ेगा। बिल के मुख्य प्रवधानों को देखने से साफ जाहिर है कि जितनी कठिन राह इसको पास कराने की रही उसको लागू करने और उससे प्रत्याशित परिणाम हासिल करने का संघर्ष और भी कठिन साबित होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले बिल के मुख्य प्रावधानों पर एक नजर। मौजूदा स्वरूप में अगर बिल पारित होता है तो लोकसभा और सभी राज्यों (दिल्ली सहित) के विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी प्रकार एससी और एसटी के लिए आरक्षित कुल सीटों मंे से एक तिहाई सीटें इन समूहों की महिलाओं के लिए आरक्षित होगीं।  मसौदे के मुताबिक सीटों का आरक्षण रोटेशन के आधार पर होगा। कानून लागू होने के 15 सालों के बाद महिलाओं के लिए आरक्षण की अवधि खत्म हो जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बिल के इन मुख्य बिदुंओं का विश्लेषण करें तो कई सवाल और दिक्कतें जेहन में आते हैं। सबसे बड़ी चिंता सीटों के आरक्षण को लेकर है। इस संदर्भ में बिल में सीट के आरक्षण की प्रक्रिया को स्पष्ट नहीं किया गया। बिल के मुताबिक आरक्षित सीटों का निर्धारण संसद द्वारा निर्धारित आथोरिटी करेगी। लेकिन उसके लिए क्या प्रक्रिया होगी इसकी कोई चर्चा नहीं। अगर सीटांे का निर्धारण न्यायसंगत तरीके से नहीं हुआ तो इससे महिलाओं को समानता के दर्जे पर लाने का मकसद पूरा नहीं होगा। जंयती नटराजन की अध्यक्षता में बनी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट मंे सिफारिश की है कि सरकार को इस मसले पर उचित तरीके से विचार विमर्श करना चाहिए। इसके अलावा बिल में रोटेशन के आधार पर सीट के आरक्षण को लेकर भी आलोचना हो रही है।  इस प्रावधान के आलोचकांे का मानना है कि रोटेशन के आधार पर सीटांे का आरक्षण सांसदो विधायको को अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास के कार्य करने के प्रोत्साहन को कम करेगा। इससे राजनैकित अस्थिरता बढ़ेगी। पंचायतरीराज मंत्रालय दारा कराए गए एक सर्वे ने पंचायतो में निर्वाचन क्षेत्र के रोटेशन को खत्म करने की सिफारिश की हैं इस का कारण यह है कि पंचायतों में करीब 85 फीसदी महिलाएं जो पहली बार पंचायतों में चुनकर आईं थीं उनमंे से केवल 15 फीसदी महिलाएं ही दुबारा निर्वाचित हो सकीं क्यांेकि जिन सीटों से वे चुनी गईं थी वे रोटेशन के तहत आरक्षित नहीं रही थीं। रोटेषन का सही प्रीााव विधानसभा और लोकसभा की आरक्षित सीटों पर भी देखने की आशंका व्यक्त की जा रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोटेशन के कारण वोटरों के प्रति निर्वाचित सदस्य की जवाबदेही भी कम होगी। वोअर अपनी ताकत को कम होता महसूस करेंगे। दो तिहाई मौजूदा उम्मीदवारों को रोटेशनल आरक्षण के कारण अपनी सीटें छोड़नी पड़ सकती है जिससे निर्वाचित सदस्य अपने क्षेत्र के मुद्दों पर गंभीरता से काम नहीं कर पाएंगे। इस प्रकार रोटेषन के प्रावधान को लागू करने में सरकार को बेहद विचार विमर्श और सतर्कता से फैसला लेना होगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस के अलावा महिलाओं के आरक्षण की सीमा अवधि 15 सालों तक सीमित करने पर भी पुनर्विचार की जरूरत है। क्योंकि इससे महिलाओं को पर्याप्त राजनैतिक प्रतिनिधित्व मिलना संभव नहीं। पंचायत चुनावों के अनुभवों से पता चलता है कि आरक्षण के पहले दो चरण महिलाओं के लिए राजनैतिक दावपेंचों को सीखने के लिए जरूरी हैं ऐसे में अगर तीसरे चरण के बाद आरक्षण को खत्म कर दिया जाता है तो इससे महिलाएं अपनी योगयता को साबित करने में और उन्हें बराबरी के स्तर पर लाने का  मकसद अधूरा रह जाएगा। स्थायी समिति ने भी इस समय सीमा को बढ़ाने की सिफारिश की है। साठ साल की अवधि के बाद भी अनुसुचित जाति और जनजातियों को मिले आरक्षण का मकसद पूरा नहीं हो सका। ऐसे में 15 साल की अवधि से आस लगाना मूर्खता होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ठीक है कि पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण ने महिलाओं में आत्मबल और फैसले लेने की नई उर्जा का संचार किया है और अब संसद तथा विधानसभाओं में भी महिलाओं की गिनती बढ़ने से नीति आधारित फैसलों में महिला नजरिया सार्थक साबित होगा लेकिन समझने की बात यह है कि बिल पास होने का जश्न मनाने के साथ आगे की टेढ़ी पगडंडी पर भी ध्यान में रखना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-7489191047596414399?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7489191047596414399'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7489191047596414399'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;अमल में लाना भी आसान नहीं महिला बिल&lt;/strong&gt;'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1426277154074543841</id><published>2010-02-05T20:08:00.000-08:00</published><updated>2010-02-05T20:09:04.052-08:00</updated><title type='text'>कृपया! मीडिया उपभोक्ता को नासमझ न समझे</title><content type='html'>अन्नू आनंद&lt;br /&gt;मीडिया वही दिखाता या छापता है जो लोग देखना या पढ़ना चाहते हैं। यह कथन बार बार दोहराया जा रहा है। लेकिन क्या सह सही है? किसी भी प्रोडेक्ट के लांच से पहले जिस प्रकार मार्किटिंग सर्वे की जाती है इन दिनो शायद मीडिया भी अपने ‘प्रोडेक्ट’ यानी चैनल या अखबार की शुरूआत से पहले ऐसी ही कोई सर्वे कराता हो। यह अलग बात है कि यह सर्वे भी उन्हीं लोगों के बीच कराई जाती है जिन की रूचियों को ध्यान में रखकर ‘प्रोडेक्ट’ बनाया जाता है। खैर, अब तो इसकी जरूरत भी अधिक दिखाई नहीं पड़ती क्यों कि हर नया चैनल वही दिखाना चाहता है जो दूसरे चैनल दिखाते हैं और चैनलों के टीआरपी ग्राफ के हिसाब-किताब से नए चैनल के कंटेट का निर्धारण हो जाता है। टीआरपी को समूचे देश के लोगों की अभिरूचियों का आधार मानते हुए मीडिया ने अपने पूरे चरित्र को ही बदल दिया गया है। टीआरपी की विश्वसनीयता और उसके तकनीकी गुणों और दोषों पर और बहस करना उचित नहीं क्योंकि बहुत से मीडिया विशेषज्ञ भी जानते हैं कि टीआरपी भले ही बहुत से लोगों के कैरियर का भविष्य निर्धारित करती हो लेकिन बहुसंख्यक लोगों की पसंद-नापसंद को पहचानने का यह मापदण्ड बेहद खोखला है। अलबता, टीआरपी के आधार पर कंटेट करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।&lt;br /&gt;हकीकत तो यह है कि अभी तक राष्टीय स्तर पर ऐसी कोई सर्वे नहीं हुई जिसमें देश के 76 प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की इच्छाओं और आकंक्षाओं को भी शामिल किया गया हो और जो ये बताए कि मीडिया में जो दिखाया जा रहा है वे उनकी पसंद और इच्छाओं के अनुरूप है।&lt;br /&gt;पिछले दिनों चैनल के एक राजनीतिक संपादक ने मीडिया के मौजूदा चरित्र को सही ठहराने की कोशिश में लिखा कि जनता की पसंद दिल्ली के बड़े सेमिनारों में आए लोगों से तय नहीं की जा सकती उसके लिए ‘जमीं पर जाना होगा।’ बिल्कुल सही कहा। लेकिन उसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि जमीन पर जाने का अभिप्राय केवल कुछ चुनिंदा और मध्यवर्गीय लोगों की पसंद नहीं बल्कि देश की बहुसंख्यक जनता की रूचियों हैं जो अक्सर मीडिया से गायब रहती हैं। अफसोस तो इसी बात का है कि शहरों से बाहर निकलकर कभी इस बात का पता लगाने की कोई सार्थक कोशिश ही नहीं की गई कि गावों के लोग  जो देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, क्या चाहते हैं--- ‘जमीन’ पर जाकर गांवों के उन सभी लोगों को   शामिल कर के देखिए जो देश की अधिकतर जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन फिर भी ‘टैम’ से बाहर हंेै तो पता चलेगा कि लोगों की सोच अभी भी कुंठित नहीं हुई।&lt;br /&gt;शहरों से बाहर ग्रामीण लोगों की राय जानने के एक प्रयास से यह सबक मिल जाएगा कि गावों के लोग समाचारों में शेयर -मार्किट, फिल्मी सितारे, भूत- प्रेत, फैशन या खान -पान से कहीं अधिक ऐसे प्रयासों, सरोकारों को देखना चाहतें हैं जिस से उनके रोजमर्रा के जीवन में सुधार हो सके। कम से कम समाचार चैनलों से तो वे सच और वास्तविक जीवन से जुड़ी  घटनाओं और समस्याओं की खबरों की ही उम्मीद करते हैं।  असली भारत का यह बहुसंख्यक समाज  इस बात को अच्छी तरह समझता है कि बडी हस्तियों को जानने या फिर चमत्कारों और भविष्य को जानने -समझने की भूख मनोरंजन चैनलो से भी पूरी हो सकती है। लेकिन पेट की भूख को शंात करना है तो उन के लिए नए रेस्त्रां या नए किसी नए प्रोडेक्ट के लांच (जो अक्सर न्यूज का हिस्सा बनते जा रहे हैं) से कहीं अधिक यह जानना जरूरी है कि गावों की राशन की दुकानों में राशन क्यों नहीं पहुंच रहा। कुपोषण आखिर कौन सी बला है जो चैनलों पर दिखाई जाने वाली ‘प्रलय’ या ‘स्वाइन फल’ू से भी अधिक बच्चों की जानें ले रही है। गावों और कस्बों में यह सोच निरंतर फैल रही है कि मीडिया में आम आदमी और उसके  सरोकार गायब क्यों है?ं अखबार और टीवी में केवल बड़े लोगों और सनसनीख्ेाज घटनाओं तक ही सिमटता क्यों जा रहा है? अपने तर्क के संदर्भ में यह बताना जरूरी होगा कि पिछले कुछ वर्षों में ग्रासरूट पत्रिका के संपादक होने के नाते मुझे करीब 15 राज्यों के छोटे कस्बों से लेकर दूर-दराज के असंख्य गावों का दौरा करने का मौका मिला। हर दौरे में गावों के चबूतरों पर हुई ग्रामीणों के साथ हुई बैठकों, स्थानीय  कार्यकर्ताओं से लेकर कसबों के आम लोगों और लोकल पत्रकार बिरादरी के साथ ं हुईं सभी बैठकों में मीडिया का कंटेट खास चर्चा का विषय रहा। एक ही सवाल मुझे बार बार मीडिया का नुमाइंदा होने पर शर्मसार कर देता कि मीडिया में आम आदमी गायब क्यों है। मैं थोड़ा झेंपते हुए उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश करती कि जब महज एक प्रतिशत लोंगों से जुड़े शेयर मार्किट की खबरें अखबारों और चैनलों की हेडलाइन्स बन सकती हैं तो फिर आम आदमी से जुड़े सरोकार और विकास की खबरें क्यों नहीं। मीडिया पर हुई हर चर्चा इस तर्क को और मजबूत करती कि दर्शक या पाठक बेवकूफ नहीं।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं गांव और विकास की खबरें मीडिया का हिस्सा  बिल्कुल नहीं है या नहीं रहा  लेकिन मुझे गुस्सा इस बात की है कि अधिक लोगों के मसले अखबारों में केवल कुछ सेंटीमीटरों में और चैनलों में कुछ मिनटों तक ही सिमट कर क्यों रह जातें हैं? लाइफस्टाइल, भूत-प्रेत, भगवानों, चमत्कारों ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों से लेकर शेयर मार्किट तक के लिए या तो अलग चैनल और पन्ने हैं या उनके लिए निर्धारित स्लाॅट हैं। लेकिन शिक्षा, भुखमरी, कृषि, कुपोषण, रोजगार जैसे मसले जो हमारे समाज का बड़ा सच है उससे हम नजरअदांज कर यह मानकर चल रहे हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं। अरे अगर आप प्रोडेक्ट बेच रहे हैं तो उपभोक्ता को नासमझ भी मत समझें।  &lt;br /&gt;अभी गावों ओर कस्बों से निकले और ऐसी समस्याओं को उठाने का मिशन लिए पत्रकारिता में आने वाले मेरे वे साथी जो आज चैनलों और अखबारों के शीर्ष पदों पर बैठे हैं ऐसे सवाल पर झट ‘टीआरपी’ ओर विज्ञापनों की कमी का रोना लेकर बैठ जाएंगे। कैरियर और मीडिया की आर्थिक मजबूरी का दम भरते हुए इन बातों की आलोचना करते हुए कहेंगे नैतिकता का पाठ पढ़ाना आसान है। लेकिन मीडिया की आर्थिक व्यवस्था को सही रखने का गणित और। ठीक है भई, अगर व्यापार ही करना है तो फिर मीडिया का क्यों? यह नहीं भूलना होगा कि कई प्रकार की सहूलियतों और विशेषाधिकारों से खड़े किए गए इस मीडिया (जिसे व्यापार मान रहे हैं) से लाखों लोगों के हित जुड़े हैं। इस धंधे मंे तो भले ही ‘प्रोडेक्ट’ कितना भी खराब हो किसी कंज्यूमर कोर्ट में सुनवाई भी नहीं होगी। &lt;br /&gt;अजीब बात यह है कि अधिकतर मेरे हमपेशी विचार गोष्ठियों और सेमीनारों में अपनी व्यावसायिक मजबूरियांे को स्वीकारने और कोई रास्ता निकालने की बजाय ये कहते नहीं थकते कि मीडिया तो समाज का आईना है और वह वही दिखाता है जो समाज में होता है और यही पत्रकार का धर्म है। कुछ समय पहले मीडिया पर हुई एक ऐसी ही गोष्ठी में एक दैनिक समाचार पत्र के प्रबंध संपादक ने ऐसे ही विचार रखे। लेकिन यह धर्म केवल एक विशिष्ट यानी इलीट वर्ग के प्रति क्यों निभाया जाता है। एनडीटीवी सहित कई अन्य चैनल कोहरे के कारण केवल फलाइटों के कैंसल होने से यात्रियों को होने वाली कठिनाइयों की खबर देता है। लेकिन 200 के करीब रेलगाड़ियां के प्रभवित होने और यात्रियों के प्लेटफार्मों पर बैठने की खबरें दूरदर्शन दिखाता है। अगर मीडिया समाज का आईना होने का दावा करता है तो माफ कीजिए हमारा देश केवल सांप बिच्छू स्वयंवर, उत्सवों, आयोजनों से भरा नहीं। &lt;br /&gt;पिछले दिनों एक चैनल के संपादक ने हिम्मत दिखाते हुए इस बात को स्वीकारा कि टीवी ने पत्रकारों को ‘टीआरपीबाज’ बना दिया है और संपादकों को ‘ब्रांड मैनेजर’। इसलिए पत्रकारिता के सही मायने खो गए हैं संभव है इससे बहुत से अन्य संपादको को भी अपने छोटे होते कदों का अहसास हो और वे टीआरपी के भम्रजाल से बाहर निकल समाज का वास्तविक आईना बनने के प्रयासों को तेज करें। &lt;br /&gt;(पूर्व संपादक मीडिया पत्रिका विदुर)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1426277154074543841?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/1426277154074543841/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=1426277154074543841' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1426277154074543841'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1426277154074543841'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='कृपया! मीडिया उपभोक्ता को नासमझ न समझे'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-8421181318684753896</id><published>2010-01-14T00:57:00.000-08:00</published><updated>2010-01-14T01:02:00.168-08:00</updated><title type='text'>भूमंडलीकरण में महिलाएं</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अभी तो खुरचन ही हाथ लगी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;उदारीकरण की शुरूआत के करीब दो दशकों के बाद ग्लोबलाइजेशन के दौर में महिलाओं की स्थिति का आकलन करते हुए ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ की कहावत याद आती है। यानी यूं कहें कि मुक्त बाजार व्यवस्था ने महिलाओं को दिया कम पर लिया अधिक तो गलत नहीं होगा। भूमंडलीकरण की आंधी ने जहां कुछ प्रतिशत महिलाओं को फायदा पहुंचाने का काम किया उससे कहीं अधिक प्रतिशत महिलाओं को विश्व व्यापार की शर्तों के थपेड़ो ने उनकी पंारपरिक आजीविका के साधनों को छीनकर उन्हें अर्थ व्यव्स्था से बाहर करने पर भी मजबूर किया है। पहले से ही सामाजिक असमानता के माहौल में जीती भारतीय महिलाओं पर भूमंडलीकरण का प्रतिकूल असर अधिक नजर आता है। हमारे देश की आर्थिक व्यव्स्था में महिलाओं का सबसे अधिक योगदान कृषि के क्षेत्र में है। यहां अधिकतर खेतिहर कार्य महिलाओं द्वारा किए जाते हैं। महिलाओं का ज्ञान और उनकी निपुणता बीजों की सुरक्षा, खाद्य उत्पादन और फसलों की विविधता और खाद्य प्रोसेसिंग में काम आती है। लेकिन विश्व व्यापार संगठन के समझौते के तहत कृषि पर कारपोरेट जगत का दबदबा बढ़ा है। जो खाद्य सुरक्षा महिलाओं के काम पर निर्भर करती है उसे कारपोरेट संबंधित खाद्य संस्कृति ने पीछे धकेल दिया है। ट्रिप्स ( व्यापार संबंधित बौद्दिक संपति अधिकार) समझौते के तहत ग्रामीण महिलाओं से बीज और जैव विविधता का ज्ञान छिनकर ग्लोबल कंपनियों के हाथों चला गया है। वर्ष 2005 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने भूमंडलीकरण के कृषि पर होने वाले प्रभावों पर कराए एक अध्ययन में कहा था कि विश्व व्यापार संगठन के तहत कृषि पर समझौता अनुचित और असमान है और इससें कृषि में कार्यरत महिलाओं पर नकारात्मक बदलाव आया है। कारपोरेट आधरित कृषि ने महिलाओं को उनकी खाद्य उत्पादन और खाद्य प्रस्संकरण की जीविका से बेदखल करने का काम किया है। यह सही है कि ग्लोबलाइजेशन ने अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र में महिलाओं को रोजगार के असीम अवसर प्रदान किए है। जो महिलाएं परिवार की देखभाल में समय बिताती थीं उन्हें श्रम प्रधान इन इकाइयों में काम करने का अवसर मिला लेकिन इस प्रक्रिया ने महिलाओं से उनके काम के बुनियादी अधिकार छीन लिए। 1990 से शुरू हुए एसएपी (ढांचागत समयोजन) कार्यक्रम के तहत कई विदेशी कंपनियों ने अपने निर्यात उधोगों जैसे कपड़ा, खेल का सामान, फूड प्रोसेसिंग, खिलौनों की इकाईयों को भारत में खोलकर महिलाओं को सस्ता श्रम मानते हुए उन्हे अधिक से अधिक काम पर रखा। लेकिन असुरक्षित माहौल और दमघोंटू काम की स्थितियों ने महिलाओं को ‘गुलाम वेतनभोगी’ बनाने का काम अधिक किया। नौकरियां मिलीं लेकिन न तो युनियन बनाने के अधिकार और न ही अपने अधिकारों के खिलाफ लड़ने या आवाज उठाने के अधिकार मिल सके। काम की उचित कल्याणकारी सरकारी नीतियों के अभाव ने इन महिलाओं को बदहाल और गुलाम बनाने वाली कार्य स्थितियों में भी काम करने का आदी बना दिया है। इस प्रक्रिया ने ‘गरीबी के स्त्रीकरण’ को अधिक प्रोत्साहित किया है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व के कुल काम के घंटों में से महिलाएं दो तिहाई घंटे काम करती हंै। लेकिन विश्व की केवल दस तिहाई आय अर्जित करती हंै और विश्व की केवल एक प्रतिशत संपति की मालकिन हंै। ग्लोबलाइजेशन के चलते आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आगे बढ़ने के रास्ते खुलने का कुछ हद तक लाभ शहरों की शिक्षित अधिकार संपन्न महिलाओं को हुआ। लेकिन यहां भी फायदा उन्हीं महिलाओं को मिला जो संगठित क्षेत्रों की कंपनियों में बेहतर कार्य शर्तों पर काम करने की स्थिति में अधिक थीं। संचार माध्यमों के विस्तार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, मीडिया के विस्तार और विश्व स्तरीय संस्थाओं के भारत में खुलने से महिलाओं को समान अवसर और अपने अधिकारों के प्रति जागृत करने का काम किया है। इस से महिलाओं के स्तर में बदलाव लाने की कुछ हद तक कोशिश भी सफल हुई। गैर सरकारी संगठनों के आने से महिलाओं में साक्षरता और वोकेशनल प्रशिक्षण का लाभ भी मिला है। लेकिन खुले बाजार से पैदा हुई उपभोक्ता संस्कृति का शिकार भी महिलाएं बनीं। इस संस्क्ति ने महानगरों से लेकर छोटे शहरों की महिलाओं को महज उपभोक्ता और उत्पादक बनाने का काम अधिक किया है। ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया ने विकास के नए आयाम बनाए हैं लेकिन लाभों के असमान वितरण से आर्थिक असमानता बढ़ी है। वर्ष 2000 में बीजिंग प्लस 5 परिपत्र में 1995 में हुए संयुक्त राष्ट्र महिला सम्मेलन के बाद से हुई प्रगति का आकलन करते हुए कहा गया है कि ग्लोबलाइजेशन कुछ महिलाओं को अवसर प्रदान करता है लेकिन बहुत सी महिलाओं को हाशिये पर भी धकेलता है इसलिए समानता के लिए उन्हें मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। ग्लोबलाइजेशन के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इससे समान रूप् से महिलाओं का भला होने वाला नहीं। ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत है जो महिलाओं की कार्यक्षमता को बढ़ाने और भूमंडलीकरण के नकारात्मक सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का सामना करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने का काम करे। भूमंडलीकरण का महिलाओं का उचित लाभ पहुंचे इसके लिए रोजगार की नीतियां को दुबारा तैयार करना होगा। ऐसे अवसरों का निर्माण करना होगा जिसमें महिलाएं विकास की प्रक्रिया में भागीदार बने। इसके लिए ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया के स्वरूप को बदलने की जरूरत है ताकि महज ‘लाभ’ पर केंद्रित नीतियों की बजाय ऐसी नीतियां बने जो लोगों पर केंद्रित हों और महिलाओं के प्रति अधिक जवाबदेह। वरना कहना गलत न होगा कि अभी तो खुरचन ही हाथ लगी। वरिष्ठ पत्राकार&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;यह लेख १२ जनवरी २०१० को राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में प्रकशित हुआ है &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-8421181318684753896?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/8421181318684753896/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=8421181318684753896' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8421181318684753896'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8421181318684753896'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='भूमंडलीकरण में महिलाएं'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-2386534767397576764</id><published>2009-12-19T00:32:00.000-08:00</published><updated>2009-12-19T00:33:26.362-08:00</updated><title type='text'>क्या कोपेनहेगन समझेगा आधी दुनिया का दर्द</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt; जलवायु बदलाव के गहराते संकट से निपटने के लिए कोपेनहेगन में शिखर वार्ता शुरू हो चुकी है। सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन को लेकर विभिन्न देशों की उचित जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। क्या सम्मेलन में किसी तार्किक फैसलों पर सहमति बन पाएगी या नहीं यह तो कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन सम्मेलन की वार्ताओं में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की सबसे अधिक और क्रूर मार झेलने वाली आधी दुनिया यानी महिलाओं के दर्द को में ध्यान में रखा जाएगा या नहीं इस को लेकर चिंता जरूर बनती है। हांलाकि इस महा-पंचायत में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नीति और निर्णय प्रक्रियाओं की अन्य पंचायतों के समान कम है। लेकिन फिर भी उम्मीद की जा रही है कि जलवायु बदलाव के महिलाओं पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखते हुए किसी भी फैसले मंे महिला नजरिए को नजरदांज नहीं किया जाएगा। मौसम में हुए बदलाव के चलते पिछले कुछ सालों में अकाल, बाढ़ और उत्पादक मौसम की अवधि कम होने के कारण खाधान्न की आपूर्ति कम होने की कईं रिपोर्टें आईं। विश्व के कुल खाद्यान्न उत्पादन का आधा से अधिक खाद्यान्न महिलाएं पैदा करती हैं। मिसाल के तौर पर दक्षिण अफ्रीका में 75 फीसदी खाद्यान्न उत्पादन महिलाओं द्वारा किया जाता है। उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर महिलाओं को मौसम के मिजाज की मार सहने के अलावा खाद्यान्न संकट से पैदा हुई भूख की समस्या को भी झेलना पड़ता है। परिवार मे पसरी भूख की मार भी महिलाओं पर अधिक असर डालती है। कृषि और खाद्य विशेषज्ञ डा। स्वामीनाथन ने पिछले दिनों बताया कि एक डिर्गी तापमान बढ़ने से गेहूं का उत्पादन 70 लाख टन कम हो जाएगा। विश्व की 70 फीसदी गरीब संख्या लड़कियों और महिलाओं की है तो जाहिर है कि इसका असर भी उन पर अधिक पड़ेगा। विश्व के गरीब कुल कार्बन का 3फीसदी उत्सर्जन करते हैं लेकिन फिर भी उत्सर्जन से होने वाले दुष्परिणामों का कहर सबसे अधिक उन्हें झेलना पड़ता है। खासकर गरीब महिलाओं को क्योंकि इन परिवारों में घर परिवार संभालने, पानी, चारा और ईंधन के इंतजाम की जिम्मेदारी भी महिलाओं पर रहती है। लेकिन इन चीजों को उपलब्ध कराने वाले पर्यावरणीय संसाधनों के उपयोग और प्रबंधन के मामले में महिलाओं की सोच और फैसले मायने नहीं रखते। जेंडर एण्ड इन्वायरमेंट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि गुजरात राज्य में महिलाओं को घर का ईंधन लाने में रोज चार से पांच घंटे का समय बिताना पड़ता है जबकि करीब एक दशक पहले ये काम चार या पांच दिनों में एक बार करना पड़ता था। प्राकुतिक आपदा का सामना भी पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक करना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक असमानता और भेदभाव के कारण महिलाओं को चक्रवात और बाढ़ का अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 141 देशों में कराई गई एक सर्वे के मुताबिक किसी भी आपदा में महिलाएं आर्थिक और सामाजिक असामनता के चलते पुरूषों की अपेक्षा 14 गुणा अधिक मरती हैं। 1991 में बंगला देश मे आए चक्रवात और बाढ़ के कारण महिलाओं की मौत चार गुणा अधिक हुई थी। पिछले माह जारी हुई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन केवल उर्जा उपलब्धता या औधोगिक उत्सर्जन का मुद्दा नहीं बल्कि मुख्य मसला किसी भी देश की कम या अधिक जनसंख्या, गरीबी और महिला समानता का है। वीमेन इन्वायरमेंट डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन ने सरकारों को जलवायु बदलाव में होने वाले प्रयासों में महिला समानता पर ध्यान देने की सिफारिश की है। संगठन के मुताबिक जलवायु बदलाव का सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ता है इसलिए इससे संबंधित फैसलों में उनकी पहुंच और भागीदारी भी अधिक होनी चाहिए। कोपेनहेगन में होने वाले हर फैसले का हर व्यक्ति पर असर पड़ेगा लेकिन याद रहे यहां होने वाले हर अनुचित फैसले की चुभन महिलाओं को अधिक महसूस होगी। पर सवाल यह है कि क्या कोपेनहेगन महिलाओं के इस दर्द को समझेगा ? &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;(यह लेख 15 दिसंबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है) &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-2386534767397576764?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/2386534767397576764/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=2386534767397576764' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2386534767397576764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2386534767397576764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_19.html' title='क्या कोपेनहेगन समझेगा आधी दुनिया का दर्द'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1631580450556588106</id><published>2009-12-16T02:54:00.001-08:00</published><updated>2009-12-16T03:11:30.735-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Grassroots Features'/><title type='text'>मेवात की पहली महिला पंचायत</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syi_n-bf-DI/AAAAAAAAAHg/8V4HCbknFwU/s1600-h/all+women+panchayat-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415789245407164466" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 205px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syi_n-bf-DI/AAAAAAAAAHg/8V4HCbknFwU/s320/all+women+panchayat-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिरोजपुर झिरका, हरियााणा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;हरियाणा में मेवात क्षेत्र के सबसे पिछड़े गांवों में से एक गांव नीमखेड़ा। दो-चार जमींदारों के घरों को छोड़कर गांव में सामुदायिक विकास का कोई प्रमुख ंिचन्ह नजर नहीं आता। मेव जाति के इस गांव में अधिकतर लोग अनपढ़ हैं। गांव के प्रत्येक घर में औसत बच्चों की संख्या सात है। यहां के अधिकतर युवा लड़के और लड़कियां खेती और जंगल में जानवर चराने का काम करते हैैं। विकास से अछूते इस गांव की दशा बदलने के लिए यहां की अगूंठा छाप महिलाओं ने एक अनूठी मिसाल कायम की है। उन्होंने सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए हरियाणा में पहली महिला पंचायत का गठन किया है। पंचायत में गांव के सभी नौ वार्डों पर महिलाओं को वार्ड पंच बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि गांव ने ब्लाक समिति और जिला परिषद् समिति में भी महिला सदस्य को ही नियुक्त किया है। पंचायत के सभी सदस्यों ने मिलकर गांव के राजनैतिक घराने से संबंधित आसूबी बेगम को सरपंच बनाया है। हरियाणा में अप्रैल माह में हुए पंचायत चुनावों से कुछ समय पहले गांव के लोगों ने एक बैठक में फैसला किया कि इस बार पंचायत की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी जाए। गांववालों के मुताबिक इसका एक बड़ा कारण यह है कि पिछले 17-18 सालों से गांव की पंचायत पर पुरुषों का वर्चस्व था। इस दौरान गांव में विकास का कोई बड़ा काम नहीं हुआ। इसलिए गांववालों ने मिलकर बिना चुनाव कराए हर वार्ड से र्निविरोध एक सक्रिय महिला को वार्ड सदस्य नियुक्त कर लिया। सरपंच बनी 60 वर्षीय आसूबी बेगम महिला पंचायत के औचित्य को स्पष्ट करते हुए कहती हैं, ‘‘पिछले 17 सालों से गांव में पुरुषों ने राज किया लेकिन गांव की समस्याओं की सुध नहीं ली। क्योंकि उन्हें इन समस्याओं से जूझना नहीं पड़ता।’’ इसकी वजह बताते हुए वह कहती है, ‘‘गांव के अधिकतर पुरुष जुआ खेलने और गांव से बाहर जाकर घूमने में समय बिताते हैं। जो गांव के बाहर नहीं जाते वे किसी भी चाय की दुकान पर बैठकर गप्पे मारने में पूरा दिन बताते हैं जबकि यहां की सभी महिलाएं घर के सारे कामों के अलावा खेतों और पशुओं की देखभाल का काम भी संभालती हैं। इन कामों को पूरा करने में उन्हें कई प्रकार की दिक्कतें आती हैं। वे जब पशुओं को चराने जंगल जाती हैं तो उन्हें घर में पानी की व्यवस्था करने की चिंता भी रहती है। पानी भरने के लिए उन्हें गांव से एक किलोमीटर दूर लगे नल से पानी लाना पड़ता है। इस तरह उनका काफी समय पानी भरने में ही बीत जाता है।’’ गांव से कुछ दूरी पर लगे नल पर महिलाओं की भीड़ देखकर पानी की तंगी का अंदाजा लग जाता है। फिरोजपुर झिरका ब्लाॅक का यह गांव हरियाणा के मेवात क्षेत्र का सबसे आखिरी गांव है। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से हरियाणा का यह सब से पिछड़ा इलाका है। इसी पिछड़े इलाके के इस गांव की आबादी तीन हज़ार के करीब है। यहां के मुस्लिम परिवारों में परिवार नियोजन न अपनाने के कारण अधिकतर परिवारों में बच्चों की संख्या सात या आठ है। गांव में मिडिल तक का स्कूल है लेकिन यहां कोई मास्टर नहीं आता। महिला शिक्षिका न होने के कारण भी गांव की लड़कियां को स्कूल नहीं भेजा जाता। इसलिए, यहां मां-बाप उन्हें स्कूल भेजने की बजाए खेती-बाड़ी, पशुओं की देखभाल या घर के कामों में लगा देते हैं। 60 वर्षीय वार्ड पंच सकुरण कहती है, ‘‘स्कूल भेजकर भी क्या करें। स्कूल भेजें भी तो वह केवल पांचवी तक ही पढ़ पाएगी। वह भी अगर मास्टर रोज आए। आगे पढ़ने के लिए तो फिर उन्हें शहर भेजना पड़ेगा। हाई स्कूल यहां से 15 किलोमीटर दूर पुन्हाना में है। लड़कियां इतनी दूर रोज पढ़ने के लिए कैसे जाएं।’’ सकुरण के साथ पंचायत की सभी सदस्य गांव में स्कूल की समस्या को लेकर काफी चिंतित है। 18 वर्षीय फ़रज़ाना पांचवी तक पढ़ी है वह आगे पढ़ना चाहती है लेकिन उसके घरवालों को उसे दूर भेजना मंजूर नहीं। पिछड़ी जाति के लिए सुरक्षित सीट पर मेमुना को वार्ड पंच बनाया गया है। मेमुना के सात बच्चे हैं उसके पति खेती में मजदूरी करते हैं। वह अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती है इसलिए वह इस बात के लिए दृढ़संकल्प है कि पंचायत के माध्यम से सबसे पहले गांव में स्कूल खोलने की कार्यवाही की जाएगी। गांव की अधिकतर महिलाएं पुरुषों से पर्दा करती हैं। वे उनके सामने बोलती नहीं। इसलिए अभी तक गांव पंचायत में उनका प्रतिनिधित्व कम ही रहा। 18 साल पहले आसूबी बेगम की सास सरपंच बनी थी। गांव की कुछ महिलाओं का मानना है कि उस समय कुछ काम हुए थे। लेकिन बाद में पुरुष बने सरपंचों और पंचों ने गांव की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। इस दौरान आसूबी बेगम के पति भी सरपंच पद पर रह चुके है लेकिन आसूबी साफ कहती हैं कि उनकी सास के अलावा किसी सरपंच के कार्यकाल में गांव के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया गया। गांव में विकास की धीमी प्रक्रिया के कारणों का खुलासा करते हुए मेवात सोशल एजूकेशनल डेवलपमेंट सोसायटी के महासचिव डाक्टर ए। अजीज के कहते हैं, ‘‘यही गांव नहीं समूचे मेवात में विकास की गति धीमी चल रही है इसका एक बड़ा कारण यहां के लोगों की सोच है। यहां के लोगों का नज़रिया नकारात्मक है। अभी भी वे पुरानी रूढ़ियों में जकड़े हैं। उनकी यह सोच विकास के किसी भी काम में बाधा बनती है।’’ डाक्टर अज़ीज ने बताया कि मेवात में निर्वाचित पंचायतों से अधिक जाति, गोत्र और धर्म पंचायतों का अधिक दबदबा है। इन पंचायतों की यहां अधिक चलती है। कुछ समय पहले मेवात क्षेत्र के ही नूह ब्लाॅक में एक दंपति को जात से बाहर शादी करने के कारण जात पंचायत ने बेहद कड़ी सजा दी थी। करीब पिछले 20 सालों से मेवात क्षेत्र पर कार्य कर रहे डाक्टर अज़ीज ने बताया, ‘‘जब उन्होंने इस क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को आर्थिक सामाजिक रूप से सबल बनाने का काम शुरू किया तो यहां फतवा जारी कर दिया गया कि मेव महिला के लिए ब्याज लेना और घर से बाहर निकलना हराम है। जागरूकता की कमी के कारण इस प्रकार के फतवे क्षेत्र के विकास में बाधा बनते हैं। पहली महिला पंचायत पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘पुरुषों के सामने महिलाएं बोलती नहीं लेकिन संभव है कि महिलाएं आपस में बैठकर अधिक अच्छे से विचार-विमर्श कर सकें लेकिन इसके लिए जरूरी है कि ‘पति’ उनको सकारात्मक सहयोग दें।’’ 40 वर्षीय वार्ड पंच सेमुना पुरुषों से पर्दा करती है। वह अपने वार्ड पंच बनने से खुश है और उसका कहना है कि उसके पति भी इस बात पर खुश हैं। सरपंच आसूबी बेगम सहित सभी वार्ड पंचों को कहना था कि वे अपने पतियों के सहयोग से ही यह कदम उठा सकीं हैं। आसूबी के मुताबिक, ‘‘उन्हें प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए पुरुषों का सहयोग लेना पड़ेगा। लेकिन वह विश्वास के साथ कहती है, बी डी ओ (ब्लाॅक डेवलपमेंट आफिसर) से बातचीत करने या उससे प्रशासनिक जानकारी के लिए भले ही हम पतियों से सहयोग लें लेकिन फैसला हम महिलाओं का ही होगा।’’ वार्ड पंच महमूदी से जब पूछा गया कि गांव की सबसे बड़ी समस्या क्या है तो वह एकदम उत्तेजित होते हुए बोली, ‘‘यह पूछिए कि क्या समस्या नहीं है।’’ वह कटाक्ष करते हुए कहती है, ‘‘शहरी औरतों के लिए यह समझना बेहद मुश्किल है। मैं सुबह रसोई में चूल्हा फूंकती हूं। दिन में जंगल में पशुओं को चराती हूं। फिर खेत में मशीन से गेहूं और ज्वार काटने का काम करना पड़ता है। इन सब कामों के साथ दूर से पानी भरकर भी लाना पड़ता है। गांव की सभी महिलाओं की यही दिनचर्या है। इस हिसाब से देखा जाए तो हमें गांव में गोबर गैस प्लांट चाहिए। पानी की सप्लाई चाहिए ताकि पानी भरकर लाने से हमें निज़ात मिले।’’ नवनिर्वाचित महिलाओं की पंचायत ने पिछले दिनों गांव में आए विधानसभा के उपाध्यक्ष को दरखास्त देकर गांव के छोटे से नाले में पानी की सप्लाई तो शुरू करवा दी है। गांववालों के मुताबिक इस नाले का पानी खेतों में सिंचाई के काम आता है। महमूदी के मुताबिक लेकिन घर के कामों और पीने के पानी की अभी भी यहां कोई सप्लाई नहीं। पानी और स्कूल के अलावा गांव की दूसरी बड़ी समस्या स्वास्थ्य केंद्र की है। सबसे निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पुन्हाना में है। यहां कोई जच्चा-बच्चा अस्पताल भी नहीं है। 99 प्रतिशत प्रसव अप्रशिक्षित दाइयों के हाथों से होते हैं जिसकी वजह से प्रसव में महिलाएं कई प्रकार की बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। वार्ड पंच सेमुना ने बताया, ‘‘गांव में न तो कोई एएनएम आती है और नहीं कोई सरकारी डाक्टर। प्रसव में किसी भी प्रकार की दिक्कत होने पर भी महिलाओं को दूर शहर की ओर भागना पड़ता है।’’ सेमुना बताती हैं, ‘‘प्रसव में गड़बड़ी के कारण कई बार महिला या तो मर जाती है या उसे कोई न कोई बीमारी घेर लेती है।’’ वार्ड पंच आशिमी स्वास्थ्य केंद्र खुलाने के साथ गांव में सभी घरों में शौचालय न होने पर चिंता प्रकट करती है। वह बताती है कि अधिकतर घरों में शौचालय नहीं। महिलाओं को दूर जंगल में जाने में कठिनाई होती है खासकर बड़ी और बूढ़ी महिलाओं को। इसलिए वह चाहती है कि गांव में गरीबों और दलितों के घरों मंे भी शौचालय बनाए जाएं। पंचायत की ये सभी महिला सदस्य बखूबी जानती हैं कि गांव की जरूरतें क्या हैं लेकिन इन जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें बेहतर सहयोग और प्रशिक्षण की जरूरत है। सभी सदस्यों की मांग है कि पंचायत के कार्यों को पूरा करने के लिए पंचायत मंे सचिव भी महिला होनी चाहिए। क्योंकि उनका मानना है कि महिला सचिव होने से उनके लिए काम करना अधिक सरल होगा। पंचायत की इन महिलाओं को शपथ लेने के दिन का इंतजार है। शपथ लेेने के बाद वह सबसे पहले गांव मंे पंचायत कार्यालय खोलेंगी इसके लिए जगह ढूंढी जा रही है। गांव की इन जुझारू महिलाओं ने अब गांव की काया कल्प करने की ठान ली है। गांव की इन वीरांगनाओं के लिए न तो उनका घूंघट रूकावट बनेगा न ही उनकी अनपढ़ता क्योंकि विपरीत परिस्थितियों के अनुभवों ने उनको सबल बनना सिखा दिया है। हरियाणा जैसे प्रदेश में जहां की पंचायतों ने अपने तानाशाही हुक्मों से महिलाओं का जीना हराम कर दिया है, वहां महिला पंचायत की परंपरा शुभ संकेत माना जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह स्टोरी मई २००५ में कवर की गई थी और ग्रासरूट सहारा समय , फिनासिअल&lt;br /&gt;वर्ल्ड , ट्रिबुन सहित कई समाचारपत्रों में प्रकशित हुई &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1631580450556588106?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/1631580450556588106/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=1631580450556588106' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1631580450556588106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1631580450556588106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='मेवात की पहली महिला पंचायत'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syi_n-bf-DI/AAAAAAAAAHg/8V4HCbknFwU/s72-c/all+women+panchayat-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-8504719331482213979</id><published>2009-12-15T03:38:00.000-08:00</published><updated>2009-12-15T03:46:17.745-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Grassroots Features'/><title type='text'>गांवों में उजाला करतीं महिला सौर इंजीनियर</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syd2rrbuiCI/AAAAAAAAAHY/b86nI7q_Emo/s1600-h/PHOTO-6.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415427569701783586" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 230px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syd2rrbuiCI/AAAAAAAAAHY/b86nI7q_Emo/s320/PHOTO-6.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;राजस्थान के अजमेर जिले के तिहारी गांव की कमला देवी दिखने में किसी भी देहाती महिला से भिन्न नहीं। सिर पर पल्लू; नाक में बड़ी सी नथ और हाथ पावों में चांदी के चमकते गहने। लेकिन वह साधारण महिलाओं की तरह खाना बनान या सिलाई बुनाई की बातों की बजाए आपको बताएगी कि किस प्रकार तारों सक्रिट चार्ज कंट्रोलर और पैनलों को जोड़कर सौर लालेटन बनाई जाती हैं। उसके द्वारा बनाए सौर लालटेन राजस्थान के गांवों के र्कइं अधेरे घरों और स्कूलों में प्रकाष फैला रहे हैं। कमला राजस्थान की पहली बेयरफुट महिला सौर इंजीनियर है। कमला की तरह देष के आठ राज्यों सिक्किम, आसम, बिहार, राजस्थान केरल, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेष और आंध्र प्रदेष के विभिन्न गांवों की महिलाएं तिलोनिया गांव के सोषल वर्कस रिसर्च सेंटर (एसडब्लयू आर सी) के बेयरफुट कालेज में प्रषिक्षण ले रहीं हंै। छह महीने के प्रषिक्षण के बाद ये महिलाएं सौर लैंप बनाने और उसकी मरम्मत करने में दक्ष हो जाती हैं उसके बाद अधिकतर महिलाएं अपने क्षेत्र के गांवों में जहां बिजली की कमी है या बिजली बिल्कुल नहीं होती सौर उर्जा प्रणाली का इस्तेमाल करतीं हंै। तिलोनिया के बेयरफुट कालेज में महिलाओं को सोलर इंजीनियर का प्रषिक्षण देने का काम 1995 में षुरू किया था। आज 75 ग्रामीण महिलाएं सोलर फोटोवोल्टिक इंकाइयों और सौर लालटेन बनाने; लगाने और उसकी मरम्मत और देखभाल करने में प्रषिक्षित हो चुकी हंै। किसी इलेक्ट्राॅनिक और सौर इंजीनियर की तकनीकी सहायता के बिना कमला और उसकी अन्य बेयरफुट इंजीनियर महिला साथियों ने दस सौर पाॅवर प्लांट; पांच हजार स्थिर घरेलू बिजली प्रणाली, तीन सौर पंप और 37 सौर पानी के हीटर लगाने और बनाने का कार्य किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें से अधिकतर महिलाएं अषिक्षित या अर्द्ध षिक्षित हैं लेकिन उन्होंने अपनी केवल खेतों में काम करने या घरेलु ढर्रे की भूमिका के अलावा वे किस प्रकार से बेहतर और परिश्कृत तकनीक को भी हैंडल कर सकती हैं। 23 वर्शीय कमला जब 12 वर्श की आयु में अपने ससुराल सिरोंज गांव में आई तो उसने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा था। वह अपनी चारों बहनों की तरह ही बिल्कुल अनपढ़ थी। उसके घर में स्कूल जाने का अवसर केवल उसके भाइयों को ही मिला। उसका काम अपनी बहनों की देखभाल करना, खाना बनाना और पानी ढोना और पषु चराना था। सिरांेज गांव में जब उसने समाज कार्य अनुसंधान केंद्र के बिजनवाड़ा के रात्रि स्कूल के बारे में सुना तो उसके मन में भी पढ़ने की इच्छा जागृत हुई। उसे लगा कि वह दिन भर घर के सारे काम खत्म कर भी स्कूल जा सकती है। लेकिन उसके पति सास इस बात के लिए तैयार नहीं थे। आखिर उसके ससुर ने उसका साथ दिया और उसने रात्रि स्कूल में पांचवी कक्षा तक पढ़ाई की। रात्रि स्कूल में पढ़ते हुए वह रात के अंधेरे में जलने वाले सौर लैंप से बेहद प्रभावित हुई क्योंकि गैर बिजलीकृत के क्षेत्र में इन लैंपों का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। यही सोच उसे केंद्र के ‘सोलर लाईट’ प्रषिक्षण कोर्स ले गई। इससे पहले गांव की किसी भी महिला ने सौर इंजीनियर का प्रषिक्षण नहीं लिया था। केवल पुरुश ही इसमें दाखिल होते थे। अपने प्रषिक्षण के बाद उसने वर्श 1997 में बिजनवाड़ा की छह महिलाओं को भी सौर उर्जा लैंप बनाने का प्रषिक्षिण दिया। इसके पष्चात कमला के पदचिन्हों पर चलते हुए कईं महिलाओं ने ‘बेयरफुट’ सोलर इंजीनियर बनने का रास्ता अपनाया। कमला के मुताबिक, ‘‘अगर मेरे ससुर ने मुझे प्रोत्साहित न किया होता तो मैं खेतों और घर के कामों से कभी बाहर न निकल पातीं। लेकिन बाद में मेरे पति और मेरी सास भी सहमत हो गए। अब मुझे इस काम में बेहद मजा आता है इसने मेरे जीवन में भी उजाला भर दिया है’’। कमला की तरह सिरंजो गांव की लाडा और डाडिया गांव की दापू भी पहले बैच की महिला सौर इंजीनियर है। किसान परिवार की लाडा कमला से ही प्रोत्साहित हुई और उसने भी प्रषिक्षण हासिल किया लेकिन कुछ ही समय बाद पति की असहमति के कारण वह प्रषिक्षण बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो गई। उसे परिवार से प्रोत्साहन देने वाला कोई नहीं था। दापू लोहार जाति के आदिवासी परिवार से संबंधित थी और अपने समुदाय की पहली महिला है जिसने सेकेंडरी स्कूल तक पढ़ने के बाद इस क्षेत्र में पांव रखा था। राजस्थान में करीब 150 रात्रि स्कूल चलते हैं जो बच्चे घर के काम-काज के कारण दिन में स्कूल नहीं जा सकते उनके लिए समाजकार्य अनुसंधान केंद्र ने ये स्कूल खोले हैं इन स्कूलों में रात को सौर लालटेन से ही रोषनी होती है। तीन हजार से अधिक चारवाहे लड़के और लड़कियां इन स्कूलों में जाते हैं। सौर लालटेन मिट्टी के तेल के लालटेनों से अधिक उपयुक्त हैं। समाज अनुसंधान केंद्र अभी तक सौर विद्युतीकरण की प्रक्रिया को आठ राज्यों के कई गैर-बिजलीकृत गांवों में लागू कर चुका है। केंद्र ने यूरोपियन यूनियन और यूएनडीपी द्वारा मिलने वाले फंड की सहायता से कुछ बेहद पिछड़े राज्यों के दूर दराज गांवों को चिन्हित किया है। वर्श 2002 तक करीबन 531 गांवों के करीब 80 हजार लोगों को सौर उर्जा प्रणाली का लाभ मिल रहा है। केंद्र के अध्यक्ष बंकर राय के मुताबिक, ‘‘इस विचार का उद्देष्य यह है कि यदि बेहद साधारण और अषिक्षित ग्रामीण लोग सौर इंकाइयों की परिश्कृत तकनीक को बनाने; लगाने, मरम्मत करने और उसके रखरखाव का कार्य करने में प्रषिक्षित किए जा सकते है तो सोैर ऊर्जा की प्रक्रिया को समूचे विष्व में अपनाया जा सकता है। क्या इसे सफल कहानी कहा जा सकता है? केंद्र के एक कार्यकर्ता का जवाब था, ‘‘उससे भी बढ़कर। यह तो षुरूआत है जहां भी ग्रामीण महिलाएं ये कार्य करती हैं वहां उनकी कीर्ति के चर्चे होते हैं। परिवार में वे अपनी पहचान बना पा रही हैं। यह बात सही है कि अगर पति और परिवार सहमत नहीं होते तो वे निर्णय नहीं ले पातीं या कभी कभी उन्हें बीच में ही प्रषिक्षण छोड़ना पड़ता है। लेकिन कम से कम पहला प्रयास षुरू हो चुका है। ग्रासरूट फीचर्स &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-8504719331482213979?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/8504719331482213979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=8504719331482213979' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8504719331482213979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8504719331482213979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_652.html' title='गांवों में उजाला करतीं महिला सौर इंजीनियर'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Syd2rrbuiCI/AAAAAAAAAHY/b86nI7q_Emo/s72-c/PHOTO-6.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-4637060291680615229</id><published>2009-12-15T03:25:00.000-08:00</published><updated>2009-12-15T03:32:16.750-08:00</updated><title type='text'>युवा माँ के स्वास्थ्य के लिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SydzWLkjaDI/AAAAAAAAAHQ/6MYZMQhd44E/s1600-h/annu+pix2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415423901836732466" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 216px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SydzWLkjaDI/AAAAAAAAAHQ/6MYZMQhd44E/s320/annu+pix2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद (उदयपुर, राजस्थान) &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;उदयपुर से कोई 55 किलोमीटर दूर आदिवासी क्षेत्र के गांव डूंगरीकलां की प्रतापी छोटी सी झुग्गी में अपनी एक माह की बेटी के साथ खेल रही थी। प्रतापी की यह चैथी संतान है। पिछले तीन बच्चों को जन्म देने के समय उसे कई प्रकार की तकलीफों को झेलना पड़ा था। पहले तीनों बच्चों का प्रसव घर पर ही हुआ था। उसे लगता नहीं था कि वह इस बार बच पाएगी। पति भी खेतों में मजदूरी करने चला जाता था। उसकी हालत बेहद गंभीर थी। प्रतापी को डर था कि इस बार वह भी आसपास के गांवों में प्रसूति के समय मरने वाली महिलाओं में से एक होगी। लेकिन पास के गांव कड़िया में शुरू हुए नए केंद्र से समय पर मिली डाक्टरी सहायता की बदौलत उसका नाम राज्य की बढ़ती मातृत्व मृत्यु दर के आकड़ों में शामिल नहीं हुआ। इसी गांव की केसकी का पहला प्रसव था लेकिन प्रसव के समय उसकी हालत काफी बिगड़ गई। उसका प्लेंस्टा नहीं गिरा था। गांव कुंचोली स्थित सेफमदरहुड केंद्र की दो नर्सों ने उसे केंद्र की गाड़ी से उदयपुर जिले के रेफ्रेल अस्पताल पहुंचाया। उसका मामला काफी बिगड़ चुका था लेकिन समय पर अस्पताल पहुंच जाने के कारण किसी प्रकार से उसकी जान तो बचा ली गई पर उसका बच्चा बच नहीं पाया। प्रतापी और केसकी की तरह उदयपुर और राजसमंद जिले के करीबन 42 गांवों की महिलाएं अब प्रसव के लिए पारंपरिक दाइयों या सगे संबंधियों पर निर्भर नहीं। उदयपुर जिले के छितरे हुए आदिवासी इलाके में 80 प्रतिशत प्रसव घरों में होते हैं। यहां के सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोग प्रसव के लिए पारंपरिक दाइयों या सगे संबंधियों पर निर्भर रहते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में और प्रसव के दौरान या बाद में उचित देखभाल न मिलने के कारण इन इलाकों में बहुत सी महिलाएं प्रसूति के समय या बाद में होने वाली गड़बड़ियों के कारण मरती हैं। उदयपुर में 75 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है लेकिन केवल चार केंद्रों में ही डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध है। प्रसव पश्चात या प्रसव पूर्व या गंभीर प्रसव मामले को देखने के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थीं। स्वास्थ्य केंद्रों की नर्सों पर प्रजनन स्वास्थ्य के अलावा भी अन्य कईं प्रकार की प्रशासनिक जिम्मेदारियां है कि वे चाह कर भी गर्भवती महिलाओं तक नहीं पहुंच पातीं। 1997 में कुंभलगढ़ ब्लाक के दक्षिण क्षेत्र में की गई सर्वे में पाया गया कि केवल चार प्रतिशत डिलीवरी नर्सों या एएनएम ने की थीं। राजस्थान की मातृत्व मृत्यु दर का आंकड़ा 670 है जबकि राष्ट्रीय दर 407 प्रति लाख है। उदयपुर स्थित स्वास्थ्य संस्था ‘अर्थ’ यानि एक्शन रिसर्च एण्ड ट्रेंनिग फाॅर हेल्थ ने क्षेत्र की इस बढ़ती मातृत्व मृत्यु दर पर काबू पाने के लिए अनोखा प्रयास किया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से अलग हटकर संस्था ने 24 घंटे की प्रसूति सुविधा वाले दो सेफमदरहुड केंद्रों की शुरूआत की। इन केंद्रों का मुख्य मकसद दूरदराज़ के गावों में रहने वाली गरीब और अनपढ़ महिलाओं को प्रसव एक से पहले और प्रसव के बाद कुशल स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना है। संस्था अर्थ’ की संस्थापक कीर्ति आयंगर के मुताबिक, ‘‘पांच वर्ष पहले जब उन्होंने इस इलाके में अपना प्रोजेक्ट शुरू किया था उस समय 95 प्रतिशत डिलीवरी घरों में होती थीं। इसलिए इन केंद्रों का लक्ष्य प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी अधिक से अधिक सेवाएं प्रदान करना है।’’ ये केंद्र आसपास गांवों की करीब 50 हज़ार जनसंख्या को प्रजनन स्वास्थ्य और नवजात शिशु की देखभाल डाक्टरों और प्रशिक्षित मिडवाइफों के जरिए मुहैया करा रहे हैं। ‘अर्थ’ ने पहला केंद्र वर्ष 1999 में दक्षिण राजस्थान के राजसमंद जिले के कुभंलगढ़ ब्लाक के कंुचोली गांव में खोला। फिर दूसरा केंद्र वर्ष 2000 में उदयपुर जिले के कड़िया गांव में खोला गया। चारों और छितरे हुए छोटे छोटे गावों से घिरे इन केंद्रों में 24 घंटे डिलीवरी की समूची सुविधा उपलब्घ है। केंद्र में कुल पांच नर्स (तीन जीएनएमस, दो एएनएम) रहती हैं। सप्ताह में दो बार स़्त्री रोग विशेषज्ञ यहां आकर एएनसी / पीएनसी, (प्रसवपूर्व और प्रवोपरान्त) गर्भपात और अन्य स्त्री रोगों का इलाज करती हैं। जबकि सप्ताह में एक बार बालरोग विशेषज्ञ भी आता है। जो कुपोषण, संक्रमण और अन्य बीमारियों का इलाज करता है। केंद्र में बच्चों के टीकाकरण की भी सुविधाएं उपलब्ध हैं। दो नर्सें यहां रात-दिन रहती हैं। नर्स मिडवाइफ को गर्भपात, रिप्रोडेक्टिव ट्रैक इंफेक्शन जैसे मामलों को देखने का प्रशिक्षण भी दिया गया है। जैसे ही केंद्र को किसी गर्भवती महिला को देखने के लिए बुलाया जाता है एक नर्स मिडवाइफ और एक पुरुष फील्ड सुपरवाइजर महिला के गांव मोटरसाइकल पर पहुंचते है। वे अपने साथ जरूरी दवाएं और संयंत्र लेकर जाते हैं। किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पर पहले उसे केंद्र के डाक्टर के पास लेजाया जाता है। अगर मामला अधिक गंभीर हो तो उसे उदयपुर स्थित रेफ्रल अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी भी केंद्र निभाता है। इसके लिए केंद्र रियायती दर पर वाहन की व्यवस्था भी करता है। गर्भवती महिला को अस्पताल में दाखिल कराने के बाद केंद्र का स्वास्थ्य कार्यकर्ता मरीज के परिवार और अस्पताल से संपर्क में रहता है। श्रीमती आंयगर ने बताया कि केंद्र में की जाने वाली डिलीवरी के लिए आदिवासी महिलाओं से 100 रूपया ओर गैर आदिवासी महिला से 300 रूपया फीस ली जाती है। इंमरजेंसी वाले मामले में केंद्र 1500 रूपए तक की वित्तीय सहायता देता है। केंद्र की मिडवाइफ प्रोजेक्ट के 42 गांवों में निर्धारित दिन पर जाकर ‘फील्ड क्लीनिक’ लगाने का काम भी करती हैं। केंद्र की डाॅक्टर रिचा कपूर के मुताबिक इन फील्ड क्लीनिक के माध्यम से गांवों की महिलाओं को प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद स्वास्थय की देखभाल करने की जानकारी दी जाती है। गर्भवती महिला को भी इन फील्ड क्लीनिकों के दौरान नर्सों से संपर्क कर अपनी डिलीवरी की योजना बनाने का समय मिलता है। इस के अलावा उन्हें नवजात शिशु की देखभाल तथा बच्चों के टीकाकरण की जानकारी और सेवाएं भी दी जाती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में लोगों की भागीदारी बढ़ाने और जागरुकता फैलाने के लिए केंद्र गावों में ‘स्वास्थ्य सखी’ बनाने का काम भी कर रहा है। केंद्र के सोशल एनीमेटर(सामाजिक प्रोत्साहक) गांवों का दौरा कर गांव की सक्रिय महिलाओं की पहचान कर उन्हें ‘स्वास्थ्य सखी’ बनाने का काम करते हैं। कुंचोली स्थित केंद्र की सोशल एनीमेटर लीला कुमार का काम तीन पंचायतों के गांवों को देखने का है वह इन गांवों में महिलाओं को डिलीवरी घर पर न कराने और गर्भनिरोधकों की जानकारी देती है। लीला कुमार के मुताबिक अभी तक वह 20 ‘स्वास्थ्य सखियां’ बना चुकी हंै। ये ‘स्वास्थ्य सखियां’ गांव की गर्भवती महिलाआंे को क्लीनिक में डिलीवरी करने के लिए प्रेरित करती हैं। इस के अलावा वह केंद्र की नर्सों को गर्भवती महिलाओं की जानकारीेेे भी देतीं हैं। गावों में गर्भनिरोधक बांटने में भी इनकी मदद ली जाती है। अर्थ के सेफमदरहुड केंद्रों की अन्य बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रजनन स्वास्थ्य और गर्भावस्था में पुरुषों की भागीदारी को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसके लिए पुरूषों से भिन्न भिन्न तरीकों से संपर्क किया जाता है। केंद्र का पुरूष कार्यकर्ता गर्भवती महिला के पति को प्रसव से जुड़ी देखभाल की जानकारी देता है। प्रति माह 250 पतियों को प्रशिक्षित किया जाता है। नवजात शिशुओं के पिताओं को परिवार नियोजन और बच्चे की देखभाल की जानकारी दी जाती है। तीन से दस के करीब समूह में युवा पुरुषों को किशोरवास्था में गर्भ ठहरने के खतरों और सुरक्षित गर्भपात के साथ पुरूषों के प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। पंचायतों को भी इसमें भागीदार बनाया गया है। पंचायत सदस्यों को मातृ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। पंचायत आधारित मातृ स्वास्थ्य कार्ड भी तैयार किया गया है जिसे महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपने पास रखतीं हैं। इस कार्ड को सेवाप्रदाता द्दारा भरा जाना होता है। श्रीमती आयंगर का कहना है, ‘‘केंद्रों की शुरुआत के बाद से क्षेत्र में संस्थागत डिलीवरियों में बढ़ोेतरी हुई है। केंद्रों की शुरुआत के पांच सालों में यहां पर 687 डिलीवरियां हुई जिसमें प्रसूति के समय मातृत्व मृत्यु शून्य और जीवित बच्चों की संख्या 643 थीं।’’ अगस्त माह की 20 तारीख तक यहां 17 डिलीवरी हो चुकीं थीं। बहुत से परिवार खासकर आदिवासी और पिछड़े समुदाय के परिवार रेफ्रल सेवाओं के लिए भी शहरी अस्पताल में जाने को तैयार नहीं होते लेकिन वितीय सहायता मिल जाने के कारण और केंद्र की नर्स का साथ मिलने से अब बहुत से इंमरजेंसी वाले मामले अस्पताल जाने में संकोच नहीं करतेे। ‘अर्थ’ के प्रयास से भले ही मातृत्व मृत्यु के ग्राफ में कोई स्पष्ट बदलाव न आया हो लेकिन प्रतापी और केसकी जैसी क्षेत्र की बहुत सी महिलाएं बेमौत मरने से जरूर बच रहीं हैं। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-4637060291680615229?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/4637060291680615229/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=4637060291680615229' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4637060291680615229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4637060291680615229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_15.html' title='युवा माँ के स्वास्थ्य के लिए'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SydzWLkjaDI/AAAAAAAAAHQ/6MYZMQhd44E/s72-c/annu+pix2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-4177672728329666790</id><published>2009-12-14T02:52:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T02:57:30.189-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानवी के साहस'/><title type='text'>बिहार की क्रांतिकारी ग्रामीण महिलाएं</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt; अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मुज़फ्फरपुर, बिहार &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तीस वर्षीय चंद्रा देवी चार साल पहले तक कभी घर से बाहर नहीं निकली थी। घर के चूल्हे चौके और अन्य खेती के कामों में खटने के बाद उसे घर के छोटे-मोटे खर्च को पूरा करने के लिए तरसना पड़ता था। उस का पति खेती का काम करता लेकिन उसकी आमदन इतनी नहीं थी कि घर की जरूरतें पूरी हो जाएं। उस समय चंद्रा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वह न केवल अपनी जरूरतों को खुद पूरा करेगी बल्कि घर की आमदनी का बड़ा हिस्सा कमाने लगेगी। लेकिन वर्ष 2001 में स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनने के बाद उसके जीवन की दिशा ही बदल गई। बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के गांव अदिगोपालपुर की रहने वाली चंद्रा के लिए समूह का सदस्य बनना भी आसान न था। वह बताती है कि जब वह सहेलियों से मिली जानकारी के मुताबिक ‘स्व-शक्ति स्वयं सहायता समूह परियोजना’ के संचालक के साथ गांव में बनने वाले नर्गिस समूह की सदस्य बनने की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए गई तो गांव के कुछ लोगों ने उसके पति को गलत बता दिया जिसकी वजह से दस दिन तक उसका पति से झगड़ा होता रहा। उस पर सदस्य न बनने का दबाव डाला गया। लेकिन चंद्रा ने हार नहीं मानी और समूह नहीं छोड़ा। आज उसी समूह की बदौलत पति भी उसकी इज्जत करता है और जरूरत पड़ने पर समूह की बैठक के लिए उसे छोड़ने भी जाता है। बंदाई(ओरांई) गांव की जातरान देवी स्वयं सहायता समूह का सदस्य बनने से पहले केवल इतना ही जानती थी कि उसे प्रति माह 20 रूपए जमा करने हांेगे और बदले में जरूरत पड़ने पर वह दो रूपए के ब्याज पर कर्ज ले सकेगी। लेकिन समूह से जुड़ने के बाद केवल तीन सालों में उसमें इतना बदलाव आया कि आज वह न केवल 50 समूहों का कामकाज देख रही है ब्लकि स्वयं कमाई भी कर रही है। जातरान देवी कहती है,‘‘ मैं सत्तू, चिप्स के पैकेट बनाकर दुकान में भेजती हूं इससे मुझे अच्छी कमाई हो जाती है।’’ जातरान के मुताबिक उनके समूह की 30 हजार रूपए की राशि बैंेक में जमा है। पुरूषोतमपुर गांव के स्वयं सहायता समूह की 28 वर्षीय अमृता देवी प्रति माह 30 रूपए समूह में जमा करती है। दस सदस्यों का उनका समूह प्रति माह कुल 300 रूपए जमा करता है। उसके हनुमान प्रसाद समूह को बैंक से मिलने वाली आर्थिक सहायता की पहली दस हजार रूपए की किश्त भी मिल चुकी है। वह बताती है कि समूह को मिले प्रशिक्षण के बाद उनके समूह की सभी महिलाएं समूह से कर्ज लेकर पशुपालन, हाट बाजार या मछलीपालन का काम कर रहीं हैं। रसूलपुर गांव की शैमु निशा कुछ साल पहले तक बीड़ी मजदूर का काम करती थी लेकिन आज वह खुद बीड़ी बनाने के धंधे की मालकिन है। यमुना शक्ति समूह की सुनीता पूरी तरह जानती है कि मुखिया के पास विकास का कितना फंड आता है और कौन सी सरकारी योजनाएं उसके क्षे़त्र में लागू हैंै। वह महिलाओं को पंचायती राज के अलावा सरकारी योजनाओं की जानकारी देने का काम कर रही है। मैदापुर पंचायत के ‘आरती स्व-शक्ति समूह’ की धर्मशीला चैधरी 22 समूहों की अध्यक्ष है। 8 से 11 तक के समूहों का एक कलस्टर होता है। धर्मशीला ने समूह का सदस्य बनने के बाद पंचायती राज और अन्य समाजिक समस्याओं की जानकारी हासिल की और अब वह समूह की सदस्यों को दहेज और दूसरी समस्याओं के प्रति जागरूक बनाने का काम करती है। महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में स्वयं सहायता समूह पूरे देश में काम कर रहे हैं। लेकिन बिहार में शुरू हुए ‘स्व-शक्ति स्वयं सहायता समूह’ (एसएचजी) परियोजना विशिष्ट है। इसकी खास विशेषता यह है कि इसमें बचत और आय अर्जन कार्यकलापों के अलावा समूह की महिलाओं को पूरी तरह सबल बनाने के लिए पंचायती राज और विकास संबंधी सरकारी योजनाओं की जानकारियां उपलब्ध कराने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। कईं प्रकार के सरकारी और गैर सरकारी हस्तक्षेपों के माध्यम से यहां की ग्रामीण महिलाएं सामुदायिक स्तर की जरूरतें पूरी करने के निर्णयों में भागीदार बन रही हैं। बिहार राज्य महिला विकास निगम द्वारा विश्व बैंक और आईएफएडी की मदद से देश के सात राज्यों के लिए प्रस्तावित इस ‘स्व-शक्ति परियोजना’ की शुरूआत वर्ष 2001 मुजफ्फरपुर जिले के 5 ब्लाकों में की गई। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी रेखा से नीचे की महिलाओं की स्थिति सुधारना है। इसलिए जिले के सीमांत और छोटे किसान परिवारों या भूमिहीन परिवारों की महिलाओं को लक्ष्य बनाया जा रहा है। जिला स्व-शक्ति योजना के संचालक अविनाश कुमार बताते हैं, ‘‘महिलाओं की सामाजिक और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने के लिए और सामुदायिक संपतियां जैसे पेयजल, शौचालय और डे- केयर सेंटर बनाने जैसे कार्यों की जिम्मेदारी भी इन समूहों पर डाली जा रही है और महिलाएं इन्हें बखूबी निभा रही हैं’’। मैदापुर पंचायत यमुना शक्ति स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सुनीता राय ग्रामीण महिलाओं को इंदिरा आवास योजना, वृद्दा पेंशन योजना और मातृत्व लाभ की जानकारी देती है। सैफुद्दीनपुर पंचायत के गांव इतबारपुर की अनीता देवी तीन कलस्टर संगम बेधा की अध्यक्ष है। इन तीन कलस्टरों में 18 समूह हैं। अनीता सभी समूहों के खाते और लेजर बुक लिखने का काम करती है। यहां के समूह की अधिकतर सदस्यों ने अपने बूते पर सामाजिक समस्याओं पर निर्णय लेकर उसे लागू करने की शुरआत भी कर दी है। ऐसे कई मामले देखने को मिल रहे हैं जहां गांव में होने वाले छोटे-मोटे झगड़ांे का निपटान समूह की मदद से किया गया हो। कासीरामपुर गांव के पार्वती शक्ति समूह की पूनम देवी ने अपने गांव में दूसरे के खेत में बकरी जाने से पैदा हुए झगड़े का निपटान सूमह के सदस्यों की मदद से किया। वह बताती है, ‘‘गांव की एक महिला की बकरी दूसरे के खेत में चली गई तो उस खेत के मालिक ने उसे अपनी बताकर महिला को थप्पड़ मारा। हमने कलस्टर समूह की बैठक बुलाई और फैसला किया कि आरोपी पुरूष महिला से माफी मांगे। महिलाओं की बैठक के बारे में सुनकर वह पुरूष घर से बाहर नहीं निकला और बाद में मैदापुर की 400 महिलाओं के सामने उसने गलती स्वीकार की।’’ मोतीपुर प्रखण्ड के जसौली गांव में दीपा समूह ने गांव में बच्चों के पढ़ने की समस्या को देखते हुए सूमह की सहायता से गांव में ‘स्व-शक्ति दीप बाल केंद्र’ स्कूल का निर्माण किया। कलस्टर की बैठक में दीपा समूह के सदस्यों ने गांव में स्कूल न होने की समस्या पर चर्चा की फिर अन्य चार समूहों की सहायता से स्कूल की शुरूआत हुई। समूह ने तय किया कि स्कूल के शि़़क्षक को वेतन देने के लिए प्रत्येक छात्र से 10 रूपए की फीस ली जाए। आज इस स्कूल में 45 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। इसी प्रकार अदिगोपालपुर पंचायत की जागृति समूह की अध्यक्ष शाहदुल्हन गांव में खुले स्कूल में निरक्षर महिलाओं को पढ़ाती है। इसके लिए गांव की पढ़ी लिखी महिलाओं की मदद भी ली जाती है। दिल्ली की प्रिया संस्था की मदद से एसएचजी की महिलाओं में नेतृत्व की भावना पैदा करने के लिए ‘सिटिजन लीडर’ नाम का कार्यक्रम तैयार किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं की पंचायती राज में भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्हें प्रेरित किया जाता है। इसके लिए विभिन्न समूहों की सबसे काबिल महिला को प्रेरक बनाया जाता है। इस कार्यक्रम को स्वशक्ति सोजना के तहत लागू किया जा रहा है। मुजफ्फरपुर जिला बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र है इसके 16 ब्लाकों मंे से 11 ब्लाक अक्सर बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। जिले की जनसंख्या का अधिकतर प्रतिशत जीविका के लिए कृषी पर निर्भर है इसलिए महिलाओं को खेती के उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण देने के लिए किसान क्लब बनाए जा रहे हैं। इन क्लबों में पुरूषों को भी सदस्य बनाया जा रहा है। मुजफ्फरपुर स्थित सेंटर फाॅर कम्युनिकेशन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट अर्थात् संसर्ग संस्था इन क्लबों को गठित करने में मदद कर रहा है। क्लब के मकसद को स्पष्ट करते हुए वरूण कहते हैं,‘‘किसान क्लब के माध्यम से विभिन्न क्षेत्र के किसान कृषी के उन्नत तकनीक, आधुनिक यंत्रों का प्रयोग, मार्केटिंग और बैंक के साथ जुड़ाव आदि के तरीकों को मिल बैठकर तय करते हैं। इन क्लबों की मदद से खेती में महिलाओं और पुरूषों के संयुक्त प्रयास को बढ़ावा मिल रहा है। जिले में स्वयं सहायता समूहों के विस्तार और इसकी सफलता को देखते हुए अब इन समूहों का एक फेडरेशन बनाने की शुरूआत हो रही है। संसर्ग के जिला समन्वयक जितेंद्र प्रसाद सिंह के मुताबिक इस संगठन में गांव, पंचायत, ब्लाक और जिला स्तर के करीब 5000 समूहों को शामिल किया जाएगा। संगठन का मुख्य मकसद समूहों की बैंकों से लिकिंग बढ़ाना और और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ प्रदान करना है। लोक सेवा संगठन के तहत इन समूहों को एकत्रित करने का मकसद समूहों को सशक्त बनाना और राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान कायम करना है। स्वयं सहायता समूहों ने गांव में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए गावों में युवा समूह बनाए हैं। जो गांवों में लोगों को गुटखा और पराग इस्तेमाल करने से रोकते हैं। किशोर लड़कियों के लिए संसर्ग ने किशोरी पंचायतें बनाई हैं। ये किशोरियां कम उमर की शादियों को रोकने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जिस बिहार की बात अक्सर पिछड़ेपन, गरीबी और भ्रष्टाचार के लिए की जाती है उसी बिहार के गावों की हजारों महिलाएं केवल विकास की बात करती या समझती हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सबलता की मिसाल बनी ये सभी महिलाएं उन लाखों करोड़ो शहरी महिलाओं के लिए सबक हैं जिनका अधिकतर समय सास बहू के सीरियल देखने और उस पर चर्चा करने में बीतता है। बिहार की इन क्रंातिकारी महिलाओं को मिलने और उनकी घर गांव और समुदाय की जरूरतों के प्रति सजगता को जानने के बाद मेरा यह विश्वास और भी दढ़ हो गया है कि ये ग्रामीण महिलाएं उन मध्यवर्गीय पढ़ी लिखी शहरी महिलाओं से कहीं अधिक सबल हैं जो हर प्रकार के अधिकारों के प्रति जागरूक होने के बावजूद भी अपना एक फैसला खुद नहीं ले पातीं। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-4177672728329666790?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/4177672728329666790/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=4177672728329666790' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4177672728329666790'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4177672728329666790'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_7120.html' title='बिहार की क्रांतिकारी ग्रामीण महिलाएं'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-8508610857924567158</id><published>2009-12-14T02:46:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T02:47:45.784-08:00</updated><title type='text'>बदलाव की डगर पर</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;बज्जू राजस्थान &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;नीले रंग का घाघरा, चेाली और सिर को आगे तक ढकती लंबी चैढ़ी ओढ़नी, माथे पर बड़ा सा बोर (टीका), सफेद चूड़ियों से आधी से अधिक भरी दोनों बाजू। राजस्थान के छोटे से गांव बज्जू की 36 वर्शीय धापू बाई ने कभी सोचा भी न था कि निरंतर सूखे से जूझती उसकी जिंदगी में ऐसा बदलाव भी आएगा कि एक दिन देष की राजधानी में सभ्रांत लोगों, प्रेस और कैमरों की भीड़ में वह अपनी कला के लिए सराही जाएगी। सात लड़कियों, एक लड़के की मां धापू बाई का जीवन अभी तक खेती में मजदूरी करने या ढोर डंगर चराने में ही बीता। लेकिन पिछले कुछ सालों से राजस्थान में पड़ने वाले निरंतर सूखे ने जब उससे कमाई का यह साधन भी छीन लिया तो उसे अपने बच्चों को दो वक्त खाना खिलाने के भी लाले पड़ गए। इसी संकट के समय में उसका सहारा बना ‘उरमूल संगठन’। धापू कढ़ाई करना तो जानती थी लेकिन अपने अंदर छिपी इस कला को उभारने और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करने का अवसर दिया उरमूल ट्रस्ट ने। बीकानेर जिले के बज्जू क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर के पास बनी बस्तियों में रहने वाले अधिकतर घरों की महिलाएं यह काम कर रही हैं। 1971 में पाकिस्तान से भारत आए षरणार्थियों में कई परिवारों को इस क्षेत्र में रहने के लिए जमीन दी गई। इन परिवारों की महिलाएं जियोमेट्रिकल आकार में, कपड़े के एक एक धागे की गिनती के आधार पर कढ़ाई करने में पारगंत थी। लेकिन बाड़मेर, जैसलमेर और उसके बाद बीकानेर की यह कला केवल छोटे व्यापारियों में ही मान्य थी। कम मजदूरी, अनियमित काम के कारण महिलाओं को अपनी कला को निखारने का बहुत कम अवसर मिला। आखिर ‘उरमूल’ ने इन जरूरतों को पूरा करने के लिए कढ़ाई की ‘सीमांत-परियोजना’ षुरू की। कढ़ाई की पारंपरिक कला को नए-नए उत्पादों में इस्तेमाल करने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया गया। उनकी कला में और सुधार लाने के लिए प्रषिक्षण की वयवस्था की गई। कुषन कवर और बैग के अलावा विभिन्न प्रकार की साज-सजावट के उत्पादों पर भी कढ़ाई का इस्तेमाल षुरू किया गया। कला में रूचि रखने वाली अन्य महिलाओं को भी कढ़ाई का प्रषिक्षण दिया गया। बीच के दलाल को हटाकर ट्रस्ट ने इन महिलाओं को अपने उत्पादों की मार्किटिंग करने के लिए विभिन्न जगहों पर जाकर उन्हें प्रदर्षित करने का रास्ता दिखाया। दो एडी गांव की मनबी कढ़ाई करने वाली विभिन्न समूहों की ‘क्वालिटी कंट्रोलर’ है। भले ही बड़ी - बड़ी कंपनियों में नियुक्त ‘क्वालिटी कंट्रोलर’ की तरह उसके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं। लेकिन पूरी तरह देहाती यह महिला कढ़ाई में सफाई कैसे बरतें और माल को दाग धब्बे रहित बनाए रखने की कला बखूबी जानती है। मनबी बताती है कि वह महिलाओं को धागा देने के अलावा अपने काम में सफाई कैसे बनाएं इसकी जानकारी देती है। मनबी इस काम के अलावा खेती और पषुपालन का काम भी करती है। उसे एक माह में पांच सौ से एक हजार रुपए के बीच की राषि मिलती है। इस समूचे कार्य की संयोजक राजकुमारी के मुताबिक कुष्नों, कुर्तों पर कढ़ाई करने वाली महिलाओं को काम के हिसाब से पैसा दिया जाता है। अधिकतर महिलाएं 35 से 40 रुपए एक दिन में कमा लेती हैं। काम भी केवल 2-3 घंटे ही करती हैं बाकी समय मे पषु चराने का काम करती है। कढ़ाई इत्यादि होने के बाद दर्जी इसकी सिलाई करते हैं। एक दर्जी को पांच कुर्तों के लिए 100 से 150 रुपए मिलते हैं। ‘उरमूल ग्रामीण स्वास्थ्य अनुसंधान और विकास ट्रस्ट’ ने 1986 में बीकानेर जिले के लूणकरणसर में अपना काम षुरू किया। भंयकर सूखे से त्रस्त महिलाओं को रोजी रोटी चलाने के लिए धागा कातने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसी के बाद बीकानेर जिले के अलावा जोधपुर जैसलमेर और सीकर जैसे जिलों में इस धागे के इस्तेमाल के लिए रोजगार अवसरों की षुरूआत हुई। एक समय में 500 से भी अधिक महिलाएं धागा कातने का काम कर रही थीं। लेकिन इस धागे को खरीदने के लिए खरीददार नहीं थे। धागे के इस्तेमाल के लिए जोधपुर जिले के फलौदी ब्लाक और जैसलमेर जिले के पोकरण ब्लाक के पारंपरिक बुनकर की मदद लेने की षुरूआत हुई। इस प्रयास ने ‘दलाल’ की ऊपर की निर्भरता को खत्म किया। दो सालों के अंदर बुनकरों ने मर्किटिंग, रंगने, स्टाक रखने और हिसाब किताब रखने में महारत हासिल कर ली। कला के विकास से मार्किट की मांग में भी विस्तार हुआ और इन लोगों को अपने ही समुदाय का लाभ बढ़ाने की इच्छा जागृत हुई। इसी इच्छा ने ‘उरमूल मरूस्थली बुनकर विकास समिति’ की स्थापना की दिषा दिखाई। पष्चिमी राजस्थान के ‘मेघवाल’ समुदाय के अधिकतर बुनकर इस समिति के सदस्य है। लंबे समय के उत्पीड़न ने इस जाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी कमजोर बना दिया था। लेकिन उरमूल समिति के कारण 170 परिवारों को सम्मान के साथ जीने का अवसर दिया। पारंपरिक डिजाईनों, रंगों और उत्पादों के निंरतर प्रदर्षन से अच्छा प्रोत्साहन मिला। अब समिति के 50 प्रतिषत उत्पादों का जापान और न्यूजीलैंड में निर्यात किया जाता है। अब किसी मेघवाल बुनकर को ‘बड़े आदमी’ के घर के सामने से निकलने के लिए अपने जूते उतारकर हाथों में नहीं पकड़ने पड़ते। लूणकरणसर जहां से इस कला की विकास की कहानी षुरू हुई थी, वर्श 1992 में बुनकरों, दर्जियों और कातनेवालों को स्थायी रोजगार प्रदान करने के लिए ‘वसुंधरा ग्रामोत्थान समिति’ बनाई गई। पारंपरिक बुनकरों की स्थिति भी काफी खराब थी। उनके पास कोई भी स्थायी रोजगार नहीं था। वसुंधरा ने उन लोगों को भी नए डिजाईन के पीढ़ा चारपाई और स्टूल बनाने का प्रषिक्षण दिया। अभी तक यहां षादी विवाह में इस्तेमाल किए जाने वाले पंारपरिक पीढ़े और स्टूल बनाने का प्रचलन था। लेकिन जल्द ही इन लोगों ने ऐसे फर्नीचर बनाने षुरू कर दिए जिसमें बुनाई का काम अधिक रहता है। फर्नीचर के अलावा महिलाओं और पुरूशों के लिए हाथ से बुनी उनी षाल और जैकेट भी बनने लगे। समिति के हस्तक्षेप की वजह से बुनकरों को अब बाजार की तलाष में भटकना नहीं पड़ता। वे समिति के प्रबंधकों केे जरिए फलोदी स्थित समिति के मुख्य कार्यालय से जुड़े हैं। जो इन्हें धागा डिजाइन और आर्डर सप्लाई करते हैं और हर महीने के आखिर में तैनात तैयार माल फलोदी लाते हैं। यहां दो दिन तक इसकी क्वालिटी की जांच की जाती है। खारिज माल की कीमत बुनकरों की सलाह से तय की जाती है। समिति ने बुनकरों का जीवन बीमा भी कर रखा है। साल के आखिर में समिति को जो लाभ होता है वह सभी बुनकरों में बोनस के रूप में बांटा जाता है। लबें समय से अभाव की जिंदगी जी रहे इन लोगों ने अपनी ही पारंपरिक कला में जीने के नए मायने ढूंढ लिए हैं। महिलाओं ने सूखे को अपनी नियती मानकर उसका रोना रोने और सरकारी सहायता की बाट जोहने की बजाय अपनी कला को महानगरों के संभ्रात घरों की षोभा बनाकर आर्थिक रूप से सबल होने का रास्ता ढूंढ लिया है। अन्नू आनंद एसोसिएट एडिटर ग्रासरूट ए-65 परवाना अर्पाटमेंटस मयूर विहार, फेज 1 एक्सटेंषन नई दिल्ली 110091 &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-8508610857924567158?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/8508610857924567158/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=8508610857924567158' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8508610857924567158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/8508610857924567158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_4199.html' title='बदलाव की डगर पर'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1602006233358859646</id><published>2009-12-14T02:32:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T02:35:48.290-08:00</updated><title type='text'>पेन और बैग रहित</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;(उदयपुर, राजस्थान )&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;दक्षिण राजस्थान के आदिवासी अचंल उदयपुर में स्थित सेंट्रल पब्लिक सीनियर सैकेण्डरी स्कूल (सीपीएम) की सांतवी कक्षा का अजीब नजारा था। कक्षा में मौजूद सभी 40 छात्र अपने-अपने कंप्यूटर पर भूगोल विशय के अध्याय ‘पृथ्वी और चट्टानों’ का अभ्यास कर रहे थे। इस अध्याय की पूरी जानकारी उन्हें कंप्यूटर स्क्रीन पर उपलब्ध थी। सभी छात्र-छात्राएं कंप्यूटर के माऊस से इस अध्याय के हर पहलू को जांचने और समझने में व्यस्त थे। बाहर से आने वाले किसी व्यक्ति को भी यह दृश्य देखकर भम्र होगा कि यह उनकी कंप्यूटर कक्षा चल रही है। लेकिन नहीं ये छात्र गणित से लेकर हिन्दी, सामाजिक ज्ञान जैसे अपने सभी विशय कंप्यूटर पर ही पढ़ते हैं। अन्य कक्षाओं का भी यही दृश्य था। है। नर्सरी के बच्चे भी कंप्यूटर पर उभरती तस्वीरों और आवाज के माध्यम से ए से ऐपल और एन्ट सीख रहे थे। स्क्रीन पर उभरते चित्रों को देखते ही बच्चे जोर से चिल्लाते। 1989 में षुरू हुआ यह 1200 छात्रों वाला पब्लिक स्कूल पहला पेन लेस (पेन रहित) और बैग रहित स्कूल बनने की राह पर है। यहां की प्रिंसीपल और संस्थापक अलका षर्मा ने स्कूल की षुरूआत के साथ ही यह सोचना षुरू कर दिया था कि किस प्रकार वह स्कूल के छात्रों को बस्ते के बोझ और पेन से मुक्ति दिलाए। इसके लिए उन्होंने कंप्यूटर को माध्यम बनाया क्योंकि उन्हे लगा कि आने वाले समय में कंप्यूटरीकृत षिक्षा प्रणाली में बेहद संभावनाएं हैं। इसी सोच ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। सबसे पहले नए साॅफ्टवेयर की मदद से सभी विशयों की विशयवस्तु को साॅफ्ट कापी यानि कंप्यूटर फार्म में बदला गया। किसी भी विशय के हर अध्याय को पहले एलसीडी और प्रोजेक्टर की मदद से पूरी कक्षा को पढ़ाया जाता है। विशय से संबंधित षिक्षक रिकार्डिड आवाज से अध्याय की पूरी जानकारी छात्रों को देते हैं फिर छात्र कंप्यूटर पर उसका अभ्यास करते हैं। होमवर्क और अभ्यास के लिए छात्रों को बारी-बारी घर पर कंप्यूटर भी दिया जाता है। स्कूल के कंप्यूटर विभाग के प्रमुख सुनील बाबेल के मुताबिक स्कूल का तकनीकी स्टाफ ‘करो करो’ जैसे र्कइं साॅफ्टवेयर की मदद से प्रष्नपत्र तैयार करता है। हर प्रष्न को चेक भी कंप्यूटरीकृत तरीके से ही किया जाता है और बच्चों को परिणाम भी तुरंत मिल जाता है। स्कूल की दूसरी से लेकर बारहंवी तक की सभी कक्षाओं के बच्चे स्कूल के इम्तहान कंप्यूटर पर देते है। अलका षर्मा के मुताबिक उनकी यह अभिलाशा है कि बारहंवी की परीक्षा भी कंप्यूटर पर हो लेकिन अभी माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं फिर बोर्ड को भी इसके लिए तैयार होना होगा। लेकिन फिलहाल उनके स्कूल की हर कक्षा के 50 प्रतिषत इम्तहान कंप्यूटर पर ही लिए जा रहे हैं षेश 50 प्रतिषत पारंपरिक तरीके से। गत वर्श स्कूल को कंप्यूटर षिक्षा में उत्कृश्ट कार्य के लिए राश्ट्रपति अब्दुल कलाम ने स्कूल की प्रिंसीपल अलका षर्मा को द्वितीय कंप्यूटर उतमत्ता पुरस्कार 2003 प्रदान किया था। श्रीमती षर्मा बताती हैं कि ‘‘पहले जब मैं ‘पेन लेस’ स्कूल की बात करती थी जो लोगों को आष्चर्य होता था लेकिन अब मेरे सपने ने आकार लेना षुरू कर दिया है। इस पुरुस्कार के बाद बच्चों के माता पिता भी उत्साहित हैं और वे भी परीक्षाओं को पूरी तरह कंप्यूटरीकृत करने में साथ दे रहें हैं।’’ स्कूल के अधिकतर बच्चे कंप्यूटर माध्यम से षिक्षा प्राप्त करने से बेहद खुष और संतुश्ट थे। संातवी कक्षा के मयंक स्क्रीन पर चट्टानों के विभिनन आकारों को दिखाते हुए बताते हैं कि इससे किसी भी विशय को हर प्रकार से परखा जा सकता है और इससे अधिक व्यावहारिक जानकारी के साथ अपनी सृजनात्मकता दिखाने की गुंजाइष अधिक रहती हैं। इसी कक्षा की र्कीति जैन के मुताबिक,‘‘हम पाॅवर प्वांइट प्रेसन्टेषन बनाकर किसी भी मुष्किल विशय को सरल बना सकते हैं। अधिक समय तक कंप्यूटर पर कार्य करने वाले सभी बच्चों को यहां प्राणायाम योगा भी सिखाए जाते हैं। इसके अलावा एक्यूपे्रषर की भी सुविधा उपलब्ध है। हर कक्षा में एक कंप्यूटर मोबाइल ट्राली पर रखा गया है जिसे जरूरत के मुताबिक एक स्थान से दूसरे स्थान लेजाया जाता है। स्कूल की ई-लाइब्रेररी और वीडियो लाइब्रेररी में हर विशय से संबंधित जानकारी की अतिरिक्त सीडी उपलब्ध है। जैसा कि प्रिंसीपल का कहना है कि स्कूल पूरी तरह तैयार है अब जरूरत है सरकार से हरी झंडी मिलने का। षिक्षा विभाग की अनुमति के बाद ही हम इसे पूरी तरह कंप्यूटरीकृत बना अतिंम परीक्षाएं भी कंप्यूटर पर ले सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;यह लेख ग्रासरूट में प्रकाशित हुआ है &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1602006233358859646?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/1602006233358859646/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=1602006233358859646' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1602006233358859646'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1602006233358859646'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_2948.html' title='पेन और बैग रहित'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6812868784998334127</id><published>2009-12-14T02:25:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T02:28:42.479-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Grassroots Features'/><title type='text'>आदिवासी बच्चों के भविष्य की उम्मीद</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;आदिवासी बच्चों के भविष्य की उम्मीद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;(कठिवारा  (झाबुआ) मध्य प्रदेश) &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ में कठिवाड़ा एक विषेश प्रकार का गांव है। कस्बों की गहमागहमी से दूर, विकास से अछूता यह गांव चारों तरफ से पहाड़ियों और जंगलों से घिरा है। सुबह छह बजे का समय है। चारों तरफ फैला सन्नाटे में अचानक प्रार्थना के स्वर गंूजने लगते हैं। यह आवाज बच्चों की है। आवाज की पीछा करने पर पता चलता है कि इस प्रार्थना के स्वर एक खुले से आश्रय के प्रागण में से आ रहे हैं। यहां खाकी निकर और सफेद कमीज पहने दो सौ के करीब बच्चे बंद आखों और जुड़े हाथों से प्रार्थना करने में तल्लीन थे। सुबह की प्रार्थना खत्म होते ही बच्चे टोलियों में बंट जाते हैं। एक टोली कमरे साफ करने लग जाती है। दूसरी रसोई में पड़े धान की सफाई और सब्जियां काटने में जुट जाती है एक अन्य टोली पौधों को पानी देने और बगीचे की साफ-सफाई कर रही है। ये युवा बच्चे अपने काम में इस तरह मग्न थे कि उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं हुआ कि बाहर से आकर कोई अजनबी उनके बीच खड़े हैं। आदिवासी लड़कों में बचपन से ही अनुसासनबद्ध तरीके से सामूहिक नेतृत्व की भावना पैदा कर उन्हें अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त जीवन के विभिन्न उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने का प्रषिक्षण देने वाला यह आश्रम है गुजरात राज्य की सीमा पर स्थित कट्ठिवाडा का ‘राजेंद्र आश्रम’। यह स्कूल आश्रम पद्धति के स्कूलों में अनूठी मिसाल है। क्योंकि यह स्कूल इन इलाकों के आदिवासी बच्चों को प्रषिक्षिति कर रहा है जिन के लिए सामान्य स्कूल भी कल्पना मात्र है। झाबुआ जिले की 87 फीसदी जनसंख्या आदिवासियों की है। इन में साक्षरता केवल 13 प्रतिषत है। ये आदिवासी सूदूर जंगलों में बसे हुए हैं। अधिकतर आदिवासियों का मुख्य धंधा खेतबाड़ी हैै। ये आदिवासी सामूहिक बस्तियों में न रह कर अलग टप्पर बना कर निवास करते हैं। इस तरह हर गांव अलग-अलग फलियों (मोहल्लों) में बंटा प्रषासन द्वारा हर गांव में स्कूल का प्रावधान है। लेकिन अधिकतर स्कूल कागजों पर चल रहे हैं। इस की एक वजह यह भी है कि इन सूदूर बस्तियों में षिक्षक आना नहीं चाहते। जिन की नियुक्ति होती भी है तो वे लंबे अवकाष पर चले जाते हैं। इसलिए इन गांवों के सरकारी स्कूल या तो बंद पड़े रहते हैं या षिक्षकों की अनुपस्थिति में बच्चे आना बंद कर देते हैं। अषिक्षा, अज्ञानता और विकास से दूर अधिकतर आदिवासी षराब पीकर अपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। जिस का असर बच्चों पर भी पड़ता है। इस लिए यहां आर्थिक सामाजिक सुधार के लिए केवल किताबी षिक्षा ही नहीं पर्याप्त बहुमुखी प्रसिक्षण की जरूरत है। राजेंद्र आश्रम इस दिषा में मील की पत्थर कहा जा सकता है। यहां बच्चे छात्रावास में रह कर कृशि, बागवानी, सामाजिक वानिकी के साथ-साथ छोटे मोटे उद्योगों का प्रषिक्षण भी प्राप्त करते हैं। यहां इस समय छात्रावास में रह कर 250 के करीब लड़के षिक्षा पा रहे हैं। आदिवासियों के जीवन की जरूरतों को ध्यान में रख कर विभिन्न क्रियाकलापों में प्रषिक्षण का प्रावधान रखा गया है। आदिवासी बच्चे आश्रम में रह कर अपने मूल पेषे खेती से दूर न हो जांए इस के लिए आश्रम में 25 एकड़ की ज़मीन पर बेहतर तकनीक से फसल उगाने, बागवानी, सामाजिक वानिकी, पषुपालन इत्यादि का व्यावहारिक प्रषिक्षण दिया जाता है। आश्रम में ही ‘राजेंद्र फ्लोर’ मिल (आटा चक्की) पर छात्र चक्की चलाने का काम सीखते हैं। इस के अलावा छोटे मोटे दूसरे गृह उद्योगों की षिक्षा दी जाती है। पषु पालन कार्य की षिक्षा के लिए मधुबन गोषाला है। सुबह की दिनचर्या सुबह पांच बजे से षुरू होती है। आधे घंटे के स्वाध्याय के बाद छह बजे प्रार्थना होती है। उस के बाद विभिन्न टोलियां अपनी-अपनी ड्यूटी का निर्धारित काम करती हैं। इसके लिए सफाई, कृशि, बगीचा, रसोई, संडास और सामान्य टोलियां बनी हुई हैं। हर टोली का एक नायक और एक उपनायक है। जो काम का संचालन करने के साथ-साथ षाम को प्रार्थना के समय समूचे दिन की रिपोर्ट पेष कर करता है। हर सप्ताह इन टोलियों का कार्य बदल जाता है। आठ बजे के करीब सभी बच्चे एक साथ बैठ कर दलिया, मूंग या पोहे इत्यादि का नाष्ता करते हैं। नाष्ते के बाद का समय होम वर्क का होता है। फिर नहाना धोना। साढ़े दस बजे भोजन। और साढ़े ग्यारह से साढ़े चार बजे तक का समय स्कूल। पांच से छह बजे का समय खेल कूद का रहता है। षाम सात-साढ़े सात बजे सर्वधर्म प्रार्थना। प्रार्थना के बाद एक षिक्षक कहानी के माध्यम से कोई नया विचार बच्चों को बताताहै। फिर रात के खाने के बाद छात्र ढोलक, हारमोनियम इत्यादि वाद यंत्रों के साथ संगीत का अभ्यास करते हैं। स्कूल का काम खत्म करने के बाद दस बजे का समय सोने का होता है। रविवार और अवकाष के दिनों में खेती बाड़ी और कटाई बुआई के अलावा दूसरे गृह उद्योगों के कार्य सिखाए जाते हैं। रोजा गांव तहसील अलिराजपुर का रहने वाला छठी कक्षा का छात्र अरविंद की आज ड्यूटी अपनी टोली के साथ सब को खाना परोसने की है। परोसने के बाद वह खाना खाते हुए बताता है कि उसे यहां रहना बहुत अच्छा लगता है। घर में तीन भाई बहन हैं। भाई भी इसी आश्रम में पढ़ता है। वह केवल दीवाली के दिन घर जाता है। अरविंद बड़ा होकर इंस्पेक्टर बनना चाहता है। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले चांदपुर गांव के सुरेष (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उस के मां-बाप नहीं। उस के घर में भाई बहन काका हैं लेकिन उसे आश्रम में रहना पंसद है। उसे पढ़ने का खास षौक है। आश्रम की षिक्षिका सुमित्रा वाखला के मुताबिक सुरेष के पिता हत्या के जुर्म में जेल में हैं। मां ने बच्चों को छोड़ कर दूसरी जगह षादी कर ली। तब से वह आश्रम में रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा है। सुरेष बड़ा होकर पुलिस में भर्ती होना चाहता है। ताकि गांव को अपराधों से मुक्त कर सके। नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले योगेंद्र भिंडे के माता-पिता उस की छोटी उमर में ही किसी बीमारी में चल बसे। जब वह पांच साल का था उसे उसके काका आश्रम में लाए थे। इसी आश्रम में उसे मां की ममता और पिता का प्यार मिला। आज वह आश्रम में रहते हुए खुष है। वह बड़ा होकर डाक्टर बनना चाहता है। छात्र अवकाष के दिन आसपास के गांवों में आदिवासियों को प्रषासनिक योजनाओं की जानकारी देने दूसरे जन जागृति के अभियान में भी हिस्सा लेते हैं। प्रधानाध्यापक नाहर सिंह वाखला के मुताबिक जब ये छात्र अपने फलियों में जाकर ताड़ी और षराब पीने के खिलाफ अभियान चलाते हैं तो भले ही उन के अभियान का कोई प्रभाव पड़े या न पड़े लेकिन यह आषा जरूर बंधती है कि बड़े होकर ये बच्चे षराब या ताड़ी को नहीं छुएंगे। इस तरह आने वाली पीढ़ी का आदिवासी समाज जरूर षराबबंदी को मानेगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से यहां के छात्र आदिवासी समाज में फैली रूढ़िवादिता और कुरीतियों पर प्रहार करते हैं। तीन से पांचवीं की करीब 150 लड़कियों के लिए अलग कन्या छात्रावास और कन्या विद्यालय भी है। तीन से पांच साल तक के बच्चों के लिए बालवाड़ी भी संचालित की जा रही है। सूदूर आदिवासी क्षेत्र में बहुमुखी प्रतिभा का विकास करने वाले इस आश्रम की षुरूआत की कहानी भी रोचक है। राजेंद्र आश्रम की स्थापना गुजरात के प्रसिद्ध समाज सेवी चुन्नीलाल महाराज ने नवंबर 1962 में की थी। चुन्नीलाल लंबे समय से कच्छ क्षेत्र में समाज सेवा का काम करते रहे। जब उन को झाबुआ के आदिवासियों के पिछड़ेपन की जानकारी मिली तो वे इस इलाके में आए। यहां आदिवासियों में काम करने के बाद वे कट्ठीवाड़ा आए। कट्ठीवाड़ा रियासत के महाराज से उन्होंने बच्चों के लिए एक आश्रम की षुरूआत करने के लिए ज़मीन मांगी। उस समय के रियासत महाराज ओंकार सिंह ने ज़मीन देने के लिए एक षर्त रखी। उन्होंने चुन्नीलाल जी से कहा कि वे पंद्रह मिनट की समयावधि में नदी के किनारे की जितनी ज़मीन दौड़ कर कवर की महाराज ने उसी समय वे आश्रम के लिए स्थानांतरित कर दी। तब दस बच्चों से इस आश्रम की षुरूआत हुई। बाद में बिल्ंिडग का निर्माण 1987 में हुआ। आज यह आश्रम मध्य प्रदेष के आदिम जाति कल्याण विभाग की ओर से मिलने वाले अनुदान पर चल रहा है। हर बच्चे पर 300 रुपए प्रति मासिक और षिक्षकों और अन्य कर्मचारियों का वेतन। लेकिन यहां के षिक्षक केंद्रीय वेतनमान के मुताबिक वेतन न मिलने की वजह से असंतुश्ट हैं। वेतन भी छह माह नौ माह और बाहर माह की तीन किष्तों मे मिलता है। आदिवासियों तक षिक्षा का ज्ञान पहुंचाने में विषेश व्याकुल रहने वाली सरकार की यह नीति दूरस्थ आदिवासी इलाकों में कार्यरत षिक्षण संस्थाओं के याथ भेदभाव के रवैये को उजागर करती है। जब कि आदिवासी इलाकों के बच्चों में किताबी ज्ञान के अलावा अच्छे संस्कारों का विकास करने और बहुआयामी प्रषिक्षण प्रदान करने वाले राजेंद्र आश्रम जैसी संस्थाओं को विषेश प्रोत्साहित करने की जरूरत है। (ग्रासरूट फीचर्स) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-6812868784998334127?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/6812868784998334127/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=6812868784998334127' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6812868784998334127'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6812868784998334127'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_9498.html' title='आदिवासी बच्चों के भविष्य की उम्मीद'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6876366875330205406</id><published>2009-12-14T02:13:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T02:15:08.268-08:00</updated><title type='text'>जंग अभी भी जारी है</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;अन्नू आनंद&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आजादी के राष्ट्रीय संघर्ष में महिलाओं की भूमिका केवल अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन तक सीमित नहीं थी उन्होंने उस दौरान भी हथियारबंद क्रांति और समाजिक परिवर्तन में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया था। स्वदेशी आंदोलन में डा। सरोजिनी नायडू, श्रीमती उर्मिला देवी, दुर्गाबाई देशमुख और मद्रास की श्रीमती एस अम्बुजा और कृष्णाबाई रामदास का नाम आता है तो लतिका घोष (महिला राष्ट्रीय संघ), वीणा दास, कमला दास गुप्ता, कल्याणी दास और सुर्या सेन जैसी महिलाओं की कमी नहीं जो क्रांतिकारी समूहों का हिस्सा बनीं। इसके अलावा राष्ट्रीयकार्यकर्ता एनी बेसेंट, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, राजकुमारी अमृतकौर, बेगम हामिद अली, रेणुका रे आदि ने महिलाआंे के उत्थान के लिए काम किया। देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं की फेहरिस्त काफी प्रभावी है ओर ये महिलाएं केवल आजादी की खातिर नहीं बल्कि महिलाओं के हितों को प्रोत्साहित करने के लिए भी संघर्ष कर रहीं थीं। आजादी के 60 वर्ष बाद आज भी महिलाएं खासकर ग्रामीण और समाज के निचले स्तर की महिलाएं देश के दूर-दराज के इलाकों में हर स्तर पर अपने हक के लिए हर चुनौती का सामना कर रही हैं। अपने मकसद को हासिल करने और समाज में अपनी पहचान कायम करने के लिए वह पूरे दम खम के साथ संघर्षरत है। लड़ाई अपने आत्मसम्मान की हो या आर्थिक संबलता की। सामाजिक न्याय की हो या फिर शासकीय सत्ता में अपनी क्षमता साबित करने की। गरीब, अनपढ़ और पिछड़े समाज की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे किसी की गुलामी और अन्याय को अब सहन नहीं करेंगी। उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके बुंदेलखंड में इन दिनों ‘गुलाबी गिरोह’ नामक पांच सौ महिलाओं के एक समूह ने क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़कर प्रशासन की नींद उड़ा दी है। वर्ष 2006 में बना यह गिरोह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रहा है। गिरोह उन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन न होने पर ध्यान केंद्रित करता है जो सरकार ने कमजोर और गरीब वर्गों के लिए बनाई जाती हैं। भ्रष्टाचार के चलते इन सरकारी योजनाओं का गरीबों को लाभ नहीं मिल रहा। गुलाबी गिरोह की मुखिया एक गरीब और अर्धशिक्षित 45 वर्षीया संपत देवी पाल है। इस गिरोह को बांदा और चित्रकूट जिले में कोटे का राशन काला बाजार में पहुंचने से रोकने में सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। इन जिलों का अभी तक 70 फीसदी राशन काला बाजार में पहुंच जाता था। कुछ लोग संपत देवी की तुलना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से करते हैं। इस गिरोह की समर्थक महिलाओं की संख्या दस हजार से कम नहीं है। अपने सदस्यों को अलग पहचान देने के लिए गिरोह ने एक ही रंग के कपड़े पहनना तय किया। गुलाबी रंग, क्योंकि किसी भी राजनैतिक पार्टी से जुड़ा नहीं इसलिए गिरोह इस रंग का इस्तेमाल करता है। भारतीय दंड संहिता के तहत इस गिरोह पर गैरकानूनी सभा, दंगा, सरकारी अधिकारी पर हमला और सरकारी कर्मचारियों का अपना काम करने से रोकने के आरोप लग चुके है। लेकिन स्थानीय स्तर पर ‘गुलाबी गिरोह’ को मिल रहे भारी समर्थन और उनकी मजबूत इच्छा शक्ति के चलते उन पर अकुंश लगाना संभव नहीं होगा। गिरोह की मुखिया संपत देवी कहती है, ‘‘देश ऐसे ही थोड़े ही आजाद हुआ है। अरे जान तो एक बार जाएगी। दस खलनायक हमें परेशान करे तो क्या पूरा बंुदेलखंड हमारे साथ है।’’ देश के करीब सभी राज्यों में महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों के जरिए छोटी-छोटी बचतों से आर्थिक आत्मनिर्भरता की एक क्रांति खड़ी कर दी है। महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में स्वयं सहायता समूह पूरे देश में सक्रिय है। देश के पिछड़े राज्यों में से एक माने जाने वाले छत्तीसगढ़ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली दस लाख से भी अधिक आदिवासी, दलित तथा अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाएं, 76 हजार स्वयं सहायता समूहों की सदस्य हैं और इन सभी समूहों की कुल मिलाकर परिसंपत्तियां 13 करोड़ रुपए से भी अधिक है। आमतौर पर ये अनपढ़ महिलाएं, खदानें, मछली का कारोबार, खेतिहर जमीनों और साप्ताहिक हाट बाजार चला रही हैं। इन्हीं बाजारों में आदिवासियों के सभी बड़े आर्थिक कारोबार चलते हंै। कोई भी चुनौती उनके लिए मुश्किल नहीं रही है। चूना पत्थर और पत्थर की खदानों के ठेकों का काम यहां अभी तक पुरुष किया करते थे लेकिन अब महिलाओं ने इस क्षेत्र में भी दखल बना लिया है और वे विशाल निर्माण प्रोजेक्टों के भी ठेके ले रही हैं। राजनांद गांव में ‘मां बम्बलेश्वरी’ स्वयं सहायता समूह की तेजतर्रार सुकुलाया का कहना है, ‘‘बाजार चलाने के शुरूआती चार महीनों में ही हमने न केवल बैंक से उधार ली कुल राशि में से 35 हजार रुपए लौटा दिए बल्कि मुनाफा कमाने में भी हम कामयाब रहे। यहां की महिलाओं का सबसे अधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चार साल पहले चार हजार एकड़ से भी अधिक जमीन पर फसल उगाने के लिए पांच लाख रुपए की बोली लगाना था। पहले तो भारतीय स्टेट बैंक के अधिकारियों ने भी इतना बड़ा कर्जा देने से इंकार कर दिया लेकिन बाद में महिलाओं ने जब संगठित होकर दबाव बनाया तो उन्हें कर्जा मिल गया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में उन्हें न केवल सफलता मिली, बल्कि इन्होंने अपने सदस्यों को अपने गांव में चावल बैंक बनाने के लिए राजी किया और शर्त यह रखी कि स्थानीय व्यापारियों को अपनी फसल बेचने से पहले वे अपनी जरूरतों के लिए इन बैंकों में बफर स्टाक बनाएंगे। इसी प्रकार देश के सात अन्य राज्यों में ‘स्वशक्ति’ स्वयं सहायता समूह के जरिए महिलाओं की ऋण पर निर्भरता कम हो रही है। बिहार में स्वशक्ति आंदोलन का रूप ले चुका है। यहां के मुज्जफरपुर जिले की महिलाएं इस ‘स्वशक्ति’ समूहों के जरिए बचत और आमदनी के कार्यकलापों के अलावा विकास संबंधी सरकारी योजनाओं और पंचायती राज की जानकारियां हासिल कर सामुदायिक स्तर की जरूरतें पूरी करने के निर्णयों में भागीदार बन रही हैं। स्वशक्ति स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनकर वे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने और सामुदायिक संपत्तियों जैसे पेयजल, शौचालय और डे-केयर जैसे केंद्र बनाने जैसे कार्यों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। जम्मू कश्मीर में महिलाओं ने आंतकवादियांे से अपनी रक्षा की खातिर हथियार उठा लिए हैं। जम्मू कश्मीर की हिलकाका पवर्तमाला में आतंकवादियों से लड़ने के लिए महिलाओं ने ‘‘आवामी फौज’’ नामक दल का गठन किया है। मार्च 2004 में मुस्लिम महिलाओं का रक्षा दल बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली मुनीरा बेगम के मुताबिक आतंकवादी हमें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। वे हमें खाने-ठहरने की सुविधा देने के लिए मजबूर करते हैं। जब महिलाओं ने विरोध किया तो उनके साथ बलात्कार हुआ या उन्हें बदनाम किया गया उनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई। इसका एक ही तरीका था कि हम यह सीख लें कि बंदूकों और हथगोलों से अपनी रक्षा कैसे की जाए।’’ हर महीने ये महिलाएं सेना के पास के शिविर में हथियारों की संभाल रखने और शूटिंग का प्रशिक्षण लेने के लिए जाती हैं। नब्बे के दशक में उत्तरांचल से निकला महिलाओं का शराब विरोधी आंदोलन अब झारखंड से लेकर मध्य प्रदेश तक पहुंच चुका है। झारखंड के पेसरा बड़ीयारी गांव में कुछ समय पहले तक उतने घर नहीं थे जितनी शराब की दुकानें। यहां भी महिलाएं अपने आदमियों की नशाखोरी की आदत और इसके कारण बर्बाद होते घरों को लेकर अरसे से परेशान थीं। आज गांव में एक भी ऐसी दुकान नहीं है। यहां की दलित महिलाओं ने शराबखोरी के खिलाफ प्रदर्शन और दुकानों की तोड़फोड़ कर पुरुषों को धमकाने का काम किया। झारखंड के गिरिडीह जिले के नौ गांवों में यही कहानी दुहराई गई है। गांव से हटकर मध्य प्रदेश की शहरी इलकों में भी महिलाओं ने शराब की सैकड़ों दुकानों को बंद करने का काम किया। खासकर आदिवासी इलाकों में यह आंदोलन और भी जोर पकड़ता जा रहा है। कुछ समय पहले उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं ने शराब बनाने और बेचने पर रोक की मांग करते हुए आंदोलन किया था। आंध्र प्रदेश में औरतों ने शराबबंदी की मांग को लेकर लाखों लीटर अर्क नष्ट कर दिया था। हरियाणा के मोहम्मदपुरा माजरा गांव में उन्होंने आंदोलन चलाते हुए यह धमकी दी थी कि अगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर ठेके नहीं हटाए गए तो वे शराबियों को पीटेंगी। विदेशी हुकूमतों से भले ही आजादी मिल गई हो लेकिन आतंकवाद और समाज में पनप रही विभेदकारी ताकतों के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई अभी भी जारी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;यह लेख अमर उजाला में मार्च 2007 में प्रकाशित हुआ है &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-6876366875330205406?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/6876366875330205406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=6876366875330205406' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6876366875330205406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6876366875330205406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html' title='जंग अभी भी जारी है'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-2110915359580180448</id><published>2009-12-07T04:51:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T05:03:18.515-08:00</updated><title type='text'>बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार की खातिर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;अन्नू आनंद&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पिछले दिनों महिला बाल विकास मंत्रालय ने कुपोषण पर काबू पाने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया। इसके लिए मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों को स्वस्थ बनाने के लिए शुरू की गई योजनाओं का प्रचार किया गया। महिला बाल विकास मंत्री ने कुपोषण पर काबू पाने के लिए किशोरियों के लिए राजीव गांधी ‘सबला’ योजना और इंंिदरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना शुरू करने भी घोषणा की। इस मौके पर लंबे अरसे से बच्चों को उचित पोषण प्रदान करने के लिए चल रही एकीकृत बाल विकास योजना सप्ताह भी मनाया गया। इन आयोजनों के मात्र एक सप्ताह के बाद यूनीसेफ ने विश्व के बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट में बताया कि भारत में प्रतिदिन पांच साल से कम आयु के पांच हजार बच्चे मर रहे हैं। यह शर्मनाक आंकड़ा चैंक्काने के साथ बच्चों के प्रति सरकार की नीतियों की पोल खोलता है। एक दिन मे पांच हजार बच्चों की मौत महज सोचने का ही नहीं गहन समीक्षा का विषय है। हमारे देश में बच्चों के पोषण से जुड़ी सबसे बड़ी योजना एकीकृत बाल विकास सेवाएं 1975 से चल रही हैं। पिछले 34 सालों में कई बार इस योजना का विस्तार कर उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की नीतियां बनी। लेकिन आज भी लक्षित लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। योजना का मुख्य फोकस अनुसुचित जाति और जनजाति होने के बावजूद अभी भी कुपोषण के कारण मरने वाले दलित और आदिवासी बच्चों की संख्या अधिक है। कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने योजना के बजट में चार गुणा बढ़ोतरी की थी। लेकिन फिर भी स्थिति यह है कि अभी भी विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में है। 6500 करोड़ से भी अधिक का बजट, लंबी अवधि तथा कईं संशोधनों के बावजूद यदि एकीकृत बाल विकास सेवाएं जरूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंच रही तो सुराख इन सेवाओं के अमलीकरण में है।। योजना के तहत देश के सभी जरूरतमंद बच्चों तक पोषित भोजन पहुंचाने के लिए चार लाख के करीब आगनवाड़ियां बनाई गई हैं। लेकिन दूरदराज के गांवों में कई आंगनवाड़ियंा ऐसी जगह स्थित हैं जहां नवजात शिशुओं या गर्भवती माओं के लिए पहुंचना संभव नहीं। अधिकतर आंगनवाड़ियो में कार्यकर्ताओं की भारी कमी है। मिनी आंगनवाड़ी में एक और बड़ी में दो कार्यकर्ताओं को रखने का प्रावधान है। इस लेखिका ने पिछले साल राजस्थान, छतीसगढ़,झारख्ंाड के दूरदराज के इलाकों में स्थित कईं आंगनवाड़ियों के दौरे में पाया कि कार्यकर्ताओं की कमी के चलते बहुत से जरूरतमंद बच्चों को पोषित भोजन नहीं मिल पा रहा। थ्जन आंगनवाड़ियों में कार्यकर्ता मौजूद हैं वहां भी उनके पास महिलाओं को फोलिक एसिड, नवजात शिशुओं को विटामिन और पोषित आहार देने के अलावा मिड डे मील में सहायता करने और अन्य सरकारी कामों को बोझ इतना अधिक है कि वे चाह कर भी लक्षित बच्चों तक नहीं पहुंच पातीं। लेकिन जमीनी हकीकत से अनजान मंत्री महोदया ने बालदिवस पर जिन दो नई योजनाओ की घोषणा की उसको लागू करने का काम भी आंगनवाड़ियों को ही सौंपा है। यही नहीं पिछले दिनों उन्होंने राज्य सरकारों को आंगनवाड़ियों मंे गर्म खाना और एक से अधिक बार खाना देने की हिदायत भी दी है। पहले से ही विभिन्न सरकारी मंत्रालयों की योजनाओं को पूरा करने के कामों में जुटे कार्यकर्ताओं पर और योजनाओं का बोझ लादना क्या उचित है? मंत्री महोदया का तर्क है कि हाल ही में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताआंे के मेहनताने में बढ़ोतरी की गई है ताकि वे बच्चों के प्रति अधिक समर्पित भाव से कार्य कर सकें। लेकिन वेतन की बढ़ोतरी क्या उनके बहुउद्देश्यीय कार्य बोझ को कम कर पाएगा ताकि वे लक्षित बच्चे तक पहुंचने के लिए अधिक समय निकाल सकें। कार्यकर्ताओं की कमी, आंगनवाड़ियों की जर्जर स्थिति और सेवाओं को लागू करने की बुनियादी जरूरतों की तरफ ध्यान देना नई योजनाएं लागू करने से भी अधिक अहम है। कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य को सुधारने में वांछित परिणामों को हासिल करने के लिए एकीकृत बाल विकास जैसी पुरानी योजना के गहन मूल्यांकन के अलावा सोशल आॅडिट करा यह जानना अधिक जरूरी है कि खामियां कहां है। इस आॅडिट से सरकार को जमीनी स्तर पर अमलीकरण के कई नए सबक मिलेंगे। केवल योजनाओं का उत्सव मनाकर बच्चों का स्वास्थ्य नहीं सुधारा जा सकता। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;(यह लेख 4 दिसंबर 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है) &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-2110915359580180448?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/2110915359580180448/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=2110915359580180448' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2110915359580180448'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/2110915359580180448'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार की खातिर'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-7665388738635047981</id><published>2009-11-29T22:27:00.000-08:00</published><updated>2009-11-29T22:35:21.932-08:00</updated><title type='text'>स्त्री का अस्तित्व</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;  इन दिनों  स्त्री&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; विमर्श की बहसों में स्त्री के यौन अधिकार पर चर्चाओं ने बेहद जोर पकड़ लिया है। इन बहसों में अक्सर जब मध्यम वर्ग की महिलाओं के अधिकारों की बात होती हैं तो अधिकतर बहसें भू्रण हत्याओं, महिला हिंसा पर थोड़ा ज्ञान बखारने के बाद स्त्री के यौन अधिकारो की ओर मुड़ जाती हंै। इन दिनों यह रिवायत कुछ अधिक ही दिखाई पड़ रही है। (शायद टीआरपी के खेल के चलते)। स्त्री केे यौन अधिकार एक बड़ा मसला है इससे इंकार नहीं लेकिन जिस समाज में वह पुरूष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व ढूंढती हो, अपने नाम से अधिक ‘मिसेज फलां’ कहलाने में गर्व महसूस करती हो, जो अपने हर छोटे बड़े फैसले के लिए पति पर निर्भर हो और अपनी इच्छाओं अपने वजूद को भुलाकर जीने के आदी हो चुकी हो उनसे से उम्मीद करना कि वे पति के साथ दैहिक संबंधों में अपने सुख, अपनी इच्छा- अनिच्छा को तरजीह दे कितना उचित है? स्त्री अधिकार के हिमायतियों की नई पौध में स्त्री के पारिवारिक और घरेलु अधिकारों की बजाय यौन अधिकारों के प्रति चिंता अधिक है। इस में कोई संदेह नहीं कि स्त्री मंे किसी भी परिस्थिति, वातावरण में स्वयं को ढालने की क्षमता गजब की है। अपनी इस कला में वह इस कदर माहिर है कि इसके लिए वह स्वयं को पूरी तरह भुला देती हैं। खासकर शादी के बाद वह जिस प्रकार अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को भूलकर एक नया अवतार धारण करती है उससे मुझे बेहद झल्लाहट होती है। अपनी इस अदाकारी के लिए वह प्रशंसा की पात्र हो या नहीं इस पर मेरी सोच अलग हो सकती है। लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैं हर दूसरी स्त्री में अपना वजूद मिटाकर भी खमोश, संतुष्ट और सहज रहने वाली ‘कलाकार स्त्री’ के दर्शन करती हूं। इसलिए मेरा संताप बढ़ता ही जा रहा है। कुछ समय पहले मुझे अपनी बेहद पुरानी सहेली से मिलने का अवसर मिला। मेरे लिए उससे मिलना किसी उत्सव से कम नहीं था। इस सहेली से मैंने अपने स्कूल और कालेज के दिनों में बहुत कुछ सीखा था। शलिनी, उसके नाम से ही मैं स्कूल के दिनों में रोमांचित हो जाती थी। पढ़ाई में तो वह हमेशा अव्वल आती ही थी। अन्य पढ़ने लिखने के कामों मे भी उसका दिमाग खूब चलता था। उससे प्रतिस्पर्धा के चलते अक्सर मेरी उत्सुकता रहती कि कोई किताब ऐसी न रह जाए जिसे पढ़ने में वह मेरे से आगे निकल जाए। नईं चीजांे को जानने समझने की उसे हमेशा उत्सुकता रहती। हर विषय में उसकी महारत मेरी हर चुनौती की प्रेरणा बनती। उसकी प्रतिभा, वाक-शैली और विचारों के कईं ट्राफीनुमा साक्ष्य, सालों तक स्कूल और कालेज में प्रिसींपल के आफिस की शोभा बढ़ाते रहे। उसे जब पता चला कि मैं शहर में हूं तो वह मिलने आई फिर हम दोनों मिलकर उसके घर गए। मैं उससे 13 सालों में शादी के बाद पहली बार मिल रही थी। बातचीत का सिलसिला लंबा चला। बातचीत में ‘‘ये कहते हैं,’’ ‘‘इन्होंने बताया’’, ‘‘इन्हीं को पता है’’, जैसे वाक्यों की गिनती घड़ी की आगे बढ़ती सुइयों के साथ बढ़ती जा रही थी। उसकी बातों का केंद्र पति, बच्चे और ‘‘हमारे यहां तो ऐसा होता है’’ जैसे विषयों पर ही रहा। चलने का समय हो गया था। शालिनी को अपने घर परिवार में खुश और संतुष्ट देखकर मुझे संतोष हुआ। लेकिन मेरे मन में उस की दबी बैठी पुरानी छवि कुछ और जानने के लिए उत्सुक थी इसलिए पूछ बैठी, ‘‘अरे भई तुम्हारी किताबों का कलेक्शन तो बहुत बढ़ गया होगा क्या वह नहीं दिखाएगी। इतने सालों में तो तुमने ढेरों बुक्स जमा कर ली हांेगी। उसने हैरत से मुझे देखते हुए पूछा, ‘‘कौन सी किताबें भई? मैंनें तो कभी कोई किताब नहीं पढ़ी। ‘‘अरे, तुम्हें याद नहीं स्कूल और कालेज में तो तू कोई भी किताब आते ही पढ़ लेती थी। दरअसल किताबें पढ़ने की आदत तो मुझे तुमसे ही पड़ी।’’ उसने जैसे कुछ याद करते हुए जबाब दिया, ‘‘अरे तब। वह तो और बात थी तब तो स्कूल -कालेज के दिन थे। मैनें तो अरसे से किसी किताब को हाथ भी नहीं लगाया।’’ वास्तव में उसके करीने से सजे सजाए पूरे घर में न तो कोई किताबों की अलमारी नजर आई और न ही कोई शेल्फ। घर लौटते हुए मैं सिदंूर से सजी मांग, हाथों में चूड़ियां और मुंह में ‘इन्होंने कहा’ की रंटत वाली शालिनी में कभी स्कूल-कालेज के विभिन्न आयोजनों पर दहेज, विधवा विवाह, स्त्री अधिकार पर अपने वक्तव्यों से कईं प्रतियोगियों के छक्के छुड़ाने वाली शालिनी की छवि ढूंढ रही थी। शालिनी को मिलने के बाद कईं दिन तक मुझे यह बात कचोटती रही कि क्या शालिनी को इस बात का अहसास है कि अपने घर परिवार की सेवा में वह अपनी वास्तविक अस्तित्व को होम कर चुकी है। शायद नहीं या फिर वह जानना नहीं चाहती। मीनू से मेरी पहली मुलाकात उससे उस समय हुई जब वह हमारे पड़ोस में अपने दो साल के बच्चे और पति के साथ रहने के लिए आई। मीनू का सारा दिन पति और बच्चे के इर्द-गिर्द उनकी इच्छाओं को पूरा करने में बीतता। कहीं घूमने जाना हो, बच्चों को कहीं घूमने लेजाना हो या मिलकर खाना खाने से लेकर बच्चों को कौन से स्कूल में डालें हर एक बात का उसके पास संक्षिप्त सा उतर होता ‘इनससे पूछकर बताऊंगी’। उसे साड़ी पहनना बहुत पसंद है। हमें भी वह साड़ी में बेहद अच्छी लगती लेकिन जब भी हम कहते तुम साड़ी क्यों नहीं पहनती तो उसका जवाब होता ‘इन्हे’ं मेरा सूट पहनना पसंद है। एक बार बातों बातों में उसने बताया कि जानती हो कभी कभी तो मेरा मन चाहता है कि मुझे पंख लग जाएं और मैं जी भरकर आकाश में उडं़ू। ऐसे ही एकबार जब मैं उसके घर में बैठी थी और वह घर की सफाई कर रही थी तो मेरी नजर एक फाइल पर पड़ी जिस पर लिखा था। डा।ममता त्रिवेदी। मैंने पूछ लिया यह डा. ममता त्रिवेदी कौन है? उसने बताया अरे मेरा ही नाम ममता है और मेैं संस्कृत में पीएचडी हूं इसलिए मैं डा.ममता त्रिवेदी हुई। उसी बातचीत में उसने बताया कि अव्वल दर्जे में पीएचडी करने के बाद उसे कालेज में पढ़ाने की नौकरी मिल रही थी। उसे लेक्चरर बनना बेहद पसंद भी है। लेकिन उसका कहना था बच्चे के साथ यह संभव कैसे होता। मैंने उससे समझाते हुए सवाल किया कि मेरी बेटी भी तो तुम्हारे बेटे जितनी है और हमारी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी समान है, मैं भी तो नौकरी कर रही हूं। उसका जवाब था, ‘‘लेकिन ‘इन्हे’ं पसंद नहीं। इसलिए मैंने काम करने का विचार त्याग दिया। मेरी डिग्री भी बेकार गई पर क्या करूं। आखिर पति के ‘अगेंस्ट’ भी तो नहीं जाया जा सकता।’’ स्त्री पुरूष में विषमता की जड़े तो मुझे इस पढ़े लिखे वर्ग में भी कम होते दिखाई नहीं पड़ती। चुटकी से सिंदूर और मंगलसूत्र में लिपटी वह अपने को एक सधे सधाए खांचे में देखने और उस पर खरी उतरने में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है। ऐसी महिलाओं का प्रतिशत कितना होगा जिनके नाम का बैंक में अपना या ज्वांइट एकाउंट होगा? कितनी प्रतिशत परिवारों में घर पति और पत्नी दोनों के नाम पर होता है? कितनी प्रतिशत महिलाएं बिना पति की आज्ञा के बैंक से पैसा निकाल पाती हैं? कुछ अपवादों को छोड़ दें तो मध्यम वर्ग की हर स्त्री अपने सामान्य परिवारिक अधिकारों को ही नहीं जानती। लेकिन इस सोच को हम चुनौती बहुत कम देते हैं। स्त्री को यौन सुख के अधिकार का पाठ पढ़ाने वालों के लिए जरूरी है कि वे पहले उसे अपने अस्तित्व को पहचानने की सीख दें। जब वह घरेलु हकों के साथ परिवार के आर्थिक- सामाजिक तथा अन्य छोटे बडे मसलों में फैसले लेने की हकदार बन जाएगी तो शारीरिक संबंधों में अपने सुख को तलाशने की परिपक्वता भी हासिल कर लेगी। (यह लेख 27 नवंबर को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ है।) &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-7665388738635047981?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/7665388738635047981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=7665388738635047981' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7665388738635047981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/7665388738635047981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/11/blog-post_29.html' title='स्त्री का अस्तित्व'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-5684025910254013592</id><published>2009-11-14T00:58:00.000-08:00</published><updated>2009-11-14T01:13:49.132-08:00</updated><title type='text'>दलितों की थाली अलग क्यों ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Sv5zC04DG8I/AAAAAAAAAHE/KsJWXniGrSE/s1600-h/IMG_0816.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403883095281834946" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Sv5zC04DG8I/AAAAAAAAAHE/KsJWXniGrSE/s320/IMG_0816.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों राहुल गांधी का दलित प्रेम उमड़ा तो उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई गांवों का दौरा कर दलितों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं को सुना और समझा। यही नहीं उन्होंने गरीब और दलितों के घर रात बिताने के बाद अपनी पार्टी के नेताओं को भी यही समानता का पाठ पढ़ाने की कोशिश की। उनकी हिदायत को मानते हुए गांधी जयंती पर सत्तारूढ़ पार्टी के कई मंत्री, सांसद, विधायक और क्षेत्रीय नेताओं ने भी अपने क्षेत्र के दलित बाहुल्य गांवो में जाकर दलितों के साथ चैपाल लगाई। उनके साथ अपनी थाली लगाकर ऐसा स्वांग रचा मानो उन्होंने ‘समानता’ की गंगा में डुबकी लगा ली हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर राहुल गांधी सहित इन मंत्री और नेताओं ने गावों में जाकर यह टोकन दलित-प्रेम दिखाने की बजाय गरीबों और दलितों के लिए चालू की गई सरकारी योजनाओं को चलाने वाले मुलाजिमांे के साथ बैठक कर उन्हें समानता की सीख दी होती तो देश के लाखों बच्चे स्कूलों में चल रही मिड डे मील योजना में अपनी अलग थाली लगाने की जिल्लत से बच जाते। संभव है कि सरकार की यह सीख मिड डे मील से वचिंत रहने वाले दलित बच्चों को बिना अपमान सहे एक समय का भोजन उपलब्ध कराने में सहायक साबित होती। अक्सर राजनेता चुनावी स्वार्थ को पूरा करने के लिए गरीबों और दलितों के प्रति ऐसी प्रतीकात्मक उदारता दिखाते हैं लेकिन जमीनी सचाई बेहद ही अलग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ सरकार भोजन का अधिकार विधेयक लाने की तैयारी कर रही है और दूसरी और देश में भोजन की सुरक्षा से जुड़ी दो सबसे बड़ी योजनाओं मिड डे मील और जन वितरण प्रणाली(पीडीएस) का लाभ देश के लाखों दलितों को नहीं मिल पा रहा। इसका मुख्य कारण इन योजनाओं में जात के आधार पर बहिष्कार और भेदभाव का नजरिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के पांच राज्यों के 531 गांवांे में मिड डे मील पर की गई सर्वे में पाया गया है कि अधिकतर सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के साथ बहिष्करण और भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है। दलित बच्चों को अन्य बच्चों से अलग बिठाकर भोजन परोसने, उन्हें भोजन देने से इंकार करने और उन्हें सबसे अंत में भोजन परोसने की घटनाएं आम देखने को मिली। इसके अलावा कई स्कूलों में दलित बच्चों को भोजन पहले परोसने की मांग पर सजा देने और उन्हें अन्य बच्चों से अलग हटकर घटिया और कम मात्रा में भोजन देने जैसी घटनाएं भी इन मंे शामिल हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश मंे इंडियन इस्टीटयूट आॅफ दलित स्टडीज की सर्वे के मुताबिक हर तीन में से एक से अधिक स्कूल के मिड डे मील में और तीन में से एक राशन की दुकान पर दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है। यह भेदभाव दलितों के भोजन के अधिकार में सबसे बड़ी बाधा है जिसे दूर किए बिना भोजन के अधिकार विधेयक को लागू करने का मकसद पूरा नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकतर गावों में किसी दलित व्यक्ति को भोजन बनाने के लिए नियुक्त करने के प्रति सबसे अधिक विरोध देखा गया। सर्वे के मुताबिक राजस्थान में केवल 8 फीसदी गावों में स्कूलों में दिया जाने वाला भोजन दलित व्यक्ति द्वारा बनाया जा रहा है। 88 फीसदी में उच्च जात के लोग ही खाना बनाने के काम में लगे हैं। इस प्रदेश में एक भी दलित आर्गेनाइजर यानी मिड डे मील का संचालक नहीं है। तमिलनाडू में 65 और आंध्र प्रदेश में 47 फीसदी गैर दलितों को खाना बनाने का काम सौंपा गया है। दलितों को खाना पकाने का काम न देने के पीछे दलील यह दी जाती है कि दलितों के खाना बनाने से दूसरे जात के लोग खाना नहीं खाएंगे और इससे जातिगत तनाव बढ़ेगा।&lt;br /&gt;जिन स्कूलों में पहले दलित महिला या पुरूष खाना पकाने के काम में लगे थे वहां उच्च जात के लोगों ने स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए अपने बच्चों को स्कूल में भेजना बंद कर दिया। आखिर प्रशासन ने वहां भी गैर दलितों को ही खाना पकाने के काम में लगा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश और बिहार में देश के एक तिहाई दलित निवास करते हैं लेकिन इन राज्यों में स्कूलों में पका हुआ खाने की बजाय सूखा राशन माह में एक बार दिया जाता है लेकिन यहां भी भ्रष्टाचार और जात आधारित भेदभाव से ही राशन का वितरण होता है। ऐसेे भी उदाहरण देखने को मिले जहां दलित बच्चों को सूखा राशन भी नसीब नहीं होता। इन राज्यों में सूखा राशन स्कूलों में देने की बजाय 37 फीसदी राशन विक्रेता के घर या दुकान से दिया जाता है। जिन स्कूलों में यह योजना चल रही है वे अधिकतर उच्च जाति के कालोनियों मे स्थित है। उत्तर प्रदेश में मिड डे मील का 85 प्रतिशत सूखा राशन उच्च जात की कालोनियों में स्थित दुकानों या घरों से दिया जाता है।&lt;br /&gt;राजस्थान में 12 फीसदी और तमिलनाडू में 19 फीसदी स्कूल हीं ऐसे हैं जो दलित कालोनियों में स्थित हैं। किसी भी राष्ट्र के लिए इस से शर्म की बात क्या हो सकती है कि देश की जनसंख्या का पांचवा हिस्सा होते हुए भी दलितों के साथ आज भी करीब सभी राज्यों में उच्च जात के लोगों द्वारा छूआछात का बर्ताव किया जाता है। गांव के कुंए से पानी भरन,े मंदिर में प्रवेश करने या यहां तक की दलित का कोई जानवर भी अगर उनके खेत या घर में गलती से चला जाए तो पूरे गांव में बवाल मच जाता है। ऐसे में उच्च जात की कालोनियों से चलाई जा रही इस मिड डे मील तक दलित बच्चों की पहुंच कितनी संभव है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;सर्वे किए गए सभी गावों में औसतन 37 प्रतिशत गावों में जातिगत भेदभाव जैसे दलित बच्चों को अलग बिठाना उनकी थाली अलग परोसना, बाद मे खाना देना या आठ गावों में घटिया खाना और कम मात्रा में खाना देने के उदाहरण भी देखे गए। भोजन के अधिकार के मद्देनजर कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया था कि केंद्र सरकार को भोजन से संबंधित कोई भी योजना शुरू करते समय उसके अमलीकरण में जात आधारित भेदभाव और बहिष्करण को रोकने के प्रावधानों को शामिल करना होगा। जन वितरण प्रणाली यानी सरकारी राशन की दुकानों में भी दलितों के साथ भेदभाव का यही सिलसिला जारी है। हांलाकि इस योजना को शुरू हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है लेकिन अभी भी सर्वे किए गए सभी गावों में इन दुकानो पर राशन का वितरण जात को देख कर किया जाता है। सभी राज्यों में पाया गया कि 40 प्रतिशत दलितों को पूरी लागत देने के बाद भी राशन कम मात्रा में दिया जाता है। बिहार में 66 फीसदी दलितों से राशन के वास्तविक मोल से अधिक लागत वसूली जाती है। यही नहीं यह राशन विक्रेता की अपनी जात पर भी निर्भर करता है कि वे किन लोगों को राष्श्न देने में प्राथमिकता दे। बिहार में सब से अधिक 86 प्रतिशत मामालों में राशन विक्रेता के द्वारा अपनी जात के लोगों को राशन वितरण करने में प्राथमिकता देने के मामले देखे गए।&lt;br /&gt;सरकार के इन दो बड़े कार्यक्रमों में दलितों के साथ होने वाले भेदभावों का ही नतीजा है कि आज भी अन्य बच्चों के मुकाबले में दलित बच्चों की मृत्यु दर का आंकड़ा अधिक है। भोजन के अधिकार का मकसद हासिल करना है तो सबसे पहले गरीबों और दलितों के लिए बनी इन योजनाओं से छूआअूत के कीेड़े को खत्म करना होगा और यह तभी संभव है जब दलित भी इन योजनाओं के अमलीकरण में हिस्सेदार और भागीदार दोनों बनंेगे। वरना भोजन के अधिकार को लागू करने का मकसद कभी हासिल नहीं होगा।&lt;br /&gt;यह लेख दैनिक भास्कर में १३ नवम्बर २००९ को प्रकाशित हुआ है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-5684025910254013592?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/5684025910254013592/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=5684025910254013592' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5684025910254013592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5684025910254013592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='दलितों की थाली अलग क्यों ?'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/Sv5zC04DG8I/AAAAAAAAAHE/KsJWXniGrSE/s72-c/IMG_0816.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-1538128623905514808</id><published>2009-10-27T01:41:00.000-07:00</published><updated>2009-10-27T01:49:08.996-07:00</updated><title type='text'>ताकि महिलाओं का सफर हो  सुरक्षित</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt; आखिर&lt;/span&gt; कामकाजी महिलाओं को घर और दफ्तर की जद्दोजहद से थोड़ी राहत मिली। बड़े शहरों और उसके आसपास के क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती ट्रेन या बस में यात्रा करने की होती है। इन भीड़ भरी बसों में किसी भी महिला के लिए सफर करना किसी यातना से कम नहीं होता। लेकिन हाल ही में रेल मंत्रालय ने दिल्ली सहित चार बड़े शहरों मुंबई, कोलकाता और चेन्नई से आठ ‘लेडिज स्पेशल’ ट्रेनों की शुरूआत कर महिलाओं की लंबे समय से चली आ रही सुखद और सुरक्षित यात्रा की मांग को कुछ हद तक पूरा करने का काम किया है। अगस्त माह से शुरू होने वाली इन रेलगाड़ियों का मकसद इन महानगरों में काम करने वाली महिलाओं की यात्रा को सरल और सुरक्षित कर महिलाओं के प्रति निरंतर बढ़ते अपराधों को कम करना है। राजधानी दिल्ली के लिए हरियाणा के पलवल शहर से ऐसी ही एक ट्रेन सुबह चलाई गई है जो शाम को वापस पलवल जाती है। पीले और नीले चटख रंग की इन ट्रेनों का अधिकतर इस्तेमाल इन शहरांे के आसपास बसे छोटे शहरों से महानगरों के कालेजों में पढ़ने वाली लड़कियों और दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। इन ट्रेनों में महिलाओं के बैठने के लिए गद्दे वाली सीट के साथ बेहतर बिजली के पंखे और साफ सफाई का खास ख्याल रखा गया है। दस रूपए की टिकट में भीड़भाड़ और धक्कामुक्की से हटकर सीट पर बैठकर गंतव्य तक पहुंचाने वाली ये ट्रेने महिलाओं में काफी लोकप्रिय हो रही हैं। इसके अलावा इन ट्रेनों में महिला टिकट क्लेक्टर और महिला सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी इन्हें पूरी तरह ‘लेडिज-फेंड्रली’ बनाती है। देश के विभिन्न शहरों में काम करने वाली महिलाओं को घर से निकलते ही सबसे बड़ी चिंता सही-सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचने की होती है। इसके लिए उपलब्ध रेल या बस जैसे सार्वजनिक परिवहनों में पुरूषों की भीड़ से जूझते हुए उसमें सफर करना किसी महिला के लिए कोई आसान काम नहीं। हांलाकि पिछले कुछ समय में भीड़ को कम करने के लिए ट्रेनों की संख्या काफी बढ़ाई गई है लेकिन इसके बावजूद अधिकतर कामकाजी महिलाओं को महज टेªन में चढ़ने के लिए मर्दों के साथ धक्कामुक्की का सामना करना पड़ता है। सीट मिलना तो दूर की बात है, महज इन टेªेनों में खड़े होने के लिए जगह बनाने के लिए भी उसे कम मशक्कत नहीं करने पड़ती। खड़े होने की जगह मिल गई तो फिर मर्दो की घूरती निगाहों से बचना, जानबूझकर छूने की कोशिशों को नाकाम करना और उन की गंदी टिप्पणियों को अनसुना करने की कोशिशें भी काफी तकलीफदायक होती हैं। अधिकतर महिलाओं को शिकायत रहती है कि घर और दफ्तर के कार्यों से कहीं अधिक थकाऊ इन टेªनों का सफर होता है। कभी बैठने की सीट मिल भी गई तो अपराधी तत्वों द्वारा पर्स छीनने या फिर छेड़खानी की आशंका हमेशा बनी रहती है। इन समस्याओं पर काबू पाने के मकसद से हांलाकि सामान्य ट्रेनों में एक या दो महिला कोच महिलाओं के लिए आरक्षित रखे जाते हैं। लेकिन आर्थिक सबलता के लिए घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं की बढ़ती तादाद के लिए ये एक या दो कोच कभी भी पर्याप्त साबित नहीं हुए। इसके अलावा इन गाड़ियों में यात्रा करने वाली महिलाओं का मानना है कि महिला कोच भी अक्सर पुरूषों से भरे रहते हैं क्योंकि महिला कोचों में बैठने वाले पुरूषों का अक्सर तर्क रहता है कि जब महिलाएं परूषों के डिब्बों में यात्रा कर सकतीं हैं तो फिर पुरूष महिलाओं के कंपार्टमेंट में क्यों नहीं। ट्रेनों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती छेड़खानी की घटनाओं को देखते हुए वर्ष 1992 में सबसे पहले मुंबई में दो ‘लेडिज स्पेशल’ टेªेनों की शुरूआत की गई थी लेकिन ये दो टेªेने यहां की कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या के लिए पर्याप्त नहीं थीं। इसके बाद भारी मांग के बावजूद भी यहां पिछले सत्रह सालों में ऐसी रेलगाड़ियों की गिनती में अभी तक बढोत्तरी नहीं हो पाई थी। अन्य बढ़े शहरों में इस मांग के बावजूद महिला आरक्षण विरोधी रहे लालू प्रसाद जी को ‘लेडिज़ स्पेशल’ का सुझाव कभी नहीं सुहाया । लेकिन ममता बनर्जी ने जब रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला तो उन्होंने अपने पहले रेल बजट में महिलाओं के लिए आठ स्पेशल ट्रेने चलाने का ऐलान किया। भले ही सरकार के इस प्रयास से बहुत सी कामकाजी महिलाओं को राहत पहुंची हो लेकिन केवल ‘स्पेशल रेलगाडियां’ हर महिला को आरामदायक और चिंतामुक्त सफर करने का अधिकार प्रदान नहीं करता। महिला हकों की पक्षधर बहुत सी महिलाओं का यह भी मानना है कि महिलाओं के लिए सुरक्षा की व्यवस्था केवल लेडिज स्पेशल में ही नही ंबल्कि हर टेªेन में होनी चाहिए। अपने पुरूष रिश्तेदारों के साथ सामान्य रेलगाड़ियों में यात्रा करने वाली महिलाओं को भी सुखद और आरामदायक यात्रा करने का पूरा अधिकार है। यह सही है कि पिछले एक दशक में महिलाओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित ट्रांसपोर्ट प्रदान करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों में कई स्पेशल बसों और ट्रेनों को शुरू किया गया है। मैक्सिको में असुरक्षित परिवहन प्रणाली को रोकने के लिए वर्ष 2008 में ‘केवल महिला बसों’ की शुरूआत की गई थी। लेकिन अब इसे आगे बढ़ाते हुए वहां अनुचित छूने को अवैध मानने के अभियान के साथ वहां की सरकार एक ऐसा अध्यादेश लाने का प्रयास कर रही है जिससे महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर तंग करने वालों को सजा दी जा सके। भारत में भी महिलाओं को घर से बाहर रेल बस या कार्यालय में अपराध मुक्त सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए ऐसे कई प्रयासों की जरूरत है। शुरूआत उनकी सुखद यात्रा से ही सही। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;(यह लेख 21 अक्तूबर को अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-1538128623905514808?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/1538128623905514808/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=1538128623905514808' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1538128623905514808'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/1538128623905514808'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/10/blog-post_27.html' title='ताकि महिलाओं का सफर हो  सुरक्षित'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6455832930514216538</id><published>2009-10-23T01:55:00.000-07:00</published><updated>2009-10-23T02:02:50.294-07:00</updated><title type='text'>विश्वास नहीं होता इन आंकडों पर</title><content type='html'>&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;अन्नू&lt;/span&gt; आनंद &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिल्ली सरकार का दावा है कि दिल्ली में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई है। सरकार के मुताबिक दिल्ली में लड़कियों के अनुपात का आंकड़ा 1004 यानी 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या 1004 हो गई है। जबकि वर्ष 2007 में यह संख्या 848 थी। महज एक साल के भीतर आंकडों में आए इस ‘चमत्कारी’ बदलाव को भुनाने की सरकार पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए दिल्ली सरकार के विभिन्न मंत्री अपनी पीठ थपथपाते हुए इसका श्रेय सरकार द्वारा शुरू की गई बहुप्रचारित ‘लाडली’ योजना को दे रहे हैं। लड़कियों के स्तर में सुधार लाने के लिए मार्च 2008 में सरकार ने लाडली योजना शुरू की थी। योजना के मुताबिक एक लाख रूपए तक की वार्षिक आमदन वाले परिवारों को जनवरी 2008 के बाद पैदा होने वाली लड़कियों की शिक्षा में मदद के लिए सरकार 18 वर्ष तक की आयु तक एक लाख रूपए की आर्थिक मदद देगी। लेकिन महज एक साल के अंतराल में योजना शहर के लैंगिक अनुपात में ऐसा सकारात्मक बदलाव लाएगी इसकी कल्पना योजना निर्माताओं ने भी नहीं की होगी। दिल्ली सरकार के रजिस्ट्रार (जन्म और मृत्यु) की वार्षिक रिपोर्ट 2008 को जारी करते हुए वित और शहरी विकास मंत्री ने इस बात को बढा़ -चढ़ा कर प्रचारित किया कि लाड़ली योजना के चलते इस साल लड़कियों के रजिस्ट्रेशन में बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2007 में लड़कियों की गिनती 1।48 लाख थी जबकि साल 2008 में यह बढ़कर 1.67 लाख पहुंच गई है। दिल्ली में कुल रजिस्टर्ड जन्मों में 49.89 फीसदी लड़कों और 50.11 फीसदी लड़कियों की संख्या है। इन आंकडों जरिए यह बात साबित करने की कोशिश की जा रही है कि राजधानी में लड़कियों के गिरते अनुपात पर काबू पाने मे सरकार सफल हो गई है और एक साल के भीतर ही सरकार ने औसत आंकड़े 848 को बढा़ कर 1004 पर पहुंचा दिया है। लेकिन इन आंकड़ो के हवाले से यह साबित करना कि लड़कियों के अनुपात में बढ़ोतरी का कारण लड़कियों के प्रति बदली सोच या शहर में कन्या भू्रण हत्याओं में कमी है, बेहद भ्रामक है। इसके लिए इन आंकडों के पीछे की हकीकत को समझने की जरूरत है। लेकिन सरकार जानबूझकर इन तथ्यों से आखें मूंदकर आंकडों का राजनैतिक लाभ उठाने की फिराक में है। दरअसल योजना में लड़कियों के जन्म के पंजीकरण पर प्रोत्साहन का प्रावधान है इसलिए लड़कियों के पंजीकृत जन्मों में बढ़ोतरी स्वाभविक थी लेकिन लड़के के जन्म को रजिस्टर्ड कराने में ऐसे किसी आर्थिक प्रोत्साहन के अभाव में उनके रजिस्ट्रेशन में कमी होना भी स्वाभाविक है। इसके अलावा आर्थिक योजना का लाभ पाने के लिए कुछ जाली नामों के पंजीकरण से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इनमें बहुत से ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जो दिल्ली के आसपास के इलाकों में रहते हुए भी योजना का लाभ लेना चाह रहें हैं। रिपोर्ट में 1000 लड़कों पर संस्थागत लड़कियों के जन्मों की संख्या 915 बताई गई है लेकिन घरों में पैदा हुई लड़कियों की गिनती 1303 जो कि आश्चर्यजनक है। यूं भी दिल्ली में लडकियों के कम अनुपात का दोषी केवल गरीब तबका नहीं हैं दक्षिण-पश्चिमी जैसे संपन्न इलाके में लड़कियों का अनुपात 2001 की जनगणना के मुताबिक 845 है। संपन्न इलाकों के अधिकतर लोग लाडली योजना से बाहर हैं। ऐसे में समूचे शहर के अनुपात का यह आकडा़ संशय पैदा करता है। शहर में इस साल पैदा हुए लडकों की गिनती 1.66 लाख बताई गई है जबकि 2007 में यह 1.74 लाख थी। लड़को की संख्या में अचानक आई यह कमी भी कई सवाल खड़े करती है। लड़की को बोझ समझने की प्रवृति किन्ही आर्थिक खंाचों में बंधी हुई नहीं है जिसे सरकार के आर्थिक सहायता के प्रलोभन से खत्म किया जा सके। महज आंकडों के छलावे से यह भ्रम पालना कि लड़कियों के प्रति शहर की सोच बदल गई है गलत होगा। फिलहाल जरूरत बहुस्तरीय प्रयासों की है जिसमें सबसे अहम प्रयास लड़की के प्रति जंग खाई मानसिकता को बदलना है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;(यह लेख ८ अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकशित हुआ है )&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-6455832930514216538?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/6455832930514216538/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=6455832930514216538' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6455832930514216538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/6455832930514216538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='विश्वास नहीं होता इन आंकडों पर'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-4541283719214001710</id><published>2009-09-29T01:22:00.000-07:00</published><updated>2009-09-29T01:25:36.067-07:00</updated><title type='text'>स्वाइन फ्लू से अधिक खतरनाक है कुपोषण</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अन्नू आनंद &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;भारत में हर रोज तीन हजार से अधिक बच्चे मर रहे हैं। जानकर विश्वास नहीं होता। अगर साथ में यह जोड़ दिया जाए कि ये मौतें स्वाइन फ्लू या बर्ड फ्लू के कारण हो रही हैं तो मीडिया में हडकंप मच जाएगा। 24 घंटे के चैनल ब्रेंकिग न्यूज के साथ हर कोने से मसले को चीड- फाड़ कर उसके हर पहलू पर अपनी ‘सूक्ष्म दृष्टि’ डालने की होड़ में लग जाएंगे। सरकार भी बड़ी मुस्तैदी से आनन -फानन में अपने प्रशासनिक अमले की ‘काबिलियत’ को दर्शाने में लग जाएगी। उनकी यह मुस्तैदी शायद जायज भी लगे क्योंकि किसी भी बीमारी के पनपने से पहले ही उसके लिए सचेत होना बेहतर गर्वनेंस के लक्षण हैं। लेकिन स्वाइन फ्लू से भी अधिक मौतों का कारण बनने वाली बीमारियों को अनदेखा कर सरकार और मीडिया का यह ‘मुस्तैद दृष्टिकोण’ हैरत पैदा करता है। पिछले हफ्ते कुपोषण के कारण हर रोज करीब तीन हजार बच्चों की मौतों के खुलासे से न तो मीडिया की धड़कने तेज हुईं और न ही सरकार की ओर से इस भंयकर समस्या से निजात पाने के लिए तुरंत कोई गंभीर उपायों की घोषणा की गई। हांलाकि यह आंकडा प्रति दिन स्वाइन फ्लू से होने वाली मौतों से कहीं अधिक है। पिछले एक साल से देश में आंकड़ो के साथ कुपोषण की बढ़ती भयावहता के प्रति चेताने के कईं प्रयास किए जा चुके हैं। इस बार एक देशव्यापी अध्ययन के जरिए इस बात का खुलासा किया गया कि देश में कुपोषण की स्थिति गंभीर है और आर्थिक प्रगति के बावजूद विश्व के एक तिहाई अल्प पोषित बच्चांे की संख्या भारत में है और इस का मुख्य कारण प्रशासन यानी गवर्नेंस की विफलता बताया गया है। इंस्टीट्यूट आॅफ डेवलपमेंट स्टडीज यूके (आईडीएस) द्वारा किए गए इस अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि भारत में तीन साल की उमर के कम से कम 46 फीसदी बच्चे अभी भी कुपोषण के शिकार है। रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषण से निपटने की इस रफ्तार के चलते भारत सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य के तहत 2015 तक देश में भूखे लोगों की संख्या पचास फीसदी कम करने के अपने लक्ष्य में कामयाब नहीं हो सकेगा। यह लक्ष्य 2043 से पहले पूरा नहीं किया जा सकता। इससे पहले पिछले साल (वर्ष 2008) ग्रामीण भारत में खाध असुरक्षा की रिपोर्ट में भी भारत में सबसे अधिक 23 करोड़ लोगों को अल्प -पोषित बताया गया था। इस सर्वे ने 5 वर्ष से कम उमर के 47 फीसदी बच्चों को जोकि सब-सहारा अफ्रीका से भी अधिक बताकर सरकार को जल्द इस ओर ध्यान देने की हिदायत दी गई थी। रिपोर्ट में 80 फीसदी से अधिक बच्चे एनीमिया के शिकार पाए गए थे। इसी साल लांसेट की रिपोर्ट में भी विश्व में सबसे अधिक अल्प-पोषित बच्चों की संख्या भारत में बताई थी। लेकिन इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया। जबकि ये सभी तथ्य यह साबित करने के लिए काफी हैं कि पिछले पंद्रह सालों में देश में पोषण का स्तर बढ़ाने के लिए जो भी योजनाएं शुरू की गईं उनसे अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो रहे। देश का सब से बड़ा पोषण कार्यक्रम एकीकृत बाल विकास सेवाएं(आईसीडीएस) भी गुणवता में कमी के कारण और लक्षित समूहों तक न पहुंचने के कारण सफल साबित नहीं हो सका। इस योजना पर की गई सर्वे से पता चलता है कि सामाजिक असमानता के चलते बहुत से वंचित समूह जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों तक ये सेवाएं नहीं पहुंच रही क्योंकि अधिकतर आंगनवाड़ियां उच्च या दबंग जाति के क्षेत्रों में स्थित हैं। मिड-डे मील में भी स्कूलों में बच्चों के साथ भेदभाव की घटनाएं देखने को मिल रहीं हैं। बहुत से स्कूलों में दलित बच्चों को सबके खाने के बाद परोसने या उन्हें अलग से परोसने जैसे भेदभाव इन बच्चों तक पोषित भोजन पहुंचाने में असमर्थ हैं। सरकार ने पिछले साल इस सोजना का विस्तार करते हुए इसके बजट में चार गुणा बढ़ोतरी जरूर की है लेकिन असली जरूरत इन सेवाओं के संचालन और उसकी निगरानी में सुधार की है ताकि हर जरूरतमंद को इसका लाभ मिल सके। इसके लिए कार्यक्रम के प्रति जवाबदेही निर्धारण की गंभीरता को समझना होगा। आईडीएस ने भी अपनी रिपोर्ट में सरकार को पोषण योजनाओं के संचालन में अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया है। गरीब तबके के हर व्यक्ति को भोजन मिल सके और कुपोषण से छुटकारा मिले इसके लिए सरकार ने भोजन का अधिकार विधेयक लाने के घोषणा भी की है और इसके लिए प्रयास गंभीर प्रयास भी किए जा रहे हैं लेकिन मौजूदा स्थिति देखते हुए सरकार की यह नेकनीयत योजना सफल हो सकेगी इसको लेकर संदेह अवश्य पैदा होता है क्योंकि जिस सार्वजनिक प्रणाली (पीडीएस) के तहत गरीबों तक गेंहू या चावल पहुंचाने की योजना है वह भ्रष्टाचार अकुशलता और गरीबों के गलत आकलन के चलते जरूरतमंदों तक पहुंचने मेें कहां तक सफल साबित होगा इस पर ध्यान देनेा जरूरी है। परिवार की पात्रता का निर्धारण सही नहीं हो पाने के कारण पीडीएस का कार्यक्रम पहले ही अपने उदेदश्य को पूरा करने में समर्थ नहीं हो पा रहा। अगर सरकार को करोड़ो बच्चों की मौतांे के अभिषाप से बचना है तो देश में पोषण का एक ऐसा कारगर कार्यक्रम शुरू करना होगा जिसमें भोजन, स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं वाले सभी विभागों को एकसाथ मिलकर लक्षित समूहों तक पहुंचना होगा और इन विभागों के कार्यवाही पर सख्त निगरानी के साथ उनकी जवाबदेही का कड़ा प्रावधान बनाना होगा। इसके अलावा पोषण के स्तर का निरंतर संचालन होना चाहिए ताकि सामाजिक संस्थाएं और मीडिया सरकारों की जिम्मेदारी निर्धारित कर सके। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;(यह आलेख २२ सितम्बर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है )&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-4541283719214001710?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/4541283719214001710/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=4541283719214001710' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4541283719214001710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4541283719214001710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/09/blog-post_29.html' title='स्वाइन फ्लू से अधिक खतरनाक है कुपोषण'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-4322424536443333628</id><published>2009-09-12T23:44:00.000-07:00</published><updated>2009-09-13T00:23:40.906-07:00</updated><title type='text'>मैंने ऐसा कहां लिखा, प्रभाष जी ?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;पिछले सप्ताह प्रभाष जोशी जी के ‘कागद कारे’ कालम में अपने नाम का जिक्र देखकर आश्चर्य हुआ। पत्रकारिता में जाति धर्म की बहस के संदर्भ में लिखते हुए उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि है कि ‘‘कुछ साल बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम.......’’ मैं, वह एक अन्नू आनंद माननीय प्रभाष जी से जानना चाहती है कि उन्होंने मेरे किस आलेख में ऐसा लिखा पाया? मैंने अभी तक लिखे अपने किसी भी लेख में या विदुर पत्रिका की संपादक के नाते लिखे किसी भी संपादकीय में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जैसा कि यहां जिक्र किया गया है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;यह सही है कि मैंने पत्रिकारिता में महिलाओं की स्थिति पर कई बार आलेखों या अन्य मंचों के जरिए कईं सवालों को उठाया है। लेकिन इसके लिए कहीं भी निजी रूप से किसी एक व्यक्ति या किसी एक संपादक पर आरोप नहीं लगाया। एक प्रोफेशनल पत्रकार होने के नाते मैंने जब भी कुछ लिखा वह तथ्यों पर आधारित रिर्पोट या विश्लेषण रहा हैं इस में निजी रूप से किसी पर कोई आरोप या प्रत्यारोप को जगह नहीं दी। तथ्यों के आधार पर बात करें तो हकीकत यह है कि जब प्रेस इंस्टीटृसूट में राजकिशोर जी ‘विदुर’ हिंदी का काम देख रहे थे तो उन्होंर्ने 1998 में महिला पत्रकारो पर एक विशेष अंक निकालने के समय मुझे फोन कर राजधानी की महिला पत्रकारों की स्थिति पर रिसर्च आधरित एक लेख लिखने को कहा। यह लेख उन्होंने जुलाई-सितंबर 1998 के अंक में ‘महिला हो डेस्क पर रहो’ के शीर्षक से प्रकाशित किया। इस लेख में राजधानी से हिंदी में निकलने वाले सभी प्रमुख समाचारपत्रों में महिलाओं की संख्या का जिक्र करते हुए उनके कार्य और पद का विश्लेषण कर महिला पत्रकारों की स्थिति का जायजा लिया गया था। जनसत्ता के संदर्भ में इसमें लिखा गया था कि ‘‘इस समय यहां 6 महिलाएं संपादकीय विभाग में हें। उन में दो महिलाएं स्थानीय रिर्पोटिग में हैं लेकिन उन्हें संवाददाता का दरजा हासिल नहीं......... शेष तीन महिलाएं रविवारी यानी फीचर विभाग में ही है। हैरानी की बात तो यह है कि इसी समाचारपत्र समूह के अग्रंेजी समाचारपत्र में राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख, स्थानीय संपादक जैसे प्रमुख पदों पर महिलाएं नियुक्त है।........’’ इसके अलावा वहां की महिला पत्रकारों द्वारा महिलाओं को रिपोर्टिंग में न लिए जाने की शिकायत का जिक्र था। इसी प्रकार का विश्लेषण नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान के संदर्भ में भी किया गयाा था। यह आकलन आंकड़ों पर आधारित था और इसमें किसी संपादक या ‘‘प्रभाष जोशी देखते नहीं़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं हुआ था। उस समय प्रभाष जी विदुर के सलाहकार संपादक थे और जिस अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ उसमें भी उनका नाम भी बतौर सलाहकार संपादक प्रकाशित हुआ था।&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;दूसरा आश्चर्य&lt;/span&gt; और दुख मुझे प्रभाष जी के संबोधन से हुआ उनका लिखना कि ‘‘एक अन्नू आनंद....ऐसा आभास देता है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति का जिक्र कर रहे हैं जिससे वे परिचित नहीं। जबकि पिछले वर्ष तक प्रेस इंस्टीटयूट में काम करने के करीब दस साल के अंतराल के दौरान प्रभाष जी से कई बार मिलना हुआ। भले ही वह टिहरी की यात्रा हो या तिलोनिया की या कोई बैठक या फिर मेरा हर दो माह के बाद उनको संपादकीय या आलेख लिखने का अनुरोध उन्होंने हमेशा ही बेहद आत्मीयता से बात की। मिलने पर भी उन्होंने अक्सर स्नेह से सिर पर हाथ रख का अपने बड़प्पन का परिचय ही दिया। इस दौरान उन्होंने कभी मेरे ऐसे किसी लेख या मेरे द्वारा उनके प्रति ऐसे किसी सोच का जिक्र नहीं किया। इससे पहले भी मैं उनके नेतृत्व में काम कर चुकी हूं। प्रभाष जी मेरे लिए सम्मानीय हैं वे हिंदी के सबसे वरिष्ठ पत्रकार हैं ऐसे में उनके साथ काम करने वालों की संख्या भी कोई कम बड़ी नही हैं। वर्ष 1991 में जनसता के रिपोर्टिंग विभाग में मैं पहली महिला थी जिसने रिपोर्टर के रूप में यहां काम किया था। उस समय प्रभाष जी जनसत्ता मे संपादक थे। हांलाकि उस समय मेरी नियुक्ति लोकसभा चुनाव के कारण पैदा हुई इलेक्शन वकेंन्सी के तहत अंशकालीन संवाददाता के रूप में ही हुई थी लेकिन मेरे लिए वह नौ महीने का कार्यकाल अविस्मरणीय रहा क्योंकि उस दौरान मुझे चीफ रिपोर्टर कुमार आनंद के अलावा आलोक तोमर सुशील कुमार सिंह सहित अन्य सभी वरिष्ठ साथियों का जो सहयोग मिला वह अक्सर महिलाओं को कम नसीब होता है। प्रभाष जी से सीधी मुलाकात कम होती थी लेकिन जब मेरी कोई स्टोरी प्रथम पेज पर छपती तो उनका रिर्पोटिग में चक्कर लगाने के दौरान मुझे ‘अन्नू की बजाय ‘इंदु’ कह कर हाथ उठाकर शाबशी देना और फिर अपनी भूल पर हल्का सा मुस्कुराना मुझे अभी भी याद है। इस लंबे परिचय के बाद उनका अचानक अपने महिला समर्थक तर्कों में मेरे बारे में गलत तथ्यों का बयान आश्चर्य पैदा करता है। उम्मीद है कि मेरे इस स्पष्टीकरण से इस संबंध में पैदा हुई गलतफहमी दूर हो सकेगी। कागद कारे प्रभाष जी का कालम है इसमें वे किसी को कैसे भी संबोधित करें और उसके बारे में लिखें इसका उन्हें पूरा अधिकार हो सकता है लेकिन किसी का उल्लेख करते समय तथ्य सही हों और उसके स्वाभिमान को ठेस न पहुुंच इतनी अपेक्षा तो की जा सकती है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद पूर्व संपादक ‘विदुर’ प्रेस इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-4322424536443333628?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/4322424536443333628/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=4322424536443333628' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4322424536443333628'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/4322424536443333628'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='मैंने ऐसा कहां लिखा, प्रभाष जी ?'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-3731691601178395545</id><published>2009-08-31T00:46:00.000-07:00</published><updated>2009-08-31T00:50:59.882-07:00</updated><title type='text'>पंचायतों में बढ़ी महिलाओं की ताकत</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SpuAsTZR1aI/AAAAAAAAAG8/miLwGE6J3A0/s1600-h/image002.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376032078805718434" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 242px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SpuAsTZR1aI/AAAAAAAAAG8/miLwGE6J3A0/s320/image002.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;आखिर यूपीए सरकार ने दुबारा सत्ता में आने के बाद अपना वादा पूरा करते हुए पंचायतों के सभी स्तरों पर महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। सरकार के इस फैसले की प्रंशसा की जानी चाहिए क्योंकि इससे लोकतंत्र की प्रक्रिया मजबूत होने के साथ महिलाओं के लिए शहरी निकायों, विधानसभा और संसंद की राह सुलभ हो सकेगी। इस संदर्भ में संसद के अगले सत्र में विधेयक लाया जाएगा। अभी तक केवल चार राज्यों मध्यप्रदेश, बिहार, उतराखंड, और हिमाचल प्रदेश में ही महिलाओं के लिए पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। शेष सभी राज्यों में 36.8 प्रतिशत सीटों पर करीब 10 लाख महिलाएं पंचायतों में मौजूद हैं। सरकार के इस फैसले के लागू होने से गावों की करीब 14 लाख महिलाएं पंचायतों के राज -काज में हिस्सेदारी कर सकेंगी। पिछले डेढ़ दशक के इतिहास को देखें तो पता चलेगा पंचायतों में भागीदारी ने ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक और राजनैतिक रूप से सबल बनाने का काम किया है। इस सबलता के चलते ये महिलाएं गांवों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए अपने अपने इलाकों में शराब -विरोधी, महिला हिंसा और अन्य लैंिगक भेदभावों की ओर मुखर हुई है। वर्ष 1994 में संविधान के तिरहतरवें संशोधन के जरिए लोकतं़त्र की इस पहली सीढ़ी पर महिलाओं ने कदम रखा था। डेढ़ दशक का यह सफर कोई आसान न था। पहले पांच सालों तक का समय सबसे चुनौतीपूर्ण था। यह वह दौर था जब घर की देहरी पार कर पंचायत की बैठकांे में आने वाली महिलाएं राजनीति के दांव पेच नहीं जानती थीं। अशिक्षा, अज्ञानता और समाज की पुरूषसतात्मक सोच ने इन महिलाओं के रास्तों में कम रूकावटें नहीं खड़ी कीं। वे पंचायतों की बैठकों में अकेले जाने से घबराती या किसी भी कागज पर मुहर लगाने जैसे फैसले लेने से हिचकिचातीं और ग्राम सभा का काम पतियों के भरोसे चलाती थीं। पंचायतों की महिला सरपंचों को ‘रबड़ स्टैम्प’ और उनके पतियों को ‘सरपंच पति’ कहा जाने लगा। लेकिन दूसरे चरण की शुरूआत में जब पुरूषों ने इन्हीं आरोपों का फायदा उठाते हुए उन्हें सता से बाहर करने की कोशिश की तो कुछ राज्यों में गैर आरक्षित सीटों पर भी महिलाएं जीत कर आईं। इसके अलावा बहुत सी महिलाएं धीरे -धीरे घर के पुरूष सदस्यों द्वारा पंचायत के कामकाज में दखल का विरोध करने लगीं। अब स्थिति यह है कि 86 प्रतिशत महिला प्रधान ग्राम पंचायतों की सभाओं को आयोजित करने और उसमें विकास के विभिन्न मुद्दों को उठाने का काम कर रहीं हैं। पिछले साल एसी नेल्सन ओआरजी मार्ग’ द्वारा अभी तक पंचायती राज पर कराई गई सबसे बड़ी सर्वे ने पंचायतों की महिलाओं द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य और अन्य जनहित मुद्दों पर मुखर होने का आंकड़ो सहित विश्लेषण किया है। सर्वे के मुताबिक करीब 58 से 66 फीसदी महिला प्रतिनिधि ग्रामीण बच्चों को स्कूलों में दाखिल कराने संबंधी कामों में जुटी हैं। इसके अलावा 41-51 प्रतिशत महिला प्रतिनिधी बीमारियों की रोकथाम के लिए अभियान चलाने और महिला स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के कामों में लगीं हैं जबकि बहुत सी महिलाओं ने प्रधान या वार्ड सदस्य बनने के बाद घर के विभिन्न मसलों पर उनकी राय लेने जैसे बदलावों की बात भी स्वीकारी। लेकिन हकीकत यह भी है कि बहुत सी पंचायतों में विकास से संबंधित बहुत से फैसले इसलिए लंबित पड़े हैं क्यों महिला सरपंच, उपसरपंच, मुखिया या प्रधान को पंचायत के पुरूष सदस्यों का समर्थन नहीं मिलता। निसंदेह 50 फीसदी आरक्षण के चलते बैठको में बढ़ने वाली महिला सदस्यों की संख्या से अब उनके राय मशवरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। जनहित के कामों में महिला नजरिए की बढ़ी ताकत का फायदा पूरे समाज को मिलेगा। लेकिन आरक्षण की अवधि कम होने के कारण इन महिलाओं को भी उन्हीं दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। पूर्व पंचायतीराज मंत्री मणि शंकर अययर ने स्वीकारा था कि ग्राम पंचायत में पहली बार आने वाली महिला अनुभव न होने के कारण अधिक सार्थक भूमिका नहीं निभा पाती लेकिन जब तक वह अनुभव हासिल करती है आरक्षण की अवधि खत्म हो जाती है। सर्वे के आकड़े भी इस बात के पक्षधर हैं कि महिलाओं को पर्याप्त प्रषिक्षण न मिलने और उन्हें दूसरी बार चुनाव लड़ने का मौका न मिलने के कारण वे अपनी काबिलियत साबित नहीं कर पातीं। इसलिए य िजरूरी है कि आरक्षण की अवधि बढ़ा कर 10 साल कर दी जाए। इसके अलावा इन महिलाओं को प्रशासनिक प्रशिक्षण देने के संसाधनों की तरफ भी सरकार को ध्यान देना होगा। फिलहाल इसके लिए एनजीओ की मदद से कुछ अकादमियों और प्रशिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था है लेकिन वे मौजूदा सदस्यों को प्रशिक्षण देने के लिए ही पर्याप्त नहीं। मघ्यप्रदेश, हरियाण जैसे राज्यों में ऐसी कईं महिला सदस्य प्रशिक्षण के अभाव में अपनी सार्थकता साबित नही कर पा रहीं। बिहार, छत्तीसगढ़ सहित पंचायतों की महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों और जीविका अर्जन की अन्य योजनाओं से जुड़ कर गांवों का जो कायाकल्प किया है वह आने वाले समय में पंचायतों में महिलाओं की बढ़ी तादाद के साथ एक बड़ी क्रांति बन कर सामने आएगा। (यह आलेख 29 अगस्त 2009 को दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-3731691601178395545?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/3731691601178395545/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=3731691601178395545' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3731691601178395545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/3731691601178395545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='पंचायतों में बढ़ी महिलाओं की ताकत'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_R6r03gQ_J3A/SpuAsTZR1aI/AAAAAAAAAG8/miLwGE6J3A0/s72-c/image002.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-5766169271748687942</id><published>2009-08-27T00:26:00.000-07:00</published><updated>2009-08-27T00:46:34.111-07:00</updated><title type='text'>स्त्री विमर्श के कुछ अहम सवाल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;स्त्री में किसी भी परिस्थिति, वातावरण में स्वयं को ढालने की क्षमता गजब की है। अपनी इस कला में वह इस कदर माहिर है कि इसके लिए वह स्वयं को पूरी तरह भुला देती हैं। खासकर विवाह के बाद वह जिस प्रकार अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को भूलकर एक नया अवतार धारण करती है उससे मुझे बेहद झल्लाहट होती है। अपनी इस अदाकारी के लिए वह प्रशंसा की पात्र है या नहीं की इस पर मेरी सोच अलग हो सकती है। लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैं हर दूसरी स्त्री में अपना वजूद मिटाकर भी खमोश, संतुष्ट और सहज रहने वाली ‘कलाकार स्त्री’ के दर्शन करती हूं। इसलिए मेरा संताप बढ़ता ही जा रहा है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कुछ समय पहले मुझे अपनी बेहद पुरानी सहेली से मिलने का अवसर मिला। मेरे लिए उससे मिलना किसी उत्सव से कम नहीं था। इस सहेली से मैंने अपने स्कूल और कालेज के दिनों में बहुत कुछ सीखा था। शलिनी, उसके नाम से ही मैं स्कूल के दिनों में रोमांचित हो जाती थी। पढ़ाई में तो वह हमेशा अव्वल आती ही थी। अन्य पढ़ने लिखने के कामों मे भी उसका दिमाग खूब चलता था। उससे प्रतिस्पर्धा के चलते अक्सर मेरी उत्सुकता रहती कि कोई किताब ऐसी न रह जाए जिसे पढ़ने में वह मेरे से आगे निकल जाए। नईं चीजांे को जानने समझने की उसे हमेशा उत्सुकता रहती। हर विषय में उसकी महारत मेरी हर चुनौती की प्रेरणा बनती। उसकी प्रतिभा, वाक-शैली और विचारों के कईं ट्राफीनुमा साक्ष्य, सालों तक स्कूल और कालेज में प्रिसींपल के आफिस की शोभा बढ़ाते रहे। उसे जब पता चला कि मैं षहर में हूं तो वह मुझसे मिलने आई फिर हम दोनों मिलकर उसके घर गए। मैं उससे 13 सालों में शादी के बाद पहली बार मिल रही थी। उसकी शादी स्कूल में दसंवी कक्षा तक हमारे साथ पढ़ने वाले एक लड़के के साथ हुई थी। कक्षा की सबसे तेज और बुदिजीवी लड़की का विवाह अमुक लड़के से होने की बात जानकर मुझे पहले थोड़ा अजीब अवश्य लगा लेकिन जल्द ही मैंने इसे दकियानूसी सोच मानते हुए झटक दिया और उसकी घर-गृहस्थी की बातें सुनने लगी। हंसते हुए उसने बताया कि ‘‘मैनें स्वयं कभी नहीं सोचा था कि इनसे मेरा विवाह होगा वह भी अरेंज’’। बातचीत का सिलसिला लंबा चला। बातचीत में ‘‘ये कहते हैं’’, ‘‘इन्होंने बताया’’ ‘‘इन्हीं को पता है’’, जैसे वाक्यों की गिनती घड़ी की आगे बढ़ती सुइयों के साथ बढ़ती जा रही थी। उसकी बातों का केंद्र पति, बच्चे और ‘‘हमारे यहां तो ऐसा होता है’’ जैसे विशयों पर ही रहा। चलने का समय हो गया था। शालिनी को अपने घर परिवार में खुश और संतुष्ट देखकर मुझे संतोष हुआ। लेकिन मेरे मन में उस की दबी बैठी छवि कुछ ओर जानने के लिए उत्सुक थी इसलिए पूछ बैठी, ‘‘अरे भई तुम्हारी किताबों का कलेक्शन तो बहुत बढ़ गया होगा क्या वह नहीं दिखाएगी। इतने सालों में तो तुमने ढेरों बुक्स जमा कर ली हांेगी। उसने हैरत से मुझे देखते हुए पूछा, ‘‘कौन सी किताबें भई? मैंनें तो कभी कोई किताब नहीं पढ़ी। अरे, तुम्हें याद नहीं स्कूल और कालेज में तो तू कोई भी किताब आते ही पढ़ लेती थी। दरअसल किताबें पढ़ने की आदत तो मुझे तुमसे ही पड़ी। उसने जैसे कुछ याद करते हुए जबाब दिया, ‘‘अरे तब। वह तो और बात थी तब तो स्कूल -कालेज के दिन थे। मैनें तो अरसे से किसी किताब को हाथ भी नहीं लगाया।’’ &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वास्तव में उसके करीने से सजे सजाए पूरे घर में न तो कोई किताबों की अलमारी नजर आई और न ही कोई षेल्फ। घर लौटते हुए मैं हल्के से सिदंूर से सजी मांग, हाथों में चूड़ियां और मुंह में ‘इन्होंने कहा’ की रंटत वाली शालिनी में कभी स्कूल-कालेज के विभिन्न आयोजनों पर स्वतंत्रता, दहेज, विधवा विवाह और बालगंगाधर तिलक, जैसे शूरवीरों पर अपने वक्तव्यों से कईं प्रतियोगियों के छक्के छुड़ाने वाली शालिनी की छवि ढूंढ रही थी। शालिनी को मिलने के बाद कईं दिन तक मुझे यह बात कचोटती रही कि क्या शालिनी को इस बात का अहसास है कि अपने घर परिवार की सेवा में वह अपनी वास्तविक अस्तित्व को होम कर चुकी है। शायद नहीं या फिर वह जानना नहीं चाहती। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मीनू या मिसेज श्रीवास्तव। हम आस-पड़ोस की महिलाएं उसे इसी नाम से जानते हैं। मेरी पहली मुलाकात उससे उस समय हुई जब वह हमारे पड़ोस में अपने दो साल के बच्चे और पति के साथ रहने के लिए आई। उस समय मेरी बेटी की उमर भी यही थी इसलिए हम अक्सर मिलने लगे। मीनू सीधी-साधी गृहणी। उसका सारा दिन पति और बच्चे के इर्द-गिर्द उनकी इच्छाओं को पूरा करने में बीतता। खुद घूमने कहां जाएं, बच्चों को घूमने कहां ले जाएं, मिलकर खाना कब खाएं, बच्चों को कौन से स्कूल में डालें हर एक बात का उसके पास संक्षिप्त सा उतर होता ‘इनससे पूछकर बताऊंगी’। उसे साड़ी पहनना बहुत पसंद है। हमें भी वह साड़ी में बेहद अच्छी लगती लेकिन जब भी हम कहते तुम साड़ी क्यों नहीं पहनती तो उसका जवाब होता ‘इन्हे’ं मेरा सूट पहनना पसंद है। एक बार बातों बातों में उसने बताया कि जानते हो कभी कभी मेरा मन क्या चाहता है कि मुझे पंख लग जाएं और मैं जी भरकर आकाष में उडं़ू। ऐसे ही एकबार जब मैं उसके घर में बैठी और वह घर की सफाई कर रही थी तो मेरी नजर एक फाइल पर पड़ी जिस पर लिखा था। डा ममता त्रिवेदी। मैंने पूछ लिया यह डा ममता त्रिवेदी कौन है? उसने बताया अरे मेरा ही नाम ममता है और मेैने संस्कृत में पीएचडी की है इसलिए मैं डा,ममता त्रिवेदी हुई। उसी बातचीत में उसने बताया कि अव्वल दर्जे में पीएचडी करने के बाद उसे कालेज में पढ़ाने क्ी नौकरी मिल रही थी। उसे लेक्चरर बनना बेहद पसंद भी है। लेकिन उसका कहना था बच्चे के साथ यह संभव कैसे होता। मैंने उससे समझाते हुए सवाल किया कि मेरी बेटी भी तो तुम्हारे बेटे जितनी है और हमारी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी समान है, मैं भी तो नौकरी कर रही हूं। उसका जवाब था लेकिन ‘इन्हे’ं पसंद नहीं। इसलिए मैंने काम करने का विचार त्याग दिया। मेरी डिग्री भी बेकार गई पर क्या करूं। आखिर पति के अगेंस्ट भी तो नहीं जाया जा सकता। मीनू के इस समझौतेवादी रवैये की मैं प्रशंसा करूं कि वह कमसे कम अपनी इच्छाओं को मार कर ही सही घर-परिवार में सुख शांति तो बनाए बैठी है या उसकी मन की दमित इच्छाओं और उसके अस्तित्व को खोने का दुख मनाउं। बात केवल एक मीनू की होती तो मैं शायद संतोश कर लेती। लेकिन अपने वजूद को मिटाकर अपनी इच्छाओं का गला घोटकर भी अपने परिवारों में हंसती इठलाती महिलाएं हर तरफ दिखाई पड़ जाएंगी। ‘अंडजेस्टमेंट’ की बलि पर चढ़ने के लिए तैयार वह भी बिना किसी षिकवे षिकायत के। बचपन से ‘हर हाल में अडजेस्टमेंट’ की घुट्टी शादी के बाद इस कदर असर दिखाती है कि वह यह जानना ही नहीं चाहती कि उसकी शिक्षा, उसका ज्ञान उसकी सोच भी समाज के विकास के लिए उतना ही अहम है जितना कि पुरूष का। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;पिछले सप्ताह गयाहरवीं में पढ़ने वाली मेरी बेटी की एक सहेली की मां से स्कूल के एक आयोजन में मुलाकात हुई। शुरूआती औपचारिकता को निभाते हुए वह कहने लगी मेरी बेटी आपकी बेटी की बेहद तारीफ करती है कि वह बहुत लायक है। फिर दूसरे ही क्षण वह मुझसे बोली लेकिन वह अपने नाम के साथ सरनेम क्यों नहीं लगाती? इससे पहले कि मैं कोई जवाब देती वहां खड़ी हम दोनों की परिचित एक अन्य महिला ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा अरे इनका सरनेम अलग है और इनके पति का अलग। फिर इनकी बेटी किसका सरनेम लगाए। पहली वाली महिला ने हैरत से कहा, ‘‘ऐसे कैसे हो सकता है पति- पत्नी का सरनेम तो एक ही होता है’’। मैनें थोड़ा संयत होते हुए कहा कि मैं अपनी इच्छा से अपने नाम के साथ शादी के पहले वाला सरनेम ही लगाती हूं। इतना सुनते ही शिक्षित, सभ्य और आधुनिक लिबास में लिपटी उस महिला ने अग्रेंजी में कहा, ‘‘इसमें अपनी इच्छा की बात कैसे हो सकती है, शादी के बाद तो सरनेम अपने आप ही बदल जाता है। इसमें अपनी मर्जी और नामर्जी की बात कहां से आई? हमने तो ऐसा कभी सोचा नहीं। लेकिन आपकी बेटी को तो पिता का सरनेम ही लगाना चाहिए वह ज्ञान दे रही थी ओर मैं यह सोच रही थी कि स्त्री अपने नाम को क्यों बदले इसके प्रति वह सोचना तक भी नहीं चाहती। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;स्त्री पुरूष में विषमता की जड़े तो मुझे इस पढ़े लिखे वर्ग में भी कम होते दिखाई नहीं पड़ती। चुटकी से सिंदूर और मंगलसूत्र में लिपटी वह अपने को एक सधे सधाए खांचे में देखने और उस पर खरी उतरने में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है। जिन परिवारों में महिलाओ ने ंिसंदूर ओर मंगलसूत्र को त्याग दिया है वे भी अपने अपने हर छोटे बड़े फैसले के लिए पुरूष पर ही निर्भर करती हैं। वे भी बिना किसी संकोच के। ऐसी महिलाओं का प्रतिशत कितना होगा जिनके नाम का बैंक में अपना या ज्वांइट एकाउंट होगा? कितनी प्रतिशत परिवारों में घर पति और पत्नी दोनों के नाम पर होता है? कितनी प्रतिशत महिलाएं बिना पति की आज्ञा के बैंक से पैसा निकाल पाती हैं। ऐसी महिलाओं की संख्या कितने प्रतिशत होगी जिनसे घर के अहम फैसलों में राय ली जाती हो। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो मध्यम वर्ग की हर स्त्री अपने सामान्य परिवारिक अधिकारों को ही नहीं जानती। लेकिन इस सोच को हम चुनौती बहुत कम देते हैं। स्त्री विमर्श की बहसों में अक्सर जब मध्यम वर्ग की महिलाओं के अधिकारों की बात होती हैं तो अधिकतर बहसें भू्रण हत्याओं, महिला हिंसा पर थोड़ा ज्ञान बखारने के बाद स्त्री के यौन अधिकारो की ओर मुड़ जाती हंै। इन दिनों यह रिवायत कुछ अधिक ही दिखाई पड़ रही है। (शायद टीआरपी के खेल के चलते)। स्त्री केे यौन अधिकार एक बड़ा मसला है इससे इंकार नहीं लेकिन जिस समाज में वह पुरूष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व ढूंढती हो, अपने नाम से अधिक ‘मिसेज फलां’ कहलाने में गर्व महसूस करती हो, जो अपने हर छोटे बड़े फैसले के लिए पति पर निर्भर हो औरे अपनी इच्छाओं अपने वजूद को भुलाकर जीने के आदी हो चुकी हो उनसे से उम्मीद करना कि वे पति के साथ दैहिक संबंधों में अपने सुख, अपनी इच्छा- अनिच्छा को तरजीह दे। कैसे संभव है। स्त्री को यौन सुख के अधिकार का पाठ पढ़ाने वालों के लिए जरूरी है कि वे पहले उसे अपने अस्तित्व को पहचानने की सीख दें। जब वह घरेलु हकों के साथ परिवार के आर्थिक- सामाजिक तथा अन्य छोटे बडे मसलों में फैसले लेने की हकदार बन जाएगी तो शारीरिक संबंधों में अपने सुख को तलाशने की परिपक्वता भी हासिल कर लेगी। फिलहाल तो वह परिवार में अपने अस्तित्व की पहचान कायम रखने की अधिक हकदार है। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4074732043239288798-5766169271748687942?l=ansuniaawaz.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/feeds/5766169271748687942/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4074732043239288798&amp;postID=5766169271748687942' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5766169271748687942'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4074732043239288798/posts/default/5766169271748687942'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ansuniaawaz.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='स्त्री विमर्श के कुछ अहम सवाल'/><author><name>Annu Anand अन्नू आनंद</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16569014454732741730</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://bp2.blogger.com/_R6r03gQ_J3A/SJgIZ__9doI/AAAAAAAAAAM/pcVJRMY4aLM/S220/annu+anand+latest.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4074732043239288798.post-6756029819731241856</id><published>2009-03-28T06:54:00.000-07:00</published><updated>2009-03-28T07:00:45.016-07:00</updated><title type='text'>चुनावों में हुई भूखों की चिंता</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;अन्नू आनंद&lt;br /&gt;कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सबके लिए अनाज का कानून देने का वादा किया है। घोषणा पत्र में सभी लोगों को खासकर समाज के कमजोर तबके को पर्याप्त भोजन देने  देने का वादा किया गया है। पार्टी ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले हर परिवार को कानूनन हर महीने 25 किलो गेंहू या चावल तीन रुपए में मुहैया कराने का वादा किया है। पार्टी की घोषणा लुभावनी लगने के साथ हैरत भी पैदा करती है कि अचानक कांग्रेस को देश के भूखों की चिंता कैसे हो गई। अभी तक पार्टी मंदी में भी आर्थिक वृद्दि के आंकड़ों को संतुलित रखने और औसत आय बढ़ने पर इतरा रही थी। जबकि हकीकत में देश के ग्रामीण इलाकों में भूख और कुपोषण की स्थिति पिछले कुछ समय से लगातार बिगड़ने की तथ्यपरक रिपोर्टें आ रही हैं। लेकिन चुनावों को देखते हुए केंद्र सरकार सहित सभी राज्य सरकारों द्वारा ‘खुशफहमी’ का माहौल पेश करने की कोशिश चल रही है।पिछले माह इस ‘फील-गुड’ वातावरण को शर्मसार करने वाली और देश में अनाज के अभाव में भूख और कुपोषण की असली हकीकत को उजागर करती विश्व खाद्य कार्यक्रम और एम एस स्वामीनाथन फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में देश में खाद्य असुरक्षा के प्रति चांैक्काने वाले तथ्यों को प्रस्तुत कर सरकार को खबरदार करने की कोशिश की गई लेकिन उस समय यूपीए सरकार सहित राज्य सरकारों ने भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया ताकि चुनावों से पहले विभ्न्नि राज्यों में चल रहे विकास के राग की पोल न खुल जाए। लेकिन लगता है अब जब राहुल गांधी ने एमएस स्वामीनाथन को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की तो उनके सुझाव पर ही कांग्रेस ने चुनावी घोषणाओं में ‘सबको अनाज’ देने को प्राथमिकता के तौर पर लिया।&lt;br /&gt;यह रिपोर्ट इस बात की ओर स्पष्ट हिदायत देती है कि केंद्रीय और राज्य सरकारों के लिए अभी सबसे बड़ी जरूरत देश के लोगों को दो वक्त पोषित भोजन उपलब्ध कराने की है ताकि भारत में सब से अधिक भूख और कुपोषण होने का कलंक मिटाया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के सभी देशों में भारत में भूखे रहने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। भारत विश्व के भूख चार्ट में पहले नंबर पर है। ‘ग्रामीण भारत में खाद्य असुरक्षा’ की स्थिति पर जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में सबसे अधिक 23 करोड़ लोग अल्प-पोषित हैं। विभिन्न राज्यों के गावों में की गई इस सर्वे में 19 में से 11 राज्यों मंे 80 प्रतिशत से अधिक बच्चे एनीमिया के शिकार पाए गए और एनीमिया के अनुपात में पिछले छह सालों में 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शायी गई है। केवल यही नहीं रिपोर्ट में भारत में पांच वर्ष से कम उमर वाले कुपोषित बच्चों की संख्या भी सबसे अधिक 47 फीसदी बताई गई है जो कि सब-सहारा अफ्रीका की 28 प्रतिशत से भी अधिक है। पांच से कम आयु वाले अविकसित बच
